कबीर-निशा पार्ट 6

प्रोफेसर सो रहे थे। बिस्तर के पाये से बंधा कबीर। निशा ने गांड में उंगलियाँ घुमाते हुए उसे चुपचाप तोड़ा। हर घुमाव पर बदन काँपता रहा, फिर भी वो सहता गया।

कबीर-निशा पार्ट 5

सुबह सात बजे मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर खड़ा था। कल अलमारी वाले क्लिप्स की लाल निशान अभी भी निपल्स पर चमक रहे थे। कपड़ा छूते ही जलन होती थी। फिर भी घंटी बज गई।

निशा ने दरवाज़ा खोला। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,

“प्रोफेसर अपने कमरे में टेबल पर काम कर रहे हैं। तुम उनकी कुर्सी के ठीक नीचे बैठोगे। मैं तुम्हारे लंड पर बर्फ रगड़ती रहूँगी। अगर एक भी बार हिले तो सिगरेट से जलाऊँगी। समझे?”

वे मुझे ऊपर ले गईं। बेडरूम में प्रोफेसर टेबल पर झुके हुए कुछ लिख रहे थे। कुर्सी बड़ी थी। निशा ने मुझे इशारे से कुर्सी के नीचे धकेला। जगह तंग थी। मैं घुटनों के बल सिकुड़कर बैठ गया। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया।

फिर उन्होंने बर्फ का एक टुकड़ा निकाला। मेरे लंड पर रखा। ठंडक तुरंत अंदर तक उतर गई। लंड सिकुड़ने लगा लेकिन निशा उसे सीधा पकड़े हुए थीं। वे बर्फ को धीरे-धीरे ऊपर से नीचे रगड़ने लगीं। ठंडक इतनी तेज़ थी कि शरीर काँप उठा। मैंने खुद को रोकने की पूरी कोशिश की।

प्रोफेसर के पैर मेरे सिर के पास थे। उनकी कलम की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। निशा बर्फ रगड़ती रहीं। कभी लंड के सिरे पर रोक देतीं, कभी अंडकोष पर ले जातीं। ठंडक से त्वचा सुन्न होने लगी थी। अचानक मेरा एक कंधा हिला। निशा तुरंत रुक गईं। उन्होंने जेब से सिगरेट और लाइटर निकाला। सिगरेट जलाई और मेरे जाँघ के अंदरूनी हिस्से के पास ले गईं। गर्मी महसूस हुई।

“फिर हिले तो लगा दूँगी,” उन्होंने फुसफुसाया।

मैंने सिर हिलाया। निशा ने बर्फ वापस लंड पर रख दी। अब वे और देर तक एक ही जगह रगड़ रही थीं। ठंडक जलन में बदलने लगी। लंड लाल हो रहा था। प्रोफेसर ने अचानक कुर्सी खिसकाई। उनका पैर मेरे कंधे से छू गया। मेरी साँस रुक गई। निशा ने बर्फ जोर से दबा दी। दर्द और ठंडक एक साथ।

प्रोफेसर वापस लिखने लगे। निशा बर्फ बदलती रहीं। नया टुकड़ा और ठंडा था। वे उसे लंड के मुहाने पर रखतीं और दबातीं। ठंडक अंदर तक चली जाती। शरीर काँप रहा था लेकिन मैं हिलने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था। आँखों से आँसू बह रहे थे। टेप के किनारे थूक निकल रहा था।

लगभग चालीस मिनट बीत चुके होंगे। लंड अब पूरी तरह सुन्न और लाल हो चुका था। निशा ने बर्फ हटाई। फिर सिगरेट की राख मेरे लंड के पास झाड़ी। गर्मी महसूस हुई। उन्होंने सिगरेट को मेरे जाँघ के पास लाकर रोका।

“अब चरम पर पहुँचो। बर्फ की ठंडक के साथ। बिना हिले।”

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उनकी हथेली ने सुन्न लंड को मसलना शुरू किया। ठंडक और मसाज एक साथ। शरीर में अजीब सी लहर दौड़ने लगी। मैं काँप रहा था लेकिन जगह से नहीं हिला। अचानक वीर्य निकलने लगा—ठंडा और धीमा। निशा ने उसे अपने हाथ में लिया और मेरे चेहरे पर मल दिया। फिर टेप हटाया।

“चाटो।”

मैंने चाटा। निशा ने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ सुन्न थे। वे मुझे कुर्सी के नीचे से बाहर खींचने लगीं। शरीर घिसट रहा था। लंड अभी भी ठंडा और सुन्न था।

निशा ने मेरे कान में कहा,

“आज बर्फ खूब रगड़ी। कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बिस्तर के पाये से बाँध दूँगी। जब वो सो रहे होंगे, मैं तुम्हारी गांड में उंगली डालकर घुमाती रहूँगी। और अगर आवाज़ निकली तो मुँह बंद करके और देर तक करूँगी।”

मैं लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। पैर काँप रहे थे। लंड पर ठंडक की जलन बाकी थी। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।

दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके स्वर में वही भूख थी।

“कबीर… तुम्हारा लंड आज खूब ठंडा हो गया। कल और अंदर तक जाएंगे।”

मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम पर जाँघों में ठंडक का अहसास बाकी था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल बिस्तर के पाये, उंगली, और निशा की वह चुपचाप क्रूरता।

सुबह सात बजकर कुछ मिनट पहले मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर खड़ा था। कल बर्फ की ठंडक अभी भी लंड पर हल्की जलन छोड़ गई थी। फिर भी हाथ ने घंटी दबा दी।

निशा ने दरवाज़ा खोला। आँखों में वही शांत लेकिन खतरनाक इरादा था। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,

“प्रोफेसर अभी गहरी नींद में हैं। तुम उनके बिस्तर के पाये से बंधोगे। मैं तुम्हारी गांड में उंगली डालकर घुमाती रहूँगी। अगर एक भी आवाज़ निकली तो मुँह बंद करके और देर तक करूँगी।”

वे मुझे ऊपर ले गईं। बेडरूम में अंधेरा था। प्रोफेसर बिस्तर पर करवट लेकर सो रहे थे। भारी साँसें आ रही थीं। निशा ने मुझे बिस्तर के एक पाये के पास नंगा किया। दोनों हाथ पीछे लाकर पाये से कसकर बाँध दिए। फिर दोनों टखनों को भी बाँध दिया। शरीर पूरी तरह पाये से चिपक गया। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया।

निशा मेरे पीछे घुटनों के बल बैठ गईं। उन्होंने मेरे गांड के दोनों हिस्सों को फैलाया। ठंडी उंगली मुहाने पर रखी और धीरे-धीरे अंदर धकेल दी। एक उंगली पूरी अंदर चली गई। वे उसे घुमाने लगीं—धीरे-धीरे, फिर थोड़ा तेज़। अंदर की दीवारों को टटोलती हुई। दर्द और अजीब सी सनसनाहट एक साथ थी।

प्रोफेसर की साँसें ऊपर से साफ सुनाई दे रही थीं। अगर वे करवट बदलते तो बिस्तर हिलता और मुझे पता चल जाता। निशा दूसरी उंगली जोड़ने लगीं। दो उंगलियाँ अब अंदर थीं। वे उन्हें अलग-अलग दिशा में घुमा रही थीं। गांड फैल रही थी। मैंने दाँत भींच लिए। आँखों से आँसू निकलने लगे।

निशा ने तीसरी उंगली भी धकेल दी। अब तीन उंगलियाँ अंदर थीं। वे जोर-जोर से अंदर-बाहर करने लगीं। हर बार गहराई तक जातीं। गांड जलने लगी। निशा ने अपना दूसरा हाथ आगे बढ़ाकर मेरे अंडकोष को पकड़ लिया और हल्के से मसलने लगीं। दर्द दो तरफ से बढ़ रहा था।

अचानक प्रोफेसर ने करवट बदली। बिस्तर चरमराया। निशा रुक गईं। तीनों उंगलियाँ अंदर ही थीं। दोनों ने साँस रोक ली। प्रोफेसर की साँसें फिर नियमित हो गईं। निशा ने फिर से घुमाना शुरू कर दिया—इस बार और तेज़। उंगलियाँ अंदर तक जाकर घूम रही थीं। मेरा शरीर काँप रहा था लेकिन रस्सियाँ कसकर बाँधी हुई थीं। हिल नहीं सकता था।

लगभग आधा घंटा बीत चुका होगा। गांड अब पूरी तरह खुली और जल रही थी। निशा ने उंगलियाँ निकालीं। फिर चारों उंगलियाँ एक साथ धकेलने लगीं। मुहाना फटने के कगार पर था। वे अंदर तक ले जाकर वहीं रोक देतीं और घुमातीं। दर्द तेज़ हो गया। आँसू फर्श पर गिर रहे थे। निशा ने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और उंगलियाँ और जोर से चलाने लगीं।

“आवाज़ निकली तो और देर तक अंदर रखूँगी,” उन्होंने फुसफुसाया।

मैं सिसक रहा था लेकिन आवाज़ कपड़े में दब रही थी। निशा ने अचानक उंगलियाँ पूरी निकाल लीं और फिर एक झटके में चारों वापस अंदर कर दीं। शरीर ऐंठ गया। रस्सियाँ हाथों में धँस गईं। निशा लगातार करती रहीं। कभी तेज़, कभी धीमे, कभी घुमाते हुए।

प्रोफेसर ने फिर करवट ली। इस बार उनकी टांग मेरे बाँधे हुए हाथ के पास आ गई। निशा ने उंगलियाँ अंदर ही रोके रखीं। समय रुक सा गया। प्रोफेसर की साँसें फिर गहरी हो गईं। निशा ने फिर से तेज़ गति शुरू कर दी। अब वे अपनी उंगलियों को पूरी तरह अंदर-बाहर कर रही थीं। गांड से आवाज़ आने लगी थी—गीली और दबी हुई। निशा ने मेरा मुँह और कस दिया।

एक घंटे के करीब हो चला था। मेरी गांड पूरी तरह सुन्न और खुली हुई थी। निशा ने उंगलियाँ निकालीं। फिर उन्होंने अपना अंगूठा भी जोड़ दिया। पाँचों उंगलियाँ अंदर धकेलने की कोशिश करने लगीं। मुहाना ज्यादा फैल गया। दर्द असहनीय हो चला था। आँखों से आँसू की धारा बह रही थी। निशा ने जोर लगाया और अंगूठा भी अंदर चला गया। अब पूरा हाथ लगभग अंदर था। वे धीरे-धीरे घुमा रही थीं।

मैं तड़प रहा था। रस्सियाँ हाथ-पैर में धँस चुकी थीं। निशा ने हाथ अंदर रखकर ही मेरे लंड को दूसरे हाथ से पकड़ लिया। वह तना हुआ था। वे उसे मसलने लगीं जबकि गांड में उनका हाथ घूम रहा था। दर्द और उत्तेजना मिलकर दिमाग सुन्न कर रहे थे।

“इसी हालत में निकालो,” निशा ने फुसफुसाया।

उनकी हथेली तेज़ हो गई। गांड में हाथ घूम रहा था। अचानक शरीर ऐंठ गया। वीर्य निकलने लगा—फर्श पर, उनकी हथेली पर। मैं काँप रहा था लेकिन आवाज़ नहीं निकली। निशा ने वीर्य को मेरे चेहरे पर मल दिया। फिर धीरे-धीरे अपना हाथ गांड से बाहर निकाला। मुहाना खुला रह गया। जलन तेज़ थी।

निशा ने टेप हटाया। रस्सियाँ खोलीं। मेरे हाथ-पैर सुन्न थे। वे मुझे उठाकर बिस्तर से दूर ले गईं। शरीर घिसट रहा था। गांड से हल्का खून और पानी निकल रहा था।

निशा ने मेरे कान में कहा,

“आज खूब अंदर तक गई। कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बाथरूम के शॉवर के नीचे खड़ा रखूँगी। जब वो नहा रहे होंगे, मैं तुम्हारे लंड पर गर्म पानी डालती रहूँगी। और अगर हिले तो ठंडा पानी झटके से डालूँगी।”

मैं लड़खड़ाते हुए खड़ा हुआ। पैर नहीं संभल रहे थे। गांड में भारी दर्द और खालीपन का अहसास था। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।

दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके स्वर में वही भूख थी।

“कबीर… तुम्हारी गांड आज खूब खुली। कल और कुछ नया करेंगे।”

मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम पर गांड में दर्द उठ रहा था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल शॉवर, गर्म पानी, और निशा की वह चुपचाप सज़ा।

अब ये सिलसिला एक जुनून से आगे निकलकर रोज़ की जरूरत बन चुका था। हर दिन नया खतरा, नया दर्द। और मैं खुद को उससे दूर करने की बजाय और गहराई में उतरता जा रहा था।

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