मौसी की टूटी हुई रातें

नदी किनारे बंगले में अकेली मौसी की भूख जाग उठी। भतीजे ने उसके शरीर को रस्सियों में जकड़कर, गला दबाकर, आँखों में आँसू भरकर अपनी मर्जी से तोड़ा। हर चीख के साथ वो और गहराई तक उसकी हो गई।

मेरा नाम आदित्य है। उम्र 22 साल। शरीर कसा हुआ, कंधे चौड़े, और लंड की साइज़ 8.5 इंच जब पूरी तरह खड़ा हो जाता है। मोटाई भी अच्छी-खासी। कॉलेज खत्म करके घर वापस आया था। परिवार छोटा था—माँ-बाप विदेश में रहते थे काम के सिलसिले में, और मैं अकेला उस पुराने बंगले में रहता था जो शहर के बाहरी इलाके में, नदी के किनारे, घने पेड़ों के बीच छिपा हुआ था। पास ही एक और घर था—वहाँ रहती थीं मेरी मौसी, कविता। उम्र 38 साल। शरीर 38-28-40 का। कमर पतली, जाँघें मोटी, स्तन भारी और लटकते हुए, निप्पल बड़े-बड़े काले। चेहरा तीखा, आँखें गहरी, और जब वो साड़ी या नाइटी पहनती थीं तो हर पुरुष की नज़र उनके ऊपर ठहर जाती।

उनके पति—मेरे मौसा—अक्सर महीने-दो महीने के लिए बाहर रहते थे व्यापार के काम से। घर में सिर्फ वो और उनकी 19 साल की बेटी रहती थी, जो ज्यादातर हॉस्टल में ही रहती थी। तो मौसी अक्सर अकेली पड़ जातीं।
मैंने कई बार देखा था। रात को उनके बेडरूम की खिड़की से रोशनी आती थी। कभी-कभी हल्की कराहें। एक बार मैं चुपके से गया था। दरवाज़ा अधखुला था। वो बिस्तर पर लेटी थीं, पैर फैलाए, और एक मोटा काला डildo उनकी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। दूसरे हाथ से वो अपने निप्पल को इतनी जोर से मरोड़ रही थीं कि आँखों में आँसू आ गए थे। मैंने उस दिन अपना लंड बाहर निकाला और वहीं खड़े-खड़े झड़ गया। उनके शरीर की भूख ने मुझे पागल बना दिया था।

एक शाम मौसा फिर निकल गए। तीन हफ्ते के लिए। मौसी ने मुझे फोन किया—“आदित्य, रात को यहाँ सो जा। अकेला घर अच्छा नहीं लगता।” मैं गया। बंगला अँधेरा था। सिर्फ लिविंग रूम में एक दीपक जल रहा था। मौसी नाइटी में थीं—पतली काली नाइटी, जिसके अंदर कुछ नहीं। स्तन साफ दिख रहे थे। निप्पल नाइटी से चिपककर बाहर को धकेल रहे थे।
हमने खाना खाया। शराब पी। वो मेरे पास बैठकर बातें करने लगीं। उनकी जाँघ मेरी जाँघ से छू रही थी। मैंने जानबूझकर अपना हाथ उनकी जाँघ पर रखा। उन्होंने हटाया नहीं। बल्कि थोड़ा और पास खिसक आईं।

रात गहरी हुई। हम दोनों एक ही कमरे में सोने वाले थे—बड़े डबल बेड पर। मौसी ने लाइट बंद कर दी। अँधेरे में सिर्फ साँसें चल रही थीं। मैं लेटा था। अचानक उनके हाथ ने मेरे लंड को पकड़ लिया। नाइटी के ऊपर से। वो सख्त हो चुका था। उन्होंने धीरे-धीरे सहलाया, फिर नीचे खिसकाकर सीधे त्वचा पर हाथ रखा।“इतना बड़ा… और इतना गरम…” उन्होंने फुसफुसाया।

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मैंने उनका हाथ पकड़कर और जोर से दबवाया। फिर पलटकर उनके ऊपर चढ़ गया। नाइटी को ऊपर खींचा। उनके भारी स्तन बाहर निकल आए। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया और दाँतों से काटा। उन्होंने कराहते हुए मेरे बाल पकड़ लिए। मैंने दूसरे स्तन को भी उतनी ही क्रूरता से चूसा, निप्पल को खींचा, दाँतों के निशान छोड़ दिए। उनके स्तनों पर लाल निशान पड़ गए।

फिर मैं नीचे गया। उनकी जाँघें फैलाईं। चूत पहले से गीली थी। मैंने जीभ अंदर डाल दी। उन्होंने मेरा सिर अपनी जाँघों के बीच दबा लिया। मैंने क्लिट को दाँतों से हल्के-हल्के काटा, फिर जोर से चूसा। उनकी कमर उछलने लगी। दो बार झड़ने के बाद भी मैं रुका नहीं। तीसरी बार जब वो काँप रही थीं, तब मैंने दो उंगलियाँ अंदर डाल दीं और जीभ से क्लिट को बेरहमी से चाटा। वो चीखने लगीं—लेकिन आवाज़ दबाकर।
फिर मैं उठा। लंड उनके मुँह के सामने ले गया। “खोल।”

उन्होंने मुँह खोला। मैंने पूरा लंड एक झटके में उनके गले तक धकेल दिया। उन्होंने गैग किया, आँखों से पानी आने लगा, लेकिन मैंने उनके बाल पकड़कर और अंदर ठेल दिया। गले की दीवारें मेरे लंड को कस रही थीं। मैंने जोर-जोर से धकेले। थूक उनके गालों से बहने लगा। जब मैं बाहर निकाला तो वो हाँफ रही थीं, ठुड्डी पर लार टपक रही थी।
मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया। हाथ पीछे बांध दिए—बिस्तर के किनारे पड़ी उनकी साड़ी की पल्लू से। पैर फैलाए। चूत और गांड दोनों खुली थीं। मैंने पहले चूत में लंड धकेला। एक ही धक्के में पूरा अंदर। उन्होंने दर्द से चीखी। मैं रुका नहीं। जोर-जोर से पेलने लगा। हर धक्के पर उनके स्तन बिस्तर से रगड़ खा रहे थे। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।

“चिल्ला… जितना चिल्लाना है चिल्ला। यहाँ कोई सुनने वाला नहीं।”
वो चिल्लाने लगीं। दर्द और मजे की मिली-जुली आवाजें। मैंने उनकी गांड पर जोर-जोर से थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। फिर अचानक लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा। थूक लगाकर एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया। उनकी आँखों से आँसू निकल आए। शरीर तन गया। मैंने और जोर लगाया। पूरा लंड उनकी गांड में समा गया। उन्होंने बिस्तर को नखों से नोच लिया।

मैंने गांड में ही पेलना शुरू किया। हर धक्का गहरा। उनकी चूत से पानी रिस रहा था, जाँघों तक बह रहा था। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनकी चूत में तीन उंगलियाँ डाल दीं। गांड और चूत दोनों एक साथ भर गईं। वो पागलों की तरह काँप रही थीं। एक के बाद एक ऑर्गेज्म आने लगे। शरीर ऐंठ रहा था, लेकिन मैंने रस्सी कस दी थी। भाग नहीं सकती थीं।

जब मैं झड़ने वाला था तो लंड निकालकर उनके मुँह में ठेल दिया। पूरा वीर्य उनके गले में उतार दिया। उन्होंने निगल लिया। कुछ बाहर गिरने पर मैंने उनकी जीभ से चाटवाया।
रात अभी खत्म नहीं हुई थी। मैंने उन्हें बांधकर रखा। कमरे में एक कैंडल स्टैंड था। मैंने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उनकी पीठ पर टपकाया। उन्होंने चीख निकाली। फिर स्तनों पर। निप्पलों पर। मोम जम गया। मैंने उंगली से खुरचकर हटाया और फिर से टपकाया। उनके शरीर पर लाल जलन के निशान पड़ गए।

फिर मैंने उनकी चूत में फिर से लंड डाल दिया। इस बार और क्रूर। हर धक्के पर उनके कूल्हे पर थप्पड़। बाल खींचना। गर्दन दबाना। जब साँस फूलने लगती तो छोड़ देता, फिर से दबा देता। उनकी आँखें पलटी जा रही थीं। मजा और दर्द एक हो गए थे।
सुबह तक मैंने उन्हें छह बार झाड़ा। चूत, गांड, मुँह—सब जगह। उनका शरीर नीला-लाल हो चुका था। जाँघों के अंदर खरोंचें। गर्दन पर उंगलियों के निशान। स्तनों पर दाँतों के निशान। वो बोल नहीं पा रही थीं। सिर्फ हाँफ रही थीं।

मैंने रस्सी खोली। उन्हें बाथरूम में ले गया। शॉवर के नीचे खड़ा किया। ठंडा पानी उनके जलते शरीर पर गिरा। मैंने पीछे से फिर से गांड में लंड डाल दिया। पानी के नीचे पेलते हुए उनके बाल पकड़े और कान में कहा—“अब से जब भी मौसा जाएँगे, तुम मुझे फोन करना। और हर बार इससे भी ज्यादा सहना पड़ेगा।”
उन्होंने सिर्फ सिर हिलाया। आँखों में डर और चाहत दोनों थे।

उस दिन के बाद सब बदल गया। हफ्ते में तीन-चार बार मैं उनके घर पहुँच जाता। कभी रात को, कभी दोपहर में जब कोई नहीं होता। एक बार मैंने उन्हें रसोई में ही चोदा—सिंक पर झुकाकर। एक बार छत पर, खुले आसमान के नीचे, जहाँ उनकी चीखें हवा में उड़ गईं। एक बार मैंने उनके हाथ-पैर बिस्तर से बांधकर पूरा दिन रखा। बीच-बीच में आकर चूत चाटता, लंड चुसाता, फिर चला जाता। वो प्यासी रह जातीं।
एक रात मैंने एक चमड़े का बेल्ट लिया। उनकी गांड पर इतनी मार की कि बैठ नहीं पाईं दो दिन तक। फिर उसी जलन भरी गांड में लंड डालकर पेलता रहा जब तक वो रोने नहीं लगीं। लेकिन रोते हुए भी उनकी चूत पानी छोड़ रही थी।

अब तो वो खुद मांगने लगी हैं। कभी फोन पर—“आज रात आ जा। आज और सख्त करना।” कभी मेरे लिए नई चीजें लाती हैं—हथकड़ियाँ, अंधी पट्टी, मोटी मोमबत्तियाँ, यहाँ तक कि एक छोटी सी चाबुक भी।
हम दोनों जानते हैं कि यह गलत है। लेकिन जब मेरा लंड उनकी गांड में होता है और वो मेरे नाम से चीख रही होती हैं, तब कोई रिश्ता याद नहीं रहता। सिर्फ शरीर रह जाता है—भूखा, क्रूर, और बेकाबू।
और हर बार जब मैं उनके शरीर पर नए निशान छोड़कर जाता हूँ, तो वो मुस्कुराती हैं। थकी हुई, टूटी हुई, लेकिन संतुष्ट।
वह सिलसिला सिर्फ जारी नहीं रहा। वह और गहरा, और काला, और निर्दयी होता चला गया।

तीसरे महीने की शुरुआत में मौसा फिर तीन हफ्ते के लिए दुबई चले गए। कविता ने खुद फोन किया। आवाज़ में पहले जैसी हिचकिचाहट नहीं थी। सिर्फ भूख थी।
“आज रात आ जा। और इस बार कुछ नया लेकर आ।”
मैं गया। हाथ में एक काला बैग था। अंदर चमड़े की हथकड़ियाँ, एक मोटी चमड़े की चाबुक, अंधी पट्टी, दो मोटी मोमबत्तियाँ, और एक स्टील का छोटा क्लैंप सेट। बंगले का दरवाज़ा खुलते ही वो नाइटी में खड़ी थी। नाइटी के नीचे कुछ नहीं। स्तन पहले से ही लाल थे—जैसे खुद को पहले से तैयार कर लिया हो।

मैंने बिना एक शब्द कहे उसके बाल पकड़े और लिविंग रूम के बीचोबीच घसीटते हुए ले गया। फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। अंधी पट्टी बाँधी। फिर दोनों हाथ पीछे हथकड़ी लगा दी। इतनी कसकर कि कलाईयाँ तुरंत लाल हो गईं।
“आज तुम्हारी इजाजत की जरूरत नहीं।” मैंने कहा और चाबुक निकाली।

पहला वार उनकी जाँघ पर पड़ा। आवाज़ तेज थी। उन्होंने मुँह दबा लिया। दूसरा वार गांड पर। तीसरा फिर जाँघ पर। हर वार के बाद मैं उनके बाल खींचकर सिर ऊपर उठाता और पूछता—“और चाहिए?”
वो सिर हिलातीं। आँसू अंधी पट्टी के नीचे से बह रहे थे, लेकिन चूत से पानी टपक रहा था। फर्श पर छोटे-छोटे धब्बे पड़ गए थे।
मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया। पैर चौड़े किए। चाबुक से उनकी खुली चूत पर दो वार किए। उन्होंने जोर से चीखी। क्लिट सूज गई। मैंने झुककर जीभ से चाटा—नमक और खून का हल्का स्वाद। फिर अचानक लंड निकालकर एक झटके में चूत में धकेल दिया। पूरा 8.5 इंच। उन्होंने बिस्तर नहीं, फर्श को नखों से नोचा। हथकड़ियाँ खनकने लगीं।

मैंने पेलना शुरू किया। हर धक्का इतना जोरदार कि उनके स्तन फर्श से रगड़ खा-खाकर और लाल हो गए। मैंने एक हाथ उनके गले पर रख दिया। साँस रोक दी। दस सेकंड। बीस सेकंड। जब उनका शरीर ऐंठने लगा तब छोड़ा। उन्होंने हवा के लिए हाँफा और उसी पल मैंने फिर से गला दबा दिया। इस बार और देर तक। उनकी चूत मेरे लंड को पागलों की तरह कस रही थी।

जब मैंने लंड निकाला तो वो पूरी तरह खोल चुकी थीं। पानी उनकी जाँघों से होते हुए फर्श तक बह रहा था। मैंने उन्हें घुटनों के बल बैठाया और लंड उनके मुँह में ठेल दिया। गले तक। उन्होंने गैग किया। आँखों से पानी की धारें। मैंने उनके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से हिलाया। लंड गले की दीवार से रगड़ खा रहा था। थूक उनके सीने पर गिर रहा था। जब मैंने बाहर निकाला तो वो खाँस रही थीं, लेकिन मुँह खुला रखे हुए थीं—और मांग रही थीं।

मैंने मोमबत्ती जलाई। पहले उनकी पीठ पर गर्म मोम टपकाया। फिर कंधों पर। फिर स्तनों पर। निप्पल पर जब मोम गिरा तो उन्होंने जोर से चीखा। मोम जम गया। मैंने उंगली से खुरचकर हटाया और तुरंत क्लैंप लगा दिए। दोनों निप्पलों पर। चेन से जोड़ दिया। हल्के से खींचा तो उनके शरीर में करंट जैसा दौड़ गया।
फिर मैंने उन्हें उठाया और बेडरूम में ले गया। बिस्तर के चारों कोनों से रस्सियाँ बाँध दीं। हाथ और पैर पूरी तरह फैला दिए। बिल्कुल क्रॉस बना दिया। चूत और गांड दोनों हवा में खुली थीं। मैंने पहले गांड में उंगली डाली। फिर दो। फिर तीन। उन्होंने दर्द से सिर इधर-उधर हिलाया। मैंने चौथी उंगली भी ठेल दी। फिर लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा।

थूक लगाए बिना एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया। उनकी चीख घर में गूँज गई। मैं रुका नहीं। और अंदर। पूरा। उनकी गांड मेरे लंड को निगल रही थी। मैंने पेलना शुरू किया—धीमे नहीं, जानवरों की तरह। हर धक्के पर क्लैंप वाली चेन हिलती और निप्पल और खिंचते। उनके आँसू बिस्तर गीला कर रहे थे।

बीच में मैंने लंड निकाला और उनकी चूत में डाल दिया। फिर वापस गांड में। फिर चूत में। बारी-बारी। दोनों छेद एक जैसे ढीले और लाल हो गए थे। मैंने उनकी चूत में पूरा हाथ घुसाने की कोशिश की। चार उंगलियाँ अंदर चली गईं। उन्होंने पागलों की तरह काँपना शुरू कर दिया। ऑर्गेज्म एक के बाद एक आने लगे। शरीर ऐंठ रहा था लेकिन रस्सियाँ कसने नहीं दे रही थीं।

जब मैं झड़ने वाला था तो लंड निकालकर उनके चेहरे पर खड़ा हो गया। अंधी पट्टी हटाई। उनकी आँखों में देखता हुआ पूरा वीर्य उनके मुँह, नाक, आँखों पर उड़ेल दिया। उन्होंने जीभ बाहर निकालकर चाटा। जो गिरा था उसे उंगली से उठाकर मुँह में डाल लिया।
रात अभी बाकी थी। मैंने रस्सियाँ थोड़ी ढीली कीं लेकिन हथकड़ियाँ नहीं खोलीं। उन्हें बाथरूम में घसीट लिया। शॉवर खोला। ठंडा पानी। उनके जलते निप्पलों और लाल गांड पर पानी गिरा। मैंने पीछे से फिर से गांड में लंड डाल दिया। पानी के नीचे पेलते हुए उनके बाल पकड़े और सिर दीवार से सटा दिया।

“अब से हर रात यही होगा। जब तक मौसा वापस नहीं आते। और अगर तुमने मना किया तो चाबुक से ज्यादा कुछ लगेगा।”
उन्होंने सिर्फ गर्दन हिलाई। आवाज़ नहीं निकल रही थी।
सुबह चार बजे तक मैंने उन्हें गिनती के हिसाब से नौ बार झाड़ा। तीन बार चूत में, चार बार गांड में, बाकी मुँह में। उनका शरीर अब पहचान में नहीं आ रहा था। जाँघों के अंदर खरोंचें, गर्दन पर उंगलियों के गहरे निशान, स्तनों पर मोम और क्लैंप के लाल दाग, गांड पर चाबुक के लंबे निशान।

मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया। हथकड़ियाँ खोलीं। उनके हाथ काँप रहे थे। मैंने उनके बाल सहलाए और कान में कहा—“सो जा। शाम को फिर आऊँगा। और इस बार उससे भी ज्यादा लेकर।”
वो मुस्कुराईं। टूटी हुई मुस्कान। आँखों में दर्द था, लेकिन उसके नीचे एक अजीब सी शांति भी थी। जैसे उन्हें आखिरकार वही मिला हो जिसकी उन्हें सालों से भूख थी।
दोपहर में मैंने फोन पर मैसेज किया।
“शाम को तैयार रहना। आज रस्सी के साथ चेन भी ला रहा हूँ। और एक बड़ा सा गैग।”

जवाब आया सिर्फ एक शब्द में।
“आ जा।”
और मैं जानता था—यह अब सिर्फ सेक्स नहीं रह गया था। यह उनके शरीर को टुकड़े-टुकड़े करके अपना बनाने का सिलसिला था। हर निशान, हर चीख, हर आँसू के साथ कविता थोड़ी और मेरी हो रही थी। और मैं हर बार थोड़ा और क्रूर।
शाम ढलते-ढलते मैं फिर निकल पड़ा। बैग पहले से भारी था। इस बार अंदर एक मोटी रस्सी, चेन, बड़ा गैग, और एक स्टील का छोटा बार था जो जाँघों को फैलाकर रखता। बंगले की लाइट बुझी हुई थी। सिर्फ उनके बेडरूम की खिड़की से हल्की रोशनी आ रही थी।

दरवाज़ा खोला तो वो पहले से घुटनों के बल बैठी थीं। नाइटी नहीं पहनी थी। बिल्कुल नंगी। कल के निशान अभी भी ताजा थे। उन्होंने सिर उठाया और मेरी आँखों में देखा।
बिना बोले उन्होंने अपने दोनों हाथ आगे कर दिए—हथकड़ियों के लिए।
मैं मुस्कुराया।
आज की रात और लंबी होने वाली थी। और इससे भी ज्यादा निर्दयी।

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