गले की चेन वाली बहू

अन्या की भारी छातियाँ और मोटी गाँड़ देख ससुर विक्रम ने उसे रस्सी से बाँधा, स्तनों पर गर्म मोम टपकाया और दोनों छेदों को बारी-बारी फाड़ दिया। अब वह खुद चारों पैरों पर माँगती है और भी जोर की सजा।

अन्या की उम्र 28 साल थी। शादी हुए तीन साल हो चुके थे। उसका शरीर 38-28-40 का था—भारी भरी छातियाँ, पतली कमर और मोटी गोल गाँड़। लोग सड़क पर भी उसके शरीर को घूरते थे, लेकिन घर के अंदर जो भूख छिपी थी, वो और भी खतरनाक थी।
शादी दिल्ली के एक बड़े घर में हुई थी। पति अमित बहुत हैंडसम था, लंबा, चौड़े कंधे वाला। अन्या ने उसे देखते ही हाँ कह दी थी। लेकिन शादी के बाद भी उसके अंदर की वह पुरानी आग कभी पूरी तरह नहीं बुझी थी। बचपन से ही उसके शरीर ने पुरुषों को पागल बनाया था। और अब ससुर विक्रम सिंह… 55 साल के, पतले बदन, आधे बाल सफेद, चेहरे पर साधारण सी दाढ़ी, लेकिन आँखों में वह भूख जो छिप नहीं पाती थी।

विक्रम का छोटा सा ट्रांसपोर्ट बिजनेस था, जिसे अब अमित सँभालता था। सास सुनीता स्कूल की हेडमिस्ट्रेस थीं। घर में अक्सर अन्या और विक्रम अकेले रह जाते थे।
शादी के पहले साल में ही अन्या गर्भवती हो गई। अमित अक्सर बाहर रहता था। डॉक्टर के चक्कर विक्रम ही लगाते थे। कार में बैठते समय उनका हाथ उसकी जाँघ पर टिक जाता। अन्या चुप रहती। वह समझ गई थी। उसकी चूत पहले से ही गीली हो जाती जब विक्रम की नज़र उसकी छातियों पर ठहरती।

बेटा आरव पैदा हुआ। तब से अन्या का दूध भरा रहता। वह ढीले कुर्ते पहनती ताकि आसानी से दूध पिला सके। विक्रम अक्सर कमरे में घुस आता जब अन्या स्तनपान करा रही होती। उसकी नज़रें अन्या के झूलते स्तनों पर चिपक जातीं। अन्या जानबूझकर स्तन थोड़ा और बाहर निकाल देती। विक्रम का लंड पैंट में तन जाता। अन्या देखती और मुस्कुराती।

एक दोपहर अमित और सास दोनों ऑफिस चले गए। अन्या ने ब्रा उतार दी। हल्के गुलाबी रंग का ढीला कुर्ता पहना, जिसके अंदर स्तन स्वतंत्र थे। दूध की बूँदें कपड़े को गीला कर रही थीं। वह विक्रम के लिए चाय लेकर गई। विक्रम टीवी देख रहे थे। अन्या झुकी तो कुर्ता आगे झूल गया। विक्रम की आँखें उसकी क्लीवेज में घुस गईं।
“बहू… तुम्हारा दूध बहुत निकल रहा है,” विक्रम की आवाज़ भारी थी।
अन्या ने जवाब दिया, “बाबा… कोई नहीं पी रहा। अमित भी रात को थक जाते हैं।”

विक्रम का हाथ अपने लंड पर चला गया। अन्या ने देखा। उसने जानबूझकर कुर्ता और ऊपर खींच लिया। दोनों स्तन आधे बाहर आ गए। दूध की धारें टपकने लगीं। विक्रम उठ खड़े हुए।
अन्या कमरे में चली गई। दरवाजा आधा खुला छोड़ दिया। वह आरव को गोद में लेकर बिस्तर पर लेट गई और स्तन निकालकर दूध पिलाने लगी। थोड़ी देर बाद विक्रम दरवाजे पर खड़े थे। एक हाथ से पैंट के ऊपर से लंड सहला रहे थे। अन्या ने आँखें उन पर टिकाईं और दूसरे हाथ से अपनी साड़ी के अंदर उंगली घुसा दी। चूत पहले से गीली थी। वह उंगली अंदर-बाहर करने लगी। विक्रम का साँस तेज हो गया। वे जल्दी से चले गए।

अगले कई दिनों तक अन्या ने उन्हें और तड़पाया। कभी छत पर कपड़े सुखाते समय साड़ी का पल्लू गिरा देती, कभी बाथरूम से निकलते समय सिर्फ तौलिया लपेटे रहती। विक्रम की नज़रें हमेशा उसकी गाँड़ और स्तनों पर रहतीं।
फिर वह दिन आया। सुबह तेज बारिश हो रही थी। अमित और सास निकल चुके थे। अन्या छत पर गई कपड़े उतारने। बारिश में भीगते हुए उसने पीली साड़ी और ब्लाउज पहना था। पानी से दोनों पारदर्शी हो गए। स्तन साफ दिख रहे थे, निप्पल कड़े। उसने पैंटी भी नहीं पहनी थी। गाँड़ की दरार साड़ी में से उभर आई।

वह सीढ़ियों पर खड़ी होकर पानी से खेलने लगी। तभी विक्रम नीचे से ऊपर आ गए। उनकी आँखें अन्या के शरीर पर चिपक गईं।
“बहू… तुम पूरी गीली हो। अंदर आओ,” आवाज़ में हुक्म था।
अन्या नीचे आई। विक्रम ने तौलिया दिया, लेकिन अन्या ने तौलिया फेंक दिया और सीधे बाथरूम की तरफ बढ़ी। विक्रम पीछे-पीछे आ गए। जैसे ही अन्या बाथरूम में घुसी, विक्रम ने दरवाजा बंद कर दिया और पीछे से उसका ब्लाउज पकड़कर फाड़ दिया। कपड़ा चीरते हुए फटा। दोनों भारी स्तन बाहर निकल आए। दूध की धारें छलक पड़ीं।

विक्रम ने तुरंत दोनों स्तन पकड़ लिए और जोर से मसल दिए। अन्या की चीख निकल गई, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। विक्रम ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसने लगे। दूध उनके मुँह में भर गया। वे निगलते गए। दूसरे स्तन को हाथ से दबा-दबाकर दूध निकाल रहे थे। अन्या की कमर लचक गई।
“बाबा… जोर से… और जोर से चूसो,” अन्या ने कहा।

विक्रम ने उसे दीवार से सटा दिया। एक हाथ से उसका गला दबाया, दूसरे से स्तन मसलते रहे। अन्या की साँस रुकने लगी, लेकिन उसकी चूत और गीली हो गई। विक्रम ने उसकी साड़ी और पेटीकोट एक झटके में नीचे खींच दिए। अन्या पूरी नंगी खड़ी थी। पानी उसके शरीर से टपक रहा था।
विक्रम ने अपने कपड़े फाड़कर उतारे। उनका लंड मोटा, काला, नसों से भरा हुआ खड़ा था। उन्होंने अन्या के बाल पकड़े और घुटनों के बल बैठा दिया।
“मुँह खोल,” उन्होंने हुक्म दिया।

अन्या ने मुँह खोला। विक्रम ने अपना लंड उसके गले तक धकेल दिया। अन्या ने गैग किया, आँखों से आँसू निकले, लेकिन विक्रम ने उसके सिर को पकड़कर और अंदर ठेल दिया। वे उसके मुँह में जोर-जोर से धक्के मारने लगे। लंड गले में ठोक रहा था। अन्या की लार टपक रही थी, लेकिन वह चूसती रही।
थोड़ी देर बाद विक्रम ने उसे उठाया और बाथरूम की सिंक पर लिटा दिया। टाँगें फैला दीं। उन्होंने बिना किसी प्रस्तावना के अपना लंड उसकी गीली चूत में एक झटके में धकेल दिया। अन्या चीख उठी।

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“आह्ह… बाबा… इतना मोटा…”
विक्रम ने जवाब में उसके गाल पर थप्पड़ मारा। फिर दोनों स्तनों को पकड़कर जोर-जोर से दबाने लगे और उसी रफ्तार से धक्के मारने लगे। हर धक्के के साथ अन्या की गाँड़ सिंक से टकरा रही थी। कमरे में थप-थप की आवाज गूँज रही थी। विक्रम कभी उसके गले को दबाते, कभी बाल पकड़कर सिर पीछे खींचते।

अन्या चरम पर पहुँच गई। उसकी चूत सिकुड़कर विक्रम के लंड को जकड़ लिया। लेकिन विक्रम रुके नहीं। उन्होंने उसे पलटा और पेट के बल झुका दिया। अब उन्होंने उसकी गाँड़ के छेद पर थूक लगाया और अपना लंड वहाँ धकेलना शुरू किया।
अन्या चिल्लाई, “बाबा… नहीं… बहुत मोटा है…”
विक्रम ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से अंदर घुसते गए। अन्या की आँखें बंद हो गईं। दर्द और मजे का मिश्रण उसके शरीर में दौड़ रहा था। विक्रम पूरी तरह अंदर चले गए और फिर जोर-जोर से धक्के मारने लगे। एक हाथ से वे उसकी चूत में उंगलियाँ घुसाए हुए थे, दूसरे से स्तन मसल रहे थे।

अन्या फिर से झड़ गई। उसके शरीर में ऐंठन दौड़ गई। विक्रम ने भी उसी समय अपना पानी उसकी गाँड़ के अंदर छोड़ दिया। गर्म तरल अन्या के अंदर भर गया।
वे दोनों साँस लेते हुए वहीं रुके। फिर विक्रम ने उसे उठाया और बेडरूम में ले गए। आरव पास के पालने में सो रहा था। विक्रम ने अन्या को बिस्तर पर लिटाया और फिर से उसके ऊपर चढ़ गए। इस बार उन्होंने उसके दोनों हाथ ऊपर बाँध दिए पुरानी साड़ी से।
“आज तुम्हें पूरी तरह तोड़ूँगा,” विक्रम ने कहा।

उन्होंने फिर से लंड उसकी चूत में घुसाया। इस बार और भी क्रूर। हर धक्का इतना जोरदार था कि बिस्तर चरमरा रहा था। वे कभी उसके निप्पल काटते, कभी गर्दन पर दाँत गड़ाते। अन्या की चीखें दब रही थीं। विक्रम ने उसके मुँह में कपड़ा ठूंस दिया।
तीसरी बार जब विक्रम झड़े, तो उन्होंने अपना पानी अन्या के चेहरे पर छोड़ दिया। गर्म वीर्य उसके होंठों, आँखों और स्तनों पर लगा। अन्या ने जीभ निकालकर चाटा।

विक्रम उठे और कपड़े पहनने लगे। अन्या अभी भी हाथ बँधे लेटी थी, शरीर पर नीले निशान, चूत और गाँड़ दोनों से वीर्य रिस रहा था।
दोपहर में जब अन्या खाना लेकर गई, विक्रम ने उसकी तरफ देखा और कहा, “रात को अमित सो जाए तो नीचे आना। आज और बाकी है।”
अन्या ने सिर हिलाया। उसकी चूत अभी भी धड़क रही थी।

रात को अमित सो गया। अन्या धीरे से नीचे आई। विक्रम सोफे पर इंतजार कर रहे थे। उन्होंने अन्या को घुटनों के बल बिठाया और फिर से अपना लंड उसके मुँह में ठेल दिया। इस बार उन्होंने उसके बालों को दोनों हाथों से पकड़कर और भी गहराई तक धकेला। अन्या की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह चूसती रही।
फिर विक्रम ने उसे उठाकर दीवार से सटाया। एक टाँग ऊपर उठाई और खड़े-खड़े चोदने लगे। हर धक्के के साथ अन्या की पीठ दीवार से टकरा रही थी। विक्रम ने उसके गले को दबाया और फुसफुसाए, “तुम मेरी रंडी हो। समझी?”

अन्या ने हाँ में सिर हिलाया।
उस रात विक्रम ने उसे तीन बार और लिया—चूत में, गाँड़ में, मुँह में। आखिर में उन्होंने अन्या को फर्श पर लिटा दिया और उसके खुले मुँह में पानी छोड़ दिया। अन्या ने सब निगल लिया।
सुबह होने से पहले अन्या ऊपर चली गई। शरीर दर्द कर रहा था, लेकिन अंदर एक अजीब सी संतुष्टि थी।
अगले दिनों में यह सिलसिला जारी रहा। कभी बाथरूम में, कभी किचन में, कभी छत पर रात के अंधेरे में। विक्रम ने अन्या को पूरी तरह अपना बना लिया था। वे उसे बाँधते, थप्पड़ मारते, गला दबाते, और फिर प्यार से उसके स्तन चूसते। अन्या हर बार और माँगती।

एक शाम जब अमित देर से आने वाला था, विक्रम ने अन्या को अपने कमरे में बुलाया। वहाँ उन्होंने उसे चारपाई से बाँध दिया। आँखों पर पट्टी बाँधी। फिर घंटों तक उसके शरीर के हर हिस्से को चूसा, काटा, मसला। आखिर में उन्होंने अपना लंड उसकी चूत में डालकर इतनी देर तक धक्के मारे कि अन्या बेहोश होने के करीब पहुँच गई।
जब पट्टी हटी, तो विक्रम उसके ऊपर मुस्कुरा रहे थे।
“अब तुम कभी अमित से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाओगी,” उन्होंने कहा।

अन्या ने आँखें बंद कर लीं। वह जानती थी—यह सच है।
घर में सब सामान्य दिखता था। लेकिन दीवारों के पीछे, बाथरूम की बंद दरवाजों के पीछे, और रात के अंधेरे में… अन्या विक्रम की हो चुकी थी। पूरी तरह। क्रूरता से, भूख से, और उस अतृप्त आग से जो दोनों के अंदर जल रही थी।

अन्या की वह आग सच में कभी नहीं बुझी। अगले हफ्ते से विक्रम ने उसे और भी नीचे खींचना शुरू कर दिया। अब सिर्फ बाथरूम या बेडरूम काफी नहीं था। वे उसे घर के हर कोने में तोड़ना चाहते थे।

एक दोपहर अमित ऑफिस चला गया और सास मीटिंग में थीं। आरव पालने में सो रहा था। अन्या किचन में खाना बना रही थी। तभी विक्रम पीछे से आए और बिना कुछ कहे उसके बाल पकड़कर पीछे खींच दिए। अन्या की गर्दन झुक गई।

“आज तुम्हें रसोई में ही कुतिया बनाऊँगा,” विक्रम की आवाज़ ठंडी और कठोर थी।

उन्होंने अन्या का कुर्ता ऊपर से फाड़ दिया। स्तन बाहर निकल आए। विक्रम ने दोनों निप्पलों को पकड़कर इतनी जोर से मरोड़ा कि अन्या की आँखों से आँसू निकल आए। फिर उन्होंने उसे सिंक के किनारे झुका दिया। एक हाथ से उसका गला दबाया, दूसरे से उसकी लेगिंग्स नीचे खींच दीं। अन्या की चूत पहले से ही गीली थी। विक्रम ने दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं और जोर-जोर से धक्के मारने लगे।

“चूत इतनी गीली… तुम खुद माँग रही हो ना?”

अन्या ने हाँ में कराह भरी। विक्रम ने उंगलियाँ निकालकर उसके मुँह में ठूंस दीं। अन्या ने अपनी ही चूत का रस चाटा। फिर विक्रम ने अपना लंड निकाला और एक झटके में उसकी चूत में धकेल दिया। हर धक्का इतना तेज था कि अन्या की कमर सिंक से टकरा रही थी। बर्तन गिरने की आवाजें आने लगीं। विक्रम ने उसके बाल और जोर से पकड़े और सिर को पीछे खींचते हुए और गहराई तक ठोका।

अन्या झड़ गई। उसकी टाँगें काँपने लगीं। लेकिन विक्रम रुके नहीं। उन्होंने लंड निकालकर उसकी गाँड़ के छेद पर लगाया। बिना थूक के, बिना तैयारी के, जोर से धकेलना शुरू किया। अन्या चिल्लाई। दर्द से उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। विक्रम ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और धीरे-धीरे लेकिन पूरी ताकत से अंदर घुसते गए।

“सहो… आज तुम्हारी गाँड़ को फाड़ दूँगा।”

वे पूरे लंड तक अंदर चले गए और फिर बेतहाशा धक्के मारने लगे। अन्या की चीखें दबी हुई थीं। विक्रम ने एक हाथ से उसकी चूत मसलनी शुरू कर दी। उंगलियाँ क्लिट पर जोर-जोर से रगड़ रही थीं। दर्द और मजे का मिश्रण अन्या को पागल कर रहा था। थोड़ी देर में विक्रम ने अपना पानी उसकी गाँड़ के अंदर छोड़ दिया। गर्म तरल अंदर भर गया और बाहर रिसने लगा।

विक्रम ने लंड निकाला और अन्या को घुटनों के बल बिठा दिया।

“चाट… साफ कर।”

अन्या ने जीभ निकाली और विक्रम के लंड को चाटने लगी। गाँड़ का रस और वीर्य मिला हुआ था। विक्रम ने उसके सिर को पकड़कर गले तक ठेल दिया। अन्या की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन वह चूसती रही जब तक विक्रम संतुष्ट नहीं हो गए।

उस शाम अमित घर आया तो अन्या सामान्य दिखने की कोशिश कर रही थी। लेकिन उसकी चाल में दर्द साफ था। रात को जब अमित सो गया, विक्रम ने अन्या को नीचे बुलाया। इस बार वे तैयार थे। उन्होंने एक मोटी रस्सी, काला टेप और एक छोटा सा चमड़े का कोड़ा ला रखा था।

अन्या को देखकर विक्रम मुस्कुराए।

“आज पूरी रात तुम्हें तोड़ूँगा। चीख मत सकोगी।”

उन्होंने अन्या के हाथ पीछे बाँध दिए। आँखों पर टेप लगा दिया। फिर उसे सोफे पर पेट के बल लिटाया और टाँगें फैला दीं। कोड़े की पहली चोट उसकी नंगी गाँड़ पर पड़ी। अन्या ने दर्द से मुँह दबा लिया। दूसरी, तीसरी… गाँड़ लाल हो गई, जलने लगी। विक्रम बीच-बीच में उसके स्तनों को मरोड़ते, निप्पलों को दाँतों से काटते।

फिर उन्होंने एक मोटा लंड जैसा खिलौना निकाला जो घर में छिपा रखा था। उसे अन्या की चूत में धकेल दिया और वाइब्रेशन चालू कर दिया। अन्या की कमर उछलने लगी। विक्रम ने उसी समय अपना लंड उसकी गाँड़ में घुसाया। दोनों छेद भरे हुए थे। वे धक्के मारते रहे, कभी तेज, कभी धीमे, कभी रुककर सिर्फ अंदर दबाए रखते। अन्या कई बार झड़ चुकी थी, लेकिन विक्रम ने उसे रुकने नहीं दिया।

आखिर में विक्रम ने खिलौना निकालकर अपना लंड उसकी चूत में डाल दिया और इतनी जोर से चोदा कि अन्या की चीखें भी दब गईं। उन्होंने अपना पानी उसके गर्भ के अंदर छोड़ दिया। फिर लंड निकालकर उसके मुँह में ठेल दिया। अन्या ने सब कुछ चाट लिया।

सुबह होने से पहले विक्रम ने उसके बंधन खोले। अन्या का शरीर नीले-काले निशानों से भरा था। स्तनों पर दाँत के निशान, गाँड़ पर कोड़े के लाल निशान, चूत और गाँड़ दोनों सूजी हुईं।

“अब से हर दोपहर तुम तैयार रहोगी,” विक्रम ने कहा। “नहीं तो सजा और बढ़ेगी।”

अगले दिन अन्या ने खुद को तैयार किया। उसने सिर्फ एक पतली साड़ी पहनी, अंदर कुछ नहीं। दोपहर होते ही विक्रम आए। उन्होंने अन्या को छत पर ले जाया। धूप तेज थी। विक्रम ने उसे रेलिंग से बाँध दिया। हाथ ऊपर, टाँगें फैली हुई। फिर उन्होंने उसकी साड़ी फाड़ दी। अन्या पूरी नंगी धूप में खड़ी थी।

विक्रम ने उसके स्तनों पर गर्म मोम टपकाया जो उन्होंने पहले से पिघला रखा था। अन्या की चीख निकल गई। मोम स्तनों पर जमा हो गया, जलन हो रही थी। फिर विक्रम ने नीचे झुककर उसकी चूत चाटनी शुरू की। जीभ अंदर-बाहर, क्लिट पर जोर से चूसना। अन्या झड़ने के करीब पहुँची तो विक्रम रुक गए।

“माँग… रंडी की तरह माँग।”

अन्या ने काँपती आवाज़ में कहा, “बाबा… चोदो… जोर से चोदो… मेरी चूत फाड़ दो…”

विक्रम ने खड़े-खड़े उसका लंड अंदर धकेल दिया। हर धक्के के साथ अन्या की पीठ रेलिंग से टकरा रही थी। विक्रम ने उसके गले को दोनों हाथों से दबाया। अन्या की साँस रुकने लगी, चेहरा लाल हो गया, लेकिन चूत और जोर से सिकुड़ रही थी। विक्रम ने उसी समय अपना पानी अंदर छोड़ दिया।

वे उसे खोलकर नीचे लाए। अन्या की टाँगें काँप रही थीं। विक्रम ने उसे फर्श पर घुटनों के बल बिठाया और अपना लंड उसके मुँह में ठेल दिया। इस बार उन्होंने और गहराई तक धकेला। अन्या की लार फर्श पर गिर रही थी। विक्रम ने उसके बाल पकड़कर और जोर से ठोका जब तक उनका दूसरा पानी उसके गले में नहीं उतर गया।

रात को अमित के सोने के बाद विक्रम ने अन्या को अपने कमरे में बुलाया। इस बार उन्होंने एक चेन और कॉलर निकाला। कॉलर अन्या के गले में कस दिया। चेन पकड़कर उसे घसीटते हुए बिस्तर पर लाए।

“आज तुम मेरी कुतिया हो। चारों पैरों पर चलो।”

अन्या ने वैसा ही किया। विक्रम ने उसके पीछे से चोदा। एक हाथ से चेन खींचते, दूसरे से उसके स्तन मसलते। बीच-बीच में कोड़े से उसकी पीठ और गाँड़ पर मारते। अन्या की चीखें कमरे में गूँज रही थीं, लेकिन विक्रम ने उसकी सास और अमित के कमरे की तरफ कान लगाया और मुस्कुराए।

“चीख… कोई नहीं सुन रहा।”

उन्होंने अन्या को पलटा और उसके चेहरे पर बैठ गए। अन्या की जीभ पर अपना गाँड़ का छेद रगड़ने लगे।

“चाट… साफ कर।”

अन्या ने चाटा। विक्रम ने उसी समय अपना लंड उसके मुँह में ठेल दिया। दोनों तरफ से भरा हुआ। वे देर तक ऐसे ही रहे। फिर अन्या को बिस्तर पर लिटाकर उसके दोनों छेदों में बारी-बारी से चोदते रहे। कभी चूत, कभी गाँड़, कभी दोनों में उंगलियाँ। अन्या कई बार बेहोशी के करीब पहुँची। शरीर पसीने और वीर्य से लथपथ था।

सुबह चार बजे विक्रम ने उसे छोड़ा। अन्या मुश्किल से चल पा रही थी। उसने आईने में देखा—गले पर कॉलर के निशान, स्तनों पर मोम और दाँत के निशान, गाँड़ पर कोड़े के लाल निशान, जाँघों पर नीले निशान।

लेकिन उसकी आँखों में डर नहीं था। सिर्फ भूख थी। और भी ज्यादा की।

अगले दिनों में विक्रम ने सीमाएँ और आगे बढ़ा दीं। कभी वे अन्या को अमित के सामने ही छिपे-छिपे छूते, कभी रात को अमित के बगल में सोते हुए अन्या की चूत में उंगलियाँ घुसाए रखते। अन्या को मना करना सिखा दिया गया था। हर “ना” के बाद सजा दोगुनी हो जाती।

एक रात विक्रम ने अन्या को पूरी तरह बाँध दिया—हाथ, पैर, आँखें, मुँह। फिर घंटों तक उसके शरीर पर मोम टपकाते रहे, कोड़े मारते रहे, और बीच-बीच में लंड अंदर ठेलते रहे। अन्या सिर्फ कराह सकती थी। जब आखिर में बंधन खुले तो वह रो रही थी… लेकिन खुशी के आँसू थे।

विक्रम ने उसके बाल सहलाए और फुसफुसाए, “अब तुम कभी स्वतंत्र नहीं हो सकती। तुम मेरी हो। हमेशा के लिए।”

अन्या ने सिर उसके सीने पर रख दिया। शरीर दर्द कर रहा था, लेकिन अंदर एक अजीब सी शांति थी। वह जानती थी—यह आग अब दोनों को जलाएगी, और वे दोनों इसमें झुलसते हुए भी और गहराई तक डूबते जाएँगे।

घर की दीवारें अब सिर्फ ईंट और सीमेंट की नहीं थीं। वे अन्या की चीखों, विक्रम के हुक्मों, और उस क्रूर प्यार की गवाह थीं जो दिन-ब-दिन और खतरनाक होता जा रहा था।

और यह सिलसिला रुकने वाला नहीं था।

दोस्त की माँ

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साले की बीवी की कोख में बीज

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