गर्भवती माँ को चारपाई पर बाँधकर बेटा मोम, बेल्ट और लंड से फाड़ता है। गला दबाकर, दोनों छेद चीरकर, खून और दर्द में डुबोकर वह उसे हमेशा के लिए अपनी गुलाम रंडी बना लेता है।
आदिल 22 साल का हो चुका था। बारहवीं पास करने के दो साल बाद वह स्थानीय कॉलेज में पढ़ रहा था और साथ में छोटी-मोटी डिलीवरी का काम भी करता था। घर में सिर्फ तीन लोग—वह, उसकी माँ रुकसाना और छोटी बहन नजमा। नजमा कॉलेज जाती थी। रुकसाना विधवा थी, चेहरा अभी भी सुंदर था, शरीर भरा-भरा, भारी स्तन, चौड़ी कमर और गोल-मटोल जाँघें। गर्मी में जब वह सलवार-कमीज पहनती तो कपड़े शरीर से चिपक जाते।
आदिल को माँ की ओर देखकर अजीब सी हलचल होती थी। वह जानता था कि ये गलत है, पर लंड हर बार खड़ा हो जाता। एक दिन किचन में रुकसाना खाना बना रही थी। पसीने से उसकी कमीज गीली हो चुकी थी। ब्रा की स्ट्रैप और निप्पल की नोक साफ दिख रही थी। आदिल पानी लेने गया तो ठिठक गया। रुकसाना ने पीछे मुड़कर देखा, उसकी नजर पैंट पर पड़ी जहाँ लंड उभरा हुआ था। वह मुस्कुराई, कुछ नहीं बोली।
रात को रुकसाना ने आदिल को अपने कमरे में बुलाया। “आदिल, कमर में दर्द हो रहा है।
मालिश कर दे।” नजमा सो चुकी थी। आदिल बेमन से गया। रुकसाना पेट के बल लेटी थी। उसने कमीज ऊपर कर दी। आदिल ने तेल लगाया और कमर दबाने लगा। उंगलियाँ नीचे सरक गईं—सलवार थोड़ी नीचे थी, गांड की गहरी लकीर साफ दिख रही थी। लंड तुरंत पत्थर हो गया। रुकसाना ने धीरे से कहा, “जोर से दबा… और नीचे भी।”
आदिल की साँसें तेज हो गईं। उसने सलवार और नीचे सरका दी। रुकसाना की सफेद पैंटी भीगी हुई थी। आदिल ने बिना सोचे पैंटी खींच दी। रुकसाना ने विरोध नहीं किया। बल्कि उसने खुद कमर उठाई। आदिल की उंगलियाँ उसकी गीली चूत पर पहुँचीं। रुकसाना कराह उठी, “आह… बेटा… धीरे…”
आदिल पागल हो चुका था। उसने माँ को पलट दिया। रुकसाना की भारी चुचियाँ बाहर निकल आईं। उसने निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा। दाँत से काटा। रुकसाना चीखी, पर आवाज दबा ली। “जोर से काट… दर्द अच्छा लग रहा है…” आदिल ने दोनों चुचियों को बेरहमी से मसला, निप्पल को दाँतों के बीच दबाकर खींचा। रुकसाना की आँखों में आँसू आ गए पर वह मुस्कुरा रही थी।
उसने आदिल का लंड बाहर निकाला। मोटा, नसों वाला, सिर से पानी टपक रहा था। रुकसाना ने उसे मुँह में ले लिया। गले तक धकेल दिया। आदिल ने उसके बाल पकड़कर जोर-जोर से धक्के मारे। रुकसाना की आँखों से पानी बह रहा था, पर वह चूसती रही। गला खराब हो रहा था फिर भी नहीं रुकी। आदिल ने उसके मुँह में पानी छोड़ दिया। रुकसाना ने सब निगल लिया और जीभ निकालकर दिखाया।
फिर आदिल ने उसे कुत्ते की तरह कर दिया। गांड ऊपर उठाई। पहले दो उंगलियाँ चूत में घुसाईं, फिर तीन। रुकसाना चीख रही थी, “फाड़ दे बेटा… माँ की चूत फाड़ दे…” आदिल ने लंड सीधा उसकी चूत में धँस दिया। एक ही धक्के में पूरा। रुकसाना की चीख निकल गई। आदिल ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया और बेरहमी से धक्के मारने लगा। हर धक्के पर रुकसाना की गांड काँप रही थी। चुचियाँ बिस्तर पर रगड़ खा रही थीं।
आदिल ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “बोल, तू मेरी रंडी है।” रुकसाना ने हाँफते हुए कहा, “हाँ… तेरी रंडी… तेरी कुतिया… चोद मुझे…” आदिल ने उसके गले पर हाथ दबाया। साँस फूलने लगी। रुकसाना की आँखें लाल हो गईं, पर वह कमर और जोर से उचका रही थी। आदिल ने गला छोड़ा तो रुकसाना ने गहरी साँस ली और कहा, “फिर दबा… और जोर से…”
उसने रुकसाना को लिटाया, टाँगें कंधों पर रखीं और पूरा वजन डालकर चोदने लगा। चूत की दीवारें फटने को थीं। खून की हल्की धार भी निकल आई, पर आदिल नहीं रुका। रुकसाना रो रही थी और साथ में कराह रही थी, “और अंदर… गर्भ तक पहुँचा दे…”
दो घंटे तक आदिल ने उसे हर पोजीशन में लिया। डॉगी, मिशनरी, रुकसाना ऊपर बैठकर—हर बार बाल खींचे, गाल थप्पड़ मारे, निप्पल काटे, गांड पर जोरदार थप्पड़ लगाए। गांड लाल हो गई थी। आदिल ने उसकी गांड में भी उँगली घुसाई जबकि लंड चूत में था। रुकसाना पागल हो चुकी थी। वह खुद कह रही थी, “दोनों छेद फाड़ दे… माँ को जानवर बना दे…”
जब आदिल ने आखिरकार उसके अंदर पानी छोड़ा तो रुकसाना काँपते हुए झड़ गई। दोनों पसीने से तर थे। रुकसाना ने आदिल का लंड साफ किया, चाटा और फिर से खड़ा कर दिया। “रात अभी बाकी है बेटा।”
अगले तीन दिन नजमा कॉलेज ट्रिप पर थी। घर सिर्फ आदिल और रुकसाना का था। उन तीन दिनों में रुकसाना पूरी तरह आदिल की गुलाम बन गई। सुबह किचन में, दोपहर में बिस्तर पर, शाम को बाथरूम में। आदिल ने उसे बाँधकर भी चोदा। पुरानी साड़ी से हाथ-पैर बाँधे, आँखों पर पट्टी बाँधी और घंटों तक इस्तेमाल किया। रुकसाना को भूख-प्यास नहीं लगती थी। सिर्फ लंड चाहिए था।
एक रात आदिल ने रुकसाना को कुर्सी पर बैठाया, हाथ पीछे बाँधे और उसके मुँह में लंड ठूँस दिया। फिर पीछे से चूत में घुसाया। रुकसाना की आवाज नहीं निकल रही थी। आदिल ने उसके स्तनों को रस्सी से बाँधकर ऊपर खींचा। दर्द से रुकसाना का शरीर काँप रहा था, पर उसकी चूत और भी गीली हो गई थी। आदिल ने कहा, “आज से तू सिर्फ मेरी है। कोई और तुझे छूएगा तो मैं मार डालूँगा।” रुकसाना ने सिर हिलाया।
जब नजमा लौटी तो घर पहले जैसा लगने लगा, पर रातों को जब नजमा सो जाती तो रुकसाना आदिल के कमरे में आ जाती। कभी चुपके से, कभी बेझिझक। आदिल उसे बिस्तर पर लिटाता, कपड़े फाड़ता और बेरहमी से लेता। कभी-कभी रुकसाना खुद आकर घुटनों के बल बैठ जाती और कहती, “आज गांड में ले… कल वाली जगह अभी तक जल रही है।”
दो महीने बाद रुकसाना गर्भवती हो गई। आदिल ने पूछा तो वह बोली, “तेरा ही है। रख लूँगी। कोई पूछेगा तो कहूँगी बाहर का है।” आदिल ने उसका गला दबाया और कहा, “तू मेरी है। बच्चा भी मेरा होगा।” फिर उस रात उसने रुकसाना को इतना जोर से चोदा कि सुबह उसकी चलने-फिरने की हालत नहीं थी।
समय बीतता गया। आदिल कॉलेज छोड़कर काम करने लगा। रुकसाना घर संभालती रही। नजमा को कुछ शक जरूर हुआ, पर उसने कुछ नहीं कहा। रातें आदिल और रुकसाना की अपनी दुनिया बन गईं। जहाँ दर्द था, खून था, थप्पड़ थे, गाली थीं और प्यार भी था—एक क्रूर, भूखा, पागल प्यार।
रुकसाना कभी-कभी कहती, “मैं जानती हूँ ये गुनाह है। पर जब तू मुझे इस तरह तोड़ता है तो स्वर्ग मिलता है।” आदिल जवाब में उसके बाल पकड़कर खींचता और फिर से शुरू कर देता।
रुकसाना अब साफ तौर पर गर्भवती थी। पेट में हल्की सी सूजन आने लगी थी, स्तन और भारी हो गए थे, निप्पल काले और संवेदनशील।
आदिल को ये सब और भड़काता था। वह जानबूझकर उसके पेट पर हाथ फेरता, फिर जोर से दबाता और कहता, “ये मेरा बीज है। तू सिर्फ मेरी कुतिया है, माँ नहीं।” रुकसाना सिर झुकाकर हाँ में जवाब देती। नजमा को कुछ भी पता नहीं चलने दिया गया। वह कॉलेज और ट्यूशन में व्यस्त रहती, घर में रहती तो अपने कमरे में बंद।
एक रात नजमा अपने दोस्त के घर रुकने चली गई। आदिल ने फैसला किया कि आज रुकसाना को पूरी तरह तोड़ना है। उसने पुरानी लोहे की चारपाई के खंभों से रस्सी बाँधी। रुकसाना को नंगा करके चारपाई पर लिटाया। दोनों हाथ ऊपर खींचकर बाँधे, टाँगें फैलाकर पैरों को भी अलग-अलग खंभों से कस दिया। रुकसाना की चूत पूरी तरह खुली हुई थी, गर्भावस्था के कारण थोड़ी सूजी हुई। आदिल ने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया ताकि चीख बाहर न जाए।
पहले उसने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम रुकसाना के स्तनों पर टपकाया। निप्पल पर जब मोम गिरा तो रुकसाना का शरीर उछल पड़ा, आँखों से आँसू बह निकले। आदिल ने दोनों निप्पलों पर बार-बार मोम गिराया, फिर ठंडा होने से पहले नाखूनों से खुरच दिया। खून की पतली लकीरें निकल आईं। रुकसाना कराह रही थी, पर आदिल नहीं रुका। उसने मोम उसकी चूत के ऊपर भी गिराया। गर्म मोम गीली चूत पर लगा तो रुकसाना ने जोर से तड़पा, रस्सियाँ खनक उठीं।
आदिल ने एक पतली बेल्ट निकाली। पहले उसके जाँघों पर लगाई, फिर सीधे खुली चूत पर। हर थप्पड़ के साथ चूत लाल होती गई, सूज गई। दस-बारह थप्पड़ के बाद चूत से हल्का खून रिसने लगा। आदिल ने बेल्ट नीचे गांड पर भी चलाई। गांड के दोनों गोल हिस्से लाल हो गए, जगह-जगह निशान पड़ गए। रुकसाना रो रही थी, पर उसकी चूत अभी भी पानी छोड़ रही थी। आदिल ने उँगली से छुआ तो वह और खुल गई।
उसने रुकसाना के मुँह से कपड़ा निकाला। “अब बोल, तू क्या है?” रुकसाना ने टूटी आवाज में कहा, “तेरी रंडी… तेरी कुतिया… तेरा इस्तेमाल का सामान…” आदिल ने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया और अपना मोटा लंड उसके मुँह में ठूँस दिया। गले तक धकेला। रुकसाना की आँखें फटी की फटी रह गईं, साँस नहीं ले पा रही थी। आदिल ने उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गला खराब हो रहा था, लार मुँह से बह रही थी, पर आदिल तब तक नहीं रुका जब तक उसका पानी रुकसाना के गले में नहीं उतर गया। रुकसाना ने खाँसते हुए सब निगल लिया।
फिर आदिल चारपाई पर चढ़ गया। उसने रुकसाना की फैली हुई चूत में लंड रखा और एक ही धक्के में पूरा अंदर कर दिया। गर्भावस्था के कारण अंदर की जगह तंग और गर्म थी। रुकसाना चीख उठी। आदिल ने उसके गले पर हाथ रख दिया और बेरहमी से धक्के मारने लगा। हर धक्के पर चारपाई चरमरा रही थी। रुकसाना की चुचियाँ ऊपर-नीचे हो रही थीं, पेट हिल रहा था। आदिल ने एक हाथ से उसके पेट को दबाया, “मेरा बच्चा अंदर है… और मैं तुझे फाड़ रहा हूँ।”
वह बिना रुके चोदता रहा। जब रुकसाना की आवाज कमजोर पड़ने लगी तो उसने उसके गाल पर जोरदार थप्पड़ मारे। दोनों गाल लाल हो गए। फिर उसने रुकसाना की गांड में दो उँगलियाँ घुसा दीं जबकि लंड चूत में था। रुकसाना पागल हो चुकी थी। वह खुद कमर उचका-उचका कर कह रही थी, “और अंदर… दोनों छेद फाड़ दे… मार डाल अगर मरना हो तो…”
आदिल ने लंड निकाला और सीधे उसकी गांड में धँस दिया। एक बार में पूरा। रुकसाना की चीख घर में गूँज गई। आदिल ने उसके मुँह पर फिर से हाथ रख दिया और गांड फाड़ने लगा। खून की धार निकल आई, पर आदिल और तेज हो गया। वह रुकसाना के बाल पकड़कर सिर पीछे खींच रहा था, गला दबा रहा था, और गांड में पूरी ताकत से धक्के मार रहा था। रुकसाना का शरीर काँप रहा था, आँखें पलटने लगी थीं, पर चूत अभी भी पानी छोड़ रही थी।
जब आदिल ने आखिरकार गांड के अंदर पानी छोड़ा तो रुकसाना बेहोश जैसी हो गई। आदिल ने रस्सियाँ खोलीं। रुकसाना बिस्तर पर गिर पड़ी, पूरे शरीर पर मोम, खून, थप्पड़ के निशान और पसीना। आदिल ने उसके बालों को पकड़कर सिर उठाया और कहा, “अब से हर रात यही होगा। जब तक तू साँस ले रही है।”
अगले दिन रुकसाना चल भी नहीं पा रही थी। आदिल ने उसे नहलाया, फिर से बाँधा, और दिन में भी इस्तेमाल किया। कभी किचन की मेज पर लिटाकर, कभी दीवार से सटाकर। वह उसके स्तनों को रस्सी से बाँधकर ऊपर खींचता, निप्पल पर क्लिप लगाता, और घंटों तक छोड़ देता। रुकसाना रोती, भीख माँगती, फिर खुद कहती, “और सख्ती कर… मैं सह सकती हूँ।”
एक हफ्ते बाद आदिल ने नया खेल शुरू किया। उसने रुकसाना को कुर्सी पर बैठाया, हाथ-पैर बाँधे, और उसके चेहरे के सामने अपना लंड रखा। “चाट। सिर्फ जीभ से।” रुकसाना ने चाटा। आदिल ने उसके सिर पर थूक दिया, फिर उसके मुँह में थूककर कहा, “निगल।” रुकसाना ने निगल लिया। फिर आदिल ने उसे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया और उसके चेहरे पर बैठ गया। “चाट। साफ कर।” रुकसाना ने उसकी गांड और लंड दोनों को जीभ से साफ किया। आदिल ने उसका सिर दबाकर रखा जब तक वह साँस के लिए तड़पने नहीं लगी।
रात को आदिल ने रुकसाना को फिर चारपाई पर बाँधा। इस बार उसने उसकी चूत में एक मोटा खीरा घुसाया, गांड में उँगली, और खुद उसके मुँह का इस्तेमाल किया। तीनों छेद एक साथ भरे हुए थे। रुकसाना की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे, पर शरीर काँप-काँप कर झड़ रहा था। आदिल ने खीरा निकालकर अपना लंड डाल दिया और इतनी बेरहमी से चोदा कि रुकसाना का होश उड़ गया।
गर्भावस्था बढ़ने के साथ आदिल और क्रूर होता गया। वह जानबूझकर उसके पेट पर वजन डालता, स्तनों को दाँतों से काटता, और कहता, “बच्चा निकले या न निकले, तू तो मेरी ही रहेगी।” रुकसाना अब खुद ही रस्सी लेकर आ जाती। “आज और सख्ती से बाँध… आज और दर्द दे।” आदिल उसके चाहने पर और आगे बढ़ जाता। कभी सिगरेट की तली उसके जाँघों पर लगाई, कभी सुई से हल्के-हल्के चुभाया, कभी घंटों तक बाँधकर भूखा-प्यासा छोड़ दिया और फिर अचानक आकर फाड़ दिया।
नजमा को कभी-कभी शक होता। एक रात उसने आवाजें सुनीं। वह दरवाजे के पास खड़ी रही, पर अंदर नहीं गई। सुबह रुकसाना के गले और कलाई पर निशान देखकर भी चुप रही। घर में एक अजीब सा सन्नाटा और तनाव बना रहता, पर कोई कुछ नहीं बोलता।
आदिल अब रुकसाना को सिर्फ शरीर नहीं, दिमाग से भी तोड़ चुका था। वह उसे गालियाँ देता, थूकता, फिर प्यार से बाल सहलाता और फिर से मारना शुरू कर देता। रुकसाना हर दर्द को सहती और माँगती। वह कहती, “अगर तूने मुझे छोड़ दिया तो मैं मर जाऊँगी। मुझे इसी तरह तोड़ते रह।”
एक रात, जब रुकसाना का पेट साफ दिखने लगा था, आदिल ने उसे फर्श पर लिटाया, टाँगें कंधों तक मोड़ीं और पूरा वजन डालकर चोदा। रुकसाना की साँस फूल रही थी, आँखें लाल थीं, मुँह से लार बह रही थी। आदिल उसके कान में बोला, “तू मेरी है। हमेशा के लिए। नजमा हो या दुनिया, कोई तुझे मुझसे नहीं छीन सकता।” रुकसाना ने फटी आवाज में जवाब दिया, “हाँ… सिर्फ तेरी… फाड़ दे मुझे… पूरी तरह…”
आदिल ने उसी रात उसके दोनों छेद बारी-बारी से फाड़े, स्तनों पर दाँत गाड़ दिए, गला दबाकर रखा और आखिर में उसके चेहरे पर पानी छोड़ दिया। रुकसाना थककर वहीं सो गई, शरीर पर निशान, खून और आदिल का पानी चिपका हुआ।
सुबह आदिल ने उसे उठाया, नहलाया, और फिर से बाँध दिया। क्योंकि दोनों जानते थे—ये खेल अब खत्म होने वाला नहीं था। जितना दर्द बढ़ेगा, उतना ही वे एक-दूसरे में डूबते जाएँगे। रुकसाना की साँसें और आदिल का लंड—दोनों एक ही आग में जल रहे थे, और आग बुझने का नाम नहीं ले रही थी।
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