शादीशुदा कजिन की पिंजरा-गुलामी

विवाहित कजिन को हर महीने पिंजरे में कैद कर चेन, मोम, सुई और मशीन से बेदर्दी तोड़ा। खून-आँसू में भी वह और क्रूरता माँगती रही।

मेरा नाम रोहन है। उम्र पच्चीस साल। जयपुर के पुराने बानी पार्क इलाके में हमारा बंगला था—बड़ी सी कोठी, तीन मंजिल, ऊँची दीवारें, और अंदर एक अलग विंग जहाँ सिर्फ परिवार सोता था। घर में पाँच लोग—मैं, मेरी बड़ी बहन प्रिया, छोटा भाई आयुष, अम्मी और अब्बू। प्रिया मुझसे तीन साल बड़ी थी।

अट्ठाईस साल की उम्र में भी उसकी देह ऐसी थी कि रास्ते चलते लड़के रुक जाते। गोरी चमड़ी पर हल्का गुलाबी रंग, स्तन इतने भारी कि सलवार-सूट के अंदर भी उनकी गोलाई साफ दिखती, कमर पतली और गांड गोल-गोल जैसे कोई पका आम। शादी से पहले वह घर में हमेशा ढीले सूट पहनती थी, लेकिन जब झुककर कुछ उठाती तो उसकी गहरी घाटी और भारी स्तनों की लटकन मुझे पागल कर देती |

मैंने कई रातें उसकी कल्पना में मुठ मारते बिताईं। कई बार उसने मुझे बाथरूम के बाहर खड़े अपना लंड सहलाते देखा। वह सिर्फ आँखें गड़ाकर देखती और मुस्कुराकर चली जाती। निकाह से पहले घर की सफाई करते वक्त जब वह झुकती, तो उसके गोरे-गोरे, रसीले स्तन मुझे साफ दिखते। मेरा लंड तुरंत खड़ा हो जाता। वह भी मेरे तने हुए लंड को देख लेती, लेकिन कुछ कहती नहीं। मैं सिर्फ मुठ मारकर शांत हो जाता।

फिर उसकी शादी हो गई विक्रम नाम के एक अमीर ठेकेदार से। शादी के आठ दिन बाद वह मायके आई। सिर्फ चार दिन के लिए। लेकिन उन आठ दिनों में विक्रम ने उसे पूरी तरह बदल दिया था। अब वह नकाब पहनने लगी थी, लेकिन आँखों में एक गहरी, भूखी चमक थी। उसकी चाल और भी कामुक हो गई थी। स्तन और भी भरे-भरे लग रहे थे, जैसे रात-रात भर चुदाई ने उन्हें और फूल दिया हो

उस रात की बात है। आयुष कोचिंग के लिए बाहर गया हुआ था। अम्मी-अब्बू अपनी मंजिल पर सो गए। प्रिया और मैं नीचे वाले बड़े कमरे में एक ही डबल बेड पर लेटे थे। कमरे में सिर्फ एक दीया जल रहा था। प्रिया ने हल्का गुलाबी सलवार-सूट पहना था। मैंने अंदर कुछ नहीं पहना था—सिर्फ ढीला शॉर्ट।

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आधी रात को अचानक प्रिया करवट बदली और मेरे ऊपर झुककर मेरे होठों पर अपने होठ रख दिए। वह आधी नींद में थी। उसे लगा कि विक्रम है। मैंने पहले तो साँस रोकी, फिर उसके होठों को चूस लिया। उसकी आँखें खुलीं। वह चौंककर पीछे हटी।
“रोहन… तू… तू ये क्या कर रहा है? तू मेरा छोटा भाई है!”
मैंने उसकी कमर पकड़ ली। “प्रिया… तू कितनी हॉट हो गई है शादी के बाद। मैं खुद को रोक नहीं पा रहा।”
वह बोली, “ये गलत है… बहुत गलत।”

मैंने उसके कान में फुसफुसाया, “किसे पता चलेगा? घर की बात घर में रहेगी। अम्मी-अब्बू ऊपर सो रहे हैं। आयुष बाहर है। सिर्फ तू और मैं।”
वह झिझकी। मैंने उसके स्तनों पर हाथ रखा। सूट के ऊपर से ही उनकी मुलायम, भारी गोलाई महसूस हुई। वह हल्की आह भरने लगी। मैंने धीरे-धीरे उसके सूट की डोरी खोली और स्तन बाहर निकाल लिए। दोनों स्तन बड़े, गोल, गुलाबी निप्पल्स वाले। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा। उसने मेरे बाल पकड़ लिए।
“आह… रोहन… छोड़… ये नहीं…”

मैंने नहीं छोड़ा। दूसरे स्तन को भी दबाया और निप्पल को दाँतों से हल्का काटा। वह कराह उठी। मैंने उसके सलवार को नीचे खींचा। उसकी चूत पर हल्के बाल थे, और वह पहले से गीली थी। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डाल दीं। वह सिसकने लगी।
“देख… तेरी चूत कितनी गीली हो रही है भाई के हाथों से।”

मैंने उसे पूरी तरह नंगा कर दिया। फिर उसके हाथों को बेड के हेडबोर्ड से बाँध दिया—कमरे में पड़ी रस्सी से। उसने विरोध किया, लेकिन मैंने उसके मुँह पर हाथ रख दिया।
“चुप रह। आज तू मेरी रंडी है। विक्रम ने तुझे सिखाया होगा, अब मैं सिखाऊँगा।”
मैंने उसकी टाँगें फैलाईं और उसकी चूत पर मुँह लगा दिया। जीभ से उसके क्लिट को जोर-जोर से चाटा, फिर अंदर तक जीभ घुसा दी। वह रस्सियों में तड़पने लगी।

“आआह्ह… रोहन… मत… उफ्फ… चाट… और जोर से चाट…”
मैंने उसकी चूत को कुत्ते की तरह चाटा। थूक और उसके पानी से पूरा मुँह भर गया। फिर मैंने अपना लंड निकाला—नौ इंच लंबा, मोटा, नसों वाला। उसके मुँह के पास ले गया।
“चूस। सीख। विक्रम को भी यही सिखाना।”

उसने मना किया। मैंने उसके बाल पकड़कर लंड उसके मुँह में ठूंस दिया। वह गैग करने लगी, लेकिन मैंने पीछे नहीं हटा। गले तक लंड धकेला। आँखों से आँसू निकलने लगे। मैंने उसके गले को दबाया और लंड अंदर-बाहर करने लगा।
“चूस रंडी… अपनी बहन की तरह नहीं, एक सस्ती रंडी की तरह चूस।”

वह चूसने लगी। आवाजें निकल रही थीं—घुर-घुर। मैंने उसके गालों पर थप्पड़ मारे। लाल हो गए। फिर लंड निकालकर उसकी चूत पर रखा। बिना किसी तैयारी के एक जोर का धक्का मारा। आधा लंड अंदर घुस गया। वह चिल्लाई।
“आह्ह्ह… फट गई… निकाल… दर्द हो रहा है…”

मैंने नहीं निकाला। पूरा लंड अंदर पेल दिया। उसकी चूत इतनी टाइट थी कि लग रहा था फट जाएगी। मैंने उसके गले पर हाथ रखा और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के के साथ उसके स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। मैंने एक स्तन को मुँह में लिया और दाँतों से काटा। निप्पल पर दाँत के निशान पड़ गए।

“चोद… अपनी बहन की चूत फाड़… आह… मादरचोद… और जोर से…”
मैंने उसकी टाँगें उसके कंधों तक मोड़ दीं। लंड और गहराई तक जा रहा था। उसके पेट पर उभार दिख रहा था। मैंने उसके मुँह पर थूका और गालियाँ देने लगा।

“बहनचोद रंडी… साली अपने भाई का लंड ले रही है… विक्रम का लंड याद आ रहा है न? उसका लंड तो छोटा होगा… मेरा देख… तेरी चूत फाड़ रहा हूँ…”

वह रोने लगी और साथ में कराहने भी लगी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले पर दबाव बढ़ाया। उसकी आँखें ऊपर पलटने लगीं। फिर मैंने लंड निकाला और उसे घोड़ी बना दिया। रस्सी अभी भी हाथों में बँधी थी। उसकी गांड ऊपर उठी हुई। मैंने थूक लगाया और एक झटके में लंड उसकी गांड में धकेल दिया।

“आआह्ह्ह… फट गई साले… निकाल… दर्द… बहुत दर्द…”
मैंने उसके मुँह बंद कर दिया और पूरा लंड अंदर पेल दिया। उसकी गांड इतनी टाइट थी कि लंड दब रहा था। मैंने जोर-जोर से गांड चोदनी शुरू कर दी। हर धक्के के साथ वह सिसक रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर खींचे और दूसरे हाथ से उसके स्तनों को मरोड़ा।
“गांड मार… अपनी बहन की गांड… विक्रम ने सिखाया होगा न… गाजर से… अब असली लंड ले…”

कुछ देर बाद वह दर्द के बावजूद मजा लेने लगी। उसकी गांड ढीली पड़ने लगी। मैंने लंड निकालकर फिर चूत में डाल दिया। दोनों छेदों में बारी-बारी से चोदने लगा। उसके पूरे शरीर पर थप्पड़ के निशान, दाँत के निशान और उँगलियों के निशान पड़ गए। मैंने उसके गले में रस्सी बाँधकर हल्का घोंटा। वह बेहोशी की कगार पर पहुँच गई, तब मैंने छोड़ दिया।

मैंने उसे पीठ के बल लिटाया। हाथ अभी भी बँधे थे। मैंने उसके ऊपर चढ़कर लंड चूत में डाल दिया और दोनों स्तनों को जोर से दबाते हुए चोदने लगा। उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन मुँह से गंदी गालियाँ निकल रही थीं।

“चोद… भैनचोद… अपनी बहन को कुत्ते की तरह चोद… वीर्य अंदर डाल… मुझे गर्भवती कर… पता नहीं विक्रम का बच्चा होगा या तेरा…”
मैंने और तेज धक्के मारे। बेड चरमरा रहा था। अम्मी-अब्बू ऊपर थे, लेकिन दीवालें मोटी थीं। मैंने उसके क्लिट को उँगली से मसला। वह जोर से काँपी और उसका पानी छूट गया। चूत में से पानी की धारा निकलने लगी। मैंने भी उसी समय अंदर झड़ दिया। गर्म वीर्य की धार उसकी कोख में भर गई।

लेकिन मैं रुका नहीं। लंड अभी भी सख्त था। मैंने उसे फिर से घोड़ी बनाया और गांड में लंड डाल दिया। इस बार और बर्बरता से। उसके कंधे पर दाँत गड़ा दिए। खून की बूंदें निकलीं। वह चिल्ला रही थी, लेकिन मैंने उसका मुँह तकिए से दबा दिया। दस-पंद्रह मिनट और गांड चोदी। फिर लंड निकालकर उसके मुँह में ठूंस दिया।
“चूस… अपना और मेरा पानी दोनों चूस…”

वह चूसने लगी। आँसू और थूक मिलाकर। मैंने दूसरी बार उसके मुँह में झड़ दिया। वीर्य उसके गले में चला गया। वह खाँसने लगी।
रात अभी बाकी थी। मैंने रस्सी खोली। उसके हाथ लाल हो गए थे। मैंने उसे गोद में लिटाया और उसके स्तन चूसने लगा। फिर तीसरी बार उसकी चूत में लंड डाल दिया। इस बार धीरे-धीरे, लेकिन गहराई तक। हर धक्के के साथ उसके पेट पर हाथ रखा और महसूस किया कि लंड कहाँ तक जा रहा है। उसने मेरे पीठ पर नाखून गड़ा दिए। खून निकला।

“रोहन… तू पागल हो गया है… लेकिन… मत रुक… और चोद…”
मैंने उसके गले पर फिर हाथ रखा और आखिरी बार जोर से चोदा। दोनों एक साथ झड़े। वीर्य उसकी जाँघों तक बह निकला।
सुबह होने से पहले मैंने उसे नहलाया। उसके शरीर पर नील और निशान थे। उसने मुझे देखा और धीरे से बोली, “अगली बार जब आऊँ… तो और सख्त करना। रस्सी से बाँधना… थप्पड़ मारना… और… गांड ज्यादा मारना।”

मैंने उसके माथे पर चुम्मा लिया। “जब भी मौका मिलेगा… तेरी चूत और गांड दोनों फाड़ दूँगा। तू मेरी निजी रंडी है अब।”
उसके बाद जब भी प्रिया मायके आती, हम दोनों को मौका मिल जाता। कभी अम्मी-अब्बू बाजार जाते, कभी आयुष बाहर रहता। हर बार मैं उसे और क्रूर तरीकों से चोदता—कभी आँखें बाँधकर, कभी मोमबत्ती की मोम गिराकर, कभी उसके स्तनों को क्लिप से दबाकर। वह हर बार और माँगती। विक्रम को कभी पता नहीं चला। और घर की दीवारें हमारे इस राज़ को अपने अंदर समेटे रखती रहीं।

उसके बाद के महीने और भी अँधेरे और गंदे हो गए। प्रिया हर दो हफ्ते में मायके आने लगी। विक्रम बिजनेस के चक्कर में बाहर रहता था, कभी दुबई, कभी मुंबई। प्रिया घर आती तो अम्मी-अब्बू को कह देती कि घर की याद सता रही है। असल में उसकी चूत और गांड मेरे लंड की भूख से तड़प रही होती।

एक रात आयुष कोचिंग के हॉस्टल में ठहर गया। अम्मी-अब्बू रिश्तेदारों के यहाँ रात भर के लिए चले गए। पूरा बंगला खाली। मैंने प्रिया को नीचे वाले कमरे में बुलाया। उसने काला सूट पहना था। मैंने दरवाजा बंद किया और चाबी घुमा दी।
“आज सिर्फ चोदना नहीं है,” मैंने कहा। “आज तुझे तोड़ना है।”

उसकी आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। मैंने अलमारी से मोटी रस्सी, काला टेप, एक चमड़े का बेल्ट और मोमबत्तियाँ निकालीं। उसने पीछे हटने की कोशिश की। मैंने उसके बाल पकड़कर खींचा और दीवार से टिका दिया।
“भागने की कोशिश मत कर रंडी। आज तू मेरी गुलाम है।”

मैंने उसके दोनों हाथ पीछे बाँधे। रस्सी इतनी कसकर कि उसकी कलाईयाँ लाल हो गईं। फिर आँखों पर काला टेप लगा दिया। उसने विरोध किया तो मैंने उसके मुँह में अपना अंडरवियर ठूंस दिया। वह गूंगी हो गई। मैंने उसके कपड़े फाड़ दिए। स्तन बाहर निकले—भारी, गोरे, निप्पल्स पहले से तने हुए। मैंने दोनों निप्पल्स को क्लothespin से दबा दिया। वह दर्द से काँपने लगी। मैंने उसके स्तनों को जोर से मरोड़ा। निप्पल्स पर खून की छोटी बूंदें दिखीं।

मैंने उसे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। अपना लंड निकाला—नौ इंच, मोटा, पहले से सख्त। उसके मुँह से अंडरवियर निकाला और लंड गले तक ठूंस दिया। वह गैग करने लगी, लार बहने लगी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे किया। लंड उसके गले में बार-बार धँस रहा था। आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने उसके गालों पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे।
“चूस… और गहरा… अपनी बहन की तरह नहीं, सड़क की रंडी की तरह।”

जब उसका मुँह पूरी तरह लार और मेरे लंड से भर गया, तब मैंने लंड निकाला और उसके चेहरे पर थूका। फिर उसे घोड़ी की पोजीशन में कर दिया। रस्सी अभी भी हाथों में बँधी थी। मैंने उसके गांड के छेद पर थूक लगाया और बिना रुके पूरा लंड एक झटके में अंदर पेल दिया। वह चीखी। आवाज दब गई क्योंकि मैंने उसका मुँह फिर से बंद कर दिया था।

मैंने उसकी गांड को बर्बरता से चोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसके शरीर में झटका लगता। मैंने बेल्ट उठाया और उसकी पीठ, गांड और जाँघों पर मारना शुरू किया। लाल निशान पड़ गए। कुछ जगहों पर त्वचा फट गई। खून की पतली लकीरें बहने लगीं। वह रो रही थी, लेकिन उसकी चूत से पानी टपक रहा था।

“दर्द हो रहा है न? अच्छा लग रहा है न? विक्रम तुझे कभी इतना नहीं तोड़ता। मैं तोड़ूँगा।”
मैंने लंड गांड से निकाला और चूत में डाल दिया। दोनों छेद एक के बाद एक फाड़ रहा था। बीच-बीच में उसके स्तनों के क्लothespin को और कसता। वह तड़प रही थी। मैंने मोमबत्ती जलाई और उसकी पीठ पर गर्म मोम गिराना शुरू किया। वह काँप उठी। मोम उसकी त्वचा पर जम गई। मैंने और गिराई—स्तनों पर, निप्पल्स पर, गांड के छेद के आसपास।

फिर मैंने उसे पीठ के बल लिटाया। टाँगें उसके कंधों तक मोड़ दीं। लंड चूत में डालकर इतनी जोर से धक्के मारे कि बेड की लकड़ी चरमराने लगी। उसके पेट पर लंड का उभार साफ दिख रहा था। मैंने एक हाथ से उसका गला दबाया। साँस फूलने लगी। आँखें ऊपर पलटने लगीं। जब वह बेहोशी के करीब पहुँची, तब छोड़ दिया। वह खाँसने लगी। मैंने फिर गला दबाया और उसी समय अंदर झड़ गया। वीर्य की तेज धार उसकी कोख में भर गई।

लेकिन रात अभी शुरू ही हुई थी। मैंने रस्सी खोली, लेकिन उसके हाथ-पैर फिर से बाँध दिए—इस बार बेड के चारों कोनों से। वह पूरी तरह फैली हुई थी। मैंने उसके क्लिट पर बर्फ का टुकड़ा रखा। वह काँपी। फिर गर्म मोम। फिर अपने दाँतों से उसके भीतरी जाँघों को काटा। खून निकला। मैंने खून चाटा।

मैंने फिर से लंड उसकी गांड में डाला। इस बार और गहरा। उसने दर्द से चीखने की कोशिश की। मैंने उसका मुँह अपने मुँह से बंद कर लिया और जीभ अंदर घुसा दी। गांड चोदते-चोदते मैंने उसके स्तनों को इतना मरोड़ा कि नाखून के निशान पड़ गए। खून की बूंदें स्तनों पर भी आ गईं।

तीसरी बार मैंने उसकी चूत में लंड डाला। इस बार मैंने उसके क्लिट को उँगली से इतनी जोर से मसला कि वह बार-बार झड़ने लगी। पानी की धारा बेड गीला कर रही थी। मैंने उसके मुँह में अपनी उँगलियाँ ठूंस दीं—वही उँगलियाँ जो उसकी चूत और गांड में थीं। वह चूसने लगी।
“निगल… अपनी गंदगी निगल।”

मैंने चौथी बार उसके मुँह में झड़ दिया। वीर्य उसके गले में चला गया। कुछ बाहर निकलकर उसके चेहरे पर फैल गया। मैंने उसे चाटने को कहा। वह चाटने लगी।

सुबह के चार बज रहे थे। उसके पूरे शरीर पर नील, खरोंच, मोम के दाग, थप्पड़ के निशान और दाँत के निशान थे। कलाईयाँ और टखने रस्सी से कटे हुए थे। मैंने उसे खोला। वह मेरे सीने से चिपक गई। आवाज काँप रही थी।
“रोहन… तूने मुझे तोड़ दिया… लेकिन… अगली बार और सख्त करना। चाबुक लाना। और… मेरी चूत में मुट्ठी डालना। मैं सह लूँगी।”
मैंने उसके बाल सहलाए। “तू अब सिर्फ मेरी है। विक्रम को सिर्फ शरीर दे। असली मालिक मैं हूँ। जब भी आएगी, मैं तुझे जानवर से भी बदतर बनाऊँगा।”

अगली मुलाकात में मैंने वैसा ही किया। चाबुक से उसकी पीठ और गांड को लाल कर दिया। मुट्ठी उसकी चूत में धीरे-धीरे घुसाई। वह चिल्लाई, रोई, लेकिन पानी छोड़ती रही। मैंने उसकी गांड में भी उँगलियाँ और फिर लंड डाला। दोनों छेद एक साथ भरे हुए। वह बेहोश होने के करीब पहुँची।

हर बार वह और माँगती। हर बार मैं और क्रूर होता। कभी उसे कुत्ते की तरह पट्टा पहनाकर घर में घुमाता। कभी उसके स्तनों को रस्सी से बाँधकर लटका देता। कभी उसके मुँह में अपना पेशाब करता और निगलने को कहता। वह निगलती। आँखों में आँसू होते, लेकिन चूत गीली रहती।

एक रात उसने खुद कहा, “मुझे गर्भवती कर दे। विक्रम का बच्चा नहीं… तेरा। मैं ससुराल जाकर भी तेरे वीर्य को अंदर रखूँगी।”
मैंने उस रात उसकी चूत में इतना वीर्य भरा कि वह टपकने लगा। उसने दोनों हाथों से चूत दबाई और मुस्कुराई।
“अब ये बच्चा तेरा होगा… भैनचोद।”

घर की दीवारें चुप रहीं। अम्मी-अब्बू कभी नहीं जान पाए। आयुष कभी नहीं समझ पाया। और प्रिया… प्रिया हर बार और टूटती गई, और मेरे लंड की गुलाम बनती गई।
रात के अँधेरे में जब भी बंगले में दीया जलता, उसकी आँखों में वही भूख जाग जाती—और मैं उसकी बहन होने की अंतिम सीमा को भी पार करके उसे सिर्फ दर्द, वीर्य और अपनी क्रूरता का खिलौना बना देता।

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