एक पति अपनी बीवी को अनजान मर्द के हवाले करता है। रस्सियों में जकड़ी औरत की चीखें, गर्म मोम और बेरोकटोक पेलने का सिलसिला रात भर चलता रहता है। पति सिर्फ देखता है।
हाय दोस्तो, नमस्कार।
आज मैं अपनी वो सच्ची घटना लिख रहा हूँ जो मेरे जीवन की सबसे काली, सबसे गंदी और सबसे रोमांचक रात बन गई।
मेरा नाम राजेश है, उम्र 34 साल। मेरी बीवी का नाम प्रिया है, उम्र 27 साल। हम लखनऊ में रहते थे। प्रिया का जिस्म गदराया हुआ, मोटे-मोटे स्तन, पतली कमर, गोल-गोल नितंब और चिकनी गोरी त्वचा। उसके स्तन इतने भारी थे कि साड़ी के नीचे भी उनकी गोलाई साफ झलकती थी।
उस दिन हमें कोलकाता जाना था। मेरे पास सिर्फ वेटिंग टिकट था। साथ में हमारा डेढ़ साल का बेटा आरव भी था। गर्मी इतनी थी कि स्टेशन पर खड़े रहना भी मुश्किल था। लखनऊ जंक्शन की वेटिंग रूम में हम बैठे थे।
पास में एक आदमी बैठा था। उम्र करीब 42 साल, कद 6 फीट, चौड़े कंधे, सेना की तरह कटी हुई दाढ़ी। उसकी आँखें लगातार प्रिया के स्तनों और नितंबों पर घूम रही थीं। वह खुलेआम घूर रहा था जैसे प्रिया उसके सामने नंगी खड़ी हो।
उसने मुझसे बात शुरू की।
“कहाँ जा रहे हो भाई?”
“कोलकाता… वेटिंग टिकट है।”
उसकी आँखों में चमक आ गई।
“मेरा नाम विक्रम सिंह है। आर्मी में हूँ। मेरा 1AC का कन्फर्म टिकट है दो लोगों का। मेरी बीवी अचानक बीमार पड़ गई, आ नहीं पाई। एक सीट खाली है। अगर तुम लोग चाहते हो तो…”
मैंने तुरंत हाँ कह दी। लेकिन विक्रम ने शर्त रखी।
“सीट मेरी बीवी के नाम पर है—सुमन देवी। तुम्हारी बीवी उसी नाम से चलेगी। तुम बाहर किसी और जगह बैठना। केबिन में सिर्फ एक आदमी और एक औरत का रिकॉर्ड है।”
मैं मजबूर था। भीड़ इतनी थी कि बच्चे के साथ खड़े रहना असंभव था। मैंने प्रिया को देखकर सिर हिलाया। प्रिया थोड़ी हिचकिचाई लेकिन आरव की गर्मी और भीड़ देखकर मान गई।
ट्रेन आई। विक्रम हमें अपने केबिन में ले गया—1AC का छोटा सा केबिन, दो बर्थ। दरवाजा बंद होते ही उसने कहा,
“टीटी आने वाला है। तुम बाहर चले जाओ राजेश। प्रिया… अब से तुम्हारा नाम सुमन है। जो मैं कहूँ वही बोलना।”
मैं बाहर निकल आया। विक्रम ने अपना फोन मुझे दे दिया, इयरफोन लगाकर।
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“तुम सुनते रहना। और जब मैं इशारा करूँ तो…”
मैं गलियारे में खड़ा होकर फोन से सुन रहा था। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
टीटी आया। विक्रम ने टिकट दिखाया।
“विक्रम सिंह… सुमन देवी?”
प्रिया की आवाज थोड़ी काँपती हुई आई, “जी सर।”
टीटी चला गया।
अब केबिन में सिर्फ विक्रम, प्रिया और सोता हुआ आरव था।
विक्रम की आवाज आई,
“सुमन जी… यानी प्रिया… तुम्हारे स्तन कितने भारी हैं। साड़ी के नीचे से भी लग रहा है कि दूध से भरे हुए हैं।”
प्रिया चुप रही।
विक्रम आगे बढ़ा,
“दो बच्चों की माँ हो… फिर भी बदन ऐसा लग रहा है जैसे कुँवारी लड़की का। चूचियाँ कितनी टाइट हैं?”
प्रिया बोली, “देखिए… मेरा पति शक्की है…”
“तुम्हारा पति बाहर खड़ा है। वह सुन रहा है। और वह चाहता है कि तुम मेरी बात मानो।”
मैंने फोन पर धीरे से कहा, “हाँ… प्रिया… जो कहे करो।”
विक्रम हँसा।
“सुन रही हो? तुम्हारा पति खुद कह रहा है। अब ब्लाउज के बटन खोलो।”
प्रिया की साँस तेज हो गई। फिर धीमी आवाज में कपड़ों की सरसराहट सुनाई दी।
विक्रम बोला,
“वाह… क्या मोटे-मोटे स्तन हैं। निप्पल अभी से खड़े हो गए। दूध भी निकलेगा क्या?”
उसने प्रिया के एक स्तन को मुँह में ले लिया। चूसने की आवाज साफ सुनाई दे रही थी। प्रिया ने हल्की सी कराह निकाली।
“आह… छोड़ो… बच्चा है…”
“बच्चा सो रहा है। और तुम्हारा पति चाहता है कि मैं इन चूचियों को चूसूँ, काटूँ, मरोड़ूँ।”
मैंने कहा, “हाँ… मरोड़ो… जोर से।”
विक्रम ने प्रिया के दोनों स्तनों को मुट्ठी में कसकर मरोड़ा। प्रिया चीखने को हुई लेकिन उसने मुँह दबा लिया।
“अब साड़ी खोलो। पेटीकोट भी।”
कुछ देर बाद विक्रम की आवाज आई,
“म denser… क्या चिकनी चूत है। बाल भी कम। और इतनी गीली? तुम तो पहले से ही पानी छोड़ रही हो।”
उसने प्रिया की चूत पर थप्पड़ मारा। जोर का शब्द सुनाई दिया।
“आह!” प्रिया कराह उठी।
“और… और जोर से मारो।” मैंने फोन पर कहा।
विक्रम ने प्रिया को पेट के बल बिछाया। एक हाथ से उसके बाल पकड़े और दूसरे हाथ से उसकी चूत और गाँड पर बारी-बारी से थप्पड़ जड़ने लगा।
थप्पड़… थप्पड़… थप्पड़…
प्रिया की आवाजें दबती जा रही थीं लेकिन कराहें बढ़ती जा रही थीं।
“तुम्हारी बीवी को दर्द अच्छा लग रहा है राजेश। देखो कैसे गाँड हिला रही है।”
फिर विक्रम ने अपना पंजा निकाल लिया।
“देख… कितना मोटा और लंबा है। 8.5 इंच। तुम्हारी चूत फट जाएगी।”
प्रिया बोली, “नहीं… इतना बड़ा… अंदर नहीं जाएगा…”
“जाएगा। तुम्हारा पति चाहता है कि मैं तुम्हारी चूत को फाड़ दूँ।”
मैंने कहा, “हाँ… फाड़ दो… पूरा अंदर डालो।”
विक्रम ने प्रिया के बाल और जोर से खींचे और एक झटके में अपना मोटा लंड उसकी चूत में धंसाल दिया।
प्रिया ने जोर से चीख मारी।
“आह्ह्ह… निकल… बहुत मोटा है… फट गई…”
लेकिन विक्रम रुका नहीं। वह प्रिया की कमर पकड़कर जोर-जोर से पेलने लगा।
थप-थप-थप-थप…
केबिन की दीवारें काँप रही थीं।
“चुद रही हो ना रंडी? अपने पति के सामने गैर मर्द से चुद रही हो।”
“हाँ… चुद रही हूँ… आह… और जोर से…”
विक्रम ने प्रिया को पलट दिया। उसके दोनों पैर कंधों पर रख दिए और पूरी ताकत से पेलने लगा। हर झटके पर प्रिया के स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। विक्रम ने एक स्तन मुँह में लिया और काटने लगा।
“आह… काटो… और काटो…” प्रिया खुद बोल रही थी।
मैं गलियारे में खड़ा लंड दबाए सुन रहा था। मेरा पूरा शरीर काँप रहा था।
विक्रम ने प्रिया को घोड़ी बना लिया। एक हाथ से उसके बाल खींचे हुए और दूसरे हाथ से उसकी गाँड पर थप्पड़ मारते हुए पेल रहा था।
“अब गाँड में डालूँगा।”
“नहीं… वहाँ नहीं… बहुत दर्द होगा…”
“तुम्हारा पति कह रहा है डालो।”
मैंने कहा, “डालो… पूरी गाँड फाड़ दो।”
विक्रम ने थूक लगाकर अपना लंड प्रिया की टIGHT गाँड में धकेलना शुरू किया। प्रिया ने तकिया मुँह में दबा लिया लेकिन चीख निकल ही गई।
“आह्ह्ह्ह… निकल जाओ… फट रही हूँ…”
विक्रम ने एक झटके में आधा लंड अंदर कर दिया और फिर पूरा।
प्रिया का शरीर काँप रहा था। आँसू बह रहे थे लेकिन उसकी चूत से पानी की धारा बह रही थी।
विक्रम अब दोनों छेद बारी-बारी से पेल रहा था। कभी चूत, कभी गाँड। प्रिया की पूरी देह लाल हो चुकी थी थप्पड़ों से। उसके स्तनों पर दांतों के निशान थे।
“अब मुँह में लो रंडी।”
प्रिया घुटनों के बल बैठी और विक्रम का लंड, जो उसकी चूत और गाँड के रस से चमक रहा था, मुँह में ले लिया। विक्रम ने उसके बाल पकड़कर मुँह में जोर-जोर से पेलना शुरू कर दिया।
“गहरी चुदाई करो… गला तक लो…”
प्रिया की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन वह रोक नहीं रही थी।
अंत में विक्रम ने प्रिया को फिर घोड़ी बनाकर उसकी गाँड में ही अपना पूरा वीर्य उड़ेल दिया। इतना कि प्रिया की जांघों से सफेद तरल बहने लगा।
उसके बाद भी वह रुका नहीं। उसने प्रिया को थोड़ी देर आराम दिए बिना फिर से चूत में डाल लिया और दूसरी बार भी उसके अंदर ही झड़ गया।
रात भर यह सिलसिला चलता रहा। कभी वह प्रिया को दीवार से सटाकर पेल रहा था, कभी बर्थ पर लिटाकर उसके स्तन मरोड़ते हुए, कभी उसके मुँह में लंड ठूसकर साँस रोक रहा था।
सुबह जब ट्रेन कोलकाता पहुँची तो प्रिया की हालत खराब थी। उसके स्तनों पर नील, चूत और गाँड सूजी हुई, आँखें लाल। लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी तृप्ति थी।
विक्रम ने मुझे देखते हुए कहा,
“तुम्हारी बीवी अब मेरी हो गई है राजेश। अगली बार जब भी बुलाऊँगा, तुम दोनों आना। और अगली बार मैं उसे और बुरी तरह इस्तेमाल करूँगा।”
प्रिया ने धीरे से सिर हिलाया।
मैंने कुछ नहीं कहा। बस आरव को गोद में लिया और प्लेटफॉर्म की तरफ चल दिया।
मेरे अंदर कुछ टूट गया था… और कुछ नया जन्म ले चुका था।
राजेश और प्रिया कोलकाता से लखनऊ लौटे तो घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। प्रिया के शरीर पर लगे निशान धीरे-धीरे हल्के पड़ रहे थे लेकिन उसकी आँखों में वो भूख और भी गहरा गई थी। राजेश हर रात उसी घटना को याद करके अपना लंड हिलाता और प्रिया को जबरदस्ती उसके सामने नंगा करके विक्रम के नाम पर गालियाँ बकता। प्रिया चुपचाप सहती, कभी-कभी खुद ही बोल पड़ती—“उसने मुझे और बुरी तरह इस्तेमाल करना था… कब बुलाएगा?”
पंद्रह दिन बाद विक्रम का फोन आया।
“राजेश, अगले शनिवार को बनारस आ जा। मेरा एक पुराना बंगला है गंगा किनारे। रात भर के लिए प्रिया को मेरे हवाले कर देना। तुम भी आना, देखना। इस बार मैं उसे सिर्फ चोदूंगा नहीं… तोड़ूंगा।”
राजेश का दिल जोर से धड़का। उसने प्रिया की तरफ देखा। प्रिया की साँसें तेज हो गईं। उसने धीरे से सिर हिलाया।
शनिवार की शाम को वे बनारस पहुँचे। विक्रम का बंगला नदी के किनारे एकांत में था। अंदर घुसते ही विक्रम ने दरवाजा बंद कर दिया। आरव को एक कमरे में सुला दिया गया। मुख्य कमरे में मोटी रस्सियाँ, चमड़े की पट्टियाँ, मोमबत्तियाँ और कई अजीब उपकरण रखे थे।
विक्रम ने प्रिया को घूरा।
“कपड़े उतार। एक-एक करके। और राजेश, तुम कोने में खड़े रहो। हाथ पीछे बाँध दूँगा ताकि तुम सिर्फ देख सको, छू न सको।”
राजेश ने बिना विरोध के हाथ पीछे किए। विक्रम ने उसकी कलाईं रस्सी से कसकर बाँध दीं। फिर प्रिया की तरफ मुड़ा।
प्रिया काँपते हाथों से साड़ी खोली। ब्लाउज, पेटticoat, ब्रा, पैंटी… सब फर्श पर गिरते गए। विक्रम ने उसके स्तनों को मुट्ठी में भरकर जोर से मरोड़ा।
“इन चूचियों को मैं आज कालूंगा। निप्पल काटने लायक बना दूंगा।”
उसने प्रिया को चारपाई पर लिटाया। हाथ-पैर चारों दिशाओं में रस्सियों से बाँध दिए। प्रिया पूरी तरह फैली हुई, बेबस। विक्रम ने एक मोटी चमड़े की पट्टी निकाली और उसकी जांघों के अंदरूनी हिस्से पर जोर का वार किया।
“आह्ह!” प्रिया चीखी। लाल निशान उभर आया।
“और… और मारो…” वह खुद बोल पड़ी।
विक्रम हँसा। पट्टी से उसकी चूत, गाँड, स्तन… हर जगह मारने लगा। हर वार पर प्रिया का शरीर उछलता, लेकिन रस्सियाँ उसे जकड़े हुए थीं। दस-बारह वारों के बाद उसकी त्वचा जल रही थी। तब विक्रम ने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम की बूँदें प्रिया के स्तनों पर गिराईं।
“आह्ह्ह… जल रहा है…!”
मोम निप्पलों पर जमा हो गई। विक्रम ने ठंडी मोम को नख से खुरचना शुरू किया। प्रिया तड़प रही थी।
फिर उसने अपना लंड निकाला—मोटा, नसों से भरा, पहले से भी ज्यादा सख्त। प्रिया की सूजी हुई चूत पर रगड़ा।
“आज पहले गाँड फाड़ूंगा। फिर चूत। फिर मुँह। और तुम्हारा पति देखता रहेगा।”
उसने थूक लगाए बिना ही प्रिया की गाँड में धकेलना शुरू किया। प्रिया ने जोर की चीख मारी। रस्सियाँ खिंचीं। विक्रम ने एक झटके में आधा लंड धंसा दिया।
“फटी…? बोल रंडी, फटी कि नहीं?”
“फटी… आह्ह… पूरी फट गई…”
विक्रम ने पूरा लंड अंदर कर लिया और जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर प्रिया की चीख गलियारे में गूँज रही थी। राजेश कोने में बँधा हुआ, लंड पूरी तरह खड़ा, आँखें फाड़े देख रहा था।
आधा घंटा गाँड चोदने के बाद विक्रम ने लंड निकाला। खून की हल्की रेखाएँ दिखीं। उसने वही लंड प्रिया की चूत में धंसा दिया। गीली चूत ने आसानी से ले लिया लेकिन विक्रम ने फिर भी इतनी ताकत से पेलना शुरू किया जैसे दीवार तोड़ रहा हो। चारपाई की चरर-चरर की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी।
“राजेश, देख तेरी बीवी की चूत कैसे लंड निगल रही है। बोल प्रिया, किसकी रंडी है तू?”
“तुम्हारी… विक्रम की रंडी… आह्ह… और जोर से चोदो…”
विक्रम ने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया और मुँह में थूक दिया। फिर लंड निकालकर प्रिया के मुँह में ठूस दिया। गला तक। प्रिया की आँखों से आँसू बहने लगे, नाक से पानी। विक्रम ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर मुँह चोदना शुरू कर दिया।
“निगल… पूरा निगल रंडी।”
जब प्रिया का दम घुटने लगा तो उसने लंड निकाला और फिर से गाँड में डाल दिया। इस बार और तेजी से। प्रिया अब सिर्फ अजीब आवाजें निकाल रही थी—न चीख, न कराह, बस टूटी हुई सिसकियाँ।
विक्रम ने रस्सियाँ खोलीं। प्रिया को उठाया और दीवार से सटा दिया। एक पैर ऊपर उठाकर फिर से चूत में घुसेड़ दिया। दूसरी हाथ से उसके गले को दबाया।
“आज मैं तुझे मारते-मारते चोदूंगा। साँस कम पड़ने पर भी लंड अंदर रहेगा।”
प्रिया का चेहरा लाल हो गया। आँखें ऊपर पलटने लगीं। विक्रम ने ठीक उसी पल अपना वीर्य उसकी चूत के अंदर उड़ेल दिया। फिर भी लंड बाहर नहीं निकाला। कुछ देर बाद फिर से सख्त होकर दूसरी बार पेलने लगा।
रात के तीन बज चुके थे। विक्रम ने प्रिया को फर्श पर गिरा दिया। उसके दोनों हाथ पीछे बाँध दिए और कुत्ते की तरह घुमाने लगा। कभी गाँड में, कभी चूत में, कभी मुँह में। बीच-बीच में चमड़े की पट्टी से उसकी पीठ और नितंबों पर मारता। प्रिया का पूरा शरीर पसीने, थूक, वीर्य और हल्के खून से लथपथ था।
राजेश अभी भी बँधा हुआ देख रहा था। उसका अपना लंड दर्द करने लगा था लेकिन वह छू भी नहीं सकता था। विक्रम कभी-कभी उसके पास आकर प्रिया के रस से सना लंड उसके चेहरे पर रगड़ देता।
“चाट… अपनी बीवी की गाँड का स्वाद चाट।”
प्रिया अब बोलने की हालत में नहीं थी। सिर्फ आँखें खोलकर विक्रम को देख रही थी—आज्ञाकारी, टूटी हुई, और अभी भी और चाहने वाली।
सुबह चार बजे विक्रम ने आखिरी बार प्रिया की दोनों छेदों में वीर्य भरा। फिर उसे वैसे ही फर्श पर छोड़ दिया। राजेश की रस्सियाँ खोलीं।
“अगली बार मैं इसे दोस्तों के साथ शेयर करूंगा। तुम तैयार रहना। और प्रिया…” उसने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया, “तुम अब मेरी संपत्ति हो। जब चाहूँ बुलाऊँगा, आना पड़ेगा।”
प्रिया ने आँखें मूंदकर सिर हिलाया।
राजेश ने काँपते हाथों से अपनी बीवी को उठाया। उसके शरीर पर जगह-जगह नील, दाँत के निशान, रस्सी के निशान और सूजन थी। लेकिन प्रिया की आँखों में अब डर नहीं, एक गहरी भूख थी।
बाहर गंगा बह रही थी। अंदर एक औरत पूरी तरह टूट चुकी थी… और एक मर्द अपनी बीवी को और ज्यादा टूटते देखने का इंतजार कर रहा था।
यह अभी खत्म नहीं हुआ था। विक्रम का अगला फोन आने वाला था—और उस बार अकेला नहीं होने वाला था।
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