इंदौर की अकेली मौसी को भतीजे ने रस्सी, चाबुक और 8 इंच के लंड से पूरी तरह तोड़ दिया। दर्द, गला दबाना, गांड फाड़ना और गुलामी की वो रातें जो हमेशा के लिए बदल गईं।
Rahul नाम है मेरा। उम्र 24 साल, सिंगल, और मध्य प्रदेश के इंदौर शहर का रहने वाला। शरीर फिट, कद 5 फीट 11 इंच, और मेरा लंड 8 इंच लंबा और 2.5 इंच मोटा है—नसें फूली हुईं, सिर चमकदार, और इतना भारी कि किसी भी औरत की चूत फाड़ देने वाला।
गर्मी की छुट्टियां शुरू हुईं तो मैंने फैसला किया कि इस बार मौसी के घर जाऊं। मौसी और मौसा इंदौर से थोड़ी दूर एक छोटी कॉलोनी में रहते थे। अगले दिन सामान पैक करके बस पकड़ी और दोपहर तीन बजे उनके घर पहुंच गया।
दरवाजा खोला एक औरत ने। उम्र करीब 34 साल, गोरी चमकदार त्वचा, 38 साइज के भारी भरे हुए बूब्स जो ब्लाउज में फूले पड़े थे, पतली कमर, गोल-मटोल चूतड़ और लंबी टांगें। चेहरे पर तीखी आंखें, मोटे होंठ और वो मस्तानी चाल कि देखते ही मेरा लंड पैंट में हिलने लगा। ये मेरी मौसी थीं—नाम रेखा। मौसा ऑफिस में ज्यादातर समय बिताते थे, घर में अक्सर अकेली रहती थीं।
मैंने प्रणाम किया। रेखा मुस्कुराईं, आवाज में हल्की सी गरमपन—“आ जा बेटा, अंदर आ।” घर में मौसी, मौसा और एक बूढ़ी दादी थीं। दादी जल्दी सो जाती थीं। शाम को मौसा आए, जल्दी खाना खाया और बोले—“रेखा, मुझे रात भर के लिए बाहर जाना है। जरूरी मीटिंग है।” और निकल गए। घर में सिर्फ दादी, रेखा और मैं रह गए।
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खाना खाते समय रेखा बार-बार झुककर रोटी रखतीं। उनके ब्लाउज के गले से गोरे, भारी बूब्स झांकते। निप्पल्स की हल्की सी आकृति साफ दिख रही थी। मेरी नजर बार-बार वहीं टिक जाती। रेखा ने एक बार मेरी आंखें पकड़ लीं। मुस्कुराईं और धीरे से बोलीं—“क्या देख रहा है Rahul?”
मैंने हिम्मत करके कहा—“आप बहुत खूबसूरत लग रही हो मौसी।”वो हंसीं, आंखों में शरारत—“शुक्रिया। अब दादी सो चुकी हैं। मैं नहा लेती हूं। तुम टीवी देखो।”
बाथरूम का दरवाजा आधा खुला छोड़ गईं। अंदर से आवाज आई—“Rahul… थोड़ा इधर आ। पीठ पर साबुन लगा दे। हाथ नहीं पहुंच रहा।”
मेरा दिल जोर से धड़का। अंदर गया। रेखा खड़ी थीं—नीचे सिर्फ गीला पेटीकोट, ऊपर एक छोटा तौलिया दोनों भारी बूब्स को मुश्किल से ढके हुए। पानी से भीगी गोरी त्वचा चमक रही थी, बाल गीले कंधों पर। तौलिया इतना छोटा था कि नीचे से चूतड़ का गोल हिस्सा और ऊपर से बूब्स का आधा हिस्सा खुला था।
मैंने साबुन लिया और उनकी पीठ पर लगाने लगा। त्वचा इतनी मुलायम और गर्म कि हाथ फिसल रहा था। रेखा ने हल्के से कराहते हुए कहा—“और नीचे… कमर तक… अच्छे से रगड़।”
मैंने कमर पर हाथ फेरा तो उन्होंने पीछे मुड़कर तौलिया ढीला कर दिया। दोनों 38 साइज के बूब्स मुक्त हो गए—भारी, गोल, गुलाबी निप्पल्स कड़े। रेखा ने मेरा हाथ पकड़कर अपने बूब्स पर रख दिया।
“दबा… जोर से दबा। मौसा तो बस छूकर छोड़ देते हैं। तू मर्द है।”
मैंने दोनों हाथों से मसलना शुरू किया। निप्पल्स को अंगूठे और उंगली से दबाया, खींचा। रेखा की सांसें तेज हो गईं—“आह्ह… हां… ऐसे ही… काट भी ले निप्पल… दर्द भी अच्छा लगता है।”
मैंने एक निप्पल मुंह में लिया, जोर से चूसा, दांतों से हल्का काटा। रेखा चीखीं लेकिन पीछे नहीं हटीं। तौलिया पूरी तरह गिर गया। मैंने पेटीकोट भी खींच दिया। नीचे बालों वाली घनी चूत, होंठ पहले से गीले। मैंने उंगली अंदर डाल दी—गर्म, तंग, रस से भरी।
रेखा ने मेरी पैंट खोल दी। लंड बाहर निकला—8 इंच, मोटा, नसें फूली। उनकी आंखें फैल गईं।
“हे भगवान… ये तो जानवर का है। मौसा का तो आधा भी नहीं। ये अंदर गया तो मेरी चूत फट जाएगी… लेकिन फाड़… आज फाड़ दे।”
बाथरूम की दीवार से सटाकर मैंने उन्हें उठाया। टांगें मेरे कमर पर लपेट लीं। लंड की टिप चूत पर रखी और एक जोरदार धक्के में आधा घुसा दिया। रेखा चीखीं—“आआह्ह… दर्द… धीरे… नहीं… जोर से ही डाल… पूरा!”
मैंने पूरा 8 इंच जड़ तक धकेल दिया। उनकी चूत दीवारों की तरह फैल गई, रस बहने लगा। मैंने कमर पकड़कर दीवार से सटा-सटाकर ठोकना शुरू किया। धप-धप की आवाज बाथरूम में गूंज रही थी। रेखा के नाखून मेरी पीठ पर गड़ गए, खून निकला लेकिन मैं रुका नहीं।
“चोद… फाड़… मौसा जैसे नामर्द को भूल जा… तू ही मेरा मर्द है… आह्ह… और गहरा… गांड भी मार… आज पूरी रंडी बना दे मुझे!”
मैंने लंड निकाला, उन्हें घुटनों के बल कर दिया। गांड के गोल-मटोल हिस्से पर दो जोरदार थप्पड़ मारे—लाल निशान पड़ गए। थूक लगाकर लंड गांड के छेद पर रखा और धीरे-धीरे दबाव डाला। रेखा चिल्लाईं—“ऊऊह्ह… जलन… बहुत मोटा… लेकिन मत निकाल… पूरा डाल… फाड़ दे मेरी गांड!”
पूरा लंड अंदर गया। मैंने कमर पकड़कर जानवर की तरह ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर उनकी गांड निचोड़ रही थी। एक हाथ से उनकी चूत में तीन उंगलियां डाल दीं, दूसरे से बाल खींचकर सिर पीछे किया।
“बोल रंडी… किसकी गांड है?”
“तेरी… तेरी गांड… चोद… मार… मुझे मार डाल लेकिन रुक मत!”
बाथरूम में पानी बह रहा था, हम दोनों पसीने से तर। रेखा बार-बार झड़ रही थीं—शरीर कांपता, चूत और गांड दोनों से रस बहता। मैंने लंड निकाला, उन्हें मुंह के बल घुमाया और मुंह में ठूंस दिया। गले तक। वो ग्ग्ग्ग… गों… गों… कर रही थीं, आंखों से आंसू बह रहे थे लेकिन खुद सिर आगे-पीछे कर रही थीं।
सारा गाढ़ा माल उनके मुंह में उंडेल दिया। रेखा ने निगल लिया, जीभ से साफ किया।
रात अभी शुरू हुई थी। हम कमरे में आए। रेखा ने अलमारी से रस्सियां, एक छोटा चाबुक और अंधे पट्टी निकाली।
“आज पूरी रात तू मेरा मालिक है। जो चाहे कर। दर्द दे, गाली दे, इस्तेमाल कर।”
मैंने उनकी आंखें बांध दीं, हाथ पीछे बांध दिए। बेड पर लिटाकर टांगें फैला दीं। चाबुक से उनकी जांघों, बूब्स और चूत पर हल्के-हल्के वार किए। रेखा कराह रही थीं—“और जोर… निशान छोड़… मैं तेरी गुलाम हूं।”
फिर मैंने लंड फिर से चूत में ठोंका। रस्सी से बांधे हाथों को खींचते हुए मिशनरी में इतनी जोर से चोदा कि बेड की खाट चरमरा गई। हर धक्के पर उनकी चूत चिपचिपाती, रस बिस्तर गीला कर रहा था। मैंने उनके गले पर हाथ रखा, हल्का दबाया। रेखा की आंखें अंधे पट्टी के नीचे कांप रही थीं लेकिन वो और जोर से कमर उठा रही थीं।
“गला दबा… और दबा… चोदते हुए मार… मुझे अपनी रंडी बना… मौसा को बता दूंगी कि उनका लंड बेकार है… तू ही असली है!”
रात भर हमने पोजीशन बदलीं। कुर्सी पर झुकाकर पीछे से, दीवार से सटाकर खड़े होकर, फिर घोड़ी बनाकर गांड और चूत बारी-बारी। चाबुक से उनकी गांड लाल कर दी। बीच-बीच में मुंह में ठूंसकर गला भर दिया। रेखा हर बार झड़तीं—शरीर तनता, चीखें निकलतीं, फिर ढीली पड़ जातीं लेकिन फिर मांगतीं—“और… मत थक… मेरी चूत और गांड दोनों तेरी हैं… इस्तेमाल कर… फाड़ दे…”
सुबह चार बजे तक हम थककर चूर हो गए। रेखा की त्वचा पर लाल निशान, चूत और गांड सूजी हुईं, होंठ सूजे। मैंने रस्सियां खोलीं। वो मेरे सीने पर लेट गईं, लंड को हाथ में लेकर हल्के से सहलाती रहीं।
“तीन दिन और मौसा नहीं आएंगे। इन तीन दिनों में तू मुझे पूरी तरह तोड़ दे। जितना क्रूर हो सके, जितना दर्द दे सके। मैं तेरी संपत्ति हूं अब।”
मैंने मुस्कुराकर उनके बालों में उंगलियां फेरीं। बाहर सूरज निकल रहा था। घर में सन्नाटा था। दादी अभी सो रही थीं। रेखा उठकर नहाईं, फिर रसोई में चली गईं नाश्ता बनाने। उनकी चाल में अभी भी वो मस्ती थी, लेकिन अब आंखों में एक अलग भूख थी—जंगली, भूखी, और पूरी तरह समर्पित।
मैं बिस्तर पर लेटा रहा, लंड फिर से हल्के से तनने लगा। तीन दिन बाकी थे। और इन तीन दिनों में रेखा को मैंने जो बनाया, वो सिर्फ उनकी चूत और गांड नहीं थी—पूरी तरह मेरी गुलाम। हर रात और भी क्रूर, और भी गहरा, और भी बेकाबू।
कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। वो तीन दिन इंदौर की उस कॉलोनी के घर में गुजरे—रस्सियों, चाबुक, गालियों और अंतहीन चुदाई के साथ। रेखा हर सुबह मुस्कुराकर नाश्ता बनातीं, और हर रात बेड पर अपने शरीर को मेरे लिए खोल देतीं—बिना किसी रोक के, बिना किसी दया के।
तीन दिन और बाकी थे। मौसा के जाने के बाद घर फिर से सन्नाटे में डूब गया। दादी हमेशा की तरह जल्दी सो गईं। रेखा ने दरवाजा बंद किया, कमरे में आईं और सीधे मेरे सामने खड़ी हो गईं। उनकी आंखों में अब कोई शरारत नहीं थी—सिर्फ भूख, समर्पण और एक गहरी भूखी गुलामी।
“मालिक,” उन्होंने धीरे से कहा, आवाज में कांप। “आज से तू जो कहे वही होगा। चाहे मार डाल, चाहे फाड़ दे, चाहे मुझे कुत्ते की तरह इस्तेमाल कर। मैं तेरी रंडी हूं। पूरी तरह।”
मैंने उन्हें घूरकर देखा। फिर आदेश दिया—“कपड़े उतार। सब।”
रेखा ने ब्लाउज, साड़ी, पेटीकोट, ब्रा, पैंटी—सब एक-एक करके उतारा। 38 साइज के भारी बूब्स मुक्त होकर झूलने लगे, निप्पल्स पहले से कड़े। चूत पर घने बाल, गांड गोल और मुलायम। मैंने रस्सी निकाली। उनके दोनों हाथ पीछे बांध दिए, इतने कसकर कि कलाईं लाल हो गईं। फिर अंधे पट्टी बांध दी। आंखें बंद। अब वो पूरी तरह अंधेरे में थीं—केवल मेरे स्पर्श, मेरी आवाज और मेरे लंड पर निर्भर।
मैंने चाबुक उठाया। पहले उनकी जांघों पर दो जोरदार वार। त्वचा पर लाल धारियां उभर आईं। रेखा ने दांत भींच लिए लेकिन आवाज नहीं निकाली। फिर बूब्स पर—निप्पल्स के ठीक ऊपर। चाबुक की तेज आवाज कमरे में गूंजी। रेखा की सांसें तेज हो गईं।
“गिन,” मैंने आदेश दिया।
“एक… दो… तीन…” हर वार पर वो गिनती बोलती रहीं। दस वार तक। उनकी गोरी त्वचा लाल-लाल हो चुकी थी, कुछ जगहों पर हल्के निशान। फिर मैंने चाबुक उनकी चूत पर मारा—सीधे होंठों पर। रेखा चीख पड़ीं—“आआह्ह!” लेकिन तुरंत बोलीं—“माफ करना मालिक… गिनती… ग्यारह…”
मैंने उन्हें बेड पर घुटनों के बल कर दिया। गांड ऊपर, कमर नीचे। रस्सी से बांधे हाथों को और खींचा। फिर थूक लगाकर लंड उनकी गांड के छेद पर रखा। बिना किसी तैयारी के, एक ही जोरदार धक्के में आधा घुसा दिया। रेखा की चीख दीवारों से टकराई।
“ऊऊह्ह… मालिक… जलन… फट रही है… लेकिन मत निकाल… पूरा डाल… फाड़ दे!”
मैंने पूरा 8 इंच जड़ तक ठोंक दिया। उनकी गांड की दीवारें मेरे मोटे लंड को कसकर निचोड़ रही थीं। मैंने कमर पकड़कर जानवर की तरह ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर उनकी गांड चिपचिपाती, रस और थूक मिलकर बह रहा था। एक हाथ से उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा, दूसरे से चाबुक उनकी जांघों पर मारता रहा।
“बोल रंडी… किसकी गांड है?”
“तेरी… तेरी मालिक… चोद… मार… मुझे कुत्ता बना दे… आह्ह… और जोर!”
मैंने स्पीड बढ़ा दी। बेड चरमरा रहा था। रेखा बार-बार झड़ रही थीं—शरीर कांपता, गांड सिकुड़ती, चीखें निकलतीं। मैंने लंड निकाला, उन्हें मुंह के बल घुमाया और गले तक ठूंस दिया। रस्सी से बांधे हाथ उनकी पीठ पर थे, मैंने सिर पकड़कर आगे-पीछे किया। ग्ग्ग्ग… गों… गों… की आवाजें, आंसू अंधे पट्टी से रिस रहे थे, सलाइवा ठोड़ी पर बह रहा था।
“निगल… सब निगल… एक बूंद भी बाहर मत निकालना।”
मैंने गाढ़ा माल उनके गले में उंडेल दिया। रेखा ने निगल लिया, खांसते हुए भी जीभ से लंड साफ किया।
रात अभी शुरू ही हुई थी। मैंने उन्हें कुर्सी पर बिठाया, टांगें फैलाकर रस्सी से कुर्सी के पायों से बांध दीं। चूत पूरी तरह खुली। मैंने दो मोमबत्तियां जलाईं। गर्म मोम उनकी जांघों पर टपकाया। रेखा चीखीं लेकिन झटकीं नहीं। फिर सीधे निप्पल्स पर। गर्म मोम ठंडा होकर सफेद परत बन गया। मैंने उंगलियों से मोम हटाया और निप्पल्स को जोर से मरोड़ा, खींचा।
“दर्द अच्छा लग रहा है न रंडी?”
“हां मालिक… और दो… मुझे तोड़ो… पूरी तरह तोड़ दो…”
मैंने लंड उनकी खुली चूत में एक झटके में पूरा घुसा दिया। कुर्सी हिलने लगी। मैंने गला दबाया—हल्का पहले, फिर और कसकर। रेखा की सांसें रुक-रुककर आ रही थीं, चेहरा लाल, लेकिन कमर नीचे से और जोर से मिल रही थी। हर धक्के पर उनकी चूत मेरे लंड को निचोड़ रही थी, रस बिस्तर और फर्श पर गिर रहा था।
“मौसा का लंड याद है?” मैंने गालियां देते हुए पूछा।
“नहीं… बेकार था… पतला… कभी फील नहीं हुआ… तू ही असली मर्द है… फाड़… मार डाल लेकिन रुक मत… आह्ह… मैं झड़ रही हूं… ले ले सब…”
वो जोर से झड़ीं। चूत में ऐंठन, शरीर तन गया, फिर ढीला पड़ गया। लेकिन मैं रुका नहीं। लंड निकालकर उनकी गांड में फिर ठोंक दिया। इस बार और क्रूर। हर धक्के पर चाबुक उनकी पीठ पर। लाल धारियां, कुछ जगहों पर हल्के खून के निशान। रेखा अब सिर्फ कराह रही थीं, आंखें अंधे पट्टी के नीचे बंद, मुंह खुला, लार बह रही थी।
सुबह तक हमने चार राउंड पूरे किए। मिशनरी में गला दबाकर, डॉगी में बाल खींचकर, काउगर्ल में उन्होंने खुद कूदते हुए लंड निचोड़ा, और आखिर में खड़े होकर दीवार से सटाकर। हर बार मैंने उनके मुंह में, चूत में या गांड में माल उंडेला। रेखा की त्वचा निशानों से भरी थी, चूत और गांड सूजी हुईं, आवाज बैठ चुकी थी।
दूसरे दिन और तीसरे दिन और भी क्रूर हो गए। मैंने उन्हें कुत्ते की तरह रस्सी से बांधकर घर में घुमाया। फर्श पर रेंगते हुए लंड चूसवाया। बाथरूम में ठंडे पानी से नहलाया, फिर गर्म मोम और चाबुक से सजा दी। एक बार मैंने उनकी चूत में चार उंगलियां डालकर मुट्ठी बनाने की कोशिश की—रेखा चीखीं लेकिन बोलीं—“कर… फाड़… मुझे अपनी मुट्ठी की रंडी बना।”
तीसरे दिन की रात सबसे लंबी थी। मैंने उन्हें बेड पर क्रूस की शक्ल में बांधा—हाथ और पैर अलग-अलग दिशाओं में। पूरा शरीर खुला, बेबस। मैंने घंटों तक उन्हें छेड़ा—जीभ से चूत चाटी, दांतों से निप्पल्स काटे, उंगलियों से गांड फैलाई, चाबुक से हर हिस्से पर वार किए। रेखा अब सिर्फ सिसक रही थीं, कभी-कभी फुसफुसातीं—“मालिक… और… मुझे तोड़… मैं तेरी हूं… हमेशा…”
जब मैंने आखिरी बार लंड उनकी चूत में ठोंका तो दोनों के शरीर पसीने और रस से चिपचिपे थे। मैंने गला दबाया, बाल खींचे, और इतनी जोर से चोदा कि रेखा की चीखें घर भर में गूंज गईं। आखिर में मैंने उनका मुंह खोला और सारा माल उनके चेहरे, जीभ और गले में उंडेल दिया। रेखा ने आंखें बंद किए बिना सब निगला, चेहरे पर माल लगाए मुस्कुराईं।
सुबह मौसा के आने से पहले रेखा ने नहाया, निशान छुपाने वाली क्रीम लगाई, साड़ी पहनी। चेहरे पर सामान्य मुस्कान थी। लेकिन जब मौसा अंदर आए, रेखा ने मेरी तरफ एक नजर डाली—आंखों में वही भूख, वही समर्पण, वही गुलामी।
मौसा चले गए ऑफिस। रेखा मेरे पास आईं, घुटनों पर बैठ गईं और लंड को बाहर निकालकर चूम लिया।
“तीन दिन खत्म हो गए मालिक… लेकिन मैं अब कभी खत्म नहीं होऊंगी। जब भी मौसा बाहर जाएं, तू मुझे फिर से तोड़ना। और भी क्रूर। और भी गहरा। मैं तेरी संपत्ति हूं… हमेशा के लिए।”
मैंने उनके बाल सहलाए। लंड फिर से तनने लगा। रेखा मुस्कुराईं—भूखी, टूटी हुई, लेकिन पूरी तरह मेरी।
और कहानी यहीं नहीं रुकी। आने वाले महीनों में हर मौका, हर रात जब मौसा घर नहीं होते, रेखा मेरे रस्सियों, चाबुक और लंड की गुलाम बनती रहीं।
हर बार और ज्यादा दर्द, और ज्यादा गालियां, और ज्यादा समर्पण। उनकी चूत और गांड अब हमेशा मेरे निशान लिए रहतीं। और हर बार वो एक ही बात कहतीं—
“फाड़ दे मालिक… मुझे पूरी तरह तोड़ दे… मैं सिर्फ तेरी रंडी हूं।”
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