प्रोफेसर के कमरे की अलमारी में नंगा खड़ा कबीर। निपल्स पर क्लिप और लटकते वजन। हिलने पर भार बढ़ता गया, फिर भी वो चुपचाप सहता रहा।
सुबह सात बजकर दस मिनट पर मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर खड़ा था। कल बिस्तर के नीचे की सुइयों के निशान अभी भी लंड पर लाल छेद छोड़ गए थे। चलते समय हल्की जलन होती थी। फिर भी घंटी बज गई।
निशा ने दरवाज़ा खोला। उनके चेहरे पर एक शांत लेकिन खतरनाक इरादा था। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और बहुत धीमी आवाज़ में कहा,
“प्रोफेसर अभी बाथरूम में हैं। नहा रहे हैं। तुम वहीं छिपोगे। और जब वो पानी डाल रहे होंगे, मैं तुम्हारे अंडकोष पर क्लिप लगाकर खींचती रहूँगी। एक भी आवाज़ निकली तो दोनों बर्बाद।”
वे मुझे ऊपर ले गईं। बाथरूम का दरवाज़ा अंदर से बंद था। पानी की आवाज़ आ रही थी। निशा ने हल्के से खटखटाया।
“मैं तौलिया लाई हूँ,” उन्होंने बाहर से कहा।
प्रोफेसर ने अंदर से जवाब दिया। निशा ने दरवाज़ा थोड़ा खोला, मुझे इशारे से अंदर धकेला और खुद भी घुस गईं। बाथरूम में भाप भरी हुई थी। प्रोफेसर शॉवर के नीचे खड़े थे, उनकी पीठ हमारी तरफ थी। निशा ने जल्दी से मुझे वॉशबेसिन के नीचे की छोटी सी जगह में धकेल दिया। जगह इतनी तंग थी कि घुटनों के बल झुकना पड़ा।
निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया। फिर उन्होंने दो मजबूत मेटल क्लिप निकाले। मेरे अंडकोष की ढीली त्वचा को खींचकर दोनों तरफ क्लिप कस दिए। दर्द तुरंत तेज़ हो गया। क्लिप से छोटी चेन जुड़ी थी। निशा ने चेन को अपने हाथ में ले लिया।
प्रोफेसर अभी भी शॉवर के नीचे थे। पानी की आवाज़ तेज़ थी। निशा ने चेन को हल्का सा खींचा। अंडकोष खिंच गए। मैं सिसक उठा लेकिन आवाज़ दब गई। निशा ने फिर से खींचा—इस बार ज़ोर से। शरीर आगे को झुक गया। दर्द नीचे तक उतर रहा था।
निशा मेरे कान में फुसफुसाईं,
“जब तक वो नहा रहे हैं, ये खिंचाव जारी रहेगा।
वे चेन को लय में खींचने लगीं। कभी हल्का, कभी झटके से। हर खिंचाव पर अंडकोष और फैलते। भाप में मेरा शरीर पसीने से तर हो रहा था। प्रोफेसर ने अचानक शॉवर बंद किया। निशा ने चेन रोक ली। दोनों ने साँस रोकी। प्रोफेसर ने तौलिया लिया और शरीर पोंछने लगे। वे मुड़ने वाले थे। निशा ने मुझे और अंदर धकेला। मेरा सिर वॉशबेसिन से टकराया।
प्रोफेसर दरवाज़े की तरफ आए। निशा ने जल्दी से तौलिया उनके हाथ में दिया और बाहर का रास्ता रोका।
“मैं यहाँ साफ कर देती हूँ,” उन्होंने कहा।
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प्रोफेसर बाहर चले गए। दरवाज़ा बंद हुआ। निशा ने तुरंत चेन ज़ोर से खींच ली। इस बार इतनी ताकत से कि मैं लगभग गिरने वाला था। आँखों से आँसू बह निकले। निशा ने क्लिप को और कस दिया। फिर उन्होंने ठंडा पानी का मग भरा और मेरे अंडकोष पर डाल दिया। ठंडक और खिंचाव एक साथ। शरीर काँप उठा।
“अब और सहो,” निशा ने कहा।
उन्होंने मुझे वॉशबेसिन के नीचे से थोड़ा बाहर खींचा। घुटनों के बल किया। फिर एक क्लिप मेरे लंड के सिरे पर भी लगा दिया। तीनों क्लिप अब चेन से जुड़े थे। निशा ने चेन को अपने हाथ में लेकर खींचना शुरू किया। लंड और अंडकोष एक साथ खिंच रहे थे। दर्द दोहरी हो गई। निशा जानबूझकर रुक-रुककर झटके दे रही थीं।
बाथरूम के बाहर प्रोफेसर के कमरे में जाने की आवाज़ आ रही थी। खतरा अभी भी बाकी था। निशा ने मेरे बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया और चेन को और कस लिया।
“आज तुम्हारे अंडकोष लाल हो जाएंगे,” उन्होंने फुसफुसाया।
वे खींचती रहीं। कभी तेज़, कभी धीमे। मेरा शरीर काँप रहा था। आँसू और थूक टेप के किनारे से बह रहे थे। निशा ने अचानक चेन छोड़ दी। राहत की साँस लेने की कोशिश की तो उन्होंने फिर से झटके से खींच लिया। दर्द पहले से ज़्यादा तेज़ था।
लगभग पैंतीस मिनट तक ये खेल चलता रहा। अंडकोष अब सुन्न पड़ने लगे थे लेकिन खिंचाव कम नहीं हो रहा था। निशा ने क्लिप एक-एक करके खोले। त्वचा पर गहरे लाल निशान और छोटे खून के बिंदु रह गए। निशा ने उन्हें अपनी उंगली से छुआ और फिर मेरे मुँह के टेप को हटाकर खून लगा दिया।
“चाटो।”
मैंने चाटा। निशा ने मुझे खड़ा किया। पैर काँप रहे थे। उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा। क्लिप के निशान साफ दिख रहे थे। निशा ने उसे अपनी हथेली में लेकर जोर से मसलना शुरू किया। खून के निशानों पर उंगली फिर रही थी। दर्द और उत्तेजना एक साथ।
“अब चुपचाप चरम पर पहुँचो,” उन्होंने कहा। “बाहर आवाज़ नहीं जानी चाहिए।”
उनकी हथेली तेज़ हो गई। मैं हिल रहा था। शरीर में ताकत नहीं बची थी। अचानक वीर्य निकलने लगा। निशा ने उसे अपने हाथ में लिया और मेरे चेहरे पर मल दिया। फिर टेप वापस लगा दिया।
“अब नीचे जाओ। प्रोफेसर कभी भी बाथरूम आ सकते हैं।”
उन्होंने हाथ की रस्सी खोली। मैं लड़खड़ाते हुए बाथरूम से बाहर निकला। सीढ़ियों से नीचे उतरते समय अंडकोष में भारी दर्द हो रहा था। हर कदम पर खिंचाव का अहसास बाकी था।
दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके चेहरे पर पसीना चमक रहा था।
“कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनकी अलमारी में खड़ा रखूँगी। दरवाज़ा थोड़ा खुला होगा। और तुम्हारे निपल्स पर क्लिप लगाकर वजन लटकाऊँगी। अगर हिले तो वजन और बढ़ेगा।”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। अंडकोष में दर्द इतना था कि चलना मुश्किल हो रहा था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल अलमारी, क्लिप, वजन, और निशा की वह ठंडी आवाज़।
सुबह सात बजकर पाँच मिनट पर मैं फिर उस घर के सामने खड़ा था। कल बाथरूम वाले क्लिप्स की लाल निशान अभी भी अंडकोष पर चमक रहे थे। चलते समय दर्द उठता था। फिर भी घंटी दब गई।
निशा ने दरवाज़ा खोला। आँखों में वही ठंडी भूख थी। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“प्रोफेसर अभी अपने कमरे में हैं। तुम उनकी अलमारी में खड़े रहोगे। दरवाज़ा थोड़ा खुला रहेगा। निपल्स पर क्लिप और वजन। अगर एक भी बार हिले तो वजन और बढ़ेगा। समझे?”
वे मुझे ऊपर ले गईं। बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था। प्रोफेसर कुर्सी पर अखबार पढ़ रहे थे। निशा ने मुझे इशारे से अलमारी की तरफ धकेला। अलमारी बड़ी थी लेकिन अंदर जगह कम। कपड़े लटक रहे थे। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप कस दिया।
फिर उन्होंने दो मजबूत मेटल क्लिप निकाले। मेरे दोनों निपल्स को पकड़कर क्लिप कस दिए। दर्द तुरंत तेज़ हो गया। क्लिप से छोटी चेन जुड़ी थी। चेन के सिरे पर लोहे के छोटे-छोटे वजन थे। निशा ने वजन छोड़ दिए। पूरा भार निपल्स पर आ गया। निपल्स खिंचकर लंबी हो गईं। दर्द सीने तक उतर रहा था।
“सीधे खड़े रहो,” निशा ने फुसफुसाया। “अगर झुके या हिले तो एक और वजन लगा दूँगी।”
उन्होंने अलमारी का दरवाज़ा लगभग बंद कर दिया—बस एक पतली सी दरार छोड़ दी। मैं अंधेरे में खड़ा था। दरार से प्रोफेसर की आधी आकृति दिख रही थी। अखबार पलटने की आवाज़ आ रही थी। वजन हर साँस के साथ झूल रहे थे और निपल्स को और खींच रहे थे।
बीस मिनट बीत चुके होंगे। पैरों में दर्द शुरू हो गया था। निपल्स सुन्न होने लगे लेकिन खिंचाव कम नहीं हो रहा था। पसीना बह रहा था। अचानक प्रोफेसर उठे और अलमारी की तरफ आने लगे। मेरी साँस रुक गई। निशा कमरे में ही थीं। उन्होंने प्रोफेसर को रोक लिया।
“अखबार यहाँ रख दो, मैं रख दूँगी,” उन्होंने कहा।
प्रोफेसर मुड़ गए। निशा ने जल्दी से अलमारी का दरवाज़ा थोड़ा और खोला। मेरे निपल्स पर लटकते वजन साफ दिख रहे थे। निशा ने एक और छोटा वजन दोनों चेन में लगा दिया। भार बढ़ गया। निपल्स और खिंच गए। आँखों से आँसू बह निकले। निशा ने दरवाज़ा फिर लगभग बंद कर दिया।
प्रोफेसर वापस कुर्सी पर बैठ गए। निशा मेरे पास आईं। दरार से उनका चेहरा दिखाई दिया। उन्होंने चेन को थोड़ा ऊपर उठाया और झटके से छोड़ दिया। दर्द की तेज़ लहर उठी। मैं लगभग झुक गया लेकिन खुद को रोक लिया। निशा मुस्कुराईं।
“अच्छा… अभी तक सीधा है।”
वे चली गईं। कमरे में उनकी और प्रोफेसर की बातें सुनाई देने लगीं। सामान्य बातें। लेकिन मैं अलमारी में खड़ा वजन झेल रहा था। समय रुक सा गया था। पैंतालीस मिनट हो चुके होंगे। पैर काँप रहे थे। निपल्स में जलन असहनीय हो चली थी। अचानक मेरा एक घुटना हिला। वजन झूले। निशा तुरंत वापस आईं।
उन्होंने दरवाज़ा खोला और दोनों चेन में एक-एक वजन और लगा दिया। अब भार काफी बढ़ चुका था। निपल्स बुरी तरह खिंच गए। खून की छोटी बूँदें निकलने लगीं। निशा ने मेरे कान में कहा,
“हिले तो और लगेगा। अब एक घंटे और खड़े रहो।”
दरवाज़ा बंद हुआ। मैं अंधेरे में तड़प रहा था। वजन लगातार खींच रहे थे। पसीने से शरीर चमक रहा था। आँखों से आँसू और मुँह से थूक टेप के किनारे बह रहा था। प्रोफेसर की अखबार पलटने की आवाज़ आ रही थी। हर आवाज़ पर दिल बैठ जाता था।
एक घंटा बीतने के बाद निशा फिर आईं। उन्होंने वजन देखे और संतुष्ट होकर सिर हिलाया। फिर उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा। वह पहले से तना हुआ था। निशा ने उसे धीरे-धीरे मसलना शुरू किया। ऊपर से वजन निपल्स को खींच रहे थे। दर्द और उत्तेजना मिलकर पागल बना रहे थे। निशा की हथेली तेज़ हो गई।
“इसी खिंचाव के साथ निकालो,” उन्होंने फुसफुसाया। “बिना आवाज़ के।”
मैं हिल रहा था। शरीर में ताकत नहीं बची थी। अचानक वीर्य निकलने लगा। निशा ने उसे अपने हाथ में लिया और मेरे चेहरे पर लगा दिया। फिर टेप हटाया।
“चाटो।”
मैंने चाटा। निशा ने क्लिप धीरे-धीरे खोले। निपल्स पर गहरे लाल निशान और खून के छोटे धब्बे रह गए। वजन हटाते समय नई जलन हुई। निशा ने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ बेजान होकर नीचे गिरे।
“आज काफी खिंचाव सह लिया,” निशा ने कहा। “कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनकी कुर्सी के नीचे बैठाऊँगी। जब वो काम कर रहे होंगे, मैं तुम्हारे लंड पर बर्फ रगड़ती रहूँगी। और अगर हिले तो सिगरेट की जलन दूँगी।”
मैं लड़खड़ाते हुए अलमारी से बाहर निकला। पैर पूरी तरह काँप रहे थे। निपल्स में दर्द इतना था कि कपड़ा पहनते समय भी जलन होती थी। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।
दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके स्वर में एक अजीब सी भूख थी।
“कबीर… तुम्हारे निपल्स आज खूब खिंच गए। कल और कुछ नया करेंगे।”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। निपल्स पर हर हल्की हवा भी जलन पैदा कर रही थी। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल कुर्सी के नीचे, बर्फ, और सिगरेट की धमकी।
अब ये खेल एक जुनून से आगे निकलकर एक जरूरत बन चुका था। हर दिन नया खतरा, नया दर्द। और मैं खुद को उससे दूर करने की बजाय और पास जाता जा रहा था।