जालंधर के पुराने होटल में मौसी ने गले में कॉलर डालकर भांजे को अपना बना लिया। हर मुलाकात में शरीर पर नए निशान, गरम मोम और बेबसी की चीखें गहराती जाती हैं।
रोहन पठानकोट का रहने वाला था। उम्र 24 साल, लंबा-चौड़ा, कसी हुई एथलेटिक बॉडी, चौड़े कंधे और मजबूत जांघें। गर्मियों की छुट्टियों में वह अपने नाना-नानी के घर जालंधर के बाहरी इलाके में गया था। वहाँ उसकी मौसी और मौसा रहते थे। मौसी का नाम सुनीता था। उम्र 35 साल। गोरी चमड़ी, लंबे घुंघराले बाल जो कमर तक लहराते, और एक ऐसी गठीली-भरपूर देह जो किसी भी जवान मर्द को पागल कर दे। बड़े-बड़े गोल स्तन, पतली कमर, चौड़े कूल्हे और गोल-मटोल गांड। वह हमेशा ढीले-ढाले लेकिन गले वाले सूती कुर्ते पहनती थी जो उसके शरीर की हर लहर को छुपाते हुए भी उजागर करते थे।
रोहन को पहली नजर में ही सुनीता की तरफ खिंचाव महसूस हुआ। वह जानबूझकर रसोई में उसके पास जाता, जब वह सब्जी काट रही होती तो उसके झुकने का इंतजार करता। कुर्ता थोड़ा खुल जाता और उन भरे-भरे, चिकने स्तनों की गहरी घाटी दिख जाती। रोहन की नजरें वहीं अटक जातीं। कभी-कभी वह जानबूझकर टकरा जाता और हल्के से उसके स्तन छू लेता। वह गर्माहट उसके हाथों में रह जाती।
एक दिन मौसा को अचानक मुंबई में कोई जरूरी काम पड़ गया। वह दस दिनों के लिए घर से बाहर चला गया। घर में सिर्फ रोहन, सुनीता और बुजुर्ग नाना-नानी रह गए। नाना-नानी रात को जल्दी सो जाते थे।
दूसरे दिन शाम को सुनीता ने रोहन को एक छोटी सी चिट्ठी दी। उसमें लिखा था:
“रोहन, मुझे तुम्हें देखते ही अंदर तक आग लग जाती है। मैं तुम्हारे साथ अकेले में वह सब करना चाहती हूँ जो एक मौसी को अपने भांजे के साथ नहीं करना चाहिए। अगर तुम तैयार हो तो आज रात बारह बजे मेरे कमरे में आ जाना। चिट्ठी वापस दे देना तो मैं समझ जाऊँगी।”
रोहन का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने तुरंत चिट्ठी वापस कर दी। सुनीता की आँखों में एक क्रूर सी मुस्कान तैर गई।
रात बारह बजे रोहन धीरे से उसके कमरे में घुसा। कमरे में सिर्फ एक छोटी सी लाल बत्ती जल रही थी। सुनीता बिस्तर पर लेटी थी। उसने काला रेशमी नाइटी पहना था जो इतना पतला था कि उसके निप्पल और चूत के बाल साफ दिख रहे थे। रोहन के पास जाते ही सुनीता ने उसका हाथ पकड़ लिया और जोर से खींचकर बिस्तर पर गिरा दिया।
“आज तुम मेरे खिलौने हो,” उसने कर्कश आवाज में कहा। “जो कहूँगी वही करोगे। समझे?”
रोहन ने सिर हिलाया। सुनीता ने उसकी पजामा की डोरी खोल दी और उसका मोटा, सख्त लंड बाहर निकाल लिया। वह औसत से थोड़ा बड़ा था—करीब सात इंच लंबा और मोटा। सुनीता ने उसे अपने हाथ में लेकर कसकर दबाया।
“दर्द हो रहा है ना?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा और और जोर से दबाया। रोहन की सांस अटक गई। फिर सुनीता ने अपना मुँह उसके लंड पर झुकाया और बिना किसी भूमिका के पूरा मुँह में ठूंस लिया। गला तक। रोहन की कमर अकड़ गई। सुनीता ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से सिर हिलाया। लंड उसके गले में धँसता और बाहर निकलता। “ग्लक… ग्लक… ग्लक…” की आवाजें कमरे में गूँजने लगीं। आँसू उसकी आँखों से बहने लगे लेकिन वह रुकी नहीं। वह जानबूझकर उसके लंड को अपने दाँतों से हल्का-हल्का काट रही थी।
जब रोहन लगभग झड़ने वाला था तो सुनीता ने अचानक मुँह हटा लिया और उसके लंड पर जोर से थप्पड़ मारा।
“बिना इजाजत के झड़ने की हिम्मत मत करना,” उसने कहा। फिर उसने अपना नाइटी उतार फेंका। उसके नंगे शरीर को देखकर रोहन की सांसें तेज हो गईं। बड़े-बड़े गोरे स्तन, गुलाबी निप्पल जो सख्त हो चुके थे, पतली कमर और घनी बालों वाली गीली चूत।
सुनीता ने बिस्तर के नीचे से एक काला चमड़े का पट्टा निकाला और रोहन के दोनों हाथों को सिर के ऊपर बाँध दिया। फिर उसकी टाँगें फैलाकर टखनों को भी बिस्तर के पायों से बाँध दिया। अब रोहन पूरी तरह बेबस था।
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“आज मैं तुम्हें सिखाऊँगी कि असली दर्द और मजा क्या होता है,” सुनीता ने कहा और उसके स्तनों को जोर से मसलने लगी। नाखून गड़ा दिए। रोहन कराह उठा। फिर उसने अपना मुँह उसके एक निप्पल पर लगाकर जोर से चूसा और दाँतों से काट लिया। रोहन चीख पड़ा। सुनीता हँसी।
“चिल्लाओ… जितना चिल्लाओ उतना मजा आएगा।”
वह नीचे की तरफ सरक गई और उसकी जाँघों के अंदरूनी हिस्से को दाँतों से काटने लगी। फिर उसकी चूत पर मुँह लगा दिया। जीभ से क्लिट को जोर-जोर से चाटने और चूसने लगी। बीच-बीच में दाँतों से हल्का काट भी लेती। रोहन तड़प रहा था। उसके लंड से पानी टपकने लगा था लेकिन सुनीता उसे छूने नहीं दे रही थी।
अचानक उसने रोहन के लंड पर थूक लगाई और बिना किसी चेतावनी के अपनी चूत पर बैठा ली। पूरा लंड एक झटके में अंदर चला गया। सुनीता जोर से चीखी लेकिन रुकने का नाम नहीं लिया। वह ऊपर-नीचे कूदने लगी। उसके बड़े स्तन हवा में उछल रहे थे। रोहन के बाँधे हुए हाथ तड़प रहे थे। वह कुछ नहीं कर सकता था।
सुनीता ने अपना हाथ पीछे ले जाकर उसकी गांड के छेद पर उंगली फेरनी शुरू कर दी। थूक लगाकर एक उंगली अंदर घुसा दी। रोहन की आँखें फटी की फटी रह गईं। दर्द और मजे का अजीब मिश्रण था। सुनीता अब दो उंगलियाँ अंदर घुसा चुकी थी और अपनी चूत में उसके लंड को और जोर से पेल रही थी।
“बोलो… मेरी चूत कैसी लग रही है?” उसने पूछा।
“बहुत… बहुत टाइट… और गर्म…” रोहन ने हाँफते हुए कहा।
सुनीता ने हँसते हुए उसकी गांड में तीसरी उंगली घुसा दी और जोर से हिलाने लगी। रोहन की चीख निकल गई। सुनीता को और मजा आने लगा। वह और तेज कूदने लगी। उसके कूल्हे रोहन की जाँघों से टकरा-टकराकर आवाज कर रहे थे।
थोड़ी देर बाद उसने लंड बाहर निकाला और रोहन को पेट के बल पलट दिया। उसके हाथ-पैर अभी भी बँधे हुए थे। सुनीता ने उसकी गांड के दोनों भागों को फैलाया और थूक लगाकर अपना चेहरा वहाँ ले गई। जीभ से उसके छेद को चाटने लगी। फिर अपनी उंगली अंदर घुसाई और घुमाने लगी। रोहन तड़प रहा था लेकिन सुनीता रुकने वाली नहीं थी।
“आज तुम्हारी गांड भी मेरी है,” उसने कहा और बिस्तर के नीचे से एक छोटा सा काला डिल्डो निकाला। उस पर तेल लगाकर धीरे-धीरे रोहन की गांड में धकेलने लगी। रोहन की चीखें कमरे में गूँज रही थीं लेकिन सुनीता ने उसका मुँह तकिया से दबा दिया। डिल्डो आधा अंदर जाने के बाद उसने उसे जोर-जोर से अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। साथ ही अपने हाथ से उसके लंड को भी सहला रही थी।
दर्द और मजे के बीच रोहन पागल हो रहा था। सुनीता ने डिल्डो को अंदर ही छोड़ दिया और फिर से उसके ऊपर सवार हो गई। इस बार उसने अपना मुँह उसके कान के पास लाया और फुसफुसाई, “अब झड़ने की इजाजत है… लेकिन मेरी चूत में ही झड़ना। एक बूँद भी बाहर गिरी तो कल रात और बुरा हाल करूँगी।”
रोहन अब नियंत्रण में नहीं था। कुछ ही देर में वह जोर से कराहते हुए उसकी चूत के अंदर झड़ गया। सुनीता ने उसके लंड को अपनी चूत में दबाए रखा और अपने कूल्हे घुमाते हुए अपना पानी भी छोड़ दिया। दोनों के शरीर पसीने से भीग चुके थे।
सुनीता ने उसके बंधन खोले। रोहन थककर बिस्तर पर गिर गया। लेकिन सुनीता अभी शांत नहीं हुई थी। उसने उसका लंड अपने मुँह में लिया और सारा वीर्य चूसकर निगल गई। फिर उसके स्तनों को फिर से मसलने और काटने लगी।
“यह तो सिर्फ शुरुआत है,” उसने कहा। “अगले नौ दिन तुम मेरे गुलाम हो। हर रात नई सजा और नया मजा मिलेगा।”
अगली रात सुनीता ने रोहन को दीवार से बाँध दिया। उसके स्तनों पर कपड़े की पिनें लगाईं और फिर उसके लंड को चाबुक से हल्के-हल्के मारने लगी। हर वार पर रोहन तड़पता और सुनीता हँसती। फिर उसने उसे घुटनों के बल बैठाया और अपना मुँह उसके चेहरे पर बैठा लिया। रोहन की जीभ उसकी चूत में घुस गई। सुनीता उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से अपना कूल्हा हिला रही थी। “चाटो… और गहरा… नहीं तो पिनें और कस दूँगी।”
तीसरी रात उसने रोहन की आँखों पर पट्टी बाँधी और उसके पूरे शरीर पर बर्फ के टुकड़े फेरने लगी। फिर अचानक गर्म मोम टपका दिया। रोहन की चीखें निकल गईं। सुनीता ने उसके लंड पर भी मोम टपकाया और फिर अपने मुँह से साफ किया। उसके बाद उसने रोहन को घोड़ी बनाकर उसकी गांड में असली लंड घुसा दिया। इस बार कोई डिल्डो नहीं था। रोहन की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन सुनीता रुकने वाली नहीं थी। वह उसके कंधे पर दाँत गड़ाए हुए जोर-जोर से पेल रही थी।
हर रात कुछ नया होता। कभी वह रोहन को कुर्सी से बाँधकर उसके लंड पर बैठ जाती और सिगरेट के धुएँ से उसका गला घोंटने की कोशिश करती। कभी उसके निप्पलों को रस्सी से बाँधकर खींचती। कभी उसे जमीन पर लिटाकर अपने पैरों से उसका लंड कुचलती और फिर उसी लंड को अपनी चूत में ले लेती।
दसवें दिन सुनीता ने रोहन को पूरी तरह नंगा करके घर के पिछवाड़े के अंधेरे कोने में ले गई। वहाँ उसने उसे एक पेड़ से बाँध दिया। रात के अंधेरे में उसने उसके सामने कपड़े उतारे और अपनी चूत में उंगलियाँ घुसाकर पानी निकालने लगी। रोहन तड़प रहा था। फिर सुनीता उसके पास आई और उसके लंड को अपनी चूत में ले लिया। पेड़ से बँधे हुए रोहन कुछ नहीं कर सकता था। सुनीता उसके गले पर हाथ रखकर हल्का दबाती और साथ ही अपने कूल्हे हिलाती। आखिर में दोनों एक साथ झड़ गए।
सुबह मौसा के आने से पहले सुनीता ने रोहन को नहलाया, कपड़े पहनाए और सामान्य व्यवहार करने को कहा। लेकिन जाते समय उसने उसके कान में कहा, “जब भी जालंधर आना… याद रखना, तुम अभी भी मेरे गुलाम हो।”
रोहन पठानकोट लौटने के दो महीने बाद फिर जालंधर पहुँचा। इस बार बहाना नाना-नानी की तबीयत था। सुनीता ने स्टेशन पर ही उसका सामान छीन लिया और सीधे शहर के पुराने हिस्से में एक जीर्ण-शीर्ण होटल के कमरे में ले गई। कमरा देखने से पहले ही उसने दरवाजा अंदर से कुंडी लगा दी।
“कपड़े उतारो,” उसने एक शब्द में हुक्म दिया। रोहन ने हिचकिचाहट भरी नजर से देखा तो सुनीता ने उसके गले पर हाथ रखकर दीवार से सटा दिया। “मैंने कहा था ना… तुम अभी भी मेरे गुलाम हो। अब बिना पूछे सांस भी मत लेना।”
रोहन ने कपड़े उतारे। सुनीता ने अपना कुर्ता भी फेंक दिया। उसके स्तन पहले से ज्यादा भारी लग रहे थे। उसने बिस्तर के नीचे से एक काला चमड़े का कॉलर निकाला और रोहन के गले में कसकर बाँध दिया। कॉलर से एक लंबी चेन निकली हुई थी। सुनीता ने चेन अपने हाथ में ली और जोर से खींचकर रोहन को घुटनों पर गिरा दिया।
“चाटो,” उसने अपनी चूत उसके मुँह पर दबाते हुए कहा। रोहन की जीभ अंदर घुसी तो सुनीता ने उसके बाल जकड़ लिए और जोर-जोर से अपना कूल्हा हिलाने लगी। “और गहरा… जीभ अंदर तक ले जा… नहीं तो आज तुम्हारी गांड में कुछ ऐसा ठूँसूंगी कि एक हफ्ते तक बैठ भी नहीं पाओगे।”
रोहन की आँखों से पानी आने लगा लेकिन वह चाटता रहा। सुनीता ने अचानक उसके मुँह से अपना शरीर हटाया और उसके लंड पर जोरदार थप्पड़ मारा। लंड लाल हो गया। फिर उसने एक पतली बांस की छड़ी निकाली और उसकी जाँघों पर एक के बाद एक वार करने लगी। हर वार पर लाल निशान उभर आते। रोहन कराह रहा था। सुनीता हँस रही थी।
“दर्द अच्छा लग रहा है ना मेरे कुत्ते?” उसने छड़ी उसकी गांड की दरार में रगड़ते हुए पूछा। फिर छड़ी का एक सिरा उसकी गांड के छेद पर टिकाया और धीरे-धीरे धकेलने लगी। रोहन की चीख निकल गई। सुनीता ने और अंदर धकेला। छड़ी आधी अंदर चली गई तो उसने उसे घुमाना शुरू कर दिया। साथ ही अपने पैर के अंगूठे से उसके लंड को कुचलने लगी।
“अब बोल… तुम क्या हो?” “मैं… मैं आपकी गुलाम हूँ…” रोहन ने हाँफते हुए कहा। “जोर से!” “मैं आपकी रंडी हूँ… आपकी गांड की चुदाई की प्यासी रंडी!”
सुनीता ने छड़ी बाहर निकाली और रोहन को पेट के बल बिस्तर पर धकेल दिया। उसके दोनों हाथ पीछे बाँध दिए। फिर उसने अपना लंड जैसा मोटा काला डिल्डो निकाला—लंबाई लगभग आठ इंच और मोटाई कलाई जितनी। तेल लगाकर सीधे उसकी गांड में एक झटके में घुसा दिया। रोहन की चीख तकिए में दब गई। सुनीता ने डिल्डो को पूरी तरह अंदर तक ठूँस दिया और फिर जोर-जोर से पेलने लगी। हर धक्के के साथ रोहन का शरीर आगे खिसक जाता। सुनीता उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींच रही थी।
“चिल्ला… और चिल्ला… मुझे तुम्हारी चीखें सुननी हैं,” वह गुर्राई। डिल्डो अंदर-बाहर हो रहा था। गांड का छेद फूल गया था, लाल हो चुका था।सुनीता ने बीच में डिल्डो निकालकर अपनी जीभ से खून के हल्के निशान चाटे और फिर से घुसा दिया। इस बार और तेजी से।
जब रोहन लगभग बेहोश होने वाला था तो सुनीता ने डिल्डो निकाल फेंका और खुद उसके ऊपर सवार हो गई। उसने अपना चूत उसके मुँह पर बैठा लिया और साथ ही झुककर उसके लंड को अपने मुँह में ले लिया। सिक्सटी-नाइन की पोजीशन में वह उसके लंड को दाँतों से काट-काट कर चूस रही थी जबकि अपना पानी उसके चेहरे पर छोड़ रही थी। रोहन की जीभ उसकी चूत के अंदर तड़प रही थी। सुनीता ने अचानक उसके लंड को मुँह से निकाला और जोर से थूककर कहा, “झड़ने की हिम्मत मत करना। आज तुम्हारा वीर्य मेरी गांड में जाएगा।”
वह पलट गई। रोहन के लंड पर थूक लगाई और अपनी गांड के छेद पर टिका दिया। फिर धीरे-धीरे बैठती चली गई। रोहन का मोटा लंड उसकी गांड में धँसता चला गया। सुनीता की आँखें बंद हो गईं। दर्द साफ था लेकिन वह रुकने वाली नहीं थी। पूरा अंदर लेने के बाद वह ऊपर-नीचे कूदने लगी। उसके बड़े स्तन रोहन के चेहरे पर बार-बार गिर रहे थे। रोहन ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से काट दिया। सुनीता चीखी लेकिन कूदना नहीं छोड़ा।
“काटो… और काटो… मुझे निशान चाहिए,” वह हाँफते हुए बोली। रोहन ने दोनों निप्पलों को बारी-बारी से काटा। सुनीता की गांड से खून की हल्की रेखा बह निकली लेकिन वह और तेजी से पेलने लगी। आखिर में वह जोर से काँपी और अपना पानी छोड़ते हुए चिल्लाई, “अब झड़ो… मेरी गांड में भर दो सब!”
रोहन ने नियंत्रण खो दिया। उसके लंड से गरम वीर्य की धार उसकी गांड के अंदर छूट गई। सुनीता ने लंड को अंदर दबाए रखा और घुमाते हुए सारा रस निचोड़ लिया। फिर वह उठकर रोहन के चेहरे के पास आई और अपना गांड का छेद उसके मुँह पर दबा दिया।
“चाटो… अपना ही वीर्य चाटो,” उसने हुक्म दिया। रोहन की जीभ अंदर गई। नमकीन, गरम स्वाद। सुनीता उसके बाल पकड़कर जोर से दबाए रही जब तक कि वह संतुष्ट नहीं हो गई।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी। सुनीता ने रोहन को कुर्सी से बाँध दिया। उसके स्तनों पर मोमबत्ती का गरम मोम टपकाने लगी। हर बूँद पर रोहन तड़पता। फिर उसने उसके लंड पर भी मोम गिराया और ठंडा होने से पहले ही अपने नाखूनों से खुरचना शुरू कर दिया। लंड पर लाल-लाल खरोंचें उभर आईं। सुनीता हँसते हुए बोली, “कल जब तुम पठानकोट जाओगे तो ये निशान तुम्हें याद दिलाते रहेंगे कि तुम किसकी संपत्ति हो।”
सुबह चार बजे सुनीता ने उसके बंधन खोले। रोहन का शरीर जगह-जगह नीला-लाल था। गांड जल रही थी, स्तनों पर दाँतों के निशान थे, लंड पर खरोंचें थीं। सुनीता ने उसके गले का कॉलर नहीं खोला। चेन पकड़कर उसे नहाने ले गई। नहाते समय भी वह उसके शरीर पर साबुन के झाग के साथ अपनी उंगलियाँ घुमाती रही—कभी लंड को कसकर मसलती, कभी गांड के छेद में उंगली घुसा देती।
होटल से निकलते समय सुनीता ने रोहन के कान में कहा, “अगली बार जब आना तो तीन दिन का टाइम लेकर आना। मैंने तुम्हारे लिए कुछ नया इंतजाम किया है… एक अंधेरा कमरा, जहाँ तुम्हें दिनों तक बाँधकर रखूँगी। खाना-पानी भी मैं ही मुँह में डालूँगी। और जब चाहूँगी… तुम्हारी गांड, तुम्हारा मुँह, तुम्हारी चूत सब कुछ इस्तेमाल करूँगी।”
रोहन की आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। वह कुछ बोल नहीं पाया। सुनीता ने उसके गाल पर जोर से थप्पड़ मारा और मुस्कुराई, “जाओ… लेकिन याद रखना—तुम्हारा शरीर अब तुम्हारा नहीं रहा। वह मेरा है। जब चाहूँगी बुलाऊँगी… और तुम दौड़ते हुए आओगे।”
पठानकोट लौटते समय ट्रेन में रोहन बार-बार अपने शरीर के निशानों को छूता रहा। हर दर्द सुनीता की याद दिलाता। और कहीं गहराई में वह जानता था कि अगली मुलाकात और भी क्रूर, और भी गंदी और और भी बेहरहम होने वाली है। सुनीता अब सिर्फ उसकी मौसी नहीं रह गई थी। वह उसकी मालकिन बन चुकी थी—एक ऐसी मालकिन जो दर्द को प्यार में और प्यार को सजा में बदल देना जानती थी।