जागीर बनाने वाली औरत

रात भर छड़ी की चोट, गले में लोहे की चेन, पिघला मोम और जबरदस्ती निगला हुआ पेशाब… एक जवान लड़के को पूरी तरह तोड़कर अपनी जागीर बनाने वाली औरत की कहानी। दर्द के बिना मजा अधूरा desi sex stories।

रात का अंधेरा शहर के ऊपर पसरा हुआ था। पुरानी दिल्ली की संकरी गलियों में हवा ठंडी चल रही थी। घर नंबर 47, दूसरी मंजिल पर एक छोटी सी फ्लैट में रहती थी कविता शर्मा। उम्र लगभग 38 साल। कद मध्यम, शरीर गठीला, रंग गेहुआँ। स्तन भारी और लटके हुए, कमर पतली, कूल्हे चौड़े। पति पिछले तीन साल से दुबई में थे। घर में सिर्फ सास-ससुर रहते थे, जो ज्यादातर दिन मंदिर या रिश्तेदारों के यहाँ बिताते थे।

मैं रोहित था। उम्र 22। बी.एड. के दूसरे साल में। पढ़ाई में औसत, लेकिन लाइब्रेरी में घंटों बैठने की आदत थी। कविता मैडम वहाँ लाइब्रेरियन थीं। जब वो चलती थीं तो उनकी साड़ी के नीचे कूल्हों का हिलना पूरे कॉलेज को चुपचाप निहारने पर मजबूर कर देता था। मैं भी उन्हीं में से एक था। मन में इच्छाएँ थीं, लेकिन हिम्मत नहीं।
दीवाली की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। कॉलेज लगभग खाली हो चुका था। एक दोपहर मैं लाइब्रेरी गया। मैडम अकेली थीं। उन्होंने मुझे देखा और बिना किसी प्रस्तावना के कहा, “रोहित, आज कुछ काम है। किताबों की लिस्ट एक्सेल में बनानी है। बैठो।”

मैं बैठा। वो किताबें निकाल-निकाल कर नाम बता रही थीं। साड़ी का पल्लू ढीला था। ब्लाउज के ऊपर से स्तनों का आकार साफ दिख रहा था। ब्रा नहीं पहनी हुई लग रही थी। निपल्स के निशान कपड़े पर उभर आए थे। मेरी नजर वहीं अटक गई।
मैडम अचानक रुकीं। “देख क्या रहे हो?” आवाज में गुस्सा था।
मैंने सिर झुका लिया। “सॉरी मैडम।”
उन्होंने पल्लू ठीक किया और मुझे डाँटा। “बाहर निकलो। अभी।”

मैं निकला। गांव चला गया। मन में वही दृश्य घूम रहा था। दो दिन बाद रात में मेरा फोन बजा।
“रोहित?” आवाज परिचित थी।
“हाँ मैडम।”
“दीवाली मुबारक। एक बात बताओ… तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड है?”
“नहीं।”

थोड़ी चुप्पी। फिर उन्होंने कहा, “मैं तुमसे बात करना चाहती हूँ। लेकिन कॉलेज में किसी को पता नहीं चलना चाहिए। समझे?”
मैंने हाँ कह दी।
उस रात से फोन पर बातें शुरू हुईं। पहले सामान्य। फिर धीरे-धीरे वो अपने शरीर की बात करने लगीं। कैसे रात में अकेली होती हैं। कैसे पति की कमी महसूस होती है। एक रात उन्होंने कहा, “तुम मुझे नंगा देखना चाहते हो ना?”
मैं चुप रहा।
“बोलो।”
“हाँ।”
“तो आओ। कल दोपहर। सास-ससुर नहीं होंगे।”

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अगले दिन मैं उनके घर पहुँचा। दरवाजा खोला। कविता साड़ी में थीं, बाल खुले। बिना कोई बात किए उन्होंने मुझे अंदर खींचा और दरवाजा बंद कर दिया।
“कपड़े उतारो।” आवाज में कोई नरमी नहीं थी।
मैंने हिचकिचाते हुए शर्ट खोली। उन्होंने खुद मेरी पैंट खींच दी। अंडरवियर भी। मेरा लंड पहले से ही सख्त था। उन्होंने उसे हाथ में लिया और जोर से दबाया।
“इतना छोटा? उम्मीद से कम है।” फिर हँसी। “लेकिन चलेगा।”
उन्होंने मुझे घुटनों पर बैठने को कहा। खुद सोफे पर बैठ गईं और साड़ी ऊपर की। बिना पैंटी। योनि के बाल साफ कटे हुए थे। उन्होंने मेरे सिर को दोनों हाथों से पकड़ा और मुँह को अपनी चुत पर दबा दिया।

“चाट। धीरे नहीं। जोर से।”
मैंने जीभ निकाली। स्वाद नमकीन था। उन्होंने बालों में उंगलियाँ फँसाईं और जोर से खींचा। “और अंदर। जीभ डाल।”
मैंने कोशिश की। उन्होंने अपने पैर मेरे कंधों पर रख दिए और कमर आगे बढ़ाई। मेरी नाक उनकी चुत में दब गई। साँस लेना मुश्किल हो रहा था। वो हिल रही थीं। “हाँ… ऐसे ही… गधा।”
थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे खड़ा किया। खुद घुटनों पर बैठ गईं। मेरे लंड को मुँह में लिया। पहले सिर्फ आगे का हिस्सा। फिर पूरा। गले तक। उनकी आँखों में पानी आ गया, लेकिन उन्होंने रुकने से इनकार कर दिया। मेरे कूल्हों को पकड़कर खुद को और अंदर खींचा। मैं धक्के मारने लगा। हर धक्के पर उनकी गर्दन में आवाज आती। गला भर जाता। फिर भी वो जारी रखतीं।

पाँच मिनट बाद मैं झड़ने लगा। उन्होंने मुँह नहीं हटाया। सारा वीर्य उनके गले में चला गया। कुछ बाहर निकला तो उन्होंने जीभ से चाट लिया।
“अब बारी मेरी।” उन्होंने कहा।
मुझे बिस्तर पर लिटाया। खुद ऊपर चढ़ीं। बिना किसी तैयारी के मेरे लंड को अपनी चुत में बैठा लिया। सूखा था। दर्द हुआ दोनों को। लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। जोर-जोर से बैठने लगीं। स्तन मेरे चेहरे पर झूल रहे थे। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और काटा। उन्होंने मेरे बाल खींचे।
“काट। जोर से काट।”

मैंने काटा। निप्पल लाल हो गया। उन्होंने और जोर से हिलना शुरू किया। चुत से आवाजें आने लगीं। गीली हो चुकी थी। उन्होंने मेरे हाथों को अपने गले पर रख दिया।
“दबा। साँस रुक जाए तब तक।”
मैंने दबाया। उनकी आँखें लाल हो गईं। चेहरा तन गया। फिर भी कमर नहीं रुकी। जब साँस पूरी तरह रुकने वाली थी तो उन्होंने मेरे हाथ हटाए। खांसते हुए बोलीं, “फिर से।”
दूसरी बार और देर तक। तीसरी बार तो वो कांपने लगीं। शरीर ऐंठ गया। चुत ने मेरे लंड को जोर से जकड़ लिया। वो चरम पर पहुँच गईं। चीखीं। फिर मेरे ऊपर गिर पड़ीं।

थोड़ी देर बाद उन्होंने मुझे पलट दिया। अब मैं ऊपर था। उन्होंने अपने दोनों पैर मेरे कंधों पर रख दिए। लगभग दोहरे हो गए। “अंदर तक डाल। दर्द हो तो भी मत रुक।”
मैंने धक्के मारे। हर धक्के पर उनकी साँसें रुक रही थीं। उन्होंने अपने स्तनों को दोनों हाथों से दबाया और निपल्स को मोड़ा। “काट इन्हें। निशान छोड़।”
मैंने काटा। दाँत के निशान पड़ गए। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “और नीचे। जांघों पर भी।”
मैंने जांघों के अंदरूनी हिस्से पर काटा। लाल निशान उभर आए। वो और गीली होती गईं। चुत से पानी निकल रहा था। बिस्तर गीला हो रहा था।

एक समय ऐसा आया जब उन्होंने मुझे रोका। “रुको। मुझे बांधो।”
अलमारी से उन्होंने एक रस्सी निकाली। मेरे हाथों को बिस्तर के सिरहाने से बांध दिया। फिर अपने आप को। घुटनों को मोड़कर और रस्सी से बांध लिया ताकि पैर खुले रहें। “अब जो चाहे कर। लेकिन रोकना मत।”
मैंने उनके मुँह में उंगलियाँ डालीं। फिर चुत में। तीन उंगलियाँ। जोर से अंदर-बाहर। उन्होंने कराहना शुरू किया। मैंने चौथी उंगली भी डाली। फिर पूरा हाथ। मुट्ठी। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। लेकिन उन्होंने “रुको” नहीं कहा। सिर्फ साँसें तेज हो गईं।

जब मुट्ठी पूरी तरह अंदर थी तो उन्होंने शरीर को आगे-पीछे हिलाया। खुद को और अंदर लेने की कोशिश की। मैंने मुट्ठी घुमाई। उनकी चुत ने जोर से जकड़ा। पानी की धार निकल पड़ी। बिस्तर पूरी तरह भीग गया।
उसके बाद मैंने अपना लंड फिर से डाला। इस बार पीछे से। उन्होंने कमर उठाई। मैंने एक हाथ उनके बालों में फँसाया और खींचा। दूसरे हाथ से गले दबाया। धक्के इतने जोर के थे कि बिस्तर की लकड़ी चरमरा रही थी। उनकी आवाज दबी हुई आ रही थी। “और जोर… तोड़ दे…”
मैंने जोर बढ़ाया। उनकी चुत की दीवारें फटने के कगार पर लग रही थीं। फिर भी वो पीछे की तरफ धकेल रही थीं। एक समय पर मैंने उनके कंधे पर काटा। खून की कुछ बूंदें निकलीं। उन्होंने कराहते हुए कहा, “हाँ… ऐसे ही… निशान छोड़…”

जब मैं दोबारा झड़ने वाला था तो उन्होंने कहा, “मुँह में डाल। पूरा।”
मैंने निकालकर उनके मुँह में ठूंस दिया। गले तक। उन्होंने निगल लिया। कुछ बाहर निकला तो चेहरे पर लगा लिया। आँखों में, गालों पर, बालों में।
बाद में हम दोनों बिस्तर पर लेटे रहे। उनके शरीर पर काटने के निशान, रस्सी के लाल निशान, चुत सूजी हुई। मेरे हाथों पर उनके नाखूनों के निशान।
उन्होंने धीरे से कहा, “अगली बार और कड़ा होगा। समझे?”

मैंने सिर हिलाया।
उस दिन के बाद हमारे मिलने का सिलसिला चलता रहा। कभी कॉलेज की पुरानी स्टोर रूम में, जहाँ कोई नहीं आता था। कभी उनके घर पर जब सास-ससुर बाहर होते। हर बार नियम और सख्त होते गए।
एक रात उन्होंने मुझे एक काला कपड़ा पहनाया। आँखों पर पट्टी बांधी। हाथ पीछे बांधे। फिर मुझे फर्श पर बैठाया। खुद मेरे सामने बैठीं और मेरे मुँह में अपना पेशाब किया। गरम। कड़वा। मैंने पी लिया क्योंकि उन्होंने कहा था। उसके बाद उन्होंने मुझे चाटने को कहा। पूरे शरीर को। पैरों से लेकर गर्दन तक।

दूसरी बार उन्होंने मोमबत्ती जलाई। पिघला हुआ मोम मेरे सीने पर गिराया। फिर अपने स्तनों पर। दर्द तेज था। लेकिन उन्होंने कहा कि दर्द ही मजा है। मोम ठंडा होने के बाद उन्होंने उसे नखूनों से खुरचा। त्वचा लाल हो गई।
एक शाम उन्होंने चेन लाई। मेरे लंड के चारों ओर बांधी। थोड़ा कसा। फिर खींचा। दर्द ऐसा कि आँखों में पानी आ गया। लेकिन उन्होंने और कस दिया। “सहन कर। नहीं तो छोड़ दूंगी।”
मैंने सहा। फिर उन्होंने उसी चेन को अपनी चुत में डालकर घुमाया। धातु की ठंडक और मेरे लंड का दर्द एक साथ।

हर मुलाकात के बाद वो मुझे साफ कपड़े पहनातीं। चेहरे पर कोई निशान न रहे, इस बात का ध्यान रखतीं। कॉलेज में हम फिर से सामान्य हो जाते। वो लाइब्रेरियन, मैं छात्र। कोई अंदाजा नहीं लगा सकता था कि रात को क्या होता है।
एक रात उन्होंने कहा, “रोहित, तुम मेरे हो। सिर्फ मेरे। समझे? कोई और लड़की देखी तो…” उन्होंने मेरे लंड को जोर से मरोड़ा। “…यह तोड़ दूंगी।”
मैंने सिर हिलाया।

एक शनिवार की रात उन्होंने मुझे घर बुलाया। सास-ससुर हरिद्वार गए हुए थे। तीन दिन का समय था। दरवाजा खोलते ही उन्होंने मेरी गर्दन में चेन डाल दी। भारी लोहे की चेन। ताला लगाया। चाबी अपनी ब्रा में रख ली।
“आज से तुम कुत्ता हो। नाम नहीं। सिर्फ कुत्ता।”
मैंने सिर झुकाया। उन्होंने मेरे कपड़े फाड़ दिए। शर्ट के बटन बिखर गए। पैंट घुटनों तक खींचकर फाड़ दी। अंडरवियर को दाँत से काट दिया। नंगा खड़ा छोड़ दिया। फिर रसोई से एक पतली बांस की छड़ी निकाली।
“चार हाथ आगे। कमर झुकाओ।”

मैं झुका। पहली चोट जांघ के पीछे पड़ी। आवाज कड़क थी। त्वचा जल उठी। दूसरी चोट और जोर की। तीसरी पर खून की पतली लकीर निकली। उन्होंने छड़ी चाटी।
“खून का स्वाद अच्छा है। और सहो।”
बीस चोटें लगाईं। जांघें, कूल्हे, पीठ। हर चोट के बाद वो मेरे लंड को जोर से मरोड़तीं। दर्द से लंड और सख्त हो जाता। जब पीठ पूरी लाल हो गई तो उन्होंने छड़ी फेंक दी।
“अब घिसट कर किचन जा।”

मैं घुटनों पर रेंगता हुआ गया। फर्श ठंडा था। चेन गर्दन में खनक रही थी। किचन में उन्होंने गैस जलाई। एक मोटी मोमबत्ती जलाई। पिघला मोम मेरे कंधे पर गिराया। दर्द तेज था। मोम ठंडा होते ही उन्होंने नखून से खुरच दिया। त्वचा उखड़ गई। फिर दूसरा कंधा। फिर सीना। निपल्स पर मोम गिराया। मैं कराह उठा।
“आवाज मत निकाल। कुत्ते रोते नहीं।”
उन्होंने मेरे मुँह में कपड़ा ठूंस दिया। फिर मोमबत्ती नीचे ले गईं। जांघों के अंदर। अंडकोष पर। एक बूँद लंड की नोक पर गिरी। शरीर ऐंठ गया। कपड़े के बावजूद आवाज निकल गई। उन्होंने मेरे बाल खींचकर सिर उठाया।
“अगली बार आवाज निकली तो जीभ काट लूँगी।”

मोमबत्ती बुझाकर उन्होंने मुझे बाथरूम घसीटा। टब में ठंडा पानी भरा। मुझे उसमें धकेल दिया। पानी बर्फीला था। शरीर कांपने लगा। उन्होंने मेरे सिर को पानी में दबाया। तीस सेकंड। साँस रुकने लगी। फिर निकाला। दोबारा दबाया। इस बार चालीस सेकंड। पानी नाक में चला गया। खांसी आने लगी। उन्होंने तीसरी बार और देर तक दबाया। जब निकाला तो मैं कांप रहा था।
“अब चाट।”
उन्होंने अपने पैर टब के किनारे पर रखे। योनि मेरे मुँह के सामने। मैंने जीभ निकाली। उन्होंने सिर दबाया। पूरा मुँह भर गया। उन्होंने पेशाब किया। गरम धार मेरे गले में चली गई। मैंने निगल लिया। पूरा। एक बूँद भी बाहर नहीं गिरने दी। जब धार रुकी तो उन्होंने कहा, “अब अंदर साफ कर।”

मैंने जीभ अंदर डाली। गहरी। उन्होंने कमर घुमाई। मेरी नाक उनकी चुत में दब गई। साँस नहीं आ रही थी। फिर भी जीभ नहीं रोकी। जब वो संतुष्ट हुईं तो सिर छोड़ा।
रात भर ये सिलसिला चला। कभी छड़ी, कभी मोम, कभी ठंडा पानी, कभी गला दबाना। सुबह चार बजे उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। हाथ-पैर चारों तरफ बांध दिए। रस्सी इतनी कसी कि उंगलियाँ सुन्न होने लगीं। फिर खुद ऊपर चढ़ीं।
“आज तुम्हारा लंड सिर्फ मेरी चुत के लिए है। झड़ने की इजाजत नहीं।”

उन्होंने लंड को चुत में बैठाया। सूखा। दर्द दोनों को हुआ। लेकिन उन्होंने परवाह नहीं की। जोर-जोर से बैठने लगीं। हर बैठने पर मेरे कूल्हे बिस्तर में धंस जाते। स्तन मेरे चेहरे पर पटक रही थीं। निपल्स मुँह में ठूंस रही थीं। “काटो। खून निकले।”
मैंने काटा। दाँत गड़े। खून की बूंदें मुँह में आईं। उन्होंने और जोर से बैठना शुरू किया। चुत की दीवारें फटने के करीब लग रही थीं। फिर भी रुकना नहीं चाहती थीं। एक घंटे तक लगातार। मेरा लंड दर्द से सुन्न हो चुका था। लेकिन झड़ने नहीं दिया। जब भी करीब आता तो वो रुक जातीं और मेरे अंडकोष को मरोड़तीं। दर्द इतना कि आँखों में अंधेरा छा जाता।

सुबह आठ बजे उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मेरे हाथ-पैर सुन्न थे। उन्होंने चेन खींचकर मुझे फर्श पर गिराया।
“अब मेरे जूते चाटो। दोनों।”
मैंने चाटे। धूल, पसीना, सब। फिर उन्होंने जूते उतारे। पैर की उंगलियाँ मुँह में ठूंस दीं। “पूरा मुँह भर। साँस मत लो।”
मैंने भरा। उन्होंने एड़ी से मेरे गले पर दबाव डाला। साँस रुक गई। तीस सेकंड बाद छोड़ा।
दोपहर तक शरीर पर इतने निशान थे कि दर्पण में खुद को पहचानना मुश्किल था। पीठ पर छड़ी के निशान, सीने पर मोम के जले हुए धब्बे, गर्दन पर चेन के लाल घेरे, जांघों पर काटने के निशान, लंड पर सूजन।

रात को फिर से शुरू किया। इस बार उन्होंने एक मोटी मोमबत्ती ली। जलती हुई। मुझे घुटनों पर बैठाया। हाथ पीछे बांधे। मोमबत्ती मेरे लंड के ठीक ऊपर रखी। मोम टपकने लगा। हर बूँद पर शरीर कांपता। उन्होंने मोमबत्ती और नीचे की। नोक लंड को छूने लगी। जलन असहनीय हो गई। मैंने दांत भींच लिए। आवाज नहीं निकाली।
जब मोम काफी जमा हो गया तो उन्होंने ठंडा पानी डालकर हटाया। त्वचा के साथ कुछ मोम चिपक गया। खींचते समय दर्द नया था।
“अब पीछे की बारी।”

उन्होंने मुझे चारों हाथ-पैर पर बैठाया। तेल नहीं लगाया। सिर्फ थूक। उंगली अंदर डाली। एक। दो। तीन। फिर पूरा हाथ। मुट्ठी। मेरे पेट में दबावमहसूस हुआ। उन्होंने मुट्ठी घुमाई। आंतें ऐंठ गईं। फिर भी उन्होंने नहीं रोका। मुट्ठी अंदर-बाहर। हर बार और गहरा। जब मुट्ठी पूरी तरह गायब हो गई तो उन्होंने दूसरी उंगलियाँ भी अंदर ठूंसने की कोशिश की। दर्द ऐसा कि आँखों से पानी बहने लगा। लेकिन मैं चुप रहा।
उसके बाद उन्होंने अपना लंडनुमा खिलौना निकाला। काला, मोटा, नसों वाला। बिना किसी रुक-रुक के अंदर डाल दिया। धक्के इतने जोर के कि मेरा माथा दीवार से टकरा रहा था। हर धक्के पर चेन खनकती। उन्होंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।
“बोल। तू क्या है?”

“कुत्ता… मैडम का कुत्ता…”
“और जोर से।”
“मैडम का गन्दा कुत्ता… जो सिर्फ चुत चाटने और लंड सहने के लिए पैदा हुआ है…”
उन्होंने खिलौना और तेज किया। आखिर में जब वो चरम पर पहुँचीं तो खिलौना अंदर छोड़ दिया। खुद मेरे मुँह पर बैठ गईं। पेशाब किया। इस बार पूरा चेहरा भिगो दिया। आँखों में, नाक में, मुँह में। मैंने जितना हो सका निगला। बाकी चेहरे पर सूखने दिया।
रात के दो बजे उन्होंने मुझे खोल दिया। शरीर हिल नहीं रहा था। उन्होंने मेरे ऊपर चादर डाल दी। खुद पास लेट गईं। उंगली से मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं,

“कल और कड़ा होगा। आज तो सिर्फ शुरुआत थी। तीन दिन हैं। मैं तुम्हें तोड़कर रख दूंगी। फिर जोड़ूंगी। अपने हिसाब से।”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ आँखें बंद कीं। शरीर दर्द से कांप रहा था। लेकिन मन के किसी कोने में एक अजीब सी भूख जाग रही थी। अगली रात का इंतजार।
सुबह जब आँख खुली तो कविता पहले से जाग चुकी थीं। हाथ में नई रस्सी थी। मोटी। और एक छोटी चाकू।
“आज निशान स्थायी होंगे।”

उन्होंने मेरे सीने पर चाकू की नोक रखी। हल्के से दबाया। खून की पतली लकीर निकली। उन्होंने लकीर के साथ अपना नाम लिखा। क…व…ि…त…ा। हर अक्षर के बाद खून पोंछकर चाटा।
“अब ये नाम हमेशा रहेगा। मिटा नहीं पाओगे।”
चाकू नीचे ले गईं। जांघ के अंदर। एक छोटा सा क्रॉस काटा। फिर दूसरे जांघ पर। खून बह रहा था। उन्होंने खून को उंगली से लेकर मेरे मुँह में लगाया।
“अपना खून चाट। याद रहे।”

फिर रस्सी से बांधने की प्रक्रिया शुरू हुई। इस बार सिर्फ हाथ-पैर नहीं। पूरे शरीर को। छाती के चारों ओर, कमर के चारों ओर, जांघों के चारों ओर। रस्सी इतनी कसी कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया। फिर उन्होंने मुझे खड़ा किया। चेन को छत के हुक से बांध दिया। पैर जमीन से ठीक एक इंच ऊपर। पूरा वजन गर्दन और कंधों पर।
छड़ी फिर से हाथ में ली। इस बार चोटें पेट पर, पसलियों पर, अंडकोष पर। हर चोट के बाद वो रुकतीं और मेरे लंड को मुँह में लेतीं। सिर्फ दो-तीन सेकंड। फिर छोड़ देतीं। उत्तेजना और दर्द का मिश्रण पागल कर रहा था।

तीन घंटे तक लटकाए रखा। जब उतारा तो पैर नहीं संभले। फर्श पर गिर गया। उन्होंने मुझे घसीटकर बाथरूम ले गईं। ठंडे पानी से नहलाया। घावों पर साबुन रगड़ा। जलन नई थी। फिर पोंछकर बिस्तर पर लिटा दिया।
“आराम कर लो। रात को असली खेल शुरू होगा।”

मैं लेटा रहा। छत की ओर देखता रहा। शरीर एक बड़े घाव की तरह दर्द कर रहा था। लेकिन आँखों के पीछे एक तस्वीर बार-बार आ रही थी। कविता की मुस्कुराहट। जब वो दर्द देती थीं तो उनकी आँखों में जो चमक होती थी, वही चमक अब मेरे अंदर भी जाग रही थी।
रात का इंतजार शुरू हो चुका था। और इस बार मैं जानता था कि सुबह तक कुछ भी बचा नहीं रहेगा। न शरीर का, न मन का। सब कुछ कविता शर्मा के नाम हो जाएगा।
चेन गर्दन में खनक रही थी। चाबी अभी भी उनकी ब्रा में थी। और तीन दिन बाकी थे।

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