कानपुर के पुराने मोहल्ले में सतीश ने अपनी बहू रीना को रस्सियों से जकड़कर रात-रात भर तोड़ा। पड़ोसन कविता गर्म मोम और धातु की रॉड से उसके शरीर को चीरती रही। दर्द में डूबी रीना अब सिर्फ ससुर की टूटी हुई संपत्ति बनकर रह गई।
सतीश शर्मा का नाम लखनऊ के किसी छोटे से मोहल्ले में शायद ही कोई जानता हो, लेकिन कानपुर के पुराने अनाज मंडी वाले इलाके में उनके बारे में लोग फुसफुसाते थे। सत्तावन साल की उम्र में भी उनका शरीर मजबूत था, बाजुओं में नसें उभरती थीं और आँखों में एक ऐसी भूख रहती थी जो कभी शांत नहीं होती। बीवी की मौत के बाद से उनके पास सिर्फ दो चीजें बची थीं—एक बेटा जो मोबाइल रिपेयर की छोटी सी दुकान चलाता था, और एक बहू जिसका नाम रीना था।
रीना की उम्र इक्कीस साल थी। शादी के दो साल बाद उसका बेटा हुआ, जो अभी चार साल का था। शादी के समय रीना पतली-दुबली थी, लेकिन बच्चे के जन्म के बाद उसका शरीर खिल उठा था। छाती छत्तीस की हो गई थी, कमर अट्ठाईस और गांड चालीस। साड़ी के नीचे से उसकी मोटी जांघें और गहरी नाभि साफ दिखती। मांग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र और ब्लाउज इतना ढीला कि जब भी वह झुकती, उसके दूध की गहरी दरार नजर आ जाती। सतीश रोज सुबह टहलने जाता तो मोहल्ले की कूड़ा उठाने वाली औरतों को सौ-दो सौ में चोद आता, लेकिन मन रीना पर ही अटका रहता। कई रातें वह अपने कमरे में लेटकर रीना के नाम की मुठ मारता, उसकी मोटी गांड और गीली चूत की कल्पना करता।
पड़ोस में एक औरत रहती थी—कविता। छत्तीस साल की, दो बच्चों की माँ, लेकिन शरीर ऐसा कि बीस साल की लड़की से कम नहीं। कविता मॉडर्न थी, जींस पहनती, बाल खुले रखती और हँसते हुए बात करती। उसका आना-जाना सतीश के घर में लगा रहता। रीना और कविता घंटों कमरे में बातें करतीं। सतीश को पता था कि दोनों चुदाई की बातें करती हैं। एक दोपहर वह दरवाजे पर कान लगाकर खड़ा हो गया।
रीना की आवाज आई, “भाभी, आजकल पति का मन ही नहीं लगता। हफ्ते में एक बार भी मुश्किल से होता है। बच्चे के बाद तो जैसे सब खत्म हो गया।”
कविता हँसी, “अरे रीना, मर्द जात घर की मुर्गी को दाल समझते हैं। बाहर के लंड के लिए तरसते हैं। तू भी कभी बैगन या बोतल से काम चला। मैं तो रोज करती हूँ। मोटा-मोटा अंदर जाता है तो लगता है कोई घोड़ा चोद रहा हो।”
रीना की साँस तेज हो गई, “मैंने कभी नहीं किया… डर लगता है।”
कविता फुसफुसाई, “डर छोड़। आज शाम को मेरे पास आ। मैं तुझे सिखाऊँगी। और सुन, तेरा ससुर तुझे रोज घूरता है। उसका लंड देख। बड़ा और काला होगा। अगर तू चाहे तो मैं व्यवस्था कर दूँ।”
सतीश का लंड पाजामे में तन गया। वह वहाँ से हट गया, लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कविता मदद करेगी।
शाम को छत पर सतीश खड़ा था। कविता अपनी छत से आई और पास आकर बोली, “अंकल, आज रात मेरे घर आना। रीना भी आएगी। कुछ खास होगा।”
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रात के ग्यारह बजे सतीश कविता के घर पहुँचा। दरवाजा खुला था। अंदर अंधेरा था, सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी। रीना चारपाई पर बैठी थी, साड़ी का पल्लू नीचे गिरा हुआ। कविता ने दरवाजा बंद किया और ताला लगा दिया।
कविता ने रीना का हाथ पकड़ा, “आज तू सिर्फ देखने वाली नहीं, भोगने वाली है।”
रीना का चेहरा लाल हो गया, लेकिन उसने मना नहीं किया। कविता ने उसकी साड़ी खींच दी। ब्लाउज के हुक खोलते ही रीना के मोटे दूध बाहर निकल आए। निप्पल कड़े थे, गहरे भूरे रंग के। कविता ने एक दूध मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। रीना कराह उठी। सतीश सामने खड़ा लंड सहला रहा था।
कविता ने रीना को चारपाई पर लिटा दिया। उसके हाथ-पैर रस्सी से बाँध दिए—हाथ सिर के ऊपर, पैर फैलाकर। रीना अब पूरी नंगी थी। चूत पर घने बाल थे, और बीच से हल्का पानी निकल रहा था। कविता ने एक मोटी मोमबत्ती ली और उसके ऊपर गर्म मोम टपकाया। रीना चीख पड़ी, “आह… जल रहा है!”
कविता हँसी, “जलने दो। दर्द में ही मजा है।” फिर उसने एक पतली बेंत निकाली और रीना की जांघों पर जोर-जोर से मारने लगी। लाल निशान पड़ गए। रीना रोने लगी, लेकिन उसकी चूत और गीली हो रही थी।
सतीश अब बर्दाश्त नहीं कर सका। उसने अपना लंड निकाला—मोटा, नसों वाला, सात इंच लंबा। कविता ने रीना का मुँह खोलकर सतीश का लंड अंदर ठूंस दिया। “चूस सालि… ससुर का लंड चूस।” रीना की आँखों में आँसू थे, लेकिन उसने मुँह खोल रखा था। सतीश ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदना शुरू कर दिया। लार बहने लगी, गला घरघरा रहा था।
कविता ने रीना की चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और जोर से फेंटने लगी। “देख अंकल, कितनी गीली है तेरी बहू। बच्चे के बाद भी तंग है।” फिर उसने एक मोटा बैगन लिया, तेल लगाया और रीना की गांड में धकेलने लगी। रीना चीखी, “नहीं… गांड फट जाएगी!” लेकिन कविता ने रुकने से मना कर दिया। बैगन आधा अंदर चला गया। रीना की आँखें फटी की फटी रह गईं।
सतीश ने लंड मुँह से निकाला और रीना की चूत पर रख दिया। एक झटके में पूरा अंदर धंस गया। रीना की चीख निकल गई। सतीश ने उसके मोटे दूध दबाए और जोर-जोर से ठोकरें मारने लगा। हर ठोकर पर रीना की गांड हिलती, चूत से पानी निकलता। कविता रीना के मुँह पर बैठ गई और अपनी चूत रगड़ने लगी। “चाट मेरी चूत… ससुर की बहू बनकर चाट।”
सतीश ने रीना को उल्टा कर दिया। अब वह कुत्ते की तरह थी—हाथ-पैर बंधे, गांड ऊपर। सतीश ने पहले चूत में फिर गांड में लंड घुसाया। गांड इतनी तंग थी कि लंड मुश्किल से जा रहा था। रीना रो रही थी, लेकिन उसकी चूत बार-बार पानी छोड़ रही थी। कविता ने एक छोटी चाबुक निकाली और रीना की पीठ पर मारने लगी। लाल धारियाँ पड़ गईं।
दो घंटे तक यह सिलसिला चला। सतीश ने रीना की चूत, गांड और मुँह तीनों जगह पानी छोड़ा। कविता ने रीना की चूत में मुँह लगाकर सतीश का पानी चाटा। रीना थककर पड़ी थी, शरीर पर निशान, आँखों में आँसू, लेकिन चेहरे पर एक अजीब संतुष्टि थी।
सुबह होने से पहले कविता ने रीना को नहलाया, कपड़े पहनाए और घर भेज दिया। सतीश को बोली, “अब यह रोज होगा। तेरी बहू अब तेरी रंडी है। जब चाहे चोद, जितना चाहे दर्द दे। मैं हमेशा मदद करूँगी।”
अगले दिन से घर का माहौल बदल गया। रीना सतीश के सामने साड़ी का पल्लू नहीं रखती। जब बेटा दुकान पर होता, सतीश रीना को रसोई में पकड़ लेता। कभी उसे सिंक पर झुकाकर चोदता, कभी चारपाई पर बाँधकर चाबुक से मारता। कविता अक्सर आती और दोनों मिलकर रीना को बर्बर तरीके से भोगतीं। कभी रीना के दूध में मिर्च रगड़ दी जाती, कभी उसकी चूत में बर्फ के टुकड़े ठूंस दिए जाते। रीना चीखती, रोती, लेकिन मना कभी नहीं करती। उसकी आँखों में अब डर के साथ वासना भी थी।
एक रात सतीश ने रीना को पूरी तरह नंगा करके छत पर ले गया। ठंडी हवा में उसके शरीर पर रोंगटे खड़े थे। कविता ने उसके हाथ पीठ के पीछे बाँधे और गर्दन में रस्सी डाल दी। सतीश ने पीछे से गांड में लंड घुसाया और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के पर रीना की गर्दन की रस्सी कस जाती। साँस फूल रही थी, चेहरा लाल हो रहा था। कविता उसके सामने बैठी अपनी चूत फेंट रही थी। “मार इसे… और जोर से मार। यह तेरी जायदाद है।”
सतीश ने आखिरी पानी रीना की गांड में छोड़ा। रीना ढेर हो गई। कविता ने उसे गोद में उठाया और धीरे से सहलाया, “अब तू पूरी तरह हमारी है। ससुर की रंडी, पड़ोसन की गुलाम।”
इसके बाद के दिनों में रीना का जीवन बदल गया। दिन में वह सामान्य बहू बनकर रहती—खाना बनाती, बच्चे को संभालती, साड़ी पहनती। लेकिन रात होते ही वह सतीश और कविता की बंधी हुई गुलाम बन जाती। कभी उसे घंटों बाँधकर रखा जाता, कभी उसके शरीर पर मोमबत्ती का गर्म मोम टपकाया जाता, कभी उसकी चूत में तरह-तरह की सब्जियाँ घुसाई जातीं। सतीश का लंड अब सिर्फ रीना की चूत और गांड में ही शांत होता। कविता मजे लेती देखती और कभी-कभी खुद भी शामिल हो जाती।
एक दिन बेटा अचानक घर आ गया जब सतीश रीना को रसोई में चोद रहा था। रीना की साड़ी कमर तक उठी हुई थी, सतीश पीछे से धक्के मार रहा था। बेटा दरवाजे पर खड़ा रह गया। सतीश रुका नहीं। उसने बेटे की तरफ देखा और बोला, “यह अब मेरी है। तू सिर्फ नाम का पति है।” बेटा कुछ नहीं बोला। वह धीरे से चला गया। उस रात से घर में एक अजीब शांति छा गई। रीना अब खुलकर सतीश के पास आती। कविता हर हफ्ते नई-नई यातनाएँ लेकर आती।
महिनों बीत गए। रीना का शरीर निशानों से भरा रहता। लेकिन उसकी आँखों में अब सिर्फ समर्पण था। सतीश शाम को छत पर खड़ा होकर मुस्कुराता। उसकी भूख अब कभी शांत नहीं होती थी, क्योंकि उसके पास एक ऐसी बहू थी जो दर्द में भी पानी छोड़ती थी, और एक पड़ोसन जो इस खेल को और क्रूर बनाती रहती थी।
रात के अंधेरे में चीखें थम गईं तो सतीश ने रीना को रस्सियों से खोलकर अपने बिस्तर पर फेंक दिया। उसका शरीर पसीने और वीर्य से चमक रहा था, पीठ पर चाबुक के लाल निशान और गांड में अभी भी सतीश का गाढ़ा पानी रिस रहा था। कविता ने धीरे से दरवाजा खोला और अंदर घुस आई। उसके हाथ में एक काला चमड़े का थैला था।
“आज रात खास है,” कविता ने फुसफुसाया, “तेरी बहू अब सिर्फ चोदी जाने वाली नहीं, टूटी हुई गुलाम बनेगी।”
रीना की आँखें डर से फैल गईं, लेकिन उसने कोई शब्द नहीं कहा। सतीश ने उसे बालों से खींचकर फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। कविता ने थैले से मोटी लोहे की हथकड़ियाँ निकालीं और रीना के दोनों हाथ पीठ के पीछे जकड़ दिए। फिर उसकी गर्दन में एक चौड़ा चमड़े का कॉलर कस दिया, जिसमें एक लंबी चेन लगी थी। चेन का दूसरा सिरा छत के हुक से बाँध दिया गया। अब रीना का सिर ऊपर उठा रहता, साँस लेना भी मुश्किल हो रहा था।
कविता ने रीना के मुँह में एक बड़ा रबर का गैग ठूंस दिया। लार बहने लगी। सतीश ने अपनी पैंट उतारी। उसका लंड फिर से तन चुका था—काला, नसों से भरा, आगे से पानी टपकता हुआ। उसने रीना की जांघें फैलाईं और बिना किसी तैयारी के गांड में पूरा लंड एक झटके में धकेल दिया। रीना की चीख गैग में दब गई। आँखों से आँसू बहने लगे। सतीश ने उसके कूल्हे पकड़कर इतनी जोर से ठोकरें मारीं कि रीना का पूरा शरीर हिल रहा था, चेन खनक रही थी।
कविता ने एक पतली धातु की रॉड निकाली—ठंडी और चमकदार। उसने रीना की चूत के होठों को फैलाया और रॉड को धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगी। रीना तड़पने लगी। रॉड चूत की दीवारों को खुरच रही थी। कविता ने रॉड को घुमाते हुए और अंदर धकेला, फिर अचानक बाहर खींच लिया और रीना की गांड के छेद में घुसा दिया, जहाँ सतीश का लंड पहले से था। दो चीजें एक साथ अंदर। रीना का शरीर ऐंठ गया। दर्द इतना था कि उसकी जांघें काँपने लगीं।
सतीश ने लंड बाहर निकाला और कविता की तरफ देखा। कविता मुस्कुराई और रीना को उल्टा कर दिया—अब वह सिर के बल झुकी हुई थी, गांड ऊपर, चेन गर्दन को और कस रही थी। सतीश ने फिर से गांड में प्रवेश किया, इस बार और गहरा। हर धक्के के साथ रीना की साँस रुक रही थी। कविता ने एक मोटी मोमबत्ती जलाई और उसके ऊपर गर्म मोम टपकाने लगी—पहले पीठ पर, फिर गांड के गोल मांस पर, फिर चूत के बालों पर। मोम चिपक जाता, ठंडा होता, फिर नया गर्म मोम गिरता। रीना की चीखें गैग के बावजूद घर में गूँज रही थीं।
दो घंटे तक यही चलता रहा। सतीश ने तीन बार पानी छोड़ा—एक बार गांड में, एक बार मुँह में गैग हटाकर, और आखिरी बार चेहरे पर। कविता ने रीना की चूत में अपनी पूरी मुट्ठी घुसा दी। उंगलियाँ मुड़ी हुई, कलाई तक अंदर। रीना का पेट फूल गया। कविता ने मुट्ठी घुमाई, अंदर-बाहर किया। खून की कुछ बूँदें निकलीं, लेकिन कविता रुकी नहीं। “यह चूत अब सिर्फ दर्द के लिए है,” उसने कहा।
सुबह होते-होते रीना बेहोश हो चुकी थी। सतीश ने उसे बिस्तर पर लिटाया। कविता ने उसके शरीर को गीले कपड़े से पोंछा, लेकिन निशान नहीं मिटे। पीठ पर चाबुक की धारियाँ, गांड पर मोम के सफेद धब्बे, चूत सूजी हुई और लाल। गर्दन पर कॉलर का निशान गहरा था।
अगले तीन दिन रीना बिस्तर से नहीं उठी। बेटा पूछता तो सतीश कह देता कि बुखार है। रात को कविता आती और नए उपकरण लाती। एक रात उसने रीना के निप्पलों पर क्लैंप लगा दिए—धातु के दांत वाले। चेन से खींचती तो निप्पल खिंच जाते, दर्द से रीना की आँखें फट जातीं। सतीश उस दौरान उसकी गांड में मोटी बोतल घुसाए रखता। बोतल के मुँह से पानी भर-भर कर अंदर छोड़ता, फिर बाहर निकालकर फिर घुसाता। रीना का पेट फूल जाता, पानी चूत और गांड दोनों से रिसता।
एक रात सतीश ने फैसला किया कि अब और आगे बढ़ना है। उसने रीना को पूरी तरह नंगा करके घर के आँगन में ले गया। ठंडी रात थी। कविता ने उसकी हाथ-पैर चारों कोनों से बाँध दिए—फैलाकर, जैसे कोई जानवर। फिर उसने एक लंबी बेंत ली और रीना की जांघों, गांड, पीठ पर बेरहमी से मारने लगी। हर प्रहार पर मांस काँपता, लाल निशान गहरे होते। सतीश उसके मुँह में लंड ठूंसकर खड़ा था, बाल पकड़े हुए। जब बेंत लगती तो रीना का मुँह सतीश के लंड पर और जोर से बंद हो जाता।
कविता ने बेंत फेंकी और एक बिजली का वायर निकाला। हल्की करंट वाली मशीन। उसने वायर के सिरे रीना की चूत के होठों से छुआए। शरीर उछल पड़ा। फिर निप्पलों पर, फिर गांड के छेद पर। रीना की चीखें आँगन में गूँज रही थीं, लेकिन मोहल्ला सोया हुआ था। सतीश ने करंट के दौरान ही उसकी चूत में प्रवेश किया। हर झटके के साथ चूत सिकुड़ती, लंड को और कसकर पकड़ती। सतीश पागलों की तरह धक्के मार रहा था। आखिर में उसने पानी रीना के गर्भ में ही छोड़ दिया, इतना गहरा कि लगता था बच्चेदानी तक पहुँच गया हो।
कविता ने रीना को खोला तो वह फर्श पर ढेर हो गई। शरीर काँप रहा था, आँखें खुली हुई लेकिन दृष्टि खोई हुई। कविता ने उसके बाल सहलाते हुए कहा, “अब तू पूरी तरह टूट चुकी है। ससुर की रंडी, मेरी गुलाम। जब चाहें चोदें, जब चाहें तोड़ें।”
उस रात के बाद रीना का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। दिन में वह चुपचाप घर का काम करती, लेकिन सतीश की नजर पड़ते ही घुटनों के बल बैठ जाती। बेटा कुछ दिनों बाद घर छोड़कर शहर के दूसरे छोर पर शिफ्ट हो गया। उसने कुछ नहीं कहा, सिर्फ सामान उठाकर चला गया। रीना ने उसे जाते हुए देखा, लेकिन आँखें नहीं मिलाईं।
अब घर सिर्फ तीन लोगों का रह गया था—सतीश, रीना और अक्सर आने वाली कविता। हर रात नया खेल होता। कभी रीना को घंटों उल्टा लटकाया जाता, खून सिर में उतर आता। कभी उसकी चूत में बर्फ के बड़े टुकड़े ठूंसकर छोड़ दिया जाता, जब तक कि वह चीख-चीखकर माफी नहीं माँगती। कभी सतीश और कविता दोनों एक साथ उसमें प्रवेश करते—एक चूत में, एक गांड में। रीना का शरीर फटने के कगार पर होता, लेकिन वे रुकते नहीं।
एक रात कविता ने एक नया विचार दिया। उसने रीना को बाँधकर रख दिया और उसके सामने एक आईना रख दिया। “देख अपनी हालत,” उसने कहा। रीना ने आईने में देखा—सूजी हुई चूत, फटी हुई गांड, निप्पलों पर घाव, गर्दन पर स्थायी निशान। सतीश पीछे से आया और फिर से उसमें घुस गया। आईने में रीना अपनी ही बर्बादी देखती रही, जबकि सतीश उसके अंदर पानी छोड़ता रहा।
महिनों बीत गए। रीना अब बोलती कम थी। उसकी आँखों में सिर्फ खालीपन था। लेकिन जब सतीश लंड निकालता या कविता चाबुक उठाती, तो उसकी चूत अपने आप गीली हो जाती। दर्द उसकी जरूरत बन चुका था। सतीश शाम को आँगन में बैठकर चाय पीता और मुस्कुराता। उसकी बहू अब पूरी तरह उसकी थी—शरीर, आत्मा, दर्द, सब कुछ।
और रात के अंधेरे में जब फिर से चीखें गूँजतीं, तो दीवारें चुपचाप सुनती रहतीं। क्योंकि कुछ कहानियाँ इतनी क्रूर होती हैं कि उन्हें सिर्फ अंधेरा ही रख सकता है।