एक अकेला मर्द जब घर में दो पीढ़ियों को अपनी भूख का शिकार बनाता है तो दीवारें भी काँप उठती हैं। दर्द की चीखें, टूटी मर्यादा और वो रातें जो किसी को नींद नहीं आने देतीं।
जब मैं 26 साल का था, मेरी नौकरी छत्तीसगढ़ के भिलाई स्टील प्लांट में लगी थी। कंपनी ने मुझे प्लांट के पास एक छोटे से कॉलोनी में दो कमरे का क्वार्टर दिया था। अकेला रहता था। घर की सफाई और खाना बनाने के लिए एक औरत आती थी—उसका नाम था शबनम। उम्र 42 साल, लेकिन चेहरा और जिस्म 32 जैसा लगते थे। मोटा-सा बदन, भारी स्तन, चौड़ी कमर और मोटे जांघ। जब वो झुककर झाड़ू लगाती तो उसकी गांड फैल जाती और मेरी साँसें उखड़ जातीं।
मैं और मेरे दोस्त बार-बार उसे लाइन मारते। कोई उसे छूने की हिम्मत नहीं करता था। तीन साल तक वो मेरे घर आती रही। धीरे-धीरे उसकी तबीयत बदल गई। गुस्सैल हो गई, काम आधे-अधूरे करने लगी। मैं सोच रहा था कि साल के अंत में उसे निकाल दूँ।
एक सुबह वो आई और सीधे बोली, “अब मैं यहाँ काम नहीं कर सकती।”
मैंने राहत की साँस ली।
फिर बोली, “अब मेरी बेटी सानिया आएगी। उम्र 22 साल है। शाम को आ जाएगी।”
शाम को दरवाज़ा खुला तो एक पतली कमर वाली लड़की खड़ी थी। सस्ते कपड़ों में भी स्टाइल से। मेकअप हल्का, आँखें तेज़। स्तन छोटे लेकिन गोल, कमर इतनी पतली कि एक हाथ में आ जाए। जाँघें चिकनी।
“तुम सानिया?” मैंने पूछा।
“हाँ। अम्मी ने कहा है काम करूँगी।”
मैंने सिर हिलाया। “ठीक है।”
शबनम चुलबुली थी। कभी-कभी मज़ाक में मेरा हाथ पकड़ लेती, मैं उसकी कमर या गर्दन पर हाथ फेर देता। लेकिन सानिया चुपचाप काम करती। एक दिन मैं बेडरूम में टीवी देख रहा था—एक विदेशी मूवी जिसमें सेक्स सीन चल रहा था। सानिया ने आवाज़ दी, “काम हो गया।”
मैंने कहा, “जाओ।”
वो रुकी, “आपसे बात करनी है। अम्मी बाहर गई हैं, घर में ताला लगा है। थोड़ी देर यहीं रुक जाऊँ?”
मैंने सोचा और बोला, “आओ अंदर। मूवी देखते हैं।”
बाथरूम गया। वापस आया तो सानिया कुर्सी पर बैठी थी और टीवी उसी सेक्स सीन पर रुका हुआ था। मेरी साँस रुक गई।
उसने बिना शर्माए कहा, “लगता है आपको शादी कर लेनी चाहिए। कब तक ये सब देखोगे?”
मैंने जवाब दिया, “तुम्हें भी शादी कर लेनी चाहिए।”
“मेरी हो चुकी है। अठारह की होते ही अम्मी ने कर दी। एक कमरे के घर में शौहर भी आ गया। कामचोर है। अब दोनों एक ही कमरे में रहते हैं।”
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उस दिन से बातें खुल गईं।
दोस्तों ने बताया—शबनम का शौहर छोड़कर भाग गया था। वो अपनी भूख मिटाने के लिए एक 55 साल के मोटे आदमी को घर ले आई थी। सानिया शाम छह बजे से पहले घर नहीं जा सकती थी क्योंकि उसी समय दोनों को अकेला समय मिलता था। सानिया का शौहर? वो बस सोने की जगह पाकर खुश था। एक कमरे में चार लोग—मज़े कैसे लेते होंगे, कोई नहीं जानता।
कुछ दिनों बाद रात दस बजे एक आदमी मेरे दरवाज़े पर आया। “बाबू, थाने चलना पड़ेगा। सानिया का शौहर चोरी करते पकड़ा गया। पुलिस पूरे घर को ले गई है। पैसे माँग रहे हैं।”
मैं थाने गया। टीआई ने पाँच हज़ार माँगे और कहा कि कुछ दिनों के लिए शहर छोड़ना पड़ेगा। मैंने पैसे दे दिए।
शबनम से पूछा, “अब कहाँ जाओगी?”
“सौ किलोमीटर दूर भाई के गाँव में।”
“मेरे पैसे?”
“कमा के दूँगी।”
मैंने कहा, “सानिया को यहाँ छोड़ दो। छुपकर रहेगी, काम करेगी। तुम वापस आकर ले जाना।”
शबनम राज़ी हो गई। “उस हरामज़ादे को जेल में सड़ने दो।”
सानिया चुप थी। घर आकर मैंने हॉल में चटाई बिछा दी। ठंड के दिन थे। सुबह साथ नाश्ता किया, मैं ऑफिस चला गया। शाम को लौटा तो वो भूखी बैठी थी, कुछ नहीं बोली। रात का खाना आया तो हड़बड़ाकर खाया। सोने के समय धीरे से पूछा, “कंबल है?”
“एक ही है।”
उस रात मैंने देखा—वो चटाई पर लेटी हुई अपनी उँगलियाँ जाँघों के बीच ले जा रही थी। धीरे-धीरे रगड़ रही थी। मुँह दबाए कराह रही थी।
अगले दिन शाम को मैंने गुस्से का नाटक किया। “अगर यहाँ रहना है तो घर की सेवा ठीक से करो। मेरी सेवा ठीक से करो। मुर्दे की तरह मत पड़ी रहो।”
वो शर्माई, “भूख लगी है।”
मैंने समोसे दिए, कुछ कपड़े, ब्रश और एक पतला कंबल। फिर कहा, “नहाकर कमरे में आओ। मूवी देखेंगे।”
बीस मिनट बाद दरवाज़ा खुला। सानिया सिर्फ पैंटी और पतली सेमी में खड़ी थी। स्तन सेमी में तने हुए, निप्पल साफ दिख रहे थे।
“ये क्या है?” मैंने पूछा।
“आपने कहा सेवा करनी होगी। यही चाहिए था ना?”
उसने पैंटी उतारनी शुरू की।
मैंने रोका। “रुको। ऐसे नहीं।”
“मेरा शौहर ऐसे ही करता था। जल्दी पैंटी उतारता, झुकाता और दो मिनट में पेल देता। मैं डरती रहती कोई देख न ले।”
मैं मुस्कुराया। “मैं सिखाता हूँ।”
दरवाज़ा बंद किया। वापस आकर उसके सेमी के अंदर हाथ डाला। कमर सहलाई। गर्दन पर होंठ रखे। वो काँप गई। धीरे-धीरे सेमी उतारी। छोटे लेकिन सख्त स्तन। मैंने निप्पल मुँह में लिए, दाँत से हल्के काटे। वो सिसकने लगी।
मैंने उसके कपड़े पूरे उतारे। पैंटी खींचकर फेंकी। जाँघें खोलीं। चूत पहले से गीली थी। उँगली अंदर डाली—गर्म और तंग। दूसरी उँगली भी। उसने दाँत भींचे।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। जाँघों को चूमा, फिर चूत पर मुँह लगाया। जीभ से फाँक खोली, क्लिट चाटी। वो कमर उछालने लगी। मैंने दोनों हाथों से उसके कूल्हे दबाए और जीभ अंदर-बाहर करने लगा। उसका पानी निकलने लगा। मैंने नहीं रोका। जब वो काँपने लगी तो रुका।
“सानिया, ये एहसान है या सच में चाहिए?”
“मत रुको… सच में चाहिए… प्लीज़…”
मैंने लंड निकाला। मोटा और सख्त। उसके मुँह के पास ले गया। “पहले चाट।”
उसने झिझकते हुए चाटा। फिर पूरा मुँह में लिया। मैंने बाल पकड़कर धक्के मारे। गला भर गया, आँखों से आँसू निकले, लेकिन उसने नहीं रोका। जब काफी गीला हो गया तो मैंने उसे पलट दिया। घुटनों के बल झुकाया। गांड ऊपर। चूत खुली।
एक झटके में अंदर घुसा दिया। वो चीखी, लेकिन मुँह दबा लिया। मैंने कमर पकड़ी और जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर उसकी पायल बजती। स्तन बिस्तर से रगड़ खा रहे थे। मैंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “आवाज़ निकाल। डर मत।”
वो कराहने लगी। “और जोर से… तोड़ दो…”
मैंने गति बढ़ाई। चूत की दीवारें कस रही थीं। मैंने एक हाथ से उसकी गांड पर थप्पड़ मारा—ज़ोर का। लाल हो गई। फिर दूसरा। वो और भीग गई। मैंने लंड निकाला, गांड की फाँक पर लगाया। “यहाँ भी?”
वो काँपी। “पहले कभी नहीं…”
मैंने धीरे से धक्का दिया। आधा घुसा। वो चिल्लाई। मैं रुका नहीं। पूरा अंदर किया। गांड तंग थी। मैंने धीरे-धीरे शुरू किया, फिर तेज़। एक हाथ से चूत मसलता रहा। वो पागल हो रही थी। “मारो… और मारो…”
मैंने वीर्य पहले उसकी गांड में छोड़ा। फिर निकाला, चूत में घुसाया और बाकी छोड़ दिया। वो काँपती हुई बिस्तर पर गिर गई।
मैंने उसे गोद में उठाया, बाथरूम ले गया। शावर के नीचे फिर से शुरू किया। दीवार से सटाकर उठा लिया। जाँघें मेरे कंधों पर। खड़े-खड़े पेलता रहा जब तक वो फिर से नहीं गिरी।
रात भर नंगे सोए। सुबह मैंने छुट्टी ले ली। उसके लिए लाए हुए छोटे कपड़े दिए—छोटी स्कर्ट, ट्यूब टॉप, फ्रॉक जो जाँघ तक भी नहीं पहुँचते। उसने पहने तो स्तन और गांड आधे बाहर।
“कल कैसा लगा?” मैंने पूछा।
“पहली बार सच में महसूस किया। शौहर तो दस धक्के मारकर सो जाता था। अम्मी जब चुदवाती तो चिल्लाती थी। मुझे लगता था औरत को कुछ नहीं मिलता।”
उसने मुझे चूमा। उसके बाद वो खुल गई।
दिन भर मैं ऑफिस जाता तो वो पोर्न देखती, खुद को उँगलियों से रगड़ती। शाम को दरवाज़ा खुलते ही मेरी पैंट खोल देती और मुँह में ले लेती। कभी घुटनों के बल, कभी मैं कुर्सी पर बैठा। गला भर जाती, लार बहती, लेकिन छोड़ती नहीं जब तक मैं उसके मुँह में नहीं छोड़ देता।
एक दिन मैंने रस्सी निकाली। उसके हाथ पीछे बाँधे। आँखों पर कपड़ा बाँधा। बिस्तर पर लिटाकर जाँघें फैलाईं। मोमबत्ती जलाई।
गर्म मोम उसके स्तनों पर टपकाया। वो काँपी, कराह उठी। मैंने चूत में उँगली घुमाई और मोम निप्पल पर गिराता रहा। फिर बेल्ट निकाली। गांड पर दस थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। फिर लंड गांड में घुसाया। हाथ बँधे होने से वो हिल नहीं पा रही थी। मैंने पूरा जोर लगाया। हर धक्के पर उसकी चीख निकलती।
रात को मैंने उसे कुत्ते की तरह घुटनों पर रखा। कॉलर जैसा कपड़ा गले में बाँधा। “अब से जब मैं कहूँगा, तभी बोलोगी। वरना सज़ा।”
वो मान गई।
अगले हफ्ते मैंने और आगे बढ़ाया। उसके दोनों हाथ छत के पंखे से बाँधे। पैर फैलाए। चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से घुसाया। कभी मुँह में, कभी स्तनों के बीच। जब वो थक जाती तो पानी पिलाता, फिर शुरू। एक रात मैंने उसकी चूत में अदरक का टुकड़ा रखा। जलन से वो पागल हो गई। मैंने तभी लंड अंदर किया। जलन और मज़े के मिश्रण में वो रोने लगी, लेकिन “रुको” नहीं कहा।
मैंने उसे सिखाया कि दर्द में भी मज़ा कैसे लिया जाता है। कभी उसके निप्पल क्लिप से दबाए, कभी जाँघों पर मोम, कभी बाल खींचकर खड़ा किया और पीछे से पेलता रहा। वो अब खुद माँगने लगी। “आज मारो ज़ोर से। निशान छोड़ दो।”
एक शाम मैंने उसे पूरी नंगी बालकनी में खड़ा किया। ठंडी हवा में स्तन तन गए। मैंने पीछे से घुसाया। कोई देख ले तो क्या—उसने सिर झुका लिया लेकिन कूल्हे हिलाती रही। मैंने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि आवाज़ न निकले और पूरी रात उसी तरह इस्तेमाल किया।
सुबह जब सूरज निकला तो उसके शरीर पर नीले-लाल निशान थे। जाँघों के अंदर सूजन, गांड पर बेल्ट के निशान, निप्पल कटे हुए। वो मुस्कुरा रही थी।
“अब मैं सिर्फ तुम्हारी हूँ,” उसने कहा। “जैसा चाहो करो। तोड़ दो, लेकिन छोड़ना मत।”
मैंने उसके बाल सहलाए। “जब तक शबनम वापस नहीं आती, तुम यहीं रहोगी। और उसके बाद भी… देखेंगे।”
उस रात फिर से रस्सी, फिर से थप्पड़, फिर से दोनों छेदों में बारी-बारी। जब मैं उसके अंदर अंतिम बार छोड़ रहा था तो उसने मेरे कान में कहा, “अगली बार अम्मी को भी बुला लेना… दोनों को एक साथ…”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस और गहराई तक धकेल दिया।
उस रात के बाद सानिया पूरी तरह बदल गई थी। सुबह जब मैं उठा तो वो मेरे लंड को मुँह में लिए हुए थी। आँखें बंद, गला भर-भरकर चूस रही थी। लार उसकी ठुड्डी से बह रही थी। मैंने बाल पकड़े और सिर दबाया। वो घुटनों के बल बैठी थी, हाथ पीछे बँधे हुए—मैंने रात को ही रस्सी नहीं खोली थी।
“अच्छी कुतिया,” मैंने कहा। “अब बता, अम्मी को कब बुलाना है?”
उसने लंड मुँह से निकाला, लार टपकाते हुए बोली, “जब आप कहो। वो गाँव में है… मैं फोन कर सकती हूँ। बोल दूँगी पैसे जमा हो गए, वापस आ जाओ।”
मैंने उसके मुँह में फिर ठूँस दिया। दस मिनट तक गला फाड़ता रहा। जब वीर्य उसके मुँह में छोड़ा तो बोला, “निगल। एक बूँद भी बाहर मत निकालना।”
उसने निगल लिया। आँखों में आँसू थे, लेकिन मुस्कान भी।
दोपहर तक मैंने प्लान बना लिया। सानिया ने शबनम को फोन किया। रोते हुए बोली, “अम्मी, पैसे मिल गए। बाबू ने दे दिए। जल्दी आ जाओ… यहाँ सब ठीक है।”
शबनम तीन दिन बाद आई। रात के नौ बजे दरवाज़ा खटखटाया। मैंने खोला। वही भारी बदन, मोटे स्तन, चौड़ी कमर। लेकिन चेहरे पर थकान थी।
“बाबू, सानिया कहाँ है?”
मैंने अंदर आने का इशारा किया। सानिया हॉल में नंगी खड़ी थी। सिर्फ गले में वो कपड़े का कॉलर, हाथ पीछे बँधे। जाँघों के अंदर सूजन के निशान साफ दिख रहे थे। गांड पर बेल्ट के लाल निशान।
शबनम की आँखें फटी की फटी रह गईं। “ये… ये क्या है?”
सानिया ने सिर झुकाया। “अम्मी… अब मैं इसी घर की हूँ। आप भी रह सकती हो… लेकिन शर्तें हैं।”
मैंने दरवाज़ा बंद किया। ताला लगाया। शबनम पीछे हटने लगी। मैंने उसका हाथ पकड़ा। “भागने की कोशिश मत करना। पैसे तुम्हारे पास नहीं। गाँव वापस कैसे जाओगी? और पुलिस… याद है ना?”
उसकी साँस तेज़ हो गई। मैंने उसे बेडरूम में धकेला। सानिया पीछे-पीछे आई।
मैंने शबनम के कपड़े फाड़ने शुरू किए। उसने विरोध किया तो मैंने थप्पड़ मारा—गाल पर ज़ोर का। वो गिर गई। मैंने साड़ी खींचकर फाड़ी, ब्लाउज के बटन तोड़े। भारी स्तन बाहर निकल आए। काले बड़े निप्पल। पेट थोड़ा बाहर, कमर मोटी, जाँघें मोटी और नरम। गांड विशाल।
“उम्र हो गई है तुम्हारी,” मैंने कहा। “लेकिन अभी भी चूत गीली हो सकती है।”
मैंने उसकी पैंटी नीचे की। चूत पर बाल घने थे। उँगली डाली—सूखी। मैंने थूक लगाया और दो उँगलियाँ अंदर घुमाईं। वो कराह उठी।
सानिया को पास बुलाया। “अपनी अम्मी की चूत चाट।”
सानिया झिझकी। मैंने उसके बाल पकड़कर झुका दिया। उसने जीभ निकाली। शबनम ने आँखें बंद कर लीं। बेटी की जीभ माँ की चूत पर लगते ही दोनों काँप गईं।
मैंने शबनम को बिस्तर पर लिटाया। हाथ ऊपर बाँधे। सानिया को उसके चेहरे पर बैठाया। “अब अम्मी तुम्हारी चूत चाटेंगी।”
शबनम ने मना किया। मैंने बेल्ट निकाली और उसकी मोटी जाँघ पर दस थप्पड़ मारे। लाल निशान उभर आए। फिर गांड पर। वो रोने लगी। अंत में जीभ निकाली। सानिया की गीली चूत पर।
मैंने दोनों को देखा। माँ-बेटी एक-दूसरे को चाट रही थीं। मैंने कपड़े उतारे। पहले सानिया की गांड में घुसा। वो आगे झुक गई, अम्मी की चूत और गहराई से चाटने लगी। मैंने जोर-जोर से पेलते हुए शबनम के बाल पकड़े और उसका मुँह अपनी ओर खींचा। “अब मेरा लंड चाट जबकि मैं तुम्हारी बेटी की गांड फाड़ रहा हूँ।”
शबनम ने मुँह खोला। मैंने आधा लंड उसके मुँह में ठूँसा, बाकी सानिया की गांड में। दोनों तरफ से धक्के। सानिया की आवाज़ दब रही थी। शबनम की आँखों से आँसू बह रहे थे।
मैंने निकाला। शबनम को पलट दिया। घुटनों के बल। विशाल गांड मेरे सामने। मैंने थूक लगाया और एक झटके में गांड में घुसा दिया। वो चीखी। “बाबू… दर्द हो रहा है… निकालो…”
मैंने नहीं निकाला। पूरा अंदर किया। मोटी गांड हिल रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसके कूल्हे दबाये और जानवरों की तरह पेलने लगा। हर धक्के पर उसका पूरा बदन काँपता। स्तन बिस्तर से रगड़ खा रहे थे।
सानिया को उसके नीचे लिटाया। “अम्मी की चूत चाटते रहो।”
मैंने एक हाथ से सानिया के बाल पकड़े और उसके मुँह को शबनम की चूत पर दबाए रखा। दूसरी तरफ गांड फाड़ता रहा। जब शबनम की चीखें बहुत तेज़ हो गईं तो मैंने उसका मुँह सानिया की चूत से बंद कर दिया।
घंटे भर बाद मैंने शबनम की गांड में वीर्य छोड़ा। निकाला तो खून की हल्की धार थी। वो काँप रही थी। मैंने सानिया को उसके ऊपर लिटाया। “अब तुम अम्मी की गांड में उँगली डालो। दो-दो उँगलियाँ।”
सानिया ने किया। शबनम रो रही थी लेकिन विरोध नहीं कर पा रही थी। मैंने सानिया की चूत में लंड डालकर दोनों को एक साथ हिलाया। माँ की गांड में बेटी की उँगलियाँ, बेटी की चूत में मेरा लंड।
रातभर यही चला। कभी शबनम को कुत्ते की तरह घसीटा, कभी सानिया को उसके चेहरे पर बैठाया और मूतने को कहा। शबनम ने मुँह खोला। गरम पेशाब उसके गले में गया। उसने निगल लिया क्योंकि मैंने बेल्ट दिखाई थी।
सुबह जब रोशनी आई तो दोनों बिस्तर पर नंगी पड़ी थीं। शरीर पर नीले निशान, जाँघों के बीच सूखा वीर्य, गांड में सूजन। शबनम की आँखें सूजी हुई थीं।
मैंने पानी पिलाया। फिर कहा, “अब से दोनों यहीं रहोगी। बाहर का कोई काम नहीं। दिन भर नंगी। जब मैं कहूँगा, तभी कपड़ा पहनना। सानिया तुम्हारी मालकिन है जब मैं ऑफिस में हूँ। उसकी बात मानना। वरना रात को सज़ा मिलेगी।”
शबनम ने सिर हिलाया। सानिया मुस्कुराई।
उस दिन से घर नरक बन गया था—लेकिन उनका नरक।
दोपहर को मैं ऑफिस से जल्दी लौटा। दोनों नंगी थीं। सानिया ने शबनम को कुर्सी से बाँध रखा था। मोमबत्ती जला रखी थी। गर्म मोम शबनम के मोटे स्तनों पर टपका रही थी। निप्पल काले पड़ गए थे। शबनम सिसक रही थी।
मैंने देखा और ताली बजाई। “शाबाश।”
फिर मैंने दोनों को बालकनी में खड़ा किया। ठंडी हवा में। सानिया के हाथ ऊपर बाँधे, शबनम के भी। मैंने बारी-बारी से दोनों की गांड में घुसाया। कोई नीचे सड़क पर देख ले तो देख ले। दोनों की चीखें हवा में गुम हो रही थीं।
रात को मैंने नया खिलौना निकाला—मोटी लोहे की छड़। गर्म की। शबनम की जाँघ के अंदर से लगाई। वो चिल्लाई। निशान पड़ गया। फिर सानिया की। दोनों रो रही थीं लेकिन चूतें गीली थीं।
मैंने उन्हें आमने-सामने बिठाया। “एक-दूसरे को चूसो। जब तक मैं नहीं कहता, मत रुकना।”
दोनों ने एक-दूसरे की चूत में मुँह मार रखा था। मैं पीछे से कभी सानिया को पेलता, कभी शबनम को। कभी दोनों के मुँह में बारी-बारी। जब थक जातीं तो थप्पड़ मारता, बाल खींचता, गर्दन दबाता।
एक हफ्ते बाद शबनम पूरी तरह टूट चुकी थी। अब वो खुद माँगने लगी। “बाबू… आज गांड में डालो… ज़ोर से…”
सानिया उससे भी आगे निकल गई थी। वो खुद रस्सी लाती, खुद मोम जलाती, खुद अपनी अम्मी को बाँधती।
एक रात मैंने दोनों को एक साथ बाँधा। हाथ-पैर। फिर कमरे में अंधेरा कर दिया। सिर्फ मोमबत्ती। मैंने दोनों की आँखें बाँधी। फिर बारी-बारी से चूत, गांड, मुँह इस्तेमाल किया। कभी दो लंड की जगह एक ही लंड दोनों में घुमाया। जब वीर्य छोड़ता तो दोनों के चेहरे पर। वो चाटतीं।
मैंने शबनम की चूत में अदरक रखा, सानिया की गांड में मिर्च का पेस्ट। जलन से दोनों पागल हो रही थीं। मैं तभी घुसा। जलन और दर्द के साथ मज़ा। वो चिल्ला-चिल्लाकर आईं।
सुबह जब सूरज निकला तो कमरे में सिर्फ कराहें और वीर्य की गंध थी। दोनों मेरे पैरों में गिरी हुई थीं।
सानिया ने सिर उठाया। “बाबू… अब हम दोनों सिर्फ तुम्हारी वस्तु हैं। जैसा चाहो करो। बेच दो, तोड़ दो, मार डालो… लेकिन इस्तेमाल करते रहना।”
शबनम ने भी सिर हिलाया। आवाज़ नहीं निकल रही थी। गला बैठ चुका था।
मैंने दोनों के सिर सहलाए। फिर लंड निकाला। “सुबह का नाश्ता।”
दोनों ने एक साथ मुँह में लिया। एक ने अंडे चाटे, दूसरी ने लंड। मैंने सिर दबाए रखा जब तक दोनों का गला नहीं भर गया।
उस दिन के बाद घर में कोई सीमा नहीं बची थी। सिर्फ दर्द था, मज़ा था, और दो शरीर जो अब इंसान नहीं रह गए थे। सिर्फ इस्तेमाल की वस्तु।
और मैं उनका मालिक।
रुबीना और ननद सीमा को ठेकेदार ने चोदा
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