भतीजे ने चाची को कमरे में कैद किआ

तीन महीने बाद लौटा भतीजा फिर से चाची के कमरे में कैद हो गया। रस्सियाँ, मोम और उनकी भारी साँसें उसे हर रात तोड़ती रहीं। अब वह गाँव छोड़ ही नहीं सकता।

मेरा नाम फरहान है। उम्र 22 साल। बिहार के एक छोटे से कस्बे मुजफ्फरपुर के पास के गाँव से हूँ। घर में माँ-बाप और एक छोटी बहन है। मैं कॉलेज में अंतिम वर्ष का छात्र था और छुट्टियों में गाँव लौट आया था।
मेरी चाची का नाम नजमा है। उम्र 38 साल। सांवली, गोरापन लिए हुए चेहरा, भारी-भरकम जिस्म। ब्लाउज साइज 40, कमर 28, हिप्स 42। लंबे काले बाल, मोटे होंठ, और स्तन जो कपड़ों में भी अपना आकार नहीं छिपा पाते।

उनके तीन बच्चे हैं—सब बड़े हो चुके। बड़ा बेटा 21 का, बेटी 20 की और छोटा बेटा 19 का। सब शहर में पढ़ते या काम करते हैं। चाची अकेली गाँव के पुराने मकान में रहती थीं। उनका पति सालों पहले मर चुका था।
मैं बचपन से उनकी तरफ आकर्षित था। उनकी साड़ी की चुन्नट, गले की गहराई, और जब वे झुककर कुछ उठातीं तो उभरे स्तन—सब कुछ मुझे बेचैन कर देता था। मैंने कई बार उनके नाम की हस्तमैथुन की थी, लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाया।

एक शाम चाची ने मुझे बुलाया। घर में बिजली नहीं थी। लालटेन की रोशनी में वे बिस्तर पर लेटी थीं। साड़ी का पल्लू ढीला था। स्तन आधे बाहर निकले हुए। मैंने आँखें फेर लीं, लेकिन लंड तुरंत सख्त हो गया।
“फरहान, बाजार से कुछ सामान ला देना। अकेली हूँ, डर लगता है।”
मैं सामान लेकर आया। तब तक रात हो चुकी थी। चाची ने दरवाजा बंद किया और मुझे अंदर बुलाया।
“बैठ। चाय पी।”

मैं बैठा। उनकी साड़ी और भी ढीली हो गई थी। निप्पल की आकृति साफ दिख रही थी। मेरी निगाह वहीं अटक गई। चाची ने नोटिस किया।
“देख क्या रहा है?” आवाज में हल्की हँसी थी।
मैं चुप रहा। वे पास आईं। उनका हाथ मेरे जाँघ पर रखा।
“तेरा लंड खड़ा है। इतने दिनों से मेरी तरफ देखता है। आज खुलकर बोल।”
मैंने हिम्मत की। “चाची… मुझे तुम्हारी चूत चाहिए।”

वे हँसीं। फिर अचानक गंभीर हो गईं। “लेना है तो ले। लेकिन मेरी शर्तें। आज से तू मेरा गुलाम। जो कहूँगी वही करेगा। मना किया तो गाँव में तेरी इज्जत मिट्टी में मिला दूँगी।”
मैंने सहमति दे दी। उसी रात से मेरी जिंदगी बदल गई।
चाची ने मुझे कमरे में ले जाकर कपड़े उतारने को कहा। मैं नंगा खड़ा हो गया। उनका 7 इंच का सख्त लंड देखकर वे मुस्कुराईं। उन्होंने अपना ब्लाउज खोला। भारी स्तन बाहर निकले। बड़े-बड़े काले निप्पल। फिर साड़ी और पेटीकोट उतारा। बिना पैंटी की चूत—मोटी, बालों से भरी, और पहले से गीली।

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उन्होंने मुझे घुटनों पर बैठाया। “चाट।”
मैंने उनकी चूत पर मुँह लगा दिया। खट्टी-मीठी गंध। मैंने जीभ अंदर डाली, क्लिट को चूसा। चाची ने मेरे बाल पकड़कर जोर से दबाया। “और गहरा… जीभ अंदर फँसा।”
मैंने उनकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं और चूत को जीभ से चीरता रहा। वे कराहने लगीं। “हाँ… ऐसे… चूस मेरी रस भरी चूत।” कुछ मिनट में वे झड़ गईं। उनका पानी मेरे मुँह में भर गया। मैंने निगल लिया।

फिर उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। खुद ऊपर चढ़ गईं। अपनी चूत को मेरे लंड पर सटाया और एक झटके में पूरा अंदर ले लिया। टाइट, गर्म, और गीली। वे उछलने लगीं। स्तन मेरे चेहरे पर झूल रहे थे। मैंने दोनों निप्पल मुँह में ले लिए और जोर से काटे। चाची चीखीं लेकिन रुकीं नहीं।
“काट… और जोर से काट मेरे दूध!”

मैंने दाँत गड़ा दिए। उन्होंने मेरे सीने पर नाखून रगड़ दिए। खून निकल आया। वे और तेज हिलने लगीं। “आज मैं तुझे फाड़ दूँगी। मेरी चूत में तेरा बीज भर दे।”
मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे से जोर-जोर से धक्के मारे। हर धक्के पर उनकी चूत चिपचिपी आवाज करती। वे झड़ती रहीं। आखिर मैं भी उनके अंदर ही फट पड़ा। गर्म वीर्य उनकी गहराई में भर गया।
अगली सुबह उन्होंने मुझे जगाया। हाथों में रस्सी थी। “आज से बंधन शुरू।”

उन्होंने मेरे हाथ-पैर बिस्तर के चारों कोनों से बाँध दिए। मैं बिलकुल बेबस। चाची नंगी हो गईं। उन्होंने मोमबत्ती जलाई और पिघला हुआ मोम मेरे सीने पर टपकाया। जलन तेज थी। मैं कराह उठा। उन्होंने मुँह में कपड़ा ठूंस दिया।
फिर वे मेरे लंड पर बैठ गईं। उलटी चुदाई। उनकी गांड मेरे चेहरे पर। “चाट मेरी गांड भी।” मैंने जीभ अंदर डाली। उनकी गांड की सिकुड़न महसूस की। वे आगे-पीछे हिल रही थीं। एक हाथ से मेरे अंडे दबा रही थीं, दूसरे से अपने स्तन मसल रही थीं।
“तेरा लंड मेरा खिलौना है। जब चाहूँगी इस्तेमाल करूँगी। तू सिर्फ सहेगा।”

उन्होंने मेरे लंड को अपनी चूत में फिर से घुसेड़ लिया। इस बार धीरे-धीरे, लेकिन गहरा। हर बार जब वे ऊपर उठतीं, मेरा लंड लगभग बाहर निकल आता, फिर एक झटके में पूरा अंदर। उनके स्तन मेरे मुँह के पास आते। मैं निप्पल चूसता। वे कभी-कभी मेरे गाल पर थप्पड़ मारतीं। “जोर से चूस, कुत्ते!”
दोपहर तक वे कई बार झड़ चुकी थीं। मेरा लंड दर्द करने लगा था, लेकिन वे रुकीं नहीं। आखिर उन्होंने मेरे मुँह से कपड़ा निकाला और अपना रस भरा मुँह मेरे ऊपर रख दिया। “पी मेरा पानी।” मैंने उनकी चूत से निकलता हुआ रस चाटा।

रात को उन्होंने मुझे खोल दिया, लेकिन सिर्फ इसलिए कि मैं उनकी सेवा करूँ। उन्होंने आदेश दिया—नहलाओ, तेल लगाओ, पैर दबाओ, और फिर से चोदो।
अगले कई दिनों तक यही सिलसिला चला। कभी वे मुझे रसोई में नंगा खड़ा करके चूत चाटवातीं, कभी आँगन में अँधेरे में गांड में उंगली डालकर चोदतीं। एक रात उन्होंने मेरे लंड पर पतली रस्सी बाँधी और खींचते हुए मुझे कमरे में घुमाया। “मेरा कुत्ता बनकर चल।”
मैंने उनकी हर इच्छा पूरी की। उन्होंने मेरे सीने पर सिगरेट के निशान लगाए, नाखूनों से खरोंचें डालीं, और कभी-कभी मेरे मुँह में अपना पेशाब भी डाला। “गुलाम का काम है मालकिन का सब कुछ निगलना।”

एक शाम उन्होंने मुझे बाँधकर बिस्तर पर लिटाया। खुद ऊपर से नीचे तक तेल लगाकर चमकदार हो गईं। फिर उन्होंने मेरा लंड अपनी चूत में लिया और धीरे-धीरे हिलने लगीं। बीच-बीच में रुककर मेरे अंडकोष को दबातीं। “आज मैं तुझे खाली कर दूँगी। जब तक मेरी मर्जी न हो, तू झड़ नहीं सकता।”
मैं कराहता रहा। उन्होंने अपनी चूत से मेरा लंड निकाला, मुँह में लिया, और दाँतों से हल्के से काटा। फिर वापस चूत में। इस बार पीछे की ओर मुँह करके। उनकी मोटी गांड मेरे पेट पर रगड़ खा रही थी। मैंने दोनों हाथों से उनके स्तन पकड़े और निप्पल मोड़े। वे चीखीं लेकिन और तेज हिलने लगीं।
“फाड़ दे मेरी चूत… आज बहुत दिनों बाद इतनी जोर की भूख लगी है।”

मैंने नीचे से धक्के तेज किए। हर धक्के पर उनकी चूत की दीवारें मेरे लंड को जकड़ लेतीं। वे झड़ती रहीं—एक, दो, तीन बार। आखिर उन्होंने अनुमति दी। मैंने उनके अंदर ही सारा वीर्य उड़ेल दिया। वे मेरे ऊपर गिर पड़ीं, साँसें फूल रही थीं।
“अब तू मेरा है। जब तक मैं कहूँ, तू यहीं रहेगा। गाँव छोड़कर मत जाना। वरना मैं तेरी तस्वीरें गाँव में फैला दूँगी—नंगा, बंधा हुआ, मेरी चूत चाटता हुआ।”
मैंने सिर हिलाया। अब मेरी जिंदगी उनकी थी।

उसके बाद के हफ्तों में चाची ने मुझे पूरी तरह अपना बना लिया। सुबह वे मुझे जगातीं, लंड चूसवातीं, फिर खुद चूत में बैठाकर नाश्ता करतीं।दोपहर को खेतों के पास के पुराने कोठे में ले जाकर रस्सियों से बाँधतीं और घंटों चोदतीं। शाम को घर लौटकर मेरे शरीर पर मोम, हल्की चाबुक जैसी रस्सी, और अपने नाखूनों से निशान छोड़तीं।
एक रात उन्होंने मुझे पूरी तरह नंगा करके आँगन में खड़ा किया। ठंडी हवा में मेरा लंड काँप रहा था। वे साड़ी में आईं, साड़ी ऊपर उठाई, और मेरे मुँह पर चूत दबा दी। “चाट। पूरी रात। जब तक मैं तृप्त न होऊँ।”

मैंने उनकी बालों वाली, गीली, गरम चूत को जीभ से साफ किया। क्लिट को दाँतों से हल्का काटा। उंगली गांड में डाली। वे कराहती रहीं, मेरे बाल नोचती रहीं, और बार-बार झड़ती रहीं। सुबह होने तक मेरा जबड़ा दर्द कर रहा था, लेकिन वे संतुष्ट थीं।
अंत में एक रात उन्होंने मुझे अपने बिस्तर पर बुलाया। रस्सियाँ, तेल, और एक पतली बेंत जैसा डंडा साथ था। उन्होंने मुझे चारों तरफ से बाँधा। फिर बेंत से हल्के-हल्के मेरे जाँघों और लंड के आसपास मारा। जलन तेज थी। फिर वे मेरे ऊपर चढ़ीं।
“आज आखिरी सबक। तू सिर्फ मेरा शरीर इस्तेमाल करने वाला नहीं। तू मेरा गुलाम है। मेरी चूत, मेरी गांड, मेरे स्तन—सब तेरे मालिक हैं। तू सिर्फ सहने के लिए बना है।”

उन्होंने अपना लंड मेरी चूत में घुसेड़ा—नहीं, मेरा लंड उनकी चूत में। फिर गांड में। फिर मुँह में। बारी-बारी से। हर बार जब मैं झड़ने के करीब पहुँचता, वे रुक जातीं और मेरे अंडे दबा देतीं। दर्द और मजे का मिश्रण। आखिर उन्होंने अनुमति दी। मैं उनकी गांड में फट पड़ा। वे मुस्कुराईं।
“अब सो जा। कल फिर शुरू होगा।”
मैं उसी बिस्तर पर सो गया—उनके शरीर से चिपका हुआ, उनके स्तन मेरे सीने पर, उनकी टाँगें मेरी टाँगों पर। सुबह जब आँख खुली तो वे फिर से मेरे लंड को चूस रही थीं।
गाँव में अब मैं सिर्फ नजमा चाची का गुलाम था। उनकी हर इच्छा, हर क्रूरता, हर भूख—मैं सहता रहा। और हर बार जब वे मेरे अंदर अपना रस भरतीं या मुझे उनके रस से नहलातीं, मुझे लगता कि यही मेरी असल जिंदगी है।

गाँव में अब मैं सिर्फ नजमा चाची का गुलाम था। उनकी हर इच्छा, हर क्रूरता, हर भूख—मैं सहता रहा। और हर बार जब वे मेरे अंदर अपना रस भरतीं या मुझे उनके रस से नहलातीं, मुझे लगता कि यही मेरी असल जिंदगी है।
कहानी यहीं खत्म नहीं होती। चाची अभी भी गाँव में हैं। और जब भी मैं लौटता हूँ, रस्सियाँ, मोम और उनकी भारी साड़ी मेरे इंतजार में होती हैं।
तीन महीने बाद मैं फिर गाँव लौटा। कॉलेज की छुट्टियाँ थीं। स्टेशन से सीधे उनके मकान की तरफ चला। दरवाजा आधा खुला था। अंदर घुसा तो चाची आँगन में बैठी थीं। काली साड़ी में। पल्लू सर से खिसका हुआ। स्तन भारी-भरकम, निप्पल साड़ी के पार साफ उभर रहे थे। उन्होंने मुझे देखा और मुस्कुराईं।

“आ गया मेरा कुत्ता। तीन महीने बाद। लंड तो याद रखा होगा मेरी चूत का स्वाद?”
मैंने सिर झुकाया। “हाँ चाची।”
उन्होंने इशारा किया। “अंदर। आज की रात लंबी है। मैंने तेरे लिए कुछ नया सोचा है।”
कमरे में घुसते ही उन्होंने दरवाजा बंद कर दिया। ताला लगाया। फिर मेरी तरफ मुड़ीं। “कपड़े उतार। सब।”
मैंने शर्ट, पैंट, अंडरवियर सब उतार दिए। नंगा खड़ा हो गया। लंड पहले से आधा सख्त था। चाची ने अपनी साड़ी खोल दी। ब्लाउज और पेटीकोट भी। पूरी नंगी। 40 साइज के स्तन लटके हुए, काले बड़े निप्पल। कमर पतली, हिप्स चौड़े, चूत पर घने बाल। गांड गोल और मोटी। उन्होंने बिस्तर के नीचे से एक बड़ा थैला निकाला। उसमें मोटी रस्सियाँ, लोहे की हथकड़ियाँ, मोमबत्तियाँ, एक पतली बेंत, और काला चमड़े का मुखौटा।

“आज तू सिर्फ मेरा खिलौना नहीं। तू मेरा दर्द सहने वाला जानवर है।”
उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। हाथ ऊपर खींचकर हथकड़ियाँ पहना दीं। पैर भी अलग-अलग बाँध दिए। मैं बिलकुल फैला हुआ, बेबस। फिर उन्होंने मुखौटा मेरे चेहरे पर चढ़ा दिया। आँखें बंद। सिर्फ साँस लेने की जगह। अंधेरा। उनकी आवाज करीब आई।
“अब तू कुछ नहीं देखेगा। सिर्फ महसूस करेगा।”

पहले उन्होंने मेरे लंड को मुँह में लिया। गहरी, गीली, दाँतों से हल्के काटते हुए। मैं कराह उठा। फिर अचानक छोड़ दिया। ठंडी बूँदें मेरे सीने पर गिरीं। मोम। जलन तेज थी। वे पिघला हुआ मोम मेरे निप्पल पर, पेट पर, फिर सीधे लंड की नस पर टपका रही थीं। मैं तड़प रहा था। मुखौटे के अंदर साँसें फूल रही थीं।
“चिल्ला। जितना चाहे चिल्ला। कोई नहीं सुनेगा।”
मोम के बाद बेंत। हल्की लेकिन सटीक मार जाँघों पर, अंडकोष के पास, फिर लंड की जड़ पर। हर वार पर मेरा शरीर उछलता। दर्द और उत्तेजना मिलकर पागल बना रहे थे। चाची हँस रही थीं।

“तेरा लंड और सख्त हो गया। दर्द में भी खड़ा रहता है। सच्चा गुलाम।”
उन्होंने मेरे ऊपर चढ़ गईं। चूत मेरे मुँह पर दबा दी। “चाट। जीभ अंदर तक। गांड भी चाट।”
मैंने अंधेरे में उनकी गीली, गर्म चूत को चाटा। बाल मुँह में आ रहे थे। रस बह रहा था। मैंने जीभ क्लिट पर फिराई, फिर नीचे गांड की सिकुड़न में घुसेड़ दी। चाची जोर से कराह उठीं। उन्होंने मेरे बाल पकड़कर और दबा दिया। “और गहरा… साँस मत ले… सिर्फ चाट।”
मैं घुट रहा था लेकिन रुक नहीं सकता था। उनकी चूत ने पानी छोड़ दिया। पूरा मुँह भर गया। उन्होंने मुखौटा थोड़ा ऊपर किया ताकि मैं निगल सकूँ। फिर वापस चढ़ा दिया।

अब वे मेरे लंड पर बैठ गईं। एक झटके में पूरा अंदर। टाइट चूत ने लंड को जकड़ लिया। वे उछलने लगीं। भारी स्तन मेरे चेहरे पर पटक रहे थे। मैं निप्पल काटने की कोशिश करता तो वे और जोर से बैठ जातीं।
“काट मेरे दूध। खून निकाल। आज मैं तुझे पूरी तरह तोड़ दूँगी।”
मैंने दाँत गड़ा दिए। निप्पल मुँह में भर गया। चाची चीखीं लेकिन रुकीं नहीं। उनकी नाखून मेरे सीने में गड़ गए। खून की पतली लकीरें बहने लगीं। वे और तेज हिल रही थीं। हर धक्के पर उनकी चूत चिपचिपी आवाज करती। मैं नीचे से भी धक्के मारने लगा। हथकड़ियाँ खनक रही थीं।
अचानक उन्होंने लंड निकाल लिया। मुँह फेरकर गांड मेरे लंड पर सटा दी। “अब गांड में। धीरे से नहीं। एक झटके में पूरा।”

मैंने कमर उठाई। लंड की नोक गांड की सिकुड़न पर लगी। चाची ने खुद को नीचे धकेला। दर्दनाक लेकिन वे सह गईं। पूरा लंड उनकी गांड में समा गया। वे धीरे-धीरे हिलने लगीं। फिर तेज।
“फाड़… फाड़ मेरी गांड… तेरा लंड मेरी गांड का मालिक है।”
मैंने जोर-जोर से धक्के मारे। उनकी गांड की दीवारें लंड को कस रही थीं। वे आगे झुक गईं। एक हाथ से अपने स्तन मसल रही थीं, दूसरे से मेरे अंडे दबा रही थीं। दर्द इतना तेज था कि मेरी आँखों में पानी आ गया, लेकिन लंड और सख्त होता जा रहा था।
वे झड़ गईं। गांड सिकुड़कर लंड को निचोड़ रही थी। मैं भी करीब था। लेकिन उन्होंने अचानक लंड निकाल लिया। “अभी नहीं। तू मेरी अनुमति के बिना नहीं झड़ेगा।”

उन्होंने बेंत फिर से उठाई। इस बार सीधे लंड पर हल्के वार। जलन। फिर मोम। लंड की नोक पर मोम टपकाया। मैं चीख पड़ा। मुखौटे के अंदर आवाज दब गई।
चाची ने मुझे खोला। हथकड़ियाँ और रस्सियाँ हटाईं। लेकिन मुखौटा नहीं। उन्होंने मुझे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। खुद बिस्तर पर लेट गईं। टाँगें फैला दीं।
“अब अपनी जीभ से मुझे साफ कर। चूत, गांड, जाँघें… सब जगह जहाँ तेरा वीर्य या मेरा रस लगा हो।”
मैंने घुटनों के बल रेंगकर उनके पास पहुँचा। जीभ से उनकी चूत चाटी, गांड के अंदर तक पहुँचा, जाँघों पर लगे रस को चाटा। चाची बीच-बीच में मेरे सिर को दबातीं। “अच्छा कुत्ता… ऐसे ही चाट।”

रात और गहरी होती गई। उन्होंने मुझे वापस बिस्तर पर लिटाया। इस बार हाथ पीछे बाँधे। फिर खुद ऊपर से नीचे तक तेल लगाकर चमकदार हो गईं। उन्होंने मेरा लंड अपनी चूत में लिया और बहुत धीरे हिलने लगीं। हर बार जब मैं झड़ने के करीब पहुँचता, वे रुक जातीं और मेरे अंडकोष को जोर से मरोड़तीं।
“दर्द सह। मजा बाद में मिलेगा।”
वे घंटों ऐसे खेलती रहीं। कभी चूत, कभी गांड, कभी मुँह। मेरे शरीर पर उनके नाखूनों के निशान, मोम के धब्बे, बेंत के लाल निशान। आखिर उन्होंने अनुमति दी। “अब भर दे। मेरी चूत में। पूरा।”

मैंने उनके अंदर सारा वीर्य उड़ेल दिया। वे मेरे ऊपर गिर पड़ीं। साँसें तेज। स्तन मेरे मुँह पर। मैंने निप्पल चूस लिया। वे मुस्कुराईं।
“अच्छा गुलाम। कल और कड़ा सबक होगा।”
सुबह उन्होंने मुझे जगाया। शरीर दर्द कर रहा था। लेकिन लंड फिर से खड़ा था। चाची नंगी थीं। उन्होंने मुझे रसोई में ले जाया। वहाँ एक मजबूत लकड़ी का खंभा था। उन्होंने मुझे उससे बाँध दिया। हाथ ऊपर, पैर थोड़े फैले।
“आज सुबह का नाश्ता मेरी चूत से लेगा।”

वे मेरे सामने खड़ी हो गईं। चूत मेरे मुँह के पास। मैंने चाटना शुरू किया। वे खड़ी-खड़ी झड़ती रहीं। उनका पानी मेरे गले में उतरता गया। बीच में उन्होंने मेरे लंड को हाथ से सहलाया लेकिन झड़ने नहीं दिया।
दोपहर तक वे मुझे खंभा से बाँधे रखीं। कभी बेंत से मारतीं, कभी मोम टपकातीं, कभी खुद आकर लंड मुँह में ले लेतीं और छोड़ देतीं। मेरा पूरा शरीर पसीने और उनके रस से भीगा हुआ था।

शाम को उन्होंने खोला। मुझे नहलाया। लेकिन नहलाते समय भी उनके हाथ मेरे लंड और अंडों पर ही थे। फिर कमरे में ले गईं।
“आज आखिरी रात की शुरुआत। मैं तुझे पूरी तरह अपना बना लूँगी।”
उन्होंने मुझे चारों तरफ से बाँधा। इस बार रस्सियाँ इतनी कसकर कि साँस लेना भी मुश्किल हो गया। मुखौटा फिर चढ़ा दिया। अंधेरा। फिर उनकी आवाज।
“अब तू कुछ नहीं बोलेगा। सिर्फ सहेगा।”

उन्होंने मेरा लंड अपनी चूत में लिया। लेकिन इस बार वे बहुत धीरे हिल रही थीं। घंटों। मेरा लंड जल रहा था। वे बीच-बीच में रुककर मेरे निप्पल काटतीं, सीने पर नाखून रगड़तीं, अंडे दबातीं। दर्द इतना था कि मेरी आँखों से आँसू बह रहे थे। लेकिन लंड सख्त बना रहा।
रात के तीन बजे उन्होंने अचानक तेज धक्के शुरू किए। चूत में, फिर गांड में, फिर वापस चूत में। हर बार गहरा। उनकी कराहें कमरे में गूँज रही थीं।

“फाड़ दे… आज मेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दे… मैं तेरी मालकिन हूँ लेकिन आज तू मुझे जानवर की तरह चोद।”
मैंने बाकी बची ताकत से धक्के मारे। हथकड़ियाँ खनक रही थीं। रस्सियाँ शरीर में धँस रही थीं। चाची कई बार झड़ीं। आखिर उन्होंने कहा, “अब दोनों जगह भर दे।”
पहले चूत में। फिर निकालकर गांड में। मैं फट पड़ा। गर्म वीर्य उनकी दोनों जगहों में भर गया। वे मेरे ऊपर लेटी रहीं। लंबे समय तक।
सुबह जब मुखौटा हटा तो उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“अब तू गाँव से नहीं जा सकता। कॉलेज भी छोड़। यहाँ रह। मेरा गुलाम। जब चाहूँगी चोदूँगी, जब चाहूँगी दर्द दूँगी, जब चाहूँगी प्यार से चाटूँगी। तू मेरा है।”

मैंने सिर्फ सिर हिलाया। शरीर पर उनके निशान थे। लंड अभी भी उनके रस से चमक रहा था। चाची ने मुझे अपने सीने से लगा लिया। भारी स्तन मेरे चेहरे पर।
“सो जा मेरे कुत्ते। शाम को फिर शुरू होगा। आज मैं तुझे और कड़ा बनाऊँगी।”
गाँव की उस पुरानी हवेली में मेरी जिंदगी अब सिर्फ नजमा चाची की क्रूर, गंदी, पागल करने वाली भूख के इर्द-गिर्द घूमती थी। रस्सियाँ, मोम, बेंत, उनकी भारी चूत और गांड—यही मेरी दुनिया बन चुकी थी। और हर रात वे मुझे याद दिलातीं कि मैं अब सिर्फ उनका है। पूरा। हमेशा के लिए।

गंगा किनारे बीवी की आखिरी चीख

डॉक्टर साहब मैं बीमार हूँ

पिता के जाने के बाद अकेली पड़ी माँ की चीखों

चाची के खून चुगवाते नाखून

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