दोस्त की अकेली माँ को रस्सियों, मोम और बेदर्द धक्कों से तोड़कर अपनी स्थायी रांड बना लिया। दर्द में डूबी क्रूर गुलामी की वो रातें जो कभी खत्म नहीं होतीं।
यह कहानी कबीर और रोहन की है। दोनों जयपुर के एक कॉलेज में साथ पढ़ते थे। उम्र दोनों की 22 साल थी। बचपन से दोस्ती थी, एक ही मोहल्ले में रहते थे। रोहन का घर सिटी पैलेस के पास वाली गली में था, जहाँ पुराने मकान और संकरी गलियाँ थीं। कबीर अक्सर रोहन के घर चला जाता था। पढ़ाई के बहाने।
रोहन के पिता व्यापार के सिलसिले में ज्यादातर बाहर रहते थे। महीने में दो-तीन दिन ही घर आते। इसलिए रोहन की माँ सुनीता अकेली पड़ जाती थीं। सुनीता की उम्र 45 साल थी। शरीर अभी भी कसा हुआ था। लंबे काले बाल, गोरी चमकदार त्वचा, 38 साइज के भारी भरे स्तन जो साड़ी के नीचे से भी अपना आकार दिखाते थे। कमर पतली, कूल्हे चौड़े और गोल। जांघें मोटी और मुलायम। जब वह घर के काम करतीं तो साड़ी का पल्लू सरक जाता और गहरी ब्लाउज की क्लीवेज साफ दिखती। कबीर की नजरें हमेशा वहीं अटक जातीं।
कबीर जानता था कि सुनीता असंतुष्ट हैं। रोहन खुद बता चुका था कि पापा साल में मुश्किल से छह-सात बार ही घर आते हैं और तब भी थके-हारे होते हैं। सुनीता की आँखों में भूख साफ झलकती थी। कबीर ने उसी भूख का फायदा उठाने का मन बना लिया था।
एक शुक्रवार की शाम को कबीर रोहन के घर पहुँचा। रोहन को बुखार था, इसलिए वह जल्दी सो गया। सुनीता रसोई में खाना बना रही थीं। साड़ी पीली थी, ब्लाउज गहरा लाल। कबीर रसोई के दरवाजे पर खड़ा हो गया। सुनीता झुककर बर्तन धो रही थीं। साड़ी का पल्लू एक तरफ सरक गया। ब्लाउज के ऊपर से स्तनों की भारी गेंदें हिल रही थीं। निप्पल कठोर होकर कपड़े को छेदते नजर आ रहे थे।
कबीर ने धीरे से कहा, “आंटी… आप बहुत अकेली लगती हो।”
सुनीता चौंकीं। मुड़ीं। उनकी आँखों में गुस्सा और कुछ और था। “कबीर, इतनी रात को रसोई में क्या कर रहे हो? जाओ सो जाओ।”
कबीर पास आया। उसकी आवाज भारी थी। “मैंने देखा है आप कैसे अपने स्तन दबाती हो जब अकेली होती हो। मैंने देखा है आपकी उंगलियाँ जांघों के बीच जाती हैं। रोहन सोया है। पापा बाहर हैं। आज मैं आपकी भूख मिटाऊँगा।”
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सुनीता का चेहरा लाल हो गया। “शर्म नहीं आती? रोहन तेरा दोस्त है!”
कबीर ने अचानक उनका हाथ पकड़ लिया। जोर से। “शर्म की बात बाद में। अभी तो तुम्हारी चूत भीग रही होगी।” उसने सुनीता को दीवार से चिपका दिया। एक हाथ से उनका गला दबाया, दूसरे से साड़ी का पल्लू खींचकर फेंक दिया। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। भारी स्तन बाहर निकल आए। बड़े, गोल, निप्पल काले और कठोर। कबीर ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दाँत से काटा।
सुनीता चीखीं, “आह… छोड़… दर्द हो रहा है…”
कबीर ने और जोर से काटा। “दर्द अच्छा लगता है ना आंटी? बोल।” उसने दूसरा स्तन भी दबाया। उंगलियों से निप्पल मोड़े। सुनीता की साँसें तेज हो गईं। उनके पैर काँपने लगे।
कबीर ने उन्हें घसीटकर बेडरूम में ले गया। रोहन के कमरे के बगल वाला कमरा। दरवाजा बंद किया। बिस्तर पर धकेल दिया। सुनीता उठने की कोशिश करने लगीं तो कबीर ने उनका दोनों हाथ पीछे करके पुरानी साड़ी के पल्लू से बाँध दिया। कसकर। फिर टाँगें फैलाकर टखनों को बिस्तर के पायों से बाँध दिया। सुनीता पूरी तरह बेबस हो गईं। स्तन हवा में लटके हुए, योनि साड़ी की तहों के नीचे दबी हुई।
कबीर ने साड़ी ऊपर की। पैंटी काली थी, बीच में गीला धब्बा। उसने पैंटी फाड़ दी। सुनीता की चूत बालों से भरी हुई, होंठ सूजे हुए और चमकदार। कबीर ने दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। जोर से। सुनीता कराह उठीं। “आह्ह… बेटा… धीरे…”
“धीरे नहीं। आज तुम्हें याद रहेगा।” कबीर ने उंगलियाँ तेजी से अंदर-बाहर करने लगा। तीसरी उंगली भी डाल दी। सुनीता की चूत चटचटाने लगी। पानी बहने लगा। कबीर ने झुककर जीभ चूत पर फेर दी। क्लिटोरिस को दाँतों से दबाया। सुनीता की कमर उछलने लगी। “नहीं… बहुत जोर से… आह…”
कबीर उठ खड़ा हुआ। अपनी पैंट खोली। लंड मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ बाहर निकला। उसने सुनीता के मुँह के पास लाकर थ Hop दिया। “चूस।”
सुनीता ने मुँह खोला। कबीर ने पूरा लंड अंदर धकेल दिया। गले तक। सुनीता का गला भर गया। आँखों से आँसू निकल आए। कबीर ने बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदने लगा। “आंटी की गरम जीभ… हाँ… ऐसे ही।” वह गहरी साँसें ले रहा था। फिर अचानक निकालकर सुनीता की चूत पर रख दिया।
एक जोरदार धक्के के साथ पूरा लंड अंदर घुस गया। सुनीता चीख पड़ीं। “आह्ह्ह… फट जाएगी…”
कबीर ने दोनों हाथों से उनके कूल्हे पकड़ लिए और पागलों की तरह धक्के मारने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था। सुनीता के स्तन हर धक्के के साथ उछल रहे थे। कबीर ने एक हाथ से उनका गला दबाया। “बोल… तेरी चूत कैसी लग रही है?”
सुनीता हाँफते हुए बोलीं, “बहुत… गहरी… दर्द… लेकिन… अच्छा…”
कबीर और तेज हो गया। उसने सुनीता को पलट दिया। घुटनों के बल। हाथ बँधे हुए। उसने उनकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारा। लाल निशान पड़ गए। फिर और थप्पड़। सुनीता चीख रही थीं लेकिन कूल्हे पीछे की तरफ धकेल रही थीं। कबीर ने लंड फिर चूत में घुसाया और एक हाथ से बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया। दूसरे हाथ से गांड के छेद में उंगली घुसा दी।
“आंटी की गांड भी ढीली कर दूँगा आज।” उसने उंगली अंदर-बाहर की। फिर दो उंगलियाँ। सुनीता पागल हो रही थीं। “नहीं… वहाँ मत… आह्ह…”
कबीर ने लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा। थूक लगाकर एक जोरदार धक्के से आधा लंड अंदर घुसा दिया। सुनीता की आँखें फटी रह गईं। दर्द से उनका पूरा शरीर काँप उठा। कबीर ने धीरे-धीरे पूरा अंदर किया। फिर तेजी से चोदने लगा।
एक हाथ से चूत में उंगलियाँ डालकर क्लिटोरिस मसल रहा था। सुनीता अब सिर्फ कराह रही थीं। “चोदो… और जोर से… दोनों छेद…”
कबीर ने उन्हें फिर सीधा किया। हाथ खोले। सुनीता के हाथ उसके कंधों पर आ गए। कबीर ने उनके दोनों स्तन जोर से दबाए और निप्पल काटे। फिर चूत में वापस घुस गया। अब दोनों की पसीने से भीगी हुई देहें एक-दूसरे से चिपक रही थीं।
कबीर ने सुनीता के होंठ काट लिए। खून की बूंद निकली। उसने चूस ली।
“आज से तुम मेरी रांड हो। जब भी बोलूँगी, चूत खोलकर रखोगी। समझी?”
सुनीता ने आँखों में आँसू और वासना लिए हुए सिर हिलाया। “हाँ… तेरी रांड… चाहे जब चोद…”
कबीर ने और तेज धक्के मारे। सुनीता का शरीर काँपने लगा। वह चिल्ला उठीं, “आ रही हूँ… कबीर… आंटी की चूत फट रही है…” उनके पूरे शरीर में लहर दौड़ गई। चूत ने लंड को कसकर जकड़ लिया। पानी की धारा बह निकली। कबीर ने भी खुद को नहीं रोका। गर्म वीर्य की धारें चूत के अंदर छोड़ दीं। इतनी कि बाहर भी निकलने लगीं।
दोनों थककर बिस्तर पर गिर पड़े। कबीर ने सुनीता के स्तनों पर सिर रखा। कुछ देर बाद उसने फिर से लंड खड़ा कर लिया। सुनीता की आँखें चौड़ी हो गईं। “फिर?”
कबीर मुस्कुराया। “रात अभी बाकी है। आज तुम्हें याद रहेगा कि असली मर्द कैसे चोदता है।” उसने सुनीता के हाथ फिर बाँधे। इस बार ऊपर की तरफ। फिर उनकी टाँगें कंधों पर रखकर चूत में घुस गया। अब और गहरा। हर धक्के के साथ सुनीता की चीखें दब जातीं। कबीर कभी गला दबाता, कभी स्तन काटता, कभी गांड पर थप्पड़ मारता।
सुनीता अब खुद माँगने लगीं। “और जोर से… बाल खींच… चूत फाड़ दे… गांड में भी डाल…”
कबीर ने उनकी बात मानी। रातभर वह सुनीता को अलग-अलग पोजीशन में चोदता रहा। कभी कुत्ते की तरह, कभी उल्टा लिटाकर, कभी दीवार से सटाकर। बीच-बीच में वह सुनीता को घुटनों पर बिठाकर लंड चूसवाता। गले तक। आँसू और लार मिलाकर। जब सुनीता थक जातीं तो वह उनके बाल पकड़कर जबरदस्ती मुँह में ठूंस देता।
सुबह चार बजे जब आखिरी बार वीर्य उनकी गांड में छोड़ा तो सुनीता पूरी तरह बिखर चुकी थीं। शरीर पर काटने और थप्पड़ के निशान, चूत और गांड दोनों से वीर्य रिस रहा था, बाल बिखरे हुए। कबीर ने उनके गाल पर थप्पड़ मारा। “अब से हर हफ्ते। रोहन के सामने भी अगर मौका मिला तो चोदूँगा। बोल स्वीकार है?”
सुनीता ने फटी आँखों से देखा। आवाज काँपती हुई निकली, “स्वीकार है… तेरी रांड हूँ… चाहे जब… जहाँ… चोद ले…”
कबीर ने उन्हें खोला। सुनीता उठ भी नहीं पाईं। कबीर ने उन्हें नहलाया, साड़ी पहनाई, बिस्तर ठीक किया। फिर अपने कपड़े पहनकर रोहन के कमरे में जाकर सो गया। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
अगले दिन रोहन बेहतर हो गया। कबीर मुस्कुराता रहा। सुनीता चाय देते समय उसके हाथ से छू गईं। आँखों में वही भूख थी, लेकिन अब उसमें डर और समर्पण भी मिला हुआ था।
उस रात के बाद कबीर का राज शुरू हो गया। कभी दोपहर में जब रोहन कॉलेज जाता, कबीर अचानक आ जाता। सुनीता को रसोई में ही चोद देता। कभी रात को रोहन के सोने के बाद। कभी वह सुनीता को बाँधकर घंटों छोड़ देता, सिर्फ देखता रहता। कभी उनसे गंदी बातें करवाता। कभी उनके स्तनों पर मोमबत्ती का मोम गिराता। कभी चूत में बर्फ की डली डालकर फिर गर्म लंड घुसाता।
सुनीता अब खुद मैसेज करतीं। “आज रात आ जा। बहुत मचल रही हूँ। गांड में डालना। जोर से।”
कबीर कभी-कभी मना भी कर देता। सिर्फ तड़पाने के लिए। सुनीता रोने लगतीं। फिर जब आता तो और क्रूर हो जाता। एक बार उसने सुनीता को छत पर ले जाकर रात के अंधेरे में चोदा। शहर की रोशनियाँ नीचे चमक रही थीं। सुनीता का मुँह बंद करके।
दोनों जानते थे कि यह खेल खतरनाक है। लेकिन न तो सुनीता रुकना चाहती थीं, न कबीर। रोहन बेखबर अपने दोस्त और माँ के बीच की इस काली भूख से अनजान था।
उस रात के बाद कबीर का राज और गहरा होता चला गया। सुनीता अब सिर्फ शरीर से नहीं, मन से भी उसकी गुलाम बन चुकी थीं। रोहन को कुछ पता नहीं चलने दिया जाता था। कबीर दिन में कॉलेज जाता, शाम को रोहन के साथ पढ़ाई का नाटक करता, और रात को जब रोहन गहरी नींद में होता तो सुनीता के कमरे का दरवाजा धीरे से खुल जाता।
एक मंगलवार की रात को कबीर ने कुछ अलग योजना बनाई थी। उसने अपने बैग में रस्सी, काला टेप, एक मोटी मोमबत्ती और छोटी धातु की क्लिपें छिपा रखी थीं। रोहन सो चुका था। कबीर ने सुनीता के कमरे में प्रवेश किया। सुनीता बिस्तर पर लेटी थीं, साड़ी पहने, लेकिन आँखें खुली हुईं। जैसे इंतजार कर रही हों।
कबीर ने दरवाजा बंद किया और लॉक लगा दिया। “आज तुम्हें सिर्फ चोदना नहीं है आंटी। आज तुम्हें तोड़ना है।”
सुनीता की साँसें तेज हो गईं। कबीर ने उनकी साड़ी और ब्लाउज एक झटके में फाड़ दिए। स्तन बाहर निकल आए। उसने दोनों निप्पलों पर धातु की क्लिपें कसकर लगा दीं। सुनीता दर्द से काँप उठीं। “आह्ह… बहुत कस गया…”“और कसेगा।”
कबीर ने क्लिपों को थोड़ा और घुमाया। निप्पल काले पड़ गए। फिर उसने सुनीता के हाथ ऊपर की तरफ खींचकर बिस्तर के सिरहाने से बाँध दिए। टाँगें फैलाकर टखनों को भी बाँध दिया। अब सुनीता पूरी तरह फैली हुई थीं। चूत और गांड खुली हवा में।
कबीर ने मोमबत्ती जलाई। सुनीता की आँखों में डर साफ था। “नहीं… मोम मत… दर्द होगा…”
कबीर मुस्कुराया। “दर्द ही तो चाहिए।” उसने जलती मोमबत्ती को उनके बाएँ स्तन के ऊपर लाया और मोम की पहली बूंद गिरा दी। सुनीता चीख पड़ीं। गर्म मोम निप्पल पर जमा हो गया। कबीर ने दूसरी, तीसरी, चौथी बूंद गिराई। दोनों स्तनों पर सफेद-सफेद दाग बन गए। सुनीता की आँखों से आँसू बहने लगे लेकिन चूत से पानी भी रिस रहा था।
कबीर ने झुककर उनकी चूत चाटी। जीभ से क्लिटोरिस को जोर से दबाया, फिर दाँतों से हल्का काटा। सुनीता की कमर उछली। “आह्ह… चाटो… और जोर से काटो…”
कबीर ने अचानक उठकर अपना लंड निकाला। मोटा, कठोर, नसों से भरा। उसने सुनीता के मुँह पर थ Hop दिया। “खोल।” सुनीता ने मुँह खोला। कबीर ने पूरा लंड गले तक धकेल दिया। सुनीता का गला भर गया, आँसू और लार बहने लगे। कबीर ने बाल पकड़कर जोर-जोर से मुँह चोदा। “आंटी की गंदी जीभ… हाँ… ऐसे ही चूसो अपनी मौत…”
जब सुनीता का चेहरा लाल पड़ गया तो उसने लंड निकाला और सीधे चूत में एक ही धक्के में पूरा घुसा दिया। सुनीता की चीख दब गई। कबीर ने दोनों हाथों से उनके कूल्हे पकड़े और पागलों की तरह पेलने लगा।
हर धक्के के साथ क्लिपें हिलतीं और निप्पलों में दर्द बढ़ता। कबीर ने एक हाथ से गला दबाया। “बोल… तेरी चूत किसकी है?”
“तेरी… कबीर… तेरी रांड की चूत…” सुनीता हाँफते हुए बोलीं।
कबीर ने और तेज किया। बिस्तर चरमरा रहा था। दीवार से आवाज आ रही थी लेकिन रोहन गहरी नींद में था। कबीर ने लंड निकालकर गांड के छेद पर रखा। थूक भी नहीं लगाया। एक जोरदार धक्के से आधा लंड अंदर घुस गया। सुनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं। “आह्ह्ह… फट गई… निकाल… दर्द…”“निकालूँगा नहीं।”
कबीर ने पूरा अंदर किया और तेजी से चोदने लगा। एक हाथ से चूत में तीन उंगलियाँ डालकर मसल रहा था। सुनीता अब सिर्फ कराह रही थीं। शरीर काँप रहा था। कबीर ने अचानक दोनों क्लिपें खोल दीं। खून की तरह दर्द का एहसास हुआ। सुनीता चीख पड़ीं। उसी पल कबीर ने गांड में और जोर से पेलते हुए वीर्य छोड़ दिया। गर्म धारें अंदर भर गईं।
लेकिन वह रुका नहीं। लंड अभी भी कठोर था। उसने सुनीता के हाथ खोले, उन्हें घुटनों के बल कर दिया और फिर से चूत में घुस गया। इस बार उसने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया। “आज तुम्हें याद रहेगा कि असली गुलाम कैसे चोदी जाती है।”
सुनीता अब खुद पीछे की तरफ धक्के मार रही थीं। “चोदो… और गहरा… गांड फाड़ दो… चूत फाड़ दो…”
कबीर ने उनकी बात मानी। उसने सुनीता को उल्टा लिटाया, टाँगें कंधों तक मोड़ दीं और इतनी गहराई तक पेलने लगा कि सुनीता की साँसें उखड़ने लगीं। बीच-बीच में वह उनके गाल पर थप्पड़ मारता, स्तन काटता, निप्पल मोड़ता। सुनीता की चूत से पानी और वीर्य मिलाकर बह रहा था। बिस्तर गीला हो चुका था।
जब कबीर दूसरी बार झड़ने वाला था तो उसने लंड निकालकर सुनीता के मुँह में ठूंस दिया। “पी ले सब।” सुनीता ने आँखें बंद करके वीर्य निगल लिया। गले तक। कबीर ने आखिरी बूंद तक उनके मुँह में छोड़ दी।
सुबह होने से पहले कबीर ने सुनीता को नहलाया। शरीर पर मोम के दाग, काटने के निशान, थप्पड़ों के लाल निशान साफ दिख रहे थे। उसने साड़ी पहनाई, बाल सँवारे, बिस्तर ठीक किया। फिर रोहन के कमरे में जाकर सो गया।
अगले दिनों में खेल और क्रूर होता गया। एक दोपहर जब रोहन कॉलेज में था, कबीर अचानक घर पहुँचा। सुनीता रसोई में थीं। कबीर ने उन्हें वहीं पकड़ा। साड़ी ऊपर की, पैंटी फाड़ी और कुकर की आवाज के बीच में ही चूत में लंड घुसा दिया। एक हाथ से उनका मुँह बंद रखा।
सुनीता की पीठ सिंक से टकरा रही थी। कबीर ने उनकी गांड पर जोरदार थप्पड़ मारे। लाल निशान पड़ गए। फिर उन्हें घुटनों पर बिठाकर लंड चूसवाया। गले तक। आँसू बह रहे थे लेकिन सुनीता खुद और गहरा ले रही थीं।
एक रात कबीर ने सुनीता को छत पर ले गया। शहर की रोशनियाँ नीचे थीं। उसने उन्हें नंगी किया, रस्सी से बाँधा और दीवार से सटाकर चोदा। हवा में उनकी चीखें दब रही थीं। कबीर ने उनके कान में कहा, “अगर कोई देख ले तो? तेरे बेटे का दोस्त तेरी गांड फाड़ रहा है।” सुनीता और गीली हो गईं।
कभी-कभी कबीर सिर्फ तड़पाता। सुनीता को बाँधकर छोड़ देता। घंटों। क्लिपें लगाए, मोम गिराए, लेकिन लंड नहीं देता। सुनीता रोने लगतीं, गिड़गिड़ातीं। “कृपया… डाल दो… मर जाऊँगी…” तब कबीर आता और इतनी बेदर्दी से चोदता कि सुनीता बेहोश होने के करीब पहुँच जातीं।
एक शुक्रवार की रात को कबीर ने सबसे क्रूर खेल खेला। उसने सुनीता के दोनों हाथ-पैर बाँधे, आँखों पर काला टेप लगाया, मुँह में कपड़ा ठूंस दिया। फिर उनकी चूत में बर्फ की डली डाली। सुनीता का शरीर काँप उठा। ठंडक के बाद उसने गर्म मोम चूत के होंठों पर गिराया। फिर अपना लंड अंदर घुसाया। ठंड और गर्मी के मिश्रण में सुनीता पागल हो रही थीं। कबीर ने उनकी गांड में भी उंगलियाँ डाल दीं। दोनों छेद एक साथ। सुनीता की चीखें कपड़े में दबकर रह गईं।
कबीर ने उस रात तीन बार झड़ा। एक बार चूत में, एक बार गांड में, एक बार मुँह में। सुनीता के शरीर पर इतने निशान थे कि अगले तीन दिन तक साड़ी के नीचे छिपाने पड़े। लेकिन सुनीता खुश थीं। हर सुबह वह कबीर को मैसेज करतीं। “आज और क्रूर होना। आज गांड फाड़ देना। आज निप्पल काट लेना।”
रोहन कुछ नहीं जानता था। वह अपने दोस्त और माँ के बीच की इस काली, गंदी, बेदर्द भूख से पूरी तरह अनजान था। कबीर दिन में उसके साथ हँसता, पढ़ाई करता, और रात को उसकी माँ को अपनी रांड बनाकर तोड़ता।
सुनीता अब खुद को सिर्फ कबीर की संपत्ति मानती थीं। जब भी वह आता, वह अपने आप कपड़े खोलने लगतीं, घुटनों के बल बैठ जातीं, मुँह खोल देतीं। कभी-कभी कबीर बिना बोले सिर्फ इशारे से काम लेता। सुनीता समझ जातीं।
जयपुर की उस पुरानी गली में यह खेल जारी रहा। दिन बीतते गए, रातें और काली होती गईं। सुनीता की चूत और गांड अब हमेशा कबीर के लंड की आदी हो चुकी थीं। दर्द अब सुख बन चुका था। और कबीर की भूख बढ़ती ही जा रही थी।
एक रात जब कबीर फिर से सुनीता के ऊपर था, गला दबाए, लंड गांड में धँसे, तो उसने कान में धीरे से कहा, “अब तुम कभी भी आजाद नहीं हो सकतीं आंटी। तुम मेरी हो। हमेशा के लिए।”
सुनीता ने आँसू भरी आँखों से सिर हिलाया। “हमेशा… तेरी रांड… चाहे जब… जहाँ… जैसे चाहो चोद लेना…”
कबीर मुस्कुराया और और गहराई तक पेलने लगा। बाहर अंधेरी रात थी। अंदर सिर्फ मांस और दर्द और वासना की आवाजें थीं। रोहन के सोने की साँसें बगल वाले कमरे से आ रही थीं। लेकिन इस कमरे में सिर्फ एक दोस्त अपनी दोस्त की माँ को टुकड़े-टुकड़े कर रहा था। बेदर्दी से। बिना रुके। बिना पछतावे के।