होटल में विधवा की गांड

सत्ताईस साल के राहुल ने बियाबान होटल में विधवा सुमन को रस्सियों से जकड़ लिया। गर्दन दबाई, गांड पर बेल्ट बरसाई, छेद फाड़कर लंड धकेला। चीखें गूंजीं, आँसू बहे, फिर भी वह और तोड़ने को तरसती रही। हर रात नई बेबसी।

हैलो दोस्तों, मेरा नाम राहुल है। मैं उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के एक छोटे से कस्बे का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र 27 साल है, रंग गेहुँआ और शरीर अच्छा-खासा कसा हुआ है। मुझे हमेशा बड़ी उम्र की मोटी गांड वाली महिलाओं को बर्बर तरीके से चोदने का शौक रहा है। खासकर वे औरतें जो शादीशुदा या विधवा हों और जिनकी गांड इतनी भारी हो कि हाथ से पकड़ते ही उंगलियाँ गायब हो जाएँ।

यह घटना तीन महीने पहले की है जब मैं किसी जरूरी काम से बलरामपुर गया था। वापसी में रात के करीब 9 बज गए थे। मैंने कस्बे के लिए लोकल बस पकड़ी। बस में भीड़ इतनी थी कि खड़े होने की जगह भी मुश्किल से मिल रही थी। मैं सबसे पिछले हिस्से में जाकर खड़ा हो गया। बस मुश्किल से चार-पाँच किलोमीटर चली होगी कि मेरे कस्बे की एक परिचित औरत और उसका बेटा बस में चढ़े। आगे जगह नहीं थी इसलिए दोनों पीछे की तरफ आ गए।

उस लड़के का नाम विक्रम था और उसकी माँ का नाम सुमन था। विक्रम ने मुझसे पूछा, “भैया कहाँ से आ रहे हो?” मैंने जवाब दिया, “बलरामपुर से।” इतने में कंडक्टर आया और विक्रम टिकट लेने आगे चला गया। अब सुमन आंटी मेरे ठीक आगे खड़ी थीं। भीड़ के कारण सब लोग एक-दूसरे से सटे हुए थे।

सुमन आंटी की उम्र 42 साल थी। उनके पति की मृत्यु हो चुकी थी और घर में सिर्फ वे और विक्रम रहते थे। आंटी का रंग दूध जैसा सफेद, शरीर गदराया हुआ और गांड इतनी विशाल व भारी थी कि साड़ी के अंदर से भी उनके चुतड़ों की दो पहाड़ जैसी शक्ल साफ नजर आती थी। उनकी गांड पीछे से इतनी उभरी हुई थी कि देखने वाले की साँस रुक जाए। मैंने कई रातों को उनकी उसी गांड की कल्पना करके मुठ मार ली थी। वे कई मर्दों से चुद चुकी थीं, यह बात कस्बे में फुसफुसाहटों से पता चलती थी।

आंटी अपनी पीठ मेरी तरफ किए खड़ी थीं। उनकी विशाल गांड मेरे लंड से महज तीन-चार इंच की दूरी पर थी। भीड़ के दबाव से अचानक आगे से धक्का लगा और आंटी का पूरा बदन मेरे शरीर से चिपक गया। उनकी बड़ी-बड़ी गद्देदार गांड सीधे मेरे पैंट के अंदर खड़े लंड पर सट गई। मेरा लंड तुरंत पत्थर की तरह सख्त हो गया और उनकी नरम गांड की गर्मी महसूस करने लगा।

मैंने मौके का फायदा उठाया और अपने लंड को उनकी गांड पर जोर-जोर से रगड़ने लगा। पहले तो आंटी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। फिर जब मैंने और जोर से रगड़ा तो उन्होंने सिर घुमाकर मुझे गुस्से से देखा। मेरी तो जान निकल गई। डर था कि कस्बे में बदनामी हो जाएगी। लेकिन अगले ही पल वे फिर आगे देखने लगीं। बस जब ब्रेक पर चढ़ी तो झटके से उनकी गांड फिर मेरे लंड से चिपक गई। इस बार आंटी ने खुद अपनी गांड को पीछे धकेलकर मेरे लंड पर रगड़ना शुरू कर दिया।

मैं दंग रह गया। उनकी साँसें तेज होने लगीं। मैंने दोनों हाथों से उनकी विशाल गांड को पकड़ लिया और जोर-जोर से मसलने लगा। आंटी ने फिर सिर घुमाया लेकिन इस बार उनकी आँखों में गुस्सा नहीं, बल्कि गहरी वासना थी। मैं समझ गया कि वे तैयार हैं। मैंने अपनी एक हथेली उनकी साड़ी के नीचे पेटिकोट के अंदर सरकाई। उन्होंने पतली काली पैंटी पहनी हुई थी। मैंने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया और उनकी चुत को सहलाने लगा। चुत पहले से ही गीली हो चुकी थी, रस उंगलियों पर चिपक रहा था।

मैंने उनके कान में धीरे से कहा, “पैर थोड़े फैलाओ।” उन्होंने बिना हिचक के पैर फैला दिए। मैंने दो मोटी उंगलियाँ उनकी चुत में धकेल दीं और अंदर-बाहर करने लगा। आंटी की आह निकल गई। वे पीछे की तरफ झुक गईं लेकिन तुरंत खुद को संभाला। उनके माथे पर पसीना चमक रहा था जो गले से होता हुआ उनकी बड़ी-बड़ी चूचियों के बीच की दरार में जा रहा था।

बस एक स्टॉप पर रुकी और कुछ लोग उतरे। मैंने तुरंत हाथ निकाल लिया। थोड़ी देर बाद जब विक्रम का ध्यान आगे था तो मैंने आंटी के कान में कहा, “नंबर ले लो।” उन्होंने हाथ पीछे किया और मैंने अपना नंबर उनके हाथ में थमा दिया। रास्ते भर मैं उनकी गांड दबाता रहा, चुत रगड़ता रहा। कस्बे पहुँचकर आंटी ने मुझे फोन किया। मैंने सीधे कहा, “कल होटल में मिलो।” वे तुरंत राजी हो गईं।

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अगले दिन आंटी ने विक्रम से बहाना बनाया कि वे अपनी सहेली के घर जा रही हैं और रात वहीं रुकेंगी। विक्रम ने कोई आपत्ति नहीं की। मैंने कस्बे से बीस किलोमीटर दूर एक छोटे होटल में कमरा बुक कर लिया। आंटी स्टैंड पर पहुँचीं। उन्होंने लाल रंग की टाइट साड़ी पहनी थी जिसमें उनकी विशाल गांड और भारी चूचियाँ साफ उभरी हुई थीं। मैंने उन्हें बाइक पर बिठाया और होटल की तरफ निकल गया।

रास्ते में आंटी बोलीं, “विक्रम जब घर पर अकेला होता है तो पूरा दिन पोर्न देखकर अपना लंड हिलाता रहता है। इसलिए वह चाहता है कि मैं बाहर रहूँ।” हम होटल पहुँचे। कमरे में दाखिल होते ही मैंने दरवाजा बंद किया और आंटी पर टूट पड़ा। उनकी विशाल गांड को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से मसलने लगा। आंटी भी पूरी तरह तैयार थीं। वे अपनी गांड हिला-हिलाकर मेरे हाथों में और जोर से दबवा रही थीं।
मैंने उनकी साड़ी कमर तक सरका दी। उनकी गांड अब नंगी थी। उन्होंने लाल रंग की पैंटी पहनी हुई थी। मैंने पैंटी को घुटनों तक खींच दिया और उनके विशाल चुतड़ों के बीच अपना मुँह घुसेड़ दिया। उनकी चुत को जीभ से चाटने लगा, रस चाट-चाट कर पीने लगा। आंटी अपनी गांड मेरे मुँह पर जोर से धकेल रही थीं और कराह रही थीं।

मैंने अपनी सारी कपड़े उतार फेंके। आंटी मेरे कसे हुए शरीर को देखकर और भी उत्तेजित हो गईं। उन्होंने मेरे लंड को पकड़ लिया। मेरा लंड 9 इंच लंबा और 3.5 इंच मोटा था। आंटी की आँखें फटी रह गईं। वे घुटनों के बल बैठ गईं और मेरे लंड को मुँह में ले लिया। वे रांडी की तरह चूसने लगीं। मैंने उनके बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और अपने लंड को उनके गले तक धकेल दिया। आंटी की साँसें रुक गईं, आँखों से आँसू निकल आए लेकिन उन्होंने लंड नहीं छोड़ा। वे गले तक ले जाकर चूसती रहीं।

पाँच मिनट बाद मैंने लंड निकाला और आंटी को गोद में उठाकर बिस्तर पर पटक दिया। उनकी टाँगें फैला दीं। चुत पूरी तरह खुली हुई थी, रस टपक रहा था। आंटी तड़प रही थीं, “पेल दो… इस मोटे लौड़े को इस रांडी की चुत में पेल दो।” मैंने थूक लगाकर पूरा लंड एक झटके में उनकी चुत में धकेल दिया। आंटी चीख उठीं। उनके नाखून बिस्तर की चादर में गड़ गए। मैंने कोई रहम नहीं किया। पूरे जोर से धक्के मारने लगा। कमरे में गच-गच की आवाजें गूंजने लगीं।

मैंने आंटी की गर्दन दबाई और उनके कान में बोला, “आज तुम मेरी गुलाम हो। जो कहूँगा वही करोगी।” आंटी ने हाँ में सिर हिलाया। मैंने उन्हें करवट से लिटाया और उनकी विशाल गांड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा। हर थप्पड़ पर उनकी गांड लाल हो जाती और वे और जोर से कराहतीं। फिर मैंने उनकी गांड के छेद में थूक लगाकर एक उंगली घुसेड़ दी। आंटी चिल्लाईं लेकिन मैंने दूसरी उंगली भी डाल दी। दोनों उंगलियों से उनके गांड के छेद को फैलाते हुए चुत में लंड ठोकता रहा।

फिर मैंने उन्हें कुत्ते की तरह चारों पैरों पर कर दिया। पीछे से उनकी गांड पकड़कर इतनी जोर से चोदने लगा कि उनका पूरा शरीर आगे-पीछे झूल रहा था। आंटी चीख रही थीं, “फाड़ दो… मार डालो… रांडी की गांड और चुत दोनों फाड़ दो।” मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले पर हाथ दबाया। वे घुटती हुई कराह रही थीं लेकिन हिप्स और जोर से पीछे धकेल रही थीं।

मैंने उन्हें पलटा और छाती पर बैठ गया। मेरे लंड को उनके मुँह में ठूंस दिया। वे आँखें बंद किए लंड चूस रही थीं जबकि मैं उनकी विशाल चूचियों को निचोड़-निचोड़ कर मसल रहा था। निप्पलों को दाँतों से काटने लगा। आंटी दर्द से काँप रही थीं लेकिन रुकने को नहीं कह रही थीं।
फिर मैंने उन्हें दीवार के सामने खड़ा किया। पैर फैलाए और पीछे से चुत में लंड घुसा दिया। एक हाथ से उनकी गर्दन दबाए रखा और दूसरे हाथ से गांड पर थप्पड़ मारता रहा। हर थप्पड़ के साथ धक्का और तेज होता गया। आंटी की टाँगें काँप रही थीं। वे दीवार से लगकर खड़ी मुश्किल से रह पा रही थीं।

मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और टाँगें उनके कंधों पर रख दीं। इस पोजीशन में पूरा लंड उनकी चुत की गहराई तक पहुँच रहा था। मैंने कोई धीमापन नहीं रखा। बर्बर तरीके से धक्के मारता रहा। आंटी की चीखें कमरे में गूंज रही थीं। “आह… मर गई… फट गई… और जोर से… और गहरा…” मैंने उनके मुँह पर हाथ रख दिया ताकि आवाज दब जाए और और तेज चोदने लगा।

रात भर हमने कई पोजीशन बदलीं। कभी आंटी ऊपर बैठकर मेरा लंड चुत में लेतीं तो मैं उनकी गांड पकड़कर ऊपर-नीचे करता। कभी मैं उन्हें घुटनों के बल झुकाकर गांड में लंड डालता। गांड की चुदाई में आंटी पहले तो दर्द से चिल्लाईं लेकिन धीरे-धीरे वे खुद गांड पीछे धकेलने लगीं। मैंने उनके गांड के छेद को फैला-फैला कर पूरा लंड अंदर तक पेल दिया। आंटी का पूरा शरीर पसीने से लथपथ था। उनके बाल बिखरे हुए थे, साड़ी और ब्लाउज कमरे में बिखरे पड़े थे।

सुबह चार बजे तक चुदाई चलती रही। आंटी की चुत और गांड दोनों सूज चुकी थीं, लाल हो चुकी थीं। वे बिस्तर पर लेटी हुई कराह रही थीं। मैंने अंतिम बार उनकी चुत में लंड डालकर जोरदार धक्के मारे और उनके अंदर ही अपना पूरा वीर्य छोड़ दिया। आंटी का शरीर काँप उठा। वे जोर से चीखीं और फिर ढेर हो गईं।

मैं उनके पास लेट गया। आंटी ने मेरा सिर अपनी भारी चूचियों पर रख लिया और धीरे से बोलीं, “तुमने आज मुझे पूरी तरह तोड़ दिया… लेकिन मुझे यही चाहिए था।” उनकी आँखों में थकान के साथ संतुष्टि चमक रही थी। हम दोनों पसीने और वीर्य से लथपथ बिस्तर पर लेटे रहे। बाहर सूरज निकलने वाला था लेकिन कमरे के अंदर अभी भी वासना की गंध तैर रही थी।

सुबह के उजाले में आंटी अभी भी बिस्तर पर लेटी हुई थीं। उनकी विशाल गांड पर मेरे थप्पड़ों के लाल निशान साफ चमक रहे थे। चुत और गांड दोनों सूजे हुए थे, वीर्य उनकी जाँघों से रिस रहा था। मैंने उठकर पानी पिया और लौटकर उनकी गांड पर हाथ फेरा। आंटी ने आँखें खोलीं और धीमी आवाज में बोलीं, “आज रात फिर आना… और इस बार और ज्यादा बर्बर होना।”

मैंने उनके बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया और उनके मुँह में थूक दिया। आंटी ने वह थूक निगल लिया जैसे कोई मीठा रस हो। मैंने कहा, “अगली बार तुम्हें रस्सियों से बाँधूँगा। गांड और चुत दोनों फाड़ दूँगा। रोना मत, वरना और जोर से पीटूँगा।” आंटी की आँखों में डर के साथ गहरी उत्तेजना चमक उठी। उन्होंने सिर हिला दिया।

तीन दिन बाद हम फिर मिले। इस बार मैंने एक और दूर का होटल लिया, जहाँ आसपास कोई आबादी नहीं थी। आंटी पहुँचीं तो उनके चेहरे पर बेचैनी साफ थी। उन्होंने काली साड़ी पहनी थी। कमरे में घुसते ही मैंने दरवाजा बंद किया और उनकी साड़ी झटके से खींच ली। आंटी नंगी खड़ी रह गईं। उनकी विशाल गांड और भारी चूचियाँ कमरे की रोशनी में काँप रही थीं।

मैंने बैग से मोटी रस्सी निकाली। आंटी की दोनों कलाईयाँ पीठ के पीछे बाँध दीं। फिर उनकी टाँगें फैलाकर टखनों को बिस्तर के दोनों किनारों से बाँध दिया। आंटी चारों तरफ से बेबस हो गईं। मैंने उनकी गांड के पास घुटनों के बल बैठकर जोर-जोर से थप्पड़ मारने शुरू किए। हर थप्पड़ इतना जोरदार था कि उनकी गांड की मांसपेशियाँ काँप जातीं और लाल निशान गहराते जाते। आंटी दांत भींचकर सह रही थीं लेकिन हर थप्पड़ पर उनकी चुत से रस टपकने लगा।

मैंने उनकी गांड के दोनों चुतड़ों को फैलाया और छेद पर थूक की एक मोटी लकीर गिरा दी। फिर तीन उंगलियाँ एक साथ उनके गांड के छेद में धकेल दीं। आंटी चीख उठीं। मैंने उंगलियों को अंदर-बाहर करना शुरू किया, छेद को जितना हो सके फैलाने की कोशिश की। आंटी का शरीर ऐंठ रहा था। उनकी गर्दन की नसें फूल गई थीं। मैंने कहा, “आज इस छेद में पूरा लंड जाएगा। रोना मत।”

मैंने अपना 9 इंच का मोटा लंड उनके गांड के छेद पर रखा और एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया। आंटी की चीख कमरे में गूंज गई। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने रुककर नहीं, बल्कि और जोर से धक्का मारा। पूरा लंड उनके गांड में समा गया। आंटी का मुँह खुला रह गया, साँसें उखड़ गईं। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और बर्बर गति से गांड चोदने लगा। हर धक्के के साथ उनकी विशाल गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। थप्-थप् की आवाजें तेज होती जा रही थीं।

मैंने एक हाथ उनकी गर्दन पर दबाया और दूसरा हाथ उनकी चुत में घुसेड़ दिया। तीन उंगलियाँ चुत में और पूरा लंड गांड में। आंटी अब सिर्फ कराह रही थीं, बोल नहीं पा रही थीं। मैंने उनकी गर्दन और जोर से दबाई। उनका चेहरा लाल हो गया, आँखें ऊपर की तरफ पलटने लगीं। मैंने थोड़ी ढील दी तो वे हाँफने लगीं। फिर मैंने फिर से गर्दन दबाई और गांड में और तेज धक्के मारने लगा।

आधी घंटे बाद मैंने लंड निकाला। उनका गांड का छेद खुला रह गया था, अंदर का गुलाबी मांस दिख रहा था। मैंने तुरंत लंड उनकी चुत में डाल दिया और उतनी ही बर्बरता से चोदने लगा। आंटी की टाँगें काँप रही थीं। रस्सियाँ उनके टखनों में गड़ गई थीं। मैंने उनके निप्पलों को दाँतों से काटना शुरू किया। एक निप्पल को मुँह में लेकर इतना जोर से चूसा और काटा कि आंटी फिर से चीख पड़ीं। खून की एक पतली लकीर निकली। मैंने वह खून चाट लिया और फिर से काटने लगा।

फिर मैंने आंटी को पलटा। अब वे पेट के बल लेटी हुई थीं, हाथ पीछे बँधे, टाँगें फैली हुई। मैंने उनके ऊपर चढ़कर फिर से गांड में लंड डाल दिया। इस बार मैंने दोनों हाथों से उनकी गर्दन दबाई और पूरा वजन उनके शरीर पर डाल दिया। आंटी का चेहरा तकिए में धँस गया। वे साँस नहीं ले पा रही थीं। मैंने दस-बारह जोरदार धक्के मारे फिर गर्दन छोड़ दी। आंटी जोर से खाँसने लगीं, आँखों से आँसू और नाक से पानी बह रहा था। लेकिन जैसे ही साँस आई, उन्होंने खुद अपनी गांड ऊपर उठाई।

मैंने रस्सी खोल दी और आंटी को घुटनों के बल बिठाया। उनके मुँह में लंड ठूंस दिया। “चूसो… गले तक ले लो… वरना गांड पर और मारूँगा।” आंटी ने आँखें बंद करके लंड को गले तक उतार लिया। मैंने उनके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर अपने लंड पर बार-बार पेलने लगा। आंटी की आँखों से आँसू बह रहे थे, गले से घरघराहट की आवाज आ रही थी। लार उनके मुँह से बहकर उनकी भारी चूचियों पर गिर रही थी।

मैंने लंड निकाला और उनके चेहरे पर थप्पड़ मारा। आंटी का गाल लाल हो गया। फिर दूसरे गाल पर भी मारा। आंटी ने सिर नीचे कर लिया लेकिन मैंने ठुड्डी पकड़कर फिर से लंड उनके मुँह में डाल दिया। इस बार मैंने उनका मुँह इतना फैलाया कि जबड़े में दर्द होने लगा। आंटी की आँखें फटी हुई थीं लेकिन उन्होंने विरोध नहीं किया।

फिर मैंने उन्हें बिस्तर के किनारे बैठाया और टाँगें उनके कंधों पर रख दीं। चुत में लंड डालकर इतनी जोर से चोदने लगा कि बिस्तर की चरमराहट तेज हो गई। आंटी की चुत से रस और मेरा पहले वाला वीर्य मिला-जुला निकल रहा था। मैंने उनके गले पर दोनों हाथ रख दिए और कसकर दबाया। आंटी का चेहरा बैंगनी पड़ने लगा। उनकी जीभ बाहर निकल आई। मैंने गर्दन दबाए रखते हुए और तेज धक्के मारे। जब उनकी आँखें बंद होने लगीं तब मैंने छोड़ दिया। आंटी ने जोर से साँस ली और तुरंत बोलीं, “फिर दबाओ… और जोर से…”

मैंने फिर से गर्दन दबाई। इस बार और देर तक। आंटी का शरीर ऐंठने लगा। मैंने उसी समय अपना वीर्य उनकी चुत की गहराई में छोड़ दिया। आंटी का पूरा शरीर काँप उठा। वे बेहोशी की कगार पर पहुँच गईं। मैंने गर्दन छोड़ी तो वे ढेर हो गईं, हाँफती हुई, पसीने से लथपथ।

मैंने पानी लाकर उनके चेहरे पर छिड़का। आंटी ने आँखें खोलीं। उनकी आवाज बैठ चुकी थी। वे फुसफुसाईं, “तुमने आज मुझे लगभग मार ही डाला… लेकिन… मुझे और चाहिए।” मैंने उनकी सूजी हुई गांड पर हाथ फेरा। लाल-नीले निशान साफ थे। चुत और गांड दोनों से वीर्य रिस रहा था। मैंने उंगली से उनका गांड का खुला छेद सहलाया। आंटी काँप उठीं।

रात के दो बज चुके थे। मैंने आंटी को फिर से बाँध दिया। इस बार हाथ ऊपर, सिर के पास। फिर मोटी बेल्ट निकाली जो मैं लाया था। आंटी की गांड पर बेल्ट से मारना शुरू किया। हर मार के साथ उनकी गांड पर लंबी लाल लकीरें पड़ती गईं। आंटी दांत भींचकर सह रही थीं। बीस-पच्चीस वार के बाद उनकी गांड पूरी तरह जल रही थी। मैंने बेल्ट रखी और फिर से लंड उनके गांड में डाल दिया। सूजी हुई गांड में लंड घुसते ही आंटी की चीख निकल गई। मैंने कोई रहम नहीं किया। पूरे जोर से धक्के मारता रहा जब तक कि मेरा दूसरा वीर्य उनके गांड के अंदर न छूट गया।

सुबह होते-होते आंटी की हालत खराब हो चुकी थी। चलने में तकलीफ हो रही थी। गांड और चुत दोनों सूजकर लाल हो गए थे। गर्दन पर मेरे हाथों के निशान साफ थे। निप्पलों पर दाँतों के काटने के निशान थे। मैंने उन्हें नहलाया, कपड़े पहनाए और बाइक से स्टैंड तक छोड़ आया। जाने से पहले आंटी ने मेरे कान में कहा, “अगली बार चाबुक लाना… और लोहे की हथकड़ियाँ… मुझे और तोड़ना।”

उसके बाद हम लगभग हर हफ्ते मिलने लगे। हर मुलाकात पहले से ज्यादा क्रूर होती गई। कभी मैं आंटी को कुत्ते की तरह रस्सी से बाँधकर कमरे में घुमाता, कभी उनके मुँह में कपड़ा ठूंसकर गांड और चुत दोनों को बारी-बारी से फाड़ता। कभी उनकी चूचियों को रस्सी से बाँधकर लटका देता और नीचे से चोदता। आंटी हर बार और गिरी हुई, और गुलाम बनती चली गईं।

एक रात मैंने उन्हें पूरी तरह नंगा करके होटल की बालकनी में खड़ा कर दिया। रात के अँधेरे में। मैंने पीछे से उनकी गांड में लंड डाल रखा था और गर्दन पकड़कर रखा था। आंटी काँप रही थीं लेकिन विरोध नहीं कर रही थीं। मैंने उनके कान में कहा, “अगर कोई देख ले तो तुम्हें कस्बे में नंगी घुमाऊँगा।” आंटी ने सिर्फ हाँ में गुनगुनाया और अपनी गांड और पीछे धकेल दी।

हर मुलाकात के बाद आंटी घर लौटतीं तो विक्रम को बहाना बनातीं कि सहेली के घर गई थीं। उनकी चाल बदल गई थी। बैठने में तकलीफ होती थी। लेकिन वे मुझसे दूर नहीं हुईं। बल्कि हर बार और ज्यादा दर्द, और ज्यादा बेबसी माँगने लगीं।

अब जब भी मैं कस्बे में होता हूँ, आंटी का फोन आ ही जाता है। उनकी आवाज में वही भूख होती है। “आज रात… और ज्यादा तोड़ना… मुझे याद नहीं रहना चाहिए कि मैं इंसान हूँ।” और मैं जाता हूँ। रस्सियाँ, बेल्ट, थप्पड़, गर्दन दबाना, गांड फाड़ना… सब कुछ दोहराता हूँ। हर बार थोड़ा और आगे। आंटी की विशाल गांड अब मेरे हाथों की आदी हो चुकी है। उनके शरीर पर मेरे बनाए निशान कभी पूरी तरह गायब नहीं होते।

और यह सिलसिला अभी रुका नहीं है। हर नई रात के साथ आंटी थोड़ी और टूटती हैं, थोड़ी और मेरी हो जाती हैं। उनकी चीखें, उनका रोना, उनका गिड़ना… सब कुछ अब मेरी लत बन चुका है। और आंटी की लत बन चुकी है मेरे हाथों से टूटना।

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