47 साल की मोटी पड़ोसन की चुदाई

22 साल के विक्रम ने 47 साल की मोटी पड़ोसन सुनीता को रातभर रस्सी से बांधकर गला घोंटा, गांड फाड़ी, मुंह में ठूंसा और दर्द से तड़पाते हुए पूरी तरह अपनी बेजुबान कुतिया बना डाला।

रात के 12 बज चुके थे। 22 साल का विक्रम अपने कमरे में अकेला बैठा था। मोबाइल पर पोर्न चला रहा था, साउंड पूरी तरह म्यूट। स्क्रीन पर एक मोटी औरत को चार आदमियों ने घेर रखा था। विक्रम का हाथ पैंट के अंदर था, धीरे-धीरे हिला रहा था। तभी दरवाजे पर जोर से दस्तक हुई।

“विक्रम! उठो बेटा!” माँ की आवाज आई। “सुनीता दीदी अकेली हैं। उनके घर जाओ। आज रात उनके पति ड्यूटी पर हैं और बेटा भी बाहर गया है।”

विक्रम ने गुस्से से मोबाइल बंद किया। पोर्न अधूरा छोड़ना अच्छा नहीं लगता। लेकिन माँ की बात टालना भी मुश्किल था। उसने पैंट ठीक की, चेहरे पर नॉर्मल एक्सप्रेशन लाया और पड़ोस के फ्लैट की तरफ चला गया।

सुनीता दीदी 47 साल की थीं। गोरी, भारी शरीर, चौड़ी कूल्हे, मोटे जांघें और बड़े-बड़े स्तन जो साड़ी के अंदर भी साफ दिखते थे। उनकी कमर मोटी थी, पेट थोड़ा बाहर निकला हुआ, लेकिन गांड इतनी बड़ी और गोल थी कि पीछे से देखने पर साड़ी तन जाती थी। विक्रम ने कई बार उन्हें बाजार में देखा था। आज पहली बार रात को उनके घर अकेले जाना था।

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दरवाजा खुला। सुनीता दीदी ने हल्की मुस्कान दी। “आ जाओ विक्रम। अंदर आओ। अकेला रहना अच्छा नहीं लगता।”
घर में हल्की रोशनी थी। टीवी चालू था। सुनीता दीदी ने साड़ी की पल्लू ठीक की। विक्रम सोफे पर बैठ गया। दीदी रसोई से पानी लेकर आईं।
“कुछ खाओगे?”
“नहीं दीदी। खा लिया है।”

थोड़ी देर चुप्पी रही। फिर सुनीता दीदी ने अचानक पूछा, “विक्रम… बता सच। क्या मैं बहुत मोटी लगती हूँ?”
विक्रम ने उनकी तरफ देखा। “नहीं दीदी। आप तो अच्छी लगती हैं।”
सुनीता दीदी खड़ी हो गईं। साड़ी के अंदर उनका शरीर हिल रहा था। उन्होंने मुड़कर अपनी गांड की तरफ इशारा किया। “पीछे से देखो। आजकल के लड़के बाजार में बोलते हैं… देखो कितनी मोटी गांड है इस औरत की। चलते-चलते हिलती है।”

विक्रम की सांस तेज हो गई। पोर्न के सीन याद आ गए। उसने दीदी की गांड को ध्यान से देखा। साड़ी के अंदर दो बड़े-बड़े गोल हिस्से साफ उभर रहे थे। “दीदी… आपकी गांड तो बहुत अच्छी है। साइज सही है। मोटी नहीं… भरपूर है।”
सुनीता दीदी मुस्कुराईं। “सच बोल रहे हो? 42 साइज है ये। आजकल के लड़के तो बुरी-बुरी बातें करते हैं।”
विक्रम ने हिम्मत की। “क्या बातें करते हैं दीदी?”

सुनीता दीदी सोफे पर बैठ गईं। उनकी जांघें थोड़ी फैल गईं। “एक ने कहा था… इस मोटी आंटी को पकड़कर साड़ी ऊपर कर दूं तो मजा आ जाए। दूसरे ने कहा… इसकी गांड में मुंह मारूं तो स्वर्ग मिल जाए।”
विक्रम का लंड पैंट में तन गया। उसने अपनी टांगें एडजस्ट कीं। “दीदी… वो बेवकूफ हैं। आप जैसी औरत को सही तरीके से तारीफ करनी चाहिए।”

सुनीता दीदी ने आंखें मीचीं। “तुम कैसे तारीफ करोगे?”
विक्रम ने आवाज धीमी की। “दीदी… आपकी गांड इतनी गोल और नरम है कि हाथ रखने का मन करता है। स्तन इतने भारी हैं कि दबाने में मजा आए। जांघें इतनी मोटी हैं कि उनके बीच सर घुसाने का मन करे।”

सुनीता दीदी की सांस तेज हो गई। उन्होंने खड़े होकर अपनी साड़ी का पल्लू गिरा दिया। ब्लाउज और पेटीकोट में आ गईं। “लाइट बंद कर दो विक्रम। और बेडरूम में चलो।”
कमरा अंधेरा हो गया। सिर्फ खिड़की से थोड़ी रोशनी आ रही थी। सुनीता दीदी बिस्तर पर लेट गईं। “मेरे पैरों पर तेल लगा दो। सोने में मदद मिलती है।”

विक्रम ने तेल की बोतल ली। दीदी के पैरों से शुरू किया। धीरे-धीरे पिंडलियों पर गया। फिर घुटनों पर। सुनीता दीदी ने आंखें बंद कर लीं। “ऊपर भी लगा दो… जांघों पर।”
विक्रम के हाथ पेटीकोट के अंदर चले गए। गोरी, मुलायम, मोटी जांघें। उसने दोनों हाथों से जांघों को सहलाया। उंगलियां अंदर की तरफ बढ़ीं। सुनीता दीदी ने पैर थोड़े और फैला दिए।

“दीदी… वो लड़के और क्या बोलते थे?”
सुनीता दीदी की आवाज भारी हो गई। “एक ने कहा था… इस आंटी को लिटाकर उसके ऊपर चढ़ जाऊं। उसके बड़े स्तन दबाऊं। उसके मुंह में लंड ठूंस दूं। गांड में उंगली करूं।”

विक्रम ने पेटीकोट ऊपर कर दिया। सुनीता दीदी ने पैंटी नहीं पहनी थी। उनकी चूत हल्के बालों वाली थी, गुलाबी, थोड़ी गीली। विक्रम ने उंगली वहां रख दी। धीरे से सहलाया।
“ओह्ह…” सुनीता दीदी कराह उठीं।

विक्रम ने दो उंगलियां अंदर घुसा दीं। चूत गीली और गरम थी। उसने जोर से अंदर-बाहर करना शुरू किया। सुनीता दीदी के स्तन ब्लाउज के अंदर हिल रहे थे। विक्रम ने एक हाथ से ब्लाउज के बटन खोले। बड़े-बड़े, भारी, लटकते हुए स्तन बाहर आ गए। निप्पल काले और कड़े थे। उसने मुंह लगाकर एक निप्पल चूस लिया। दांतों से काटा।

सुनीता दीदी ने उसके बाल पकड़ लिए। “जोर से… और जोर से चूस।”
विक्रम ने दोनों स्तनों को दोनों हाथों से दबाया। इतनी जोर से कि उंगलियों के निशान पड़ गए। फिर उसने दीदी को पलट दिया। पेट के बल लिटाया। गांड उसके सामने थी। बड़ी, गोल, गोरी, दोनों हिस्से अलग-अलग। उसने दोनों हाथों से गांड के गालों को फैलाया। बीच में गुदा साफ दिख रही थी।

उसने थूक लगाकर एक उंगली गुदा में घुसा दी। सुनीता दीदी चीख पड़ीं। “आह्ह्ह… धीरे…”
विक्रम ने नहीं सुना। दो उंगलियां गुदा में ठूंस दीं। जोर-जोर से अंदर-बाहर करने लगा। दूसरी हाथ से चूत में तीन उंगलियां घुसा दीं। दोनों छेद एक साथ फड़फड़ा रहे थे।

“कुत्ते की तरह भौंक,” विक्रम ने कहा। आवाज में कठोरता थी।
सुनीता दीदी ने शरमाते हुए भौंका। “भौं… भौं…”
विक्रम ने अपनी पैंट उतार दी। उसका लंड मोटा, लंबा, नसों वाला था। उसने सुनीता दीदी की गांड के ऊपर थप्पड़ मारा। जोर का। लाल निशान पड़ गया। फिर दूसरा थप्पड़। तीसरा। सुनीता दीदी कराह रही थीं, लेकिन गांड और ऊपर उठा रही थीं।

विक्रम ने लंड चूत के मुंह पर रखा और एक झटके में अंदर घुसा दिया। पूरा। सुनीता दीदी की चीख निकल गई। “मार गया… बहुत मोटा है…”
विक्रम ने कमर पकड़ ली। जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के में उसके अंडकोष दीदी की गांड से टकरा रहे थे। चूत की आवाज गीली-गीली आ रही थी। स्तन बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे।

“बोल… तुझे चोदना चाहिए था उन लड़कों को,” विक्रम ने कहा।
“हां… चोदना चाहिए था… मुझे पकड़कर… साड़ी फाड़कर… सब मिलकर…” सुनीता दीदी हांफ रही थीं।
विक्रम ने बाल पकड़कर उनका सिर पीछे खींचा। और जोर से धक्के मारे। फिर उसने लंड निकाला और गुदा के मुंह पर रखा। बिना किसी चेतावनी के अंदर धकेल दिया।

सुनीता दीदी जोर से चिल्लाईं। “नहीं… बहुत दर्द… निकाल…”
विक्रम ने नहीं निकाला। बल्कि और अंदर धकेल दिया। पूरा लंड गुदा में समा गया। उसने कमर पर जोर से थप्पड़ मारे और धक्के शुरू कर दिए। गुदा की दीवारें कस रही थीं। सुनीता दीदी के आंसू निकल आए थे, लेकिन वे गांड और ऊपर उठा रही थीं।
“चुपचाप लेट। दर्द सह।” विक्रम की आवाज ठंडी थी।

उसने दीदी के दोनों हाथ पीठ के पीछे बांध दिए। चादर के टुकड़े से। फिर बाल पकड़कर मुंह में अपनी उंगलियां ठूंस दीं। दीदी घुटने टेककर बैठी थीं, गांड ऊपर, मुंह खुला। विक्रम ने गुदा में और जोर से धक्के मारे। हर धक्के के साथ दीदी की आवाज दब रही थी।

थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला। सुनीता दीदी को पीठ के बल लिटाया। टांगें उनके कंधों पर रख दीं। चूत में फिर से घुसा दिया। इस बार और गहरा। उसने एक हाथ से उनका गला दबाया। हल्का। फिर जोर से। सुनीता दीदी की आंखें लाल हो गईं, लेकिन वे हिप ऊपर उठा रही थीं।

“तुझे इस्तेमाल करूंगा,” विक्रम ने कहा। “जब चाहूंगा। जैसे चाहूंगा।”
सुनीता दीदी ने सिर हिलाया। आंसू और पसीने से चेहरा भीगा था।
विक्रम ने उन्हें कुत्ते की पोजीशन में कर दिया। बाल पकड़कर खींचा। गांड पर लगातार थप्पड़ मारते हुए चोदता रहा। कभी चूत में, कभी गुदा में। दोनों छेद लाल और सूजे हुए थे। स्तन इधर-उधर हिल रहे थे। निप्पल इतने कड़े हो गए थे कि छूने पर दर्द हो रहा था।

अंत में विक्रम ने सुनीता दीदी को घुटनों पर बैठाया। उनका मुंह खोला और लंड अंदर ठूंस दिया। गले तक। दीदी की आंखों से आंसू बह रहे थे। विक्रम ने उनके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से हिलाया। मुंह की लार बह रही थी। गले में आवाज घुट रही थी।
जब वह करीब आया तो उसने लंड निकालकर उनके चेहरे पर झाड़ दिया। गर्म वीर्य माथे, आंखों, मुंह और स्तनों पर गिरने लगा। सुनीता दीदी ने जीभ बाहर निकालकर चाटा।

विक्रम ने उन्हें बिस्तर पर धकेल दिया। “अब सो जा। कल फिर आऊंगा।”
सुनीता दीदी बिस्तर पर लेटी रहीं। शरीर दर्द से कांप रहा था। गांड और चूत दोनों से वीर्य और लार बह रहा था। उन्होंने धीरे से मुस्कुराया।
“आना… जरूर आना।”

रात अभी खत्म नहीं हुई थी। विक्रम घर पहुंचकर भी शांत नहीं हो पाया। उसका लंड फिर से तन चुका था। सुनीता दीदी का शरीर, उनकी चीखें, उनकी गीली चूत और तंग गुदा… सब कुछ दिमाग में घूम रहा था। उसने तय किया—वापस जाना है। अभी।

दो बज रहे थे। गली बिल्कुल सुनसान। उसने सुनीता दीदी के फ्लैट का दरवाजा धीरे से खटखटाया। कोई जवाब नहीं आया। फिर जोर से। दरवाजा खुला। सुनीता दीदी सिर्फ एक पतली नाइटी में खड़ी थीं। आंखें नींद से भारी, गले पर उंगलियों के निशान, स्तनों पर दांत के निशान, जांघों पर लाल निशान।

विक्रम ने बिना एक शब्द बोले अंदर घुसकर दरवाजा बंद कर दिया। ताला लगा दिया।
“कपड़े उतार,” उसने सीधी आवाज में कहा।
सुनीता दीदी कांप उठीं। “विक्रम… इतनी रात को…”
“कपड़े उतार। वरना खुद फाड़ दूंगा।”

उसने नाइटी के दोनों कंधे पकड़कर नीचे खींच दिए। कपड़ा फटते हुए उनके शरीर से अलग हो गया। अब वे पूरी तरह नंगी थीं। बड़े-बड़े लटकते स्तन, मोटा पेट, चौड़ी कमर, और वह भारी गांड जो अभी भी लाल थी। चूत और गुदा दोनों थोड़े सूजे हुए थे।
विक्रम ने उन्हें बालों से पकड़कर घसीटते हुए बेडरूम ले गया। बिस्तर पर पटक दिया। “घुटने के बल बैठ। हाथ पीछे।”

सुनीता दीदी ने वैसा ही किया। विक्रम ने बेल्ट निकाली और उनके दोनों हाथों को पीठ के पीछे कसकर बांध दिया। इतना कसकर कि हाथों में दर्द होने लगा। फिर उसने बेल्ट का बाकी हिस्सा उनके गले में लपेटा और खींच लिया। सुनीता दीदी की सांस रुकने लगी।
“अब तू मेरी कुतिया है,” विक्रम ने कहा। “बोल।”
“मैं… मैं आपकी कुतिया हूं…” आवाज घुटी हुई निकली।

विक्रम ने उनके मुंह में अपनी दो उंगलियां ठूंस दीं। गले तक। सुनीता दीदी ने गैग किया, आंसू निकल आए। उसने उंगलियां और अंदर धकेलीं। “चाट। साफ कर।”
सुनीता दीदी ने जीभ से उसकी उंगलियां चाटना शुरू किया। लार बह रही थी। विक्रम ने उंगलियां निकालीं और उनके चेहरे पर थप्पड़ मारा। जोर का। गाल लाल हो गया। फिर दूसरा थप्पड़। तीसरा। सुनीता दीदी का सिर इधर-उधर हिल रहा था, लेकिन वे चुपचाप सह रही थीं।

उसने अपनी पैंट उतारी। लंड पहले से कड़ा था, नसें फूली हुई। उसने सुनीता दीदी के बाल पकड़कर उनका मुंह लंड पर खींच लिया। पूरा अंदर। नाक उनकी गांड से छू रही थी। गले में लंड फंस गया। सुनीता दीदी घुटने-घुटने कर रही थीं, लेकिन विक्रम ने सिर को और जोर से दबाया। दस सेकंड। बीस सेकंड। जब उन्होंने हाथ-पैर पटकने शुरू किए तो उसने निकाला। सुनीता दीदी जोर-जोर से हांफ रही थीं, लार और आंसू चेहरे पर फैले हुए।

“फिर से,” विक्रम ने कहा।
फिर से वही। और गहरा। और देर तक। इस बार जब निकाला तो सुनीता दीदी की आंखें लाल हो चुकी थीं। उन्होंने खांसते हुए कहा, “कृपया… थोड़ा धीरे…”

विक्रम ने हंसकर उनके बाल खींचे। “धीरे? तूने कहा था उन लड़कों को तुझे चोदना चाहिए था। आज मैं वही कर रहा हूं। और भी बुरा।”
उसने सुनीता दीदी को पेट के बल लिटा दिया। हाथ बंधे हुए। गांड ऊपर। उसने दोनों गालों को जोर से फैलाया और थूक लगाकर अपना लंड गुदा के मुंह पर रखा। बिना रुके एक झटके में अंदर धकेल दिया। पूरा।

सुनीता दीदी की चीख घर में गूंज गई। “आह्ह्ह्ह… फट गई… निकाल… दर्द…”
विक्रम ने कमर पकड़ ली और जोर-जोर से धक्के मारने लगे। हर धक्के में उनके अंडकोष गांड से टकरा रहे थे। गुदा की दीवारें फटने के कगार पर थीं। उसने एक हाथ से उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और दूसरे हाथ से गांड पर लगातार थप्पड़ मारने लगा। लाल निशान पड़ते जा रहे थे। कुछ जगहों पर हल्के नीले पड़ने शुरू हो गए।

“बोल… तुझे दर्द में मजा आ रहा है,” विक्रम ने कहा।
“हां… मजा… आ रहा है…” सुनीता दीदी की आवाज टूट रही थी।
विक्रम ने लंड निकाला। गुदा खुली रह गई थी, थोड़ी खून की धार भी दिख रही थी। उसने तुरंत चूत में घुसा दिया। गीली और गरम। उसने दोनों छेदों को बारी-बारी इस्तेमाल करना शुरू किया। तीन धक्के गुदा में, पांच धक्के चूत में। सुनीता दीदी का शरीर कांप रहा था। स्तन बिस्तर पर रगड़ खा रहे थे, निप्पल छिलने लगे थे।

थोड़ी देर बाद विक्रम ने उन्हें पलट दिया। टांगें उनके कंधों तक मोड़ दीं। लगभग दोहरी हो गईं। चूत पूरी तरह खुली। उसने लंड अंदर ठूंसकर गला दबाना शुरू किया। एक हाथ से गला, दूसरे हाथ से स्तन को इतनी जोर से मसल रहा था कि उंगलियों के निशान गहरे पड़ गए। सुनीता दीदी की आंखें फटी की फटी रह गईं। सांस नहीं आ रही थी। चेहरा लाल हो गया। जब वे बेहोशी के करीब पहुंचीं तो विक्रम ने गला छोड़ दिया। वे जोर-जोर से खांसने लगीं।

“अभी और बाकी है,” उसने कहा।
उसने अलमारी से एक मोटा मोमबत्ती निकाली। सुनीता दीदी की आंखें डर से फैल गईं। विक्रम ने मोमबत्ती को उनके मुंह में ठूंस दिया। “चुस। भीगने दे।”

फिर उसने मोमबत्ती को चूत में घुसा दिया। पूरा। सुनीता दीदी कराह उठीं। विक्रम ने मोमबत्ती को अंदर-बाहर करना शुरू किया। जोर से। कभी-कभी घुमाते हुए। दूसरी तरफ उसने अपनी उंगलियां गुदा में ठूंस दीं। चार उंगलियां। मुट्ठी बनाने की कोशिश की। सुनीता दीदी चीख रही थीं, शरीर ऐंठ रहा था, लेकिन हाथ बंधे होने की वजह से कुछ नहीं कर पा रही थीं।

विक्रम ने मोमबत्ती निकाली और अपने लंड की जगह पर रख दी। फिर से गुदा में। इस बार और क्रूर। उसने दीदी के दोनों स्तनों को पकड़कर ऊपर खींचा और धक्के मारते हुए उनके निप्पलों को दांतों से काटने लगा। खून की हल्की बूंदें निकलीं। सुनीता दीदी रो रही थीं, लेकिन उनके मुंह से सिर्फ “और… और जोर से…” निकल रहा था।

घंटे भर तक यही चला। विक्रम ने उन्हें हर पोजीशन में इस्तेमाल किया। कुत्ते की तरह, मेंढक की तरह, उल्टा लटकाकर, बालों से खींचते हुए। कभी चेहरे पर थूका, कभी गांड पर, कभी मुंह में। जब वह करीब आया तो उसने सुनीता दीदी को घुटनों पर बैठाया, बाल पकड़कर मुंह खोला और गले के अंदर वीर्य की धार छोड़ दी। इतना कि सुनीता दीदी को निगलने में तकलीफ हुई। बचा हुआ उनके चेहरे और स्तनों पर रगड़ दिया।

सुनीता दीदी बिस्तर पर गिर गईं। शरीर कांप रहा था। गांड और चूत दोनों से वीर्य, लार और थोड़ा खून बह रहा था। गले पर, स्तनों पर, जांघों पर, गांड पर—सब जगह निशान थे। आंखें सूजी हुईं।
विक्रम ने बेल्ट खोली। हाथ मुक्त हो गए। सुनीता दीदी ने तुरंत अपने हाथों से अपनी चूत और गुदा को सहलाना शुरू किया। दर्द में भी आनंद ले रही थीं।

विक्रम ने कपड़े पहने। दरवाजे की तरफ बढ़ा। फिर रुका।
“कल रात फिर आऊंगा। और इस बार और सामान लाऊंगा। रस्सी, चिमटा, मोम… सब। तू तैयार रहना।”
सुनीता दीदी ने कमजोर आवाज में कहा, “आना… जरूर आना… मुझे और चाहिए… और बुरा… और दर्द…”
विक्रम मुस्कुराया। दरवाजा खोला और अंधेरी गली में निकल गया।

सुनीता दीदी बिस्तर पर लेटी रहीं। शरीर जल रहा था, लेकिन मन में एक अजीब सी भूख जाग गई थी। कल रात का इंतजार अब शुरू हो चुका था। और इस बार विक्रम कोई रहम नहीं रखने वाला था।

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