रुबीना और ननद सीमा को ठेकेदार ने चोदा

शादीशुदा रुबीना और ननद सीमा को ठेकेदार काँटा गाँव ले जाकर तीन दिन बाँधता, चाबुक मारता, गाँड फाड़ता और जानवरों जैसा इस्तेमाल करता है। दर्द, अपमान और मजे का सबसे क्रूर खेल।

रुबीना जब घर पहुँची तो उसकी ननद सीमा ने दरवाज़ा खोला। सीमा की आँखों में शैतानी चमक थी। “दीदी, मिल आई क्या उस मोटे से? मज़ा आया?” रुबीना ने आँखें सिकोड़ते हुए कहा, “चुप कर। कुछ मत बोल।” सीमा हँसी, “आज तुम्हारा चेहरा देखकर लग रहा है कि तुमने ज़िंदगी में पहली बार असली मर्द चखा है। जाओ नहा लो, वरना पसीने की बदबू से पता चल जाएगा।”

रुबीना नहाई। आईने में उसने अपने शरीर को देखा—गोरी, गदराई जाँघें, भारी स्तन, और जाँघों के बीच अभी भी गीलापन। कल रात की याद आते ही उसके निप्पल सख्त हो गए। उसने मोबाइल उठाया, काँटा का नंबर देखा, फिर रख दिया। तभी फोन बजा।

काँटा: “कसी हो मेरी रंडी?” रुबीना का गला सूख गया। “मैं… ठीक हूँ।” काँटा: “सिर्फ़ ठीक? कल मैंने तुम्हारी चूत फाड़ दी थी। आज भी गीली हो क्या?” रुबीना चुप रही। काँटा: “बोल। वरना कल तुझे बाँधकर रखूँगा।” रुबीना ने धीमे से कहा, “हाँ… गीली हूँ।” काँटा हँसा। “अच्छा। कल से टिफ़िन मत ला। मैं खुद आऊँगा। और हाँ, कल अपनी पैंटी घर छोड़ देना। नंगी आना।”

रुबीना ने फोन काट दिया। दिल धड़क रहा था।
दूसरे दिन दोपहर में रुबीना काले बुर्के में निकली। हाथ में टिफ़िन नहीं था। काँटा की लोहे की दुकान के पीछे वाला पुराना गोदाम खाली था। काँटा पहले से अंदर था। उसने शटर बंद कर दिया और रुबीना को घसीटते हुए अंदर ले गया।

“कपड़े उतार,” उसने हुक्म दिया। रुबीना ने बुर्का उतारा। उसके नीचे सिर्फ़ ब्रा और सलवार थी। काँटा ने ब्रा के हुक फाड़ दिए। भारी स्तन बाहर निकल आए। उसने एक स्तन मुँह में भर लिया और दाँतों से निप्पल को काटा। रुबीना चीखी। “आह्ह्ह… दर्द हो रहा है!” काँटा: “दर्द ही तो मज़ा है। चुपचाप सह।”

उसने रुबीना को दीवार से सटाया, सलवार नीचे खींची और घुटनों के बल बैठा दिया। अपनी मोटी उँगलियाँ चूत में घुसाईं। दो उँगलियाँ एक साथ। रुबीना की कमर ऐंठ गई। “इतनी गीली? तू तो तैयार बैठी थी।” काँटा ने अपनी धोती खोल दी। काला, मोटा, नसों वाला लंड बाहर निकला। उसने रुबीना के बाल पकड़कर मुँह में ठूँस दिया। “चाट। अच्छे से।”

रुबीना ने आँखें बंद करके चाटा। लंड गले तक चला गया। काँटा ने सिर दबाया और धक्के लगाने शुरू कर दिए। रुबीना की आँखों से आँसू बहने लगे, लेकिन उसने विरोध नहीं किया। थोड़ी देर बाद काँटा ने लंड निकाला और रुबीना को ज़मीन पर पटक दिया।
“टाँगें फैला।” रुबीना ने फैला दीं। काँटा ने बिना किसी तैयारी के पूरा लंड एक झटके में चूत में घुसेड़ दिया। “आआआह्ह्ह्ह!” रुबीना की चीख निकली। काँटा ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। “आवाज़ मत निकाल। वरना और ज़ोर से दूँगा।”

वह धक्के लगाने लगा—भारी, गहरे, बेरहम। हर धक्के के साथ रुबीना का शरीर आगे-पीछे हो रहा था। स्तन हिल रहे थे, जाँघें काँप रही थीं। काँटा ने उसके दोनों हाथ पीछे बाँध लिए और बाल पकड़कर सिर ऊपर खींचा। “अब बोल—‘मैं तुम्हारी रंडी हूँ’।” रुबीना हाँफते हुए बोली, “मैं… तुम्हारी रंडी हूँ।” “ज़ोर से!” “मैं तुम्हारी रंडी हूँ!”

काँटा और तेज़ हो गया। उसने एक हाथ से रुबीना की गर्दन दबाई। साँस फूलने लगी। उसी पल रुबीना झड़ गई। चूत से पानी फूट पड़ा। काँटा हँसा। “देखा? गला दबाने से झड़ती है तू।”
उसने लंड निकाला, रुबीना को घुमाया और घोड़ी बना दिया। फिर से लंड अंदर घुसाया।

अब वह गाँड की दोनों गोलइयों को जोर-जोर से थप्पड़ मार रहा था। लाल निशान पड़ गए। “यह गाँड मेरी है। समझी?” रुबीना सिर हिलाती रही। काँटा ने थूक लगाया और एक उँगली गाँड में घुसा दी। रुबीना सहम गई। “नहीं… वहाँ मत…” काँटा: “आज नहीं तो कल। आदत डाल।”
वह दोनों जगह एक साथ इस्तेमाल करने लगा—लंड चूत में, उँगली गाँड में।

रुबीना पागल हो रही थी। दर्द और मज़े का मिश्रण। आखिर में काँटा ने लंड निकालकर रुबीना के चेहरे पर झाड़ दिया। गर्म वीर्य आँखों, नाक, मुँह पर लगा। “चाट ले सब।” रुबीना ने जीभ निकालकर चाटा।
काँटा ने अखबार से साफ़ किया और कहा, “कल फिर आना। और इस बार अपनी ननद को भी साथ लाना। मैं दोनों को एक साथ चोदना चाहता हूँ।”

रुबीना घर पहुँची तो सीमा ने फिर वही सवाल किया। रुबीना ने कुछ नहीं कहा, बस नहा ली। शाम को उसके पति नदीम का फोन आया। “आज देर से आऊँगा। कुछ काम है।” रुबीना ने हाँ कर दी। मन में सिर्फ़ काँटा की बात घूम रही थी।

अगले दिन रुबीना और सीमा दोनों गोदाम पहुँचीं। काँटा पहले से तैयार था। उसने दोनों को नंगा किया। सीमा पहले से जानती थी, इसलिए बिना हिचक के घुटनों के बल बैठ गई और काँटा का लंड मुँह में ले लिया। रुबीना को दीवार से बाँध दिया गया। काँटा ने रस्सी से उसके हाथ ऊपर बाँधे और टाँगें फैलाकर बाँध दीं।

फिर उसने रुबीना की चूत पर थप्पड़ मारे। “आज सिर्फ़ देखने वाली नहीं रहेगी। दोनों इस्तेमाल होंगी।” सीमा को उसने घोड़ी बनाया और पीछे से चोदने लगा, जबकि रुबीना बाँधी हुई देख रही थी। हर धक्के के साथ सीमा की चीखें निकल रही थीं। काँटा बीच-बीच में रुबीना के स्तनों को मरोड़ता, निप्पल काटता।

फिर उसने रुबीना की बँधी टाँगों के बीच अपना मुँह लगा दिया और जीभ से चाटने लगा। रुबीना कराह उठी। काँटा ने सीमा को रुबीना के ऊपर बैठा दिया। “अब एक-दूसरे को चाटो।”
दोनों औरतें एक-दूसरे की चूत चाटने लगीं। काँटा पीछे से दोनों को बारी-बारी चोदता रहा। कभी रुबीना की चूत, कभी सीमा की। कभी दोनों की गाँड में उँगली। कमरा सिसकारियों, थप्पड़ों और गीली आवाज़ों से भर गया।

आखिर में काँटा ने दोनों को ज़मीन पर लिटाया, उनके मुँह पास किए और दोनों के चेहरों पर झाड़ दिया। वीर्य दोनों के बालों, होंठों, स्तनों पर लगा। “अब एक-दूसरे का चेहरा चाट लो।”
दोनों ने वैसा ही किया।

काँटा ने कपड़े पहने और कहा, “अगले हफ़्ते मेरा गाँव चलना है। वहाँ मेरी पत्नी और बेटा है। तुम दोनों आओगी। सीमा को मेरी पत्नी बना दूँगा, रुबीना को मेरी रखैल। समझ गईं?”
रुबीना और सीमा दोनों हाँ में सिर हिला गईं।

घर लौटते समय रुबीना ने सीमा से पूछा, “तुम सच में तैयार हो?” सीमा मुस्कुराई, “दीदी, पैसे मिल रहे हैं। और मज़ा भी। नदीम को कुछ पता नहीं चलेगा। वो तो बस बिज़नेस के चक्कर में रहता है।”
रात को नदीम घर आया तो रुबीना पहले से नहाई-धोई बिस्तर पर लेटी थी। उसने पति को कोई शिकायत नहीं की। मन में सिर्फ़ अगले हफ़्ते का इंतज़ार था—गाँव, बाँधना, पीटना, और वह मोटा काला लंड जो अब उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुका था।

काँटा ने फोन पर आख़िरी संदेश भेजा: “रस्सियाँ, चाबुक और तेल ले आता हूँ। गाँव में तीन दिन रहना है। दोनों तैयार रहना। कोई मना नहीं करेगा।”
रुबीना ने संदेश पढ़ा और धीरे से मुस्कुरा दी। उसके शरीर में अभी भी काँटा के नाखूनों और दाँतों के निशान थे। वह जानती थी कि आगे और ज़्यादा दर्द और और ज़्यादा मज़ा आने वाला है।

गाँव का नाम था बेलवाड़ी। शहर से साठ किलोमीटर दूर, घने पेड़ों और पुरानी मिट्टी की दीवारों वाला एक सुनसान इलाका। काँटा ने तीन दिन पहले ही व्यवस्था कर ली थी। एक पुराना मकान किराए पर लिया था, जिसकी चारदीवारी ऊँची थी और पीछे एक अलग कमरा था जहाँ पहले अनाज रखा जाता था। वही कमरा अब उनके खेल का अड्डा बनने वाला था।

रुबीना और सीमा सुबह ही निकल पड़ीं। नदीम को बताया गया कि सीमा की कोई रिश्तेदार बीमार है, इसलिए दोनों जा रही हैं। नदीम ने सिर हिला दिया, बिज़नेस के फोन में उलझा हुआ था। काँटा ने दोनों को एक पुरानी जीप में बैठाया। रास्ते भर उसने रुबीना की जाँघ दबाए रखी और कभी-कभी सीमा के स्तन भी मसल दिए।

गाँव पहुँचते ही काँटा की असली पत्नी और बेटा कहीं दिखाई नहीं दिए। असल में वे शहर में ही थे। काँटा ने दो नाट्य कलाकारों को किराए पर बुलाया था—एक अधेड़ औरत और एक सोलह-सत्रह का लड़का। औरत को काँटा की पत्नी का रोल दिया गया था, लड़के को बेटे का। दोनों को सिर्फ़ बाहर घूमने-फिरने और पड़ोसियों के सामने अभिनय करने का काम था। अंदर के कमरे में वे नहीं आते थे।

मकान में घुसते ही काँटा ने शटर बंद कर दिए। उसने रुबीना और सीमा को सीधे पीछे वाले कमरे में घसीटा। कमरे में एक मोटी लकड़ी की खाट थी, चारों कोनों पर लोहे के छल्ले लगे हुए थे। दीवार पर चाबुक, रस्सियाँ, मोटी चेन और एक तेल की बोतल रखी थी। फर्श पर पुराना बोरा बिछा था।
“कपड़े उतारो। दोनों।” काँटा की आवाज़ भारी थी।

रुबीना और सीमा ने एक-दूसरे की ओर देखा। सीमा पहले उतरी। उसकी गोरी चमड़ी पर अभी भी पिछले दिनों के हल्के निशान थे। रुबीना ने भी कपड़े उतारे। दोनों नंगी खड़ी थीं। काँटा ने घूमकर दोनों को देखा, फिर रुबीना के बाल पकड़कर खाट के पास खींच लाया।
“हाथ ऊपर।”

उसने मोटी रस्सी से रुबीना के दोनों हाथ खाट के ऊपरी छल्लों से बाँध दिए। टाँगें फैलाकर निचले छल्लों से बाँध दीं। रुबीना की चूत पूरी तरह खुली हुई थी, स्तन तनाव में आगे निकले हुए। काँटा ने सीमा को घुटनों के बल बैठाया।
“तेल लगा। अच्छे से।”

सीमा ने तेल की बोतल खोली और रुबीना की चूत, गाँड और स्तनों पर तेल मलने लगी। काँटा पीछे खड़ा देख रहा था। जब सीमा की उँगली रुबीना की गाँड में घुसी तो रुबीना की कमर ऐंठ गई।
“और अंदर तक। ढीला कर दे उसे।”

सीमा ने दो उँगलियाँ गाँड में घुसा दीं। रुबीना की आँखें बंद हो गईं। काँटा ने चाबुक उठाया। पहला वार रुबीना की जाँघ पर पड़ा। तेज़ आवाज़ हुई। रुबीना चीखी। दूसरा वार दूसरी जाँघ पर। तीसरा सीधे चूत के ऊपर।
“आआआह्ह्ह!”
काँटा हँसा। “आवाज़ अच्छी है। और निकाल।”

वह चाबुक से लगातार मारता रहा—जाँघों पर, पेट पर, स्तनों के नीचे। लाल धारियाँ उभर आईं। बीच-बीच में वह चाबुक की नोक से रुबीना के निप्पल को छेड़ता। सीमा अभी भी उँगलियाँ अंदर घुमाए हुए थी। काँटा ने सीमा के बाल पकड़कर खींचे।
“अब तू भी तैयार हो जा।”

उसने सीमा को भी खाट के किनारे बाँध दिया, लेकिन रुबीना के बिल्कुल पास। दोनों की टाँगें एक-दूसरे से सट गईं। काँटा ने अपनी धोती खोली। काला मोटा लंड पहले से तना हुआ था। उसने रुबीना की खुली चूत पर लंड रखा और एक झटके में पूरा अंदर घुसेड़ दिया।
रुबीना की चीख निकल गई। काँटा ने उसका मुँह दबाया और धक्के लगाने शुरू कर दिए—भारी, गहरे, बिना रुक।

हर धक्के के साथ खाट चरमरा रही थी। रस्सियाँ हाथों में धँस रही थीं। काँटा ने एक हाथ से सीमा की चूत में उँगली घुसाई और दूसरे हाथ से रुबीना के बाल खींचे।
“दोनों को एक साथ चोदूँगा आज। समझी?”

वह रुबीना से निकला और सीधे सीमा में घुस गया। सीमा की कमर उछली। काँटा बारी-बारी दोनों को चोदने लगा। कभी रुबीना की चूत, कभी सीमा की। कभी दोनों की गाँड में उँगली। पसीना बह रहा था। कमरे में गीली आवाज़ें और सिसकारियाँ गूँज रही थीं।

काँटा ने अचानक रुबीना की रस्सी ढीली की और उसे उल्टा लिटा दिया—चेहरा नीचे, गाँड ऊपर। फिर से बाँध दिया। अब उसने चाबुक से गाँड पर वार किए। एक, दो, पाँच, दस। गाँड लाल हो गई, सूजन आ गई। रुबीना रो रही थी, लेकिन विरोध नहीं कर रही थी। काँटा ने तेल लगाया और अपना लंड उसकी गाँड में धकेलना शुरू किया।

पहले सिर्फ़ सुपाड़ा घुसा। रुबीना की चीखें तेज़ हो गईं। काँटा ने और जोर लगाया। आधा लंड अंदर चला गया। फिर पूरा। रुबीना का शरीर काँप रहा था। काँटा ने धक्के लगाने शुरू कर दिए—धीमे नहीं, पूरे जोर से। हर धक्के के साथ रुबीना की चीख निकलती। सीमा बँधी हुई देख रही थी, उसकी अपनी चूत से पानी बह रहा था।

काँटा ने सीमा को भी उसी पोजीशन में बाँध दिया। अब दोनों की गाँड उसके सामने थीं। वह बारी-बारी दोनों की गाँड चोदने लगा। बीच-बीच में चाबुक मारता, बाल खींचता, गर्दन दबाता। एक बार उसने रुबीना की गर्दन इतनी ज़ोर से दबाई कि उसकी साँस फूलने लगी। उसी पल रुबीना झड़ गई—गाँड और चूत दोनों से पानी निकल रहा था।
“देखा? गला दबाने से तू झड़ती है। फिर से करूँ?”

उसने फिर दबाया। रुबीना की आँखें उलटने लगीं। काँटा ने उसी समय गाँड में और तेज़ धक्के लगाए। रुबीना बेहोशी की कगार पर पहुँच गई, फिर वापस आई। काँटा बाहर निकला और दोनों के चेहरों पर झाड़ दिया। वीर्य आँखों में, बालों में, मुँह में लगा।
“चाटो एक-दूसरे का चेहरा।”

दोनों ने जीभ निकालकर एक-दूसरे के चेहरे चाटे। काँटा देखकर मुस्कुरा रहा था। उसने फिर से दोनों को बाँध दिया, इस बार एक-दूसरे के सामने। टाँगें फैलाकर। फिर उसने एक मोटी मोमबत्ती जलाई और गर्म मोम रुबीना के स्तनों पर टपकाने लगा। रुबीना चीखी। मोम सीमा के निप्पल पर भी गिरा। दोनों कराह रही थीं।

रात भर यही सिलसिला चला। काँटा कभी दोनों को एक साथ चोदता, कभी एक को बाँधकर दूसरी से चाटवाता, कभी चाबुक से मारता। सुबह होते-होते दोनों के शरीर पर लाल-नीले निशान थे, जाँघों के बीच सूजन, गाँड पर चाबुक के निशान। काँटा ने उन्हें थोड़ा आराम दिया, लेकिन रस्सियाँ पूरी तरह नहीं खोलीं।

दूसरे दिन उसने और नया खेल शुरू किया। उसने एक पतली लकड़ी की छड़ ली और दोनों की चूत के होंठों पर हल्के-हल्के वार करने लगा। फिर जोर से। चूत लाल हो गई। उसके बाद उसने दोनों को एक-दूसरे के ऊपर लिटाया—रुबीना नीचे, सीमा ऊपर—और दोनों की चूत में एक साथ उँगली घुमाते हुए लंड बारी-बारी घुसाया।

दोपहर में बाहर से आवाज़ आई। नाट्य कलाकार औरत चिल्ला रही थी, “अरे काँटा, खाना लगा दूँ क्या?” काँटा ने जवाब दिया, “हाँ, बाहर ही छोड़ देना।” अंदर वह रुबीना की गर्दन में चेन डालकर खींच रहा था जैसे कुत्ते को। सीमा घुटनों के बल चल रही थी, मुँह में काँटा का लंड था।
तीसरे दिन काँटा ने सबसे क्रूर खेल खेला। उसने दोनों को पूरी तरह बाँध दिया—हाथ-पाँव फैलाकर।

फिर एक-एक करके उनकी चूत में मोटी लकड़ी की मूसल घुसाई, जितना गहरा हो सके। दोनों चीख रहे थे। काँटा ने चाबुक से मूसल के आसपास मारा। फिर उसने खुद दोनों को बारी-बारी चोदा, इस बार बिना तेल के, सूखा। दर्द इतना था कि रुबीना की आँखों से खून जैसे आँसू बह रहे थे।

आखिर में काँटा ने दोनों को छोड़ दिया। वे खाट पर पड़े काँप रहे थे। शरीर पर जगह-जगह निशान, खरोंच, सूजन। काँटा ने पानी पिलाया और कहा,
“अब तुम दोनों मेरी हो। शहर लौटकर भी यही चलेगा। नदीम को कुछ पता नहीं चलेगा। और अगर किसी ने मुँह खोला…” उसने चाबुक उठाकर हवा में फटकारा, “तो इससे भी बुरा होगा।”
रुबीना ने कमजोर आवाज़ में कहा, “हम… तैयार हैं।”

सीमा ने भी सिर हिलाया। आँखों में डर था, लेकिन नीचे जाँघों के बीच अभी भी गीलापन था।
काँटा मुस्कुराया। उसने दोनों के बाल सहलाए, फिर जोर से पकड़कर खींचे।
“अच्छा। अब सो जाओ। रात को फिर शुरू करेंगे। इस बार और देर तक।”

बाहर गाँव की रात गहरा रही थी। अंदर कमरे में सिर्फ़ साँसें और कभी-कभी सिसकारियाँ सुनाई दे रही थीं। तीन दिन पूरे होने वाले थे, लेकिन काँटा का खेल अभी खत्म नहीं हुआ था। वह जानता था कि ये दोनों अब उसकी रस्सियों और चाबुक के बिना नहीं रह सकतीं। और वे भी यह बात धीरे-धीरे समझने लगी थीं।

कज़िन की रस्सी और चाबुक वाली रातें

कर्ज में डूबे पति ने बीवी रीना को बूढ़े राजू चाचा ने चोदा

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सीमा आंटी की खूनी रस्सी

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