जयपुर के पुराने मकान की ऊपरी मंजिल पर एक जवान लड़का अपनी भाभी की छुपी भूख का शिकार बन जाता है। रात दर रात दर्द, कामुक यातना और पूर्ण समर्पण का खेल गहराता जाता है, जहाँ हर सीमा टूटती है और सिर्फ आज्ञा बचती है।
दोस्तो, मेरा नाम रोहन है। उम्र बीस साल। लंबाई करीब पाँच फुट आठ इंच, गोरा-चिट्टा चेहरा, लेकिन शरीर पर थोड़ी-थोड़ी मसल्स आने लगी थीं कॉलेज की जिम से। मैं जयपुर के एक पुराने मोहल्ले में रहता था, जहाँ गलियाँ संकरी थीं और मकानों की छतें एक-दूसरे से सटी हुई। हमारा मकान तीन मंजिला था। नीचे पापा-मम्मी, बीच में मेरा कमरा और ऊपर सबसे ऊपरी मंजिल पर भाई विक्रम और उनकी पत्नी प्रिया रहती थीं।
विक्रम भाई की शादी को सिर्फ चार महीने हुए थे। प्रिया मेरी भाभी। उम्र पच्चीस साल। साँवली नहीं, गेहुँआ रंग की, लंबे काले बाल जो कमर तक आते थे, और जिस्म ऐसा कि देखने वाले की साँस अटक जाए। लंबे-लंबे पैर, पतली कमर, और ऊपर से दो भारी स्तन जो कभी भी कपड़ों के अंदर से अपनी मौजूदगी जता देते थे। भाई ऑफिस जाता था बैंक में, और भाभी घर सँभालती थीं। मुझे पढ़ाई का बहाना करके घर पर ही रहना अच्छा लगता था। कारण साफ था—भाभी।
उस रविवार की दोपहर की बात है। घर में सब सो गए थे। गर्मी इतनी कि पंखे भी हार मान गए थे। मैं अपने कमरे में लेटा था, लेकिन मन कहीं और था। अचानक ऊपर से आवाजें आने लगीं। पहले धीमी, फिर तेज। मैं चुपके से सीढ़ियाँ चढ़ा। उनके कमरे का दरवाजा बंद था, लेकिन खिड़की के पास एक छोटी सी दरार थी जहाँ पर्दा हिल रहा था। मैंने आँखें सटा दीं।
अंदर का नजारा देखकर मेरा लंड तुरंत तन गया। प्रिया भाभी पूरी नंगी थीं। चारपाई पर घुटनों के बल झुकी हुई, दोनों हाथ आगे टिके। विक्रम भाई उनके पीछे खड़े थे, नंगे, और अपना मोटा काला लंड उनकी गांड में धकेल रहे थे। हर धक्के के साथ भाभी की गांड हिलती, और उनकी चूचियाँ नीचे लटककर झूल रही थीं।
“और जोर से… कुत्ते की तरह चोद… मेरी गांड फाड़ दे…” भाभी चीख रही थीं।
भाई ने एक तमाचा उनकी गांड पर जड़ा। आवाज इतनी तेज कि मुझे भी महसूस हुई। “साली रंडी, इतनी चुदासी क्यों हो आज? तेरी गांड पहले से ही ढीली पड़ गई है।”
फिर भाई ने लंड बाहर निकाला, थूक लगाया और एक ही झटके में फिर से अंदर घुसेड़ दिया। भाभी की चीखें और तेज हो गईं। “आह्ह… माँ चोद… और गहरा… मेरी गांड में पूरा डाल…”
भाई ने उनके बाल पकड़कर सर पीछे खींचा और जोर-जोर से धक्के लगाने लगे। गांड की मांसपेशियाँ फैल-सकुड़ रही थीं। मैंने अपना लंड बाहर निकाला और दरार के सामने ही मसलने लगा। भाभी की लटकती चूचियाँ, उनकी खुली हुई गांड का छेद जिसमें भाई का लंड अंदर-बाहर हो रहा था—सब कुछ मेरी आँखों में कैद हो रहा था।
थोड़ी देर बाद भाई ने लंड निकालकर भाभी को पलटा। अब वे चित लेट गईं। भाई ने उनकी टाँगें कंधों पर चढ़ाईं और सीधे उनकी चूत में घुस गए। इतनी जोर से कि चारपाई चरमरा उठी। “आज तेरी दोनों होल्स फाड़ दूँगा… पहले गांड, अब चूत…”
भाभी के नाखून भाई की पीठ पर चल रहे थे। “हाँ… फाड़ दे… मुझे कुतिया बना दे… जोर से… और जोर से…”
मैं बाहर खड़ा अपने लंड को इतनी तेज हिला रहा था कि माल निकलने ही वाला था। तभी भाई चिल्लाया, “ले… ले मेरी रंडी… पूरा अंदर…” और भाभी के अंदर ही झड़ गया। भाभी ने तुरंत लंड मुँह में ले लिया और चाटने लगी। “तेरी मलाई… कितनी गंदी… कितनी टेस्टी…”
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मैं वहाँ से भागकर अपने कमरे में आया और दीवार पर अपना माल पोछते हुए लेट गया। आँखों के सामने सिर्फ भाभी की नंगी गांड और चूत घूम रही थी।
शाम को सात बजे भाभी चाय लेकर आईं। सफेद सलवार-कमीज में, लेकिन अंदर कोई ब्रा नहीं थी। चूचियों के नुकीले सिरे साफ दिख रहे थे। उन्होंने चाय रखी और मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं, “आज तुम ऊपर क्यों आए थे?”
मैं चुप रहा। वे मुस्कुराईं। “दरवाजा बंद करके मूठ मार लिया करो… नहीं तो कोई देख लेगा।”
मेरी आँखें फटी रह गईं। उन्होंने मेरे लंड पर हाथ रखा जो अभी भी आधा तना हुआ था। “बता… मेरा नाम लेकर कितनी बार हिला चुका है?”
मैंने सर झुका लिया। भाभी ने मेरी ठोड़ी पकड़कर ऊपर उठाई। “सच बोल।”
“बहुत बार…” मैंने फुसफुसाया।
वे हँसीं। “अच्छा… तो आज रात को मेरे कमरे में आ जाना। भाई ऑफिस से लेट आएगा। तब देखूँगी तुम्हारी हिम्मत।”
रात के ग्यारह बजे जब घर शांत हो गया, मैं ऊपर गया। कमरा अंधेरा था। भाभी दरवाजा खोलते ही अंदर खींच लिया और ताला जड़ दिया। वे सिर्फ एक पतली साड़ी में थीं, अंदर कुछ नहीं। साड़ी सरक गई तो उनकी पूरी नंगी देह मेरे सामने थी।
उन्होंने मुझे दीवार से सटाया और लंड बाहर निकाल लिया। “इतना छोटा… फिर भी मेरी गांड देखने के बाद तन जाता है?” कहकर उन्होंने जोर से थप्पड़ मारा मेरे लंड पर। दर्द हुआ, लेकिन उत्तेजना और बढ़ गई।
फिर वे घुटनों के बल बैठ गईं और लंड मुँह में भर लिया। दाँत से हल्के-हल्के काटतीं, फिर जोर से चूसतीं। मैं उनके बाल पकड़कर सर धकेलने लगा। “और गहरा… गला तक…”
भाभी ने आँखें ऊपर उठाईं और गला खोल दिया। मेरा लंड उनके गले में अटक गया। वे उल्टी जैसी आवाजें निकाल रही थीं, लेकिन रुक नहीं रहीं थीं। थूक उनके मुँह से बह रहा था, लंड पर चमक रहा था। अचानक उन्होंने लंड बाहर निकाला और खड़े होकर बोलीं, “अब मेरी बारी।”
वे चारपाई पर लेट गईं, टाँगें फैला दीं। उनकी चूत पहले से गीली थी, बाल मुँडे हुए। “चूस… अच्छे से… नहीं तो आज तुझे गांड में डंडे से चुदवाऊँगी।”
मैं उनके बीच झुक गया। जीभ चूत पर फिराई। खट्टा-मीठा स्वाद। उन्होंने मेरे सर को दोनों हाथों से दबाया। “अंदर… जीभ अंदर डाल… मेरी चूत चाट कुत्ते…”
मैंने जीभ अंदर तक घुसेड़ी। वे कराहने लगीं। फिर उन्होंने मुझे ऊपर खींचा। “अब डाल… लेकिन धीरे नहीं… एकदम जोर से।”
मैंने लंड उनकी चूत पर सेट किया। वे खुद पकड़कर अंदर खींचने लगीं। एक धक्के में पूरा अंदर। गर्मी इतनी कि लग रहा था जल जाऊँगा। मैं धक्के लगाने लगा। पहले धीमे, फिर तेज। उनकी चूचियाँ मेरे चेहरे पर उछल रही थीं। मैंने एक चूची मुँह में ली और जोर से काट लिया।
“आह्ह… काट… और काट… मेरी चूची फाड़ दे…” वे चीखीं।
मैंने दोनों चूचियों को मसलना शुरू किया। नाखून गड़ा दिए। लाल निशान पड़ गए। नीचे कमर की रफ्तार बढ़ती गई। चूत की आवाज—छपाक-छपाक—पूरे कमरे में गूँज रही थी।
“और जोर… मेरी चूत फाड़… मुझे अपनी रंडी बना…” भाभी बड़बड़ा रही थीं।
मैंने उनकी टाँगें और चौड़ाई से फैला दीं। लंड और गहरा जाने लगा। अचानक उन्होंने मुझे धक्का दिया और खुद ऊपर चढ़ गईं। “अब मैं चोदूँगी तुझे।”
वे बैठकर उछलने लगीं। हर बार लंड पूरा अंदर जाता, फिर बाहर आता। उनकी गांड मेरे जाँघों पर पट-पट बज रही थी। मैंने उनकी गांड के दोनों लोथड़े पकड़कर जोर से मसले। फिर एक उँगली उनके गांड के छेद में घुसेड़ दी।
“आह्ह… हाँ… उँगली भी डाल… दोनों होल्स भर दे…” वे और तेज उछलने लगीं।
मैंने दूसरी उँगली भी डाल दी। गांड का छेद फैल रहा था। वे कराहते हुए बोलीं, “अब गांड में डाल… चूत छोड़… गांड फाड़…”
मैंने उन्हें नीचे गिराया। पेट के बल लिटाया। थूक लगाकर लंड उनकी गांड पर सेट किया। एक जोरदार धक्का। आधा अंदर गया। भाभी चीखीं, लेकिन पीछे हाथ बढ़ाकर मेरी कमर पकड़ ली। “पूरा… एकदम पूरा डाल… दर्द होगा तो और मजा आएगा…”
दूसरा धक्का। पूरा लंड उनकी गांड में समा गया। इतना टाइट कि साँस फूल गई। मैं धक्के लगाने लगा। धीरे-धीरे रफ्तार बढ़ाई। उनकी गांड लाल हो रही थी। मैंने तमाचे जड़ने शुरू किए। एक… दो… पाँच… दस। हर तमाचे के साथ वे और जोर से कराहतीं।
“साली… तेरी गांड कितनी गरम है… कितनी टाइट…” मैं गुर्रा रहा था।
वे मुँह बिस्तर में दबाए चीख रही थीं। “और जोर… फाड़ दे… मुझे कुतिया की तरह चोद…”
मैंने उनके बाल पकड़कर सर पीछे खींचा। कमर की रफ्तार पागलों जैसी हो गई। लंड अंदर-बाहर हो रहा था, गांड की मांस फैल-सकुड़ रही थी। अचानक मेरा शरीर अकड़ा। “ले… ले सब अंदर…” और मैं उनकी गांड में ही झड़ गया। इतना जोर से कि वे काँप उठीं।
मैं बाहर निकला। उनका गांड का छेद खुला हुआ था, मेरा सफेद माल बह रहा था। वे पलटकर लेटीं। “अभी खत्म? मेरी चूत अभी बाकी है।”
उन्होंने मुझे नीचे लिटाया और खुद मेरे मुँह पर चूत बिठा दी। “चाट… साफ कर… अपनी ही मलाई चाट…”
मैंने जीभ निकाली। उनकी चूत और गांड दोनों चाटने लगा। मेरा ही वीर्य उनके शरीर से लगा हुआ था। वे मेरे लंड को हाथ से हिला रही थीं। थोड़ी देर में लंड फिर तन गया।
वे नीचे आईं और घोड़ी बन गईं। “अब पीछे से चूत में… लेकिन इस बार हाथ बाँधूँगी।”
उन्होंने अपनी साड़ी से मेरे हाथ पीछे बाँध दिए। मैं असहाय था। वे खुद लंड पकड़कर अपनी चूत में डाल बैठीं। फिर उछलने लगीं। मेरे हाथ बँधे होने से मैं कुछ कर नहीं पा रहा था। सिर्फ उनकी गांड देख रहा था जो मेरे ऊपर पट-पट बज रही थी।
“देख… कैसे चोद रही हूँ तुझे… तेरा लंड मेरी चूत की गुलामी कर रहा है…” वे हँस रही थीं।
रफ्तार इतनी तेज कि बिस्तर हिलने लगा। अचानक उन्होंने अपना हाथ पीछे ले जाकर मेरे अंडकोष मसल दिए। दर्द हुआ, लेकिन लंड और सख्त हो गया। “आज तुझे पूरी तरह अपना बना लूँगी… तेरा लंड सिर्फ मेरी चूत और गांड के लिए…”
मैं कराह उठा। वे और तेज हो गईं। फिर अचानक रुकीं और लंड निकालकर मेरे मुँह में ठूंस दिया। “चाट… साफ कर फिर से…”
मैंने चाटा। वे फिर से चूत में डाल बैठीं। इस बार उन्होंने मेरे गले पर हाथ रख दिया। हल्का दबाया। “आज मैं तेरा गला भी दबाऊँगी… देखूँगी कितना सहन कर सकता है…”
दबाव बढ़ा। मेरी साँस फूलने लगी। लेकिन उत्तेजना चरम पर थी। वे उछलती रहीं, गला दबाती रहीं। अचानक दोनों झड़ गए। मेरा माल उनकी चूत में, उनका पानी मेरे लंड पर।
वे मेरे ऊपर गिर पड़ीं। साँसें तेज चल रही थीं। थोड़ी देर बाद उन्होंने मेरे हाथ खोल दिए। “अब रोज रात को आना। भाई को पता नहीं चलना चाहिए। अगर पकड़ा गया तो दोनों की गांड फट जाएगी।”
मैंने उन्हें कसकर पकड़ा। “भाभी… मैं रोज आऊँगा… तुम्हारी चूत और गांड दोनों रोज फाड़ूँगा…”
वे मुस्कुराईं। “फिर कल रात को रस्सी लेकर आना। आज सिर्फ हाथ बाँधे, कल पूरी बॉडी बाँधूँगी। फिर देखना कैसा मजा आता है।”
मैंने उनके शरीर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जैसी आपकी मर्जी भाभी… मैं आपका गुलाम हूँ।”
वे उठकर कपड़े पहनने लगीं। “अब जा अपने कमरे। सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई करना। नहीं तो मैं खुद तेरी गांड में लंड डालूँगी सजा के तौर पर।”
मैं नंगा ही उनके कमरे से निकला। सीढ़ियाँ उतरते समय दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। शरीर पर उनके नाखूनों के निशान थे, गांड पर तमाचों के लाल दाग। लेकिन मन में एक ही बात घूम रही थी—कल रात की रस्सी, और भाभी की वो क्रूर मुस्कान।
अगली रात मैं रस्सी लेकर पहुँचा। उन्होंने मुझे पूरी तरह नंगा किया, हाथ-पैर बाँध दिए चारपाई के कोनों से। फिर मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम मेरे सीने पर टपकाया। दर्द हुआ, लेकिन लंड तन गया। उन्होंने हँसते हुए कहा, “दर्द में मजा है ना? अब तेरी गांड में भी मोम डालूँगी।”
और फिर वो रात ऐसी बीती कि सुबह होने तक मेरा शरीर उनके निशानों से भरा था। चूत, गांड, मुँह—हर छेद इस्तेमाल हो चुका था। वे कभी रंडी बनतीं, कभी मालकिन। कभी मुझे कुत्ता बनाकर रेंगवातीं, कभी खुद घुटनों पर आ जातीं।
घर में सब सामान्य चलता रहा। पापा-मम्मी को कुछ पता नहीं चला। भाई अपनी दुनिया में मस्त। और मैं और प्रिया भाभी—हर रात एक नई सीमा पार करते। कभी चाबुक, कभी ठंडा पानी, कभी घंटों बांधकर छोड़ देना। हर बार वे और क्रूर होतीं, हर बार मैं और गहरा उनके वश में।
एक रात उन्होंने कहा, “एक दिन भाई को भी शामिल करूँगी। देखूँगी तुम दोनों कैसे मेरी सेवा करते हो।”
मैंने उनकी आँखों में देखा। वहाँ सिर्फ आग थी। और मैं जानता था—ये आग अब बुझने वाली नहीं।
रात के अँधेरे में जब मैं रस्सी और मोमबत्ती लेकर उनके कमरे में पहुँचा, प्रिया भाभी पहले से नंगी चारपाई पर लेटी हुई थीं। कमरे में सिर्फ एक लाल रंग की मोमबत्ती जल रही थी, जिसकी रोशनी उनके जिस्म पर लाल-लाल धब्बे बना रही थी। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराईं, लेकिन वो मुस्कान में कोई प्यार नहीं था, सिर्फ भूख थी।
“कपड़े उतार… और फर्श पर घुटनों के बल बैठ,” उन्होंने हुक्म दिया।
मैंने सब उतार दिया। मेरा लंड पहले से तना हुआ था। वे उठकर मेरे पास आईं और रस्सी से मेरे दोनों हाथ पीछे बाँध दिए, इतनी कसकर कि रस्सी मांस में धँस गई। फिर मेरी आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया। अंधेरा। सिर्फ उनकी साँसें और मेरे दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी।
“आज तुझे सिर्फ इस्तेमाल की चीज बनाऊँगी,” उनकी आवाज कान में गूँजी। “बोल… तू क्या है?”
“आपकी रंडी… आपकी कुतिया…” मैंने कहा।
एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर पड़ा। “जोर से बोल!”
“आपकी रंडी हूँ भाभी… आपकी गांड और चूत की गुलाम कुतिया!”
उन्होंने मेरे बाल पकड़कर खींचा और मुझे चारपाई की तरफ घसीटा। पेट के बल लिटाया। फिर गर्म मोम मेरी पीठ पर टपकाने लगीं। एक… दो… तीन बूँदें। हर बूँद जलन पैदा कर रही थी। मैं कराह उठा। उन्होंने और मोम गिराया—इस बार मेरी गांड के छेद के ठीक ऊपर।
“आह्ह… भाभी… जल रहा है…”
“जलने दे… दर्द में ही मजा है,” वे हँसीं। फिर उन्होंने मोमबत्ती बुझा दी और उसके गरम सिरे को मेरे गांड के छेद पर रगड़ने लगीं। मैं तड़प रहा था। अचानक उन्होंने वो गरम सिरा अंदर धकेल दिया। दर्द ऐसा कि आँखों से आँसू निकल आए, लेकिन लंड और सख्त हो गया।
वे मेरे ऊपर चढ़ गईं। उनकी गीली चूत मेरे मुँह पर आ बैठी। “चाट… अच्छे से… नहीं तो और गहरा मोम डालूँगी।”
मैंने जीभ निकाली। उनकी चूत का खट्टा पानी मेरे मुँह में भर रहा था। वे आगे-पीछे हिचकोले ले रही थीं, मेरे नाक पर दबाव डाल रही थीं। साँस लेना मुश्किल हो रहा था। जब वे संतुष्ट हुईं तो नीचे खिसक गईं और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। दाँत से काटतीं, फिर जोर से चूसतीं। मैं हाथ बँधे होने की वजह से कुछ कर नहीं पा रहा था। सिर्फ कराह रहा था।
अचानक उन्होंने लंड छोड़ दिया और मेरे अंडकोष पकड़कर मसलने लगीं। “इतने भरे हुए… आज सब निकाल दूँगी… लेकिन आसानी से नहीं।”
वे उठकर एक पतली बेंत लाईं। आँखों पर कपड़ा होने की वजह से मुझे दिखी नहीं, लेकिन जब पहली चोट मेरी गांड पर पड़ी तो समझ गया। पट्! दर्द की लहर पूरे शरीर में दौड़ गई। दूसरी चोट… तीसरी… दसवीं। मेरी गांड जल रही थी, सूज रही थी। हर चोट के साथ वे बोल रही थीं, “गिन… जोर से गिन…”
“एक… दो… तीन…” मैं चीख रहा था। बीस चोटों के बाद उन्होंने बेंत रख दी और मेरे गांड के लाल लोथड़ों को मसलने लगीं। फिर थूक लगाकर दो उँगलियाँ एक साथ अंदर घुसेड़ दीं। “आज तीन उँगलियाँ डालूँगी… कल मुट्ठी…”
तीसरी उँगली भी अंदर चली गई। मैं तड़प रहा था। वे उँगलियाँ अंदर-बाहर कर रही थीं, कभी मोड़तीं, कभी फैलातीं। फिर अचानक उँगलियाँ निकालकर अपना लंड जैसा कुछ अंदर धकेलने लगीं—वो एक मोटा लकड़ी का डंडा था जो उन्होंने पहले से तैयार रखा था।
“आह्ह… भाभी… बहुत मोटा है… फट जाएगा…”
“फटने दे… तेरी गांड को मैंने अपना शौचालय बना लिया है,” वे गुर्राईं और डंडा पूरा अंदर धकेल दिया। फिर धक्के लगाने लगीं। हर धक्के के साथ मेरी गांड फैल रही थी, दर्द और मजा दोनों एक साथ। वे डंडा अंदर छोड़कर मेरे लंड पर बैठ गईं। चूत में पूरा लंड समा गया।
अब वे उछल रही थीं और साथ में डंडा भी अंदर-बाहर कर रही थीं। दो होल्स एक साथ भरे हुए। मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था। वे मेरे गले पर हाथ रखतीं, दबातीं, फिर छोड़तीं। साँस फूलने और आने का खेल। अचानक उन्होंने डंडा और तेज धकेलना शुरू किया।
“झड़… अब झड़… मेरी चूत में सब डाल…”
मैं काबू नहीं कर पाया। जोर से झड़ गया। वे हँसते हुए मेरा माल अपनी चूत में समाहित करती रहीं। फिर लंड निकालकर मेरे मुँह में ठूंस दिया। “चाट… अपनी गंदगी चाट…”
आँखों का कपड़ा अभी भी बँधा था। मैं चाट रहा था। वे संतुष्ट होकर रस्सी खोलने लगीं। लेकिन हाथ खोलते ही उन्होंने मुझे फिर से बाँध दिया—इस बार हाथ ऊपर, पैर फैलाकर।
“अब मेरी बारी… आज तू मुझे चोदेगा… लेकिन मेरे हिसाब से।”
उन्होंने मेरी आँखों का कपड़ा खोला। लाल रोशनी में उनकी नंगी देह चमक रही थी। गांड पर मेरे तमाचों के निशान, चूचियों पर काटने के निशान। वे चारपाई पर घोड़ी बन गईं। “आ… पीछे से… लेकिन धीरे नहीं… एकदम जानवर की तरह।”
मैंने लंड उनकी गांड पर सेट किया। अभी भी वो डंडे से खुली हुई थी। एक जोरदार धक्का। पूरा अंदर। वे चीखीं। मैंने उनके बाल पकड़कर खींचे और पागलों की तरह धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ उनकी गांड पट-पट बज रही थी। मैंने तमाचे जड़ने शुरू किए—बाएँ… दाएँ… बाएँ… दाएँ। उनकी गांड लाल हो चुकी थी।
“और जोर… फाड़ दे… मुझे अपनी कुतिया बना…” वे चीख रही थीं।
मैंने उनकी कमर पकड़कर और तेज किया। लंड इतनी गहराई तक जा रहा था कि लग रहा था उनकी पेट में पहुँच जाएगा। अचानक उन्होंने खुद पीछे धकेलना शुरू किया। “रुका मत… आज मेरी गांड को याद दिला दे कि वो किसकी है…”
मैं झड़ने के करीब था। उन्होंने महसूस किया और लंड निकाल लिया। “नहीं… अभी नहीं। पहले मेरी चूत फाड़।”
वे पलट गईं। टाँगें कंधों तक चढ़ा दीं। मैंने चूत में लंड धकेल दिया। गीली, गरम, और टाइट। धक्के इतने जोर के कि चारपाई दीवार से टकराने लगी। उनकी चूचियाँ उछल रही थीं। मैंने एक चूची पकड़कर जोर से मसली, नाखून गड़ा दिए। खून की छोटी सी रेखा निकल आई। वे कराह उठीं।
“काट… काट मेरी चूची… खून निकाल…”
मैंने दाँत गड़ा दिए। वे और जोर से चिल्लायीं। नीचे मेरी कमर पागल हो रही थी। अचानक उन्होंने मेरे गले में दोनों हाथ डाल दिए और दबाया। “आज तू मेरे नीचे मर… लेकिन झड़ते वक्त…”
दबाव बढ़ा। मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। लेकिन उत्तेजना चरम पर थी। मैं आखिरी धक्के लगाते हुए उनकी चूत में ही झड़ गया। वे गला छोड़तीं और खुद भी काँप उठीं। दोनों पसीने से लथपथ, हाँफते हुए लेटे रहे।
थोड़ी देर बाद वे उठीं और मेरे शरीर पर पानी डालने लगीं। ठंडा पानी। फिर गरम। फिर ठंडा। मेरा शरीर काँप रहा था। उन्होंने फिर से रस्सी बाँधी—इस बार मुझे खड़े होकर दीवार से सटाया। हाथ ऊपर।
“अब एक नया खेल,” उन्होंने कहा और एक छोटी चाबुक निकाली। पतली, लेकिन नुकीली। पहली चोट मेरी छाती पर पड़ी। लाल लकीर। दूसरी… तीसरी। वे निचले हिस्से पर भी मारने लगीं—लंड के पास, अंडकोष के पास। दर्द इतना कि मैं चीख रहा था, लेकिन लंड फिर से तन गया।
वे घुटनों के बल बैठ गईं और लंड मुँह में ले लिया। चाबुक एक हाथ में, लंड दूसरे में। हर चोट के साथ वे जोर से चूसतीं। मैं पागल हो रहा था। अचानक उन्होंने लंड छोड़ दिया और चाबुक से मेरे अंडकोष पर हल्की चोट लगाई। “आज तेरे इनको भी सिखाऊँगी सबक।”
मैं तड़प रहा था। वे फिर से लंड मुँह में ले गईं और इस बार गले तक। मैं उनकी गर्दन पकड़कर धकेलने लगा। वे उल्टी जैसी आवाजें निकाल रही थीं, लेकिन रुक नहीं रहीं थीं। थूक फर्श पर गिर रहा था। अचानक मैं फिर से झड़ गया—सीधे उनके गले में। वे निगल गईं। सब।
रस्सी खोलते हुए वे बोलीं, “कल रात और बड़ा खेल होगा। भाई को ऑफिस से जल्दी बुलाने का प्लान है। देखूँगी तुम दोनों कैसे मेरी सेवा करते हो। एक लंड मुँह में, एक गांड में… या दोनों चूत में एक साथ।”
मैं उनके पैरों पर गिर गया। “जैसी आपकी इच्छा भाभी… मैं तैयार हूँ… कुछ भी सहने को।”
वे मेरे बाल सहलाती हुई बोलीं, “अच्छा गुलाम है तू। लेकिन याद रख… अगर कभी मना किया तो चाबुक से तेरी गांड का मांस उतार दूँगी।”
मैं उठा। शरीर पर निशान, जलन, दर्द—लेकिन मन में एक अजीब सुकून। उन्होंने दरवाजा खोला। “जा… सो जा। कल रात ग्यारह बजे। और हाँ… रस्सी के साथ लोहे की हथकड़ियाँ भी लेते आना।”
मैं नंगा ही सीढ़ियाँ उतर रहा था। हर कदम पर गांड जल रही थी, लंड अभी भी आधा तना हुआ। कमरे में आकर जब बिस्तर पर लेटा तो छत की तरफ देखता रहा। आँखों के सामने सिर्फ प्रिया भाभी की क्रूर मुस्कान घूम रही थी—वो मुस्कान जिसमें दर्द था, मजा था, और एक ऐसी भूख जो अब कभी शांत नहीं होने वाली।
अगली रात का इंतजार शुरू हो चुका था। और मैं जानता था—ये खेल अब सिर्फ हम दो का नहीं रहेगा। विक्रम भाई भी इसमें शामिल होने वाले थे। घर की दीवारें जल्द ही और भी ज्यादा चीखें सुनने वाली थीं। चीखें जो दर्द की होंगी, मजे की होंगी, और ऐसी होंगी जो किसी को भी पागल बना दें।
मैंने आँखें बंद कीं। शरीर में अभी भी मोम की जलन थी, चाबुक की लकीरें थीं, और गांड में वो खोखलापन जो डंडे ने छोड़ दिया था। लेकिन सबसे ज्यादा वो भूख थी—प्रिया भाभी की भूख, जो अब मेरी भी बन चुकी थी। कल रात… सब कुछ बदलने वाला था।
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