आँखें बंद, बाँहें छत से बंधी, बर्फ और गर्म मोम का खेल। निशा ने कबीर को पूरी रात अपने अंदर कैद रखा। सुबह तक बदन टूट चुका था, फिर भी वो फिर आने को बेताब था।
अगले दिन सुबह सात बजकर चालीस मिनट पर मैं फिर उसी दरवाज़े के सामने खड़ा था। शरीर अभी भी कल के निशानों से जल रहा था। जाँघों पर बेल्ट के लाल निशान, सीने पर मोम के दाग और अंडकोष पर चेन की जलन अभी भी बाकी थी। फिर भी मेरे अंदर एक पागल सी बेचैनी थी। निशा ने कहा था—“आज तुम्हें छत से बाँधकर लटकाऊँगी।”
दरवाज़ा खुला। निशा ने सिर्फ एक पतली काली ड्रेस पहनी थी। बाल खुले, आँखों में पहले से भी ज़्यादा ठंडी आग। उन्होंने मुझे अंदर खींचा, ताला लगाया और सीधे उस कमरे में ले गईं जहाँ अब मेज़ नहीं थी। छत से एक मोटी लोहे की कड़ी लटक रही थी। फर्श पर मोटी चटाई बिछी थी। एक तरफ़ छोटी-छोटी सुइयाँ, पतली रस्सियाँ, काला टेप और एक लंबी पतली छड़ी रखी हुई थी।
“कपड़े फेंको,” निशा ने हुक्म दिया।
मैंने उतारे। निशा ने मेरे दोनों हाथ ऊपर किए और कड़ी में बाँध दिए। फिर उन्होंने एक छोटी सी स्टूल खींचकर मेरे पैरों के नीचे रखी। मैं लगभग लटक रहा था। सिर्फ पंजों के बल खड़ा था। उन्होंने स्टूल थोड़ा सा खिसका दिया। अब पूरा वजन मेरे बाजुओं पर आ गया। दर्द तुरंत शुरू हो गया।
निशा ने मेरे मुँह में काला टेप चिपका दिया।
“आज चीख भी नहीं पाओगे। सिर्फ आँखों से रोना।”
उन्होंने पतली छड़ी उठाई और मेरे जाँघों पर जोर से मारी। एक, दो, तीन… लगातार। हर वार के साथ मेरी जाँघें काँप रही थीं। छड़ी इतनी तेज़ थी कि त्वचा तुरंत लाल हो गई। फिर उन्होंने छड़ी को मेरे अंडकोष पर हल्के से छुआया।
“आज यहाँ भी मारूँगी। लेकिन पहले… सुई।”
निशा ने एक पतली चमकदार सुई उठाई। मेरे तने हुए आठ इंच के लंड को अपनी हथेली में पकड़ा और सुई की नोक उसके सिरे के ठीक नीचे रख दी। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने धीरे-धीरे सुई धकेलनी शुरू की।
दर्द इतना तेज़ था कि मेरे पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। आँसू अपने आप निकलने लगे। सुई आधी अंदर चली गई। निशा ने मुस्कुराते हुए दूसरी सुई निकाली और लंड के दूसरी तरफ़ चुभा दी।
“देखो कितना सुंदर लग रहा है। तुम्हारा लंड अब मेरा खिलौना है।”
वे खड़ी हो गईं और मेरे सामने अपनी ड्रेस उतार दीं। नंगी। उन्होंने अपनी चूत के होंठ खोले और मेरी नाक के बिलकुल पास ला दीं।
“सूंघो। आज तुम सिर्फ मेरी गंध में साँस लोगे।”
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फिर वे पीछे गईं। उन्होंने मेरे पैरों को भी रस्सी से बाँध दिया और स्टूल पूरी तरह हटा दिया। अब मैं सिर्फ हाथों के बल लटक रहा था। कंधे जल रहे थे। निशा ने छड़ी फिर उठाई और इस बार मेरे गांड पर मारना शुरू किया। जोरदार वार। एक के बाद एक। मेरी गांड जल रही थी। हर वार के साथ मेरा शरीर हवा में झूल रहा था। सुइयाँ लंड में चुभी हुई थीं और हर हिलने पर दर्द और बढ़ जाता।
बीस मिनट तक लगातार मारने के बाद निशा रुकीं। मेरे शरीर पर लाल निशान और छोटे-छोटे खून के बिंदु चमक रहे थे। उन्होंने मेरे मुँह से टेप उतारा।
“अब बोलो। तुम क्या हो?”
“आपकी… गुलाम… आपकी दर्द की कुतिया…”
निशा ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। फिर उन्होंने मेरे लंड से सुइयाँ निकालीं। खून की पतली धारें बहने लगीं। उन्होंने अपना मुँह नीचे किया और खून चूस लिया। फिर लंड को गले तक ले गईं। दांतों से काटती हुई। मैं फिर से चीखने लगा।
“अब तुम्हें चोदूंगी,” उन्होंने कहा।
निशा ने एक छोटी सी कुर्सी खींचकर मेरे सामने रखी और उस पर बैठ गईं। उन्होंने मेरे लटकते शरीर को अपने करीब खींचा और अपना पूरा वजन मेरे लंड पर डाल दिया। मेरा लंड उनकी चूत में समा गया। लेकिन इस बार वे खुद नहीं हिल रही थीं। बल्कि उन्होंने मेरे कूल्हों को पकड़कर मुझे आगे-पीछे झुलाना शुरू कर दिया। छत की कड़ी खनक रही थी। मेरा पूरा शरीर उनके ऊपर झूल रहा था। हर बार जब मैं अंदर जाता तो उनकी चूत मुझे निचोड़ लेती।
“ज़ोर से झूलो। खुद को चोदो,” निशा ने हुक्म दिया।
मैंने बाजुओं में ताकत लगाई और खुद को आगे-पीछे हिलाने लगा। दर्द और मज़ा एक साथ मिलकर मुझे पागल बना रहे थे। निशा मेरे गाल पर थप्पड़ मार रही थीं। फिर उन्होंने मेरे निपल्स को अपने नाखूनों से नोचना शुरू किया। खून निकल आया।
आधा घंटा झूलने के बाद मेरी बाँहें लगभग जवाब दे चुकी थीं। निशा उतर गईं। उन्होंने मुझे नीचे उतारा लेकिन हाथ नहीं खोले। फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। फिर अपनी गांड मेरे चेहरे पर दबा दीं।
“अब साँस मत लो। जब तक मैं पानी न छोड़ूँ।”
उनकी गांड ने मेरे मुँह-नाक को पूरी तरह बंद कर दिया। मैं हाँफ रहा था। साँस नहीं आ रही थी। निशा हिल रही थीं। उनकी गीली चूत मेरे माथे पर रगड़ रही थी। जब मेरी आँखें बंद होने लगीं तभी उन्होंने उठाया। मैंने जोर से साँस ली तो उन्होंने फिर दबा दिया। तीन बार ऐसा किया। चौथी बार जब उन्होंने उठाया तो मैं लगभग बेहोश होने वाला था।
निशा ने मुझे फिर लिटा दिया। इस बार उन्होंने मेरे पैर फैलाए और छड़ी से मेरे अंडकोष पर हल्के-हल्के मारना शुरू किया। हर वार के साथ मेरा शरीर ऐंठ रहा था। फिर उन्होंने एक पतली रस्सी ली और मेरे अंडकोष को कसकर बाँध दिया। खून का बहाव रुक गया। दर्द असहनीय हो चला था।
“अब आखिरी तोहफा,” निशा ने कहा।
उन्होंने मेरे लंड को अपनी गांड में डाल लिया और रस्सी को अपने हाथ में पकड़कर जोर-जोर से हिलने लगीं। हर बार जब वे ऊपर उठतीं तो रस्सी खिंचती और मेरे अंडकोष पर दबाव बढ़ जाता। मैं चीख रहा था। असली दर्द की चीख। निशा और तेज़ हो गईं। उनकी गांड मेरे लंड को निगल रही थी। जब वे चरम पर पहुँचीं तो उन्होंने रस्सी और कस दी। मैं भी उसी पल फट गया। वीर्य उनकी गांड में जा रहा था लेकिन दर्द इतना था कि मुझे लगा मैं पागल हो जाऊँगा।
निशा उतर गईं। उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मेरे हाथ-पैर सुन्न थे। शरीर पर छड़ी के निशान, सुइयों के छोटे छेद, खून और वीर्य के दाग फैले हुए थे। निशा मेरे पास बैठ गईं और मेरे बाल सहलाते हुए धीरे से बोलीं,
“अगली बार तुम्हें पूरी रात यहीं लटकाकर रखूँगी। और सुबह तक तुम्हारा लंड मेरी चूत में रहेगा। चाहे तुम रोओ या बेहोश हो जाओ।”
मैं कुछ बोल नहीं पाया। सिर्फ काँप रहा था। निशा ने मेरे कपड़े फेंके और दरवाज़ा खोला।
“जाओ। कल फिर यही समय।”
मैं लड़खड़ाते हुए बाहर निकला। गली की धूप में मेरा शरीर जल रहा था। हर कदम पर दर्द हो रहा था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल फिर वही छत, वही कड़ी, और निशा की वह क्रूर मुस्कान।
अगले दिन सुबह सात बजकर पैंतीस मिनट पर मैं फिर उसी दरवाज़े के सामने था। शरीर कल के निशानों से भरा हुआ था। जाँघों और गांड पर छड़ी के गहरे लाल निशान, लंड पर सुइयों के छोटे छेद और अंडकोष पर रस्सी की जलन अभी भी बाकी थी। फिर भी पैर खुद-ब-खुद उस घर की तरफ चल रहे थे। निशा ने कहा था—“आज पूरी रात लटकाकर रखूँगी।”
दरवाज़ा खोला तो निशा सिर्फ एक पतली काली चादर ओढ़े खड़ी थीं। उन्होंने मुझे अंदर खींचा, ताला लगाया और सीधे उस कमरे में ले गईं। छत की कड़ी पहले से लटकी थी। फर्श पर मोटी काली चटाई बिछी थी। एक तरफ़ बर्फ के टुकड़े, लंबी मोटी मोमबत्ती, काला कपड़ा, टेप और एक पतली धातु की छड़ रखी हुई थी।
“आज तुम कुछ नहीं बोलोगे जब तक मैं न कहूँ,” निशा ने ठंडे स्वर में कहा। “कपड़े फेंको।”
मैंने उतारे। निशा ने मेरे दोनों हाथ ऊपर करके कड़ी में बाँध दिए। फिर उन्होंने काला कपड़ा निकालकर मेरी आँखों पर कसकर बाँध दिया। दुनिया अंधेरी हो गई। उसके बाद उन्होंने मेरे मुँह में मोटा कपड़ा ठूंसकर टेप से सील कर दिया। अब न दिख रहा था, न बोल पा रहा था।
निशा ने मेरे पैरों को भी रस्सी से बाँधकर थोड़ा फैला दिया। फिर स्टूल हटा दिया। पूरा वजन बाजुओं पर आ गया। कंधे तुरंत जलने लगे। अंधेरे में दर्द और तेज़ महसूस हो रहा था।
अचानक ठंडी चीज़ मेरे सीने पर छुई। बर्फ। निशा बर्फ के टुकड़े को मेरे निपल्स पर रगड़ने लगीं। ठंडक इतनी तेज़ थी कि शरीर काँप उठा। फिर बर्फ को नीचे ले गईं—पेट पर, जाँघों पर और आखिर में मेरे तने हुए लंड पर। बर्फ लंड के सिरे पर रखने के बाद उन्होंने उसे अंडकोष के बीच दबा दिया। ठंडक ने मुझे अंदर तक जकड़ लिया। मैं सिसकने लगा लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
बर्फ पिघलने के बाद निशा ने मोटी मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम की पहली बूँद मेरे बाएँ निपल पर गिरी तो मेरा शरीर हवा में झूल गया। फिर दाएँ निपल पर। फिर लंड के ऊपर। हर बूँद जलन पैदा कर रही थी। मोम जम रहा था और त्वचा खींच रही थी। निशा लगातार मोम गिराती रहीं—सीने पर, पेट पर, जाँघों पर। मेरा पूरा ऊपरी शरीर मोम की सफेद परत से ढक गया।
फिर अचानक छड़ी की आवाज़ आई। निशा ने मेरी गांड पर जोरदार वार किया। एक, दो, तीन… गिनती खो गई। हर वार के साथ मेरा शरीर आगे को झूलता और बाज़ुओं में दर्द बढ़ जाता। छड़ी कभी जाँघों पर पड़ती, कभी गांड पर, कभी पीठ के निचले हिस्से पर। त्वचा जल रही थी। अंधेरे में हर दर्द दस गुना लग रहा था।
लगभग आधा घंटा मारने के बाद निशा रुकीं। उन्होंने मेरे मुँह से टेप और कपड़ा हटाया। मैं हाँफ रहा था।
“बोलो,” उन्होंने हुक्म दिया।
“धन्यवाद… मैडम… और मारो…”
निशा की हल्की हँसी सुनाई दी। उन्होंने फिर से मुँह बंद कर दिया। फिर मुझे थोड़ा नीचे किया लेकिन हाथ नहीं खोले। फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। आँखें अभी भी बंद थीं। निशा ने अपनी चूत मेरे मुँह पर दबा दी।
“चाटो। जब तक मैं कहूँ, जीभ मत हटाओ। अगर रुके तो फिर से छड़ी।”
मैंने जीभ निकाली। उनकी चूत पहले से गीली थी। मैं चाटने लगा—होठों को, अंदर तक, फिर गांड की सूराख को। निशा मेरे बाल पकड़कर सिर को और जोर से दबा रही थीं। मेरी नाक उनकी चूत में धँसी हुई थी। साँस लेने के लिए संघर्ष हो रहा था। वे हिल रही थीं। कभी-कभी वे अपना पूरा वजन मेरे चेहरे पर डाल देतीं और मैं लगभग घुटने लगता। इक्कीस मिनट तक लगातार चाटने के बाद मेरी जीभ सुन्न पड़ गई थी। निशा ने अपना पानी मेरे मुँह में छोड़ दिया। मुझे निगलना पड़ा।
फिर उन्होंने मुझे फिर से लटका दिया। इस बार उन्होंने धातु की छड़ उठाई। ठंडी धातु मेरे लंड के नीचे छुई। निशा ने छड़ को धीरे-धीरे मेरे अंडकोष के बीच रगड़ना शुरू किया। फिर हल्का सा दबाया। दर्द तेज़ था। उन्होंने छड़ को और जोर से दबाया। मैं हवा में तड़प रहा था। आँखों पर कपड़ा होने की वजह से पता नहीं चल रहा था कि अगला वार कब और कहाँ होगा।
अचानक निशा ने मेरे लंड को अपनी चूत में ले लिया। वे कुर्सी पर बैठी थीं और मेरे लटकते शरीर को अपने ऊपर खींच रही थीं। पूरा लंड अंदर चला गया। निशा ने मेरे कूल्हों को पकड़कर मुझे झुलाना शुरू कर दिया। हर बार जब मैं अंदर जाता तो उनकी चूत मुझे कसकर पकड़ लेती। बाज़ुओं में दर्द असहनीय हो चला था। कंधे लगभग जवाब दे रहे थे।
“खुद को चोदो,” निशा ने कहा। “अगर रुके तो अंडकोष पर छड़ से मारूँगी।”
मैंने बाजुओं में बाकी बची ताकत लगाई और खुद को आगे-पीछे हिलाने लगा। हर झूले के साथ दर्द और मज़ा एक साथ मिल रहे थे। निशा मेरे निपल्स को अपने नाखूनों से नोच रही थीं। मोम की परत टूट रही थी और त्वचा और जल रही थी। मैं रो रहा था। आँसू काले कपड़े को गीला कर रहे थे।
एक घंटे तक इसी तरह झूलने के बाद मेरी बाँहें पूरी तरह सुन्न हो गईं। निशा उतर गईं। उन्होंने मुझे नीचे उतारा लेकिन आँखों का कपड़ा और हाथों की रस्सी नहीं खोली। फर्श पर लिटा दिया। फिर उन्होंने मेरे पैर फैलाए और बर्फ के नए टुकड़े मेरे अंडकोष पर रख दिए। ठंडक ने मुझे फिर से काँप दिया। उसके ठीक बाद गर्म मोम की बूँदें अंडकोष पर गिराईं। ठंड और गर्मी का ये खेल मेरे दिमाग को सुन्न कर रहा था।
निशा मेरे ऊपर सवार हो गईं। इस बार गांड में। उन्होंने धीरे-धीरे पूरा लंड अपनी गांड में लिया और रुक गईं। फिर उन्होंने धातु की छड़ से मेरे अंडकोष को हल्का सा टकराया।
“हिलो। खुद को गांड में चोदो। अगर रुके तो और जोर से मारूँगी।”
मैंने कूल्हे हिलाने शुरू किए। हर धक्के के साथ उनकी गांड मुझे निचोड़ रही थी। निशा छड़ से कभी-कभी अंडकोष पर हल्का वार कर देतीं। दर्द की लहरें पूरे शरीर में दौड़ रही थीं। मैं चीख रहा था लेकिन आवाज़ दबी हुई थी। निशा तेज़ होती गईं। उनकी सिसकारियाँ कमरे में गूँज रही थीं। जब वे चरम पर पहुँचीं तो उन्होंने अपने नाखून मेरे सीने में गड़ा दिए। खून निकल आया। उसी पल मैं भी फट गया। वीर्य उनकी गांड में जा रहा था लेकिन शरीर इतना थक चुका था कि सिर्फ काँप रहा था।
निशा उतर गईं। उन्होंने आँखों का कपड़ा हटाया। रोशनी में मेरी आँखें चौंधिया गईं। शरीर पर मोम, खून, छड़ी के निशान और वीर्य के दाग फैले हुए थे। निशा मेरे पास बैठ गईं और मेरे बाल सहलाते हुए धीरे से बोलीं,
“आज रात यहीं सोओगे। हाथ बंधे रहेंगे। मैं सोते समय भी तुम्हारा लंड अपनी चूत में रखूँगी। अगर रात में निकला तो सुबह तुम्हें और सज़ा मिलेगी।”
उन्होंने मुझे फर्श पर ही लिटा दिया। हाथ अभी भी कड़ी से बंधे थे। निशा मेरे ऊपर लेट गईं और मेरे आधे-अधूरे लंड को अपनी चूत में ले लिया। उनका शरीर मेरे ऊपर भारी लग रहा था। उन्होंने मेरा मुँह अपने स्तन से बंद कर दिया।
“सो जाओ। कल सुबह तक यही हाल रहेगा।”
मैं थकान और दर्द से लगभग बेहोश हो रहा था। निशा की साँसें मेरे कानों में आ रही थीं। कमरे में अंधेरा गहराता जा रहा था। शरीर जल रहा था, बाँहें सुन्न थीं, लेकिन अंदर एक अजीब सी शांति भी थी।
अब मैं पूरी तरह उनका हो चुका था। रात लंबी होने वाली थी। और मैं जानता था कि सुबह तक मेरा शरीर और भी टूट चुका होगा। लेकिन पैर फिर भी कल इसी दरवाज़े पर पहुँच जाएंगे। क्योंकि अब दर्द के बिना मेरा लंड तनता ही नहीं था।
कबीर-निशा पार्ट 3: रात भर लटकता गुलाम
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