मौसी की बेटी को रात के अंधेरे में जबरदस्ती तोड़ा, फिर शादी के बाद भी बार-बार उसके शरीर को चीरता रहा। दर्द, खून और मजबूर सिसकियों से भरी एक ऐसी दास्तान जो पढ़ते ही साँस रोक दे cousin sister chudai ।
दोस्तो, मेरा नाम अरमान खान है।मैं बिहार के एक छोटे से कस्बे से हूँ। मेरी उम्र उस समय 22 साल थी। हाईट 5 फीट 9 इंच, शरीर दुबला-पतला लेकिन कसा हुआ। यह मेरी जिंदगी की पहली और सबसे क्रूर सेक्स कहानी है। एकदम सच्ची।
उसकी उम्र मुझसे तीन साल ज्यादा थी—25। नाम था नजमा। मेरी मौसी की बेटी। बचपन से ही मुझे उसके शरीर पर नज़र थी। गेहुँआ रंग, कसा हुआ बदन, छाती 34 इंच की भारी और टाइट। कमर पतली, गांड गोल और उभरी हुई। जब भी मिलती तो उसके चुस्त सूट में निप्पल की नोक साफ दिखती। मैं रातों को उसी की कल्पना में मुठ मारता।
सर्दियों की एक रात। मौसी के घर गया था अम्मी के साथ। उनका घर पटना के किनारे एक पुरानी कॉलोनी में था—दो छोटे कमरे, दीवारें पतली। नजमा उस दिन काले रंग का सलवार-कुर्ता पहने थी। कुर्ता छाती पर इतना टाइट था कि उसके निप्पल की शक्ल साफ उभर रही थी। उसने मुझे देखा और धीरे से मुस्कुराई। उस मुस्कान में कुछ और था।
रात का खाना खाकर सब सोने चले। मौसी और अम्मी कमरे के अंदर की चारपाई पर। नजमा और मैं गेट के पास वाली दो चारपाइयों पर। बीच में मुश्किल से एक फुट का फासला। सर्दी तेज थी। रजाई ओढ़ ली। कमरे में एक छोटी सी बल्ब जल रही थी।
मैं लेटा-लेटा उसकी तरफ देख रहा था। रजाई उसके पेट तक थी। काले कुर्ते के नीचे उसकी भारी छातियाँ साफ उभरी हुई थीं। निप्पल की नोक खड़ी लग रही थी। मेरा लंड तुरंत सख्त हो गया। मैंने रजाई के अंदर हाथ डालकर अपना मोटा लंड पकड़ा और धीरे-धीरे सहलाने लगा। सोच रहा था—आज रात इसे तोड़ना है। इसकी वर्जिन चूत को फाड़ना है।
आधी रात को मेरी आँख खुली। सब गहरी नींद में थे। नजमा सीधी लेटी थी। रजाई उसके कमर तक खिसक गई थी। उसकी मोटी छातियाँ कुर्ते में तनी हुई थीं। मैंने धीरे से चारपाई पर सरककर उसके करीब आया। हाथ बढ़ाया और उसकी बाईं चूची पर हल्के से रखा। गरम और सख्त। निप्पल मेरी हथेली में चुभ रहा था।
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वह नींद में करवट ले ली। मेरा हाथ हट गया। मैंने थोड़ी देर इंतजार किया। फिर दोबारा हाथ बढ़ाया। इस बार पूरी हिम्मत से उसकी दोनों छातियों को पकड़ लिया। कुर्ते के ऊपर से निप्पल को उंगलियों में दबाया और मसलने लगा। वह हल्की सी कराह उठी लेकिन सोई रही। मैंने कुर्ते के अंदर हाथ डाल दिया। ब्रा नहीं थी। नंगी गरम छातियाँ मेरे हाथ में आ गईं। निप्पल पहले से ही खड़े थे। मैंने उन्हें नोंचते हुए मसलना शुरू किया। इतना जोर से कि मेरे नाखून उसके नरम मांस में धंस गए।
अब मैं और नीचे गया। सलवार के नाड़े को ढीला किया। उसके पेट पर हाथ फिराया—मुलायम और गरम। फिर सलवार के अंदर घुसाया। पैंटी नहीं थी। सीधा उसकी बालों वाली चूत पर हाथ लग गया। बाल घने और एक इंच लंबे। मैंने मुट्ठी भर बाल पकड़कर खींचे। वह कराह उठी लेकिन आँख नहीं खोली।
मैंने उसकी चूत की फाँक खोल दी। उंगली से फाँक के बीच के दाने को रगड़ने लगा। गीला हो रहा था। मैंने एक उंगली अंदर धकेल दी। टाइट। बहुत टाइट। वर्जिन चूत ने मेरी उंगली को कस लिया। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया। दो मिनट में उसकी चूत से पानी निकलने लगा। गरम, चिपचिपा। मैंने उंगली निकालकर चूस ली। स्वाद नमकीन और तीखा था।
फिर दो उंगलियाँ अंदर ठेल दीं। वह दर्द से कराह उठी। शरीर हिला। लेकिन मैं नहीं रुका। उंगलियों को जोर-जोर से अंदर-बाहर करने लगा। उसकी चूत की दीवारें फटने वाली थीं। खून की एक बूंद मेरी उंगली पर लग गई। वर्जिन सील टूट रही थी। मैंने और जोर लगाया। तीन उंगलियाँ अंदर ठेल दीं। वह छटपटा उठी। आँखें खुल गईं।
“क्या कर रहे हो… दर्द हो रहा है…” उसकी आवाज फुसफुसाहट में थी। डर और मजे का मिश्रण।
मैंने उसका मुँह अपने दूसरे हाथ से बंद कर दिया। “चुप रह। वरना मौसी और अम्मी दोनों जग जाएँगी। फिर देखूँगा क्या होता है।”
उसकी आँखों में डर था लेकिन चूत और गीली हो गई थी। मैंने उसका हाथ पकड़कर अपने सख्त लंड पर रख दिया। “पकड़ इसे। महसूस कर कितना मोटा है।”
वह काँप रही थी लेकिन लंड को पकड़ लिया। मैंने उसकी उंगलियों को अपने लंड पर फिराया। फिर दोबारा उसकी चूत में तीन उंगलियाँ धकेल दीं। इस बार पूरा जोर लगाकर। वह मेरे हाथ के नीचे कराह रही थी। आँसू निकल आए लेकिन चूत ने उंगलियों को निगल लिया। मैंने उंगलियों को घुमाते हुए उसकी अंदर की दीवारों को कुरेदना शुरू किया।
“और खोल… और फैला…” मैंने फुसफुसाया।
उसने अपनी टाँगें थोड़ी फैलाईं। मैंने सलवार को घुटनों तक खींच दिया। उसकी नंगी चूत और गांड मेरे सामने थी। बालों वाली, गीली, थोड़ी खून लगी। मैंने झुककर उसकी चूत पर मुँह लगा दिया। जीभ से फाँक चाटी। दाने को मुँह में लेकर चूसा। वह काँप उठी। दोनों हाथों से मेरे बाल पकड़ लिए।
मैंने उसकी गांड की दरार में भी उंगली घुसा दी। सूखी थी। जोर से धकेला। वह दर्द से चीखी लेकिन मेरे हाथ ने उसका मुँह दबा रखा था। अब उसकी चूत और गांड दोनों में मेरी उंगलियाँ थीं। एक साथ अंदर-बाहर। क्रूर। बिना किसी रहम के।
उसकी शरीर में ऐंठन चल रही थी। पसीना छूट रहा था। मैंने उसकी छातियों को फिर से नोंचना शुरू किया। निप्पल को दाँतों से काटने जितना जोर से दबाया। वह रो रही थी लेकिन चूत से पानी की धारा बह रही थी।
“झड़… झड़ जा अब…” मैंने उसके कान में कहा।
उसने सिर हिलाया। नहीं। लेकिन शरीर ने जवाब दे दिया। उसकी चूत ने मेरी उंगलियों को कस लिया। पूरे शरीर में कंपकंपी दौड़ गई। गर्म पानी की तेज धार मेरी हथेली पर गिरने लगी। वह झड़ गई। आँखें बंद, मुँह खुला, साँसें उखड़ी हुईं।
मैं रुका नहीं। उसकी चूत अभी भी ऐंठ रही थी। मैंने चार उंगलियाँ एक साथ अंदर ठेल दीं। पूरा हाथ लगभग घुसने वाला था। वह दर्द से काँप उठी। “नहीं… निकालो… फट जाएगी…”
“फटने दे। आज इसकी कुँवारपन की मिट्टी पलीद करनी है।”
मैंने अपना लंड उसकी गीली चूत पर रखा। सिरा फाँक में लगाकर जोर से धकेला। टाइट चूत ने सिरे को भी मुश्किल से लिया। मैंने कमर झटका। आधा लंड अंदर घुस गया। खून और पानी मिला। वह चीखने वाली थी लेकिन मैंने उसका मुँह और कसकर दबाया। पूरा लंड एक झटके में अंदर ठेल दिया।
उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। दर्द से शरीर अकड़ गया। मैंने बिना रुके धक्के लगाने शुरू कर दिए। जोर-जोर से। हर धक्के पर उसकी चूत की दीवारें फटती महसूस हो रही थीं। खून मेरी जांघों पर लग रहा था। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “देख… तेरी वर्जिन चूत कैसे फट रही है।”
वह रो रही थी लेकिन उसके पैर मेरे कमर के चारों तरफ लिपट गए थे। मैंने और तेज धक्के लगाए। बिस्तर चरमरा रहा था। कमरे में हल्की आवाज़ आ रही थी लेकिन सब गहरी नींद में थे।
मैंने उसे करवट दिलाई। पीछे से घुसा। एक हाथ से उसकी गांड की दरार में उंगली डाली। दूसरे हाथ से छाती नोंच रहा था। लंड उसकी चूत में पूरा अंदर-बाहर हो रहा था। हर धक्के पर उसकी गांड मेरे पेट से टकरा रही थी।
“अब इसकी गांड भी लूँगा।”
मैंने लंड निकाला। खून और पानी से लथपथ। गांड की सूखी दरार पर लगाया। जोर से धकेला। सिरा अंदर गया। वह दर्द से काँप उठी। मैंने और जोर लगाया। आधा लंड उसकी गांड में घुस गया। वह रो रही थी लेकिन आवाज़ नहीं निकाल पा रही थी। मैंने पूरा लंड ठेल दिया। उसकी गांड फट गई।
अब बारी-बारी चूत और गांड में धक्के लगाने लगा। एक बार चूत, दो बार गांड। उसकी शरीर ढीली पड़ रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा—“आज के बाद तू कभी किसी और को अपनी यह फटी हुई चूत और गांड नहीं दिखा पाएगी। याद रख।”
मेरा लंड फटने वाला था। मैंने आखिरी तेज धक्के लगाए और उसकी चूत के अंदर ही पूरा वीर्य उड़ेल दिया। गर्म धार अंदर बह रही थी। फिर निकाला और उसकी गांड में भी बाकी बचा वीर्य ठेल दिया।
वह सिसक रही थी। शरीर काँप रहा था। चूत और गांड दोनों से खून और वीर्य रिस रहा था। मैंने उसकी सलवार ऊपर खींच दी। रजाई ओढ़ा दी। खुद अपनी पैंट ठीक की।
सुबह होने में अभी दो घंटे थे। वह करवट लेकर मुँह फेर लेटी। आँसू उसके गालों पर सूख रहे थे। मैंने उसके कान में फुसफुसाया—“कल रात फिर आएगा मौका तो और बुरी तरह लूँगा।”
सुबह मौसी ने आवाज़ लगाई। नजमा उठकर किचन में चली गई। नाश्ता बनाते समय उसके चलने में दर्द साफ दिख रहा था। हम दोनों ने एक-दूसरे की तरफ नहीं देखा। दोपहर को हम घर लौट आए।
उसके छह महीने बाद उसकी शादी हो गई। अब उसके तीन बच्चे हैं। जब कभी मिलते हैं तो उसकी आँखों में वही डर और याद बची रहती है। वह मुस्कुराती है लेकिन उसकी मुस्कान में वह रात हमेशा जिंदा रहती है।
उस रात के बाद हम घर लौट आए। लेकिन मेरी भूख नहीं बुझी थी। नजमा की फटी हुई चूत और गांड की याद दिन-रात सताती रही। तीन हफ्ते बाद मौसी की तबियत खराब होने का बहाना बनाकर मैं अकेले ही उनके घर पहुँच गया। शाम के साढ़े सात बजे। अम्मी को घर पर छोड़ आया था।
नजमा किचन में थी। काले सूट में। उसने मुझे देखा तो चेहरा सफेद पड़ गया। आँखों में वही डर। मैंने दरवाजा बंद किया। मौसी और फूफाजी बाजार गए हुए थे। घर में सिर्फ हम दोनों।
मैंने बिना एक शब्द बोले उसके बाल पकड़कर किचन की दीवार से धक्का दिया। उसके मुँह पर हाथ रखा। “उस रात की अधूरी बात आज पूरी करूँगा। आज तेरी दोनों छेद इतने फाड़ूँगा कि तू चल भी नहीं पाएगी।”
उसने हाथ जोड़कर मना किया। आँसू बहने लगे। मैंने उसके कुर्ते को चीर दिया। छातियाँ बाहर निकल आईं। निप्पल पहले से काले और सख्त। मैंने दाँतों से एक निप्पल काट लिया। खून की बूंद निकली। वह चीखी। मैंने दूसरा निप्पल भी दाँतों में दबाया और खींचा।
सलवार नीचे खींच दी। पैंटी नहीं थी। उसकी चूत पर अभी भी हल्के निशान और बालों के बीच सूखा खून चिपका था। मैंने उसे जमीन पर धकेल दिया। पेट के बल लिटाया। दोनों हाथ पीछे बांध दिए अपनी बेल्ट से। फिर उसकी गांड के दोनों हिस्से फैलाए।
“आज पहले गांड लूँगा। पूरी।”
लंड निकाला। पहले से सख्त और नसों से भरा। थूक लगाकर उसकी गांड की सूखी दरार पर लगाया। बिना किसी तैयारी के पूरा जोर लगाकर धकेला। सिरा अंदर घुसा। वह दर्द से चीखी। मैंने और जोर लगाया। आधा लंड उसकी गांड में धंस गया। दीवारें फटने का अहसास हो रहा था। मैंने कमर झटका। पूरा लंड एक ही धक्के में अंदर।
उसकी गांड से खून निकलने लगा। मैंने धक्के तेज कर दिए। हर धक्के पर उसकी गांड की मांसपेशियाँ फटती महसूस हो रही थीं। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “चिल्ला। और जोर से चिल्ला। किसी को सुनाई नहीं देगा।”
दस मिनट तक उसकी गांड में ही बर्बरता से धक्के लगाता रहा। खून मेरी जांघों पर बह रहा था। फिर लंड निकाला। खून से लथपथ। सीधा उसकी चूत में ठेल दिया। वर्जिन सील पहले ही टूटी हुई थी लेकिन अभी भी टाइट। मैंने दोनों छेदों में बारी-बारी धक्के लगाने शुरू किए। एक बार गांड, दो बार चूत।
उसके मुँह में अपनी चार उंगलियाँ ठेल दीं। गला तक। वह उल्टी करने वाली थी लेकिन मैं नहीं रुका। “चाट। अपने खून का स्वाद चख।”
मैंने उसे घुटनों के बल बैठाया। लंड उसके मुँह में ठेल दिया। पूरा। नाक तक। वह दम घुटने लगी। आँखों से पानी बह रहा था। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे किया। गले की दीवारें मेरे लंड से रगड़ खा रही थीं। थूक और लार उसके मुँह से बाहर निकल रही थी।
फिर उसे चारपाई पर लिटाया। दोनों टाँगें उसके कंधों तक मोड़ दीं। चूत पूरी तरह खुली। मैंने मुट्ठी बनाने की कोशिश की। चार उंगलियाँ अंदर। फिर अंगूठा। धीरे-धीरे पूरी मुट्ठी उसकी चूत में धकेलने लगा। वह चीख रही थी। शरीर ऐंठ रहा था। खून की धार बह निकली। मैंने मुट्ठी अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी। उसकी चूत की दीवारें फट रही थीं।
“आज इसकी कुँवारपन की आखिरी निशानी भी मिटा दूँगा।”
मुट्ठी निकालकर लंड दोबारा ठेल दिया। इतनी तेज गति से कि चारपाई हिलने लगी। उसके निप्पल नोंचते हुए, गांड में उंगली डालते हुए, चूत में बर्बर धक्के। मेरा लंड फटने वाला था। मैंने आखिरी दस धक्के इतने जोर से लगाए कि उसकी चूत से खून की धार तेज हो गई। फिर पूरा वीर्य उसकी गर्भ तक उड़ेल दिया।
निकाला। खून और वीर्य मिला हुआ। उसकी गांड में भी बाकी बचा ठेल दिया। फिर उसे खड़ा किया। दीवार से लगाकर फिर से गांड में घुसा। इस बार खड़े-खड़े। उसके बाल पकड़कर सिर दीवार से टकराते हुए धक्के।
एक घंटे तक लगातार दोनों छेदों का इस्तेमाल करता रहा। जब मेरा लंड ढीला पड़ा तो मैंने उसे जमीन पर बैठाया। उसके मुँह में अपना लंड डालकर दोबारा खड़ा किया। गला तक। फिर से दोनों छेदों में।
रात के ग्यारह बजे मौसी-फूफाजी लौटे। मैंने जल्दी से उसके कपड़े ठीक किए। खून के निशान कुर्ते से पोछ दिए। वह चल भी नहीं पा रही थी। दर्द से काँप रही थी। मैंने उसके कान में कहा—“अगली बार और बुरा होगा। याद रखना।”
मैं रात भर उसी कमरे में सोया। सुबह उठकर देखा तो वह किचन में थी। चलते समय उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। चूत और गांड दोनों से अभी भी हल्का खून रिस रहा था। उसने मुझसे आँख नहीं मिलाई।
उसके बाद मैं महीने में दो-तीन बार अकेला जाने लगा। हर बार और क्रूर। कभी रस्सी से बांधकर, कभी उसके मुँह में कपड़ा ठूंसकर, कभी उसकी छातियों पर सिगरेट के जलने के निशान बनाकर। एक बार मैंने उसकी चूत में मोमबत्ती का मोटा सिरा ठेल दिया और जलाया। गर्म मोम उसकी अंदर की दीवारों पर गिर रहा था। वह बेहोश हो गई थी।
शादी से एक हफ्ता पहले आखिरी बार गया। उस रात मैंने उसे इतना फाड़ा कि सुबह तक वह बिस्तर से उठ भी नहीं पाई। चूत और गांड दोनों से खून की धार बह रही थी। मैंने उसके पूरे शरीर पर अपने नाखूनों से खरोंच डाल दी थीं। गर्दन पर दाँत के निशान। निप्पल सूजे हुए और काले।
शादी हो गई। तीन बच्चे हो गए। लेकिन जब भी मौसी के घर जाता हूँ तो नजमा की आँखों में वही खौफ दिखता है। कभी-कभी रात को जब सब सो जाते हैं तो मैं उसके कमरे के बाहर खड़ा होकर सुनता हूँ—वह सिसकती है। कभी-कभी मैं दरवाजा खोलकर अंदर चला जाता हूँ। अंधेरे में। वह पहचान लेती है मेरी साँस। बिना एक शब्द बोले अपनी सलवार नीचे कर देती है। क्योंकि जानती है विरोध करने का नतीजा क्या होता है।
आज भी जब मैं उसकी फटी हुई, ढीली हो चुकी चूत में हाथ डालता हूँ तो वह काँपती है। और मैं हँसता हूँ। क्योंकि वह शरीर अब भी मेरा है। शादीशुदा होकर भी। बच्चों की माँ होकर भी।
दोस्तो,
यह सिलसिला अभी भी जारी है। कभी खत्म होने वाला नहीं। अगर तुम और सुनना चाहते हो कि शादी के बाद की रातों में मैंने उसे कितना तोड़ा, तो बस एक शब्द लिख देना।
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