भाई का क्रूर शिकार

शादीशुदा बहन को भाई ने रस्सियों से बाँधकर चाबुक, मोम और मुट्ठी से चूत-गांड फाड़ी। गला घोंट-घोंटकर वीर्य भरा, दर्द में तड़पाती रंडी को बार-बार तोड़ा। घर की दीवारें चुप रहीं।

ये कहानी एक सच्चे अनुभव पर आधारित है। मेरा नाम अमित है। मैं लखनऊ (उत्तर प्रदेश) से हूँ। उम्र 24 साल, लंबाई 6 फीट 1 इंच। शरीर कसा हुआ, चौड़ा सीना और लोग कहते हैं कि मेरी आँखों में एक जंगली भूख छिपी रहती है। मेरा लंड 8.5 इंच लंबा और मोटा है, नसें उभरी हुई, सुपारा भारी। मुझे लड़कियों में सिर्फ मस्ती नहीं, पूरा कब्जा चाहिए। दर्द, हुक्म, और बेबसी का स्वाद।

मेरी मौसी की बेटी नीलम। रिश्ते में मेरी कजिन, लेकिन उम्र में मुझसे दो साल छोटी—22 साल। गोरा बदन, 36-28-36 का फिगर, लंबे काले बाल कमर तक, और होंठ ऐसे जैसे कोई पके आम को काटने का मन करे। उसकी आँखें बड़ी-बड़ी, लेकिन उनमें एक छिपी हुई भूख थी जो मैंने पहली नज़र में पहचान ली।

मैं कानपुर से लखनऊ आया था अपने मास्टर डिग्री के फाइनल सेमेस्टर की प्रोजेक्ट रिपोर्ट लिखने के लिए। मौसी का घर शांत इलाके में था। नीलम घर में अकेली रहती थी ज़्यादातर, क्योंकि मौसी-मौसा दोनों बाहर जॉब पर रहते थे। पहले हफ़्ते हम सिर्फ बातें करते रहे—किताबें, सीरीज़, पुरानी यादें। लेकिन तीसरे दिन रात को जब मैं बालकनी में सिगरेट पी रहा था, नीलम पास आई। उसने काला सिल्क का नाइटी पहना था। निप्पल साफ़ उभर रहे थे।

“अमित भैया… तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड है?” उसने सीधा पूछा।
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, “नहीं। और तुम्हारा बॉयफ्रेंड?”
“कोई नहीं। सब नरम किस्म के निकलते हैं। मुझे कोई ऐसा चाहिए जो… जो मुझे तोड़ दे।”
उस रात मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन नींद नहीं आई।

अगली सुबह नीलम बाथरूम से निकली। सिर्फ तौलिया लपेटे। पानी की बूँदें गर्दन से सीने तक बह रही थीं। तौलिया ढीला था। एक झलक में उसका एक मम्मा पूरी तरह बाहर आ गया—गुलाबी निप्पल, सख्त। उसने देखा कि मैं घूर रहा हूँ। मुस्कुराई और तौलिया और ढीला कर दिया। फिर बाथरूम का दरवाज़ा बंद कर लिया।

मैंने कंट्रोल खो दिया। बाथरूम का लॉक कमज़ोर था। मैंने धक्का दिया। दरवाज़ा खुला। नीलम नंगी खड़ी थी। पानी की बूँदें जाँघों से नीचे टपक रही थीं। उसने चीखने की कोशिश की, लेकिन मैंने मुँह दबा लिया।
“चुप। एक आवाज़ निकली तो मौसी को फोन कर दूँगा कि उनकी बेटी कितनी खुली घूमती है।”

उसकी आँखों में डर और उत्तेजना दोनों थे। मैंने तौलिया फेंक दिया। दोनों हाथों से उसके मम्मों को ज़ोर से मसला। निप्पल को दाँतों से काटा। नीलम की साँसें तेज़ हो गईं। “आह… दर्द… लेकिन मत छोड़ो…”
मैंने उसे बालों से पकड़कर घुटनों के बल बैठा दिया। अपना लंड निकाला और उसके मुँह पर थपथपाया। “खोल। पूरा।”

उसने पहले मना किया। मैंने गाल पर एक थप्पड़ मारा—ज़ोरदार। लाल निशान पड़ गया। फिर उसने मुँह खोला। मैंने पूरा लंड एक झटके में उसके गले तक धकेल दिया। नीलम ने उबकाई दी, आँसू बह निकले, लेकिन मैंने सर पकड़ रखा था। आगे-पीछे। गला खराब होने तक। जब लार और थूक उसकी ठुड्डी से टपकने लगे, तब मैंने निकाला।
“अब उठ। बेड पर जा।”

उसके कमरे में ले जाकर मैंने उसे चारों हाथ-पैर बाँध दिए। बिस्तर के खंभों से। रेशमी स्कार्फ से। नीलम ने विरोध किया, लेकिन उसकी आवाज़ में डर के साथ मज़ा भी था। मैंने उसकी चूत को देखा—मुट्ठी भरी, बाल कटे हुए, गुलाबी। दो उँगलियाँ अंदर डालकर फैलाया। फिर तीन। नीलम चीखी।
“चुप रह। नहीं तो मुँह में कपड़ा ठूँस दूँगा।”

मैंने क्रीम नहीं लगाई। सूखा ही अपना मोटा लंड उसकी चूत के मुँह पर रखा और एक जोरदार धक्का मारा। आधा लंड अंदर घुस गया। नीलम की आँखें फटी की फटी रह गईं। खून की एक पतली लकीर निकली। पहली बार थी।
“निकालो… दर्द हो रहा है… बहुत…”

मैंने दूसरा धक्का मारा। पूरा लंड अंदर। उसकी चीख को मैंने अपने मुँह से दबा लिया। किस करते हुए मैंने उसे चोदना शुरू किया—तेज़, गहरा, बिना रुके। हर झटके पर उसके मम्मे हिल रहे थे। मैंने निप्पल को दाँतों से दबाया और खींचा। नीलम की आवाज़ बदल गई—दर्द से सिसकियाँ, फिर धीरे-धीरे कराह।

दस मिनट बाद मैंने उसके अंदर ही झड़ दिया। गर्म रस उसकी चूत में भर गया। खून और मेरे पानी का मिश्रण जाँघों से नीचे बह रहा था। मैंने लंड निकाला तो वह खुली हुई, लाल, सूजी हुई चूत देखकर मुस्कुराया।
“अब मुँह खोल। चूस। अपना खून और मेरा रस दोनों।”

नीलम ने सिर हिलाया। मैंने उसके बाल पकड़कर सर नीचे किया। उसने चूसा—गंदी, नमकीन, खूनी। मैंने फिर से खड़ा कर लिया। इस बार उसे घोड़ी बनाया। कमर पकड़कर इतनी ज़ोर से पेलने लगा कि बिस्तर चरमरा रहा था। नीलम दो बार झड़ गई, लेकिन मैं रुका नहीं। तीसरी बार जब मैंने अंदर डाला, तो उसने रोते हुए कहा, “बस… और नहीं…”

मैंने उसके मुँह में उँगलियाँ ठूँस दीं। “बोलने की इजाज़त मैं दूँगा।”
रात भर हमने चार बार किया। एक बार मैंने उसकी गांड भी ली। सूखी। उसने चीख-चीख कर कहा कि फट जाएगी, लेकिन मैंने धीरे-धीरे पूरा धकेल दिया। खून फिर निकला। सुबह तक नीलम चल नहीं पा रही थी। जाँघों के अंदर नीले निशान, गर्दन पर दाँत के निशान, कलाई पर रस्सी के निशान।

मैंने मेडिकल स्टोर से दर्द की दवा और आपातकालीन गर्भनिरोधक गोलियाँ लाकर दीं। “आज से तुम मेरी हो। जब मैं कहूँगा, फैल जाओगी। जब मैं कहूँगा, चूसोगी। विरोध किया तो घरवालों को सब बता दूँगा—कैसे तुम खुद मेरे कमरे में आईं, कैसे मुस्कुराईं।”
नीलम ने आँसू पोंछते हुए सिर हिलाया।

उसके बाद के तीन हफ़्ते नर्क और स्वर्ग दोनों थे। दिन में वह सामान्य कजिन बनकर रहती। रात को मेरी गुलाम। कभी मैंने उसे रसोई में टेबल पर चोदा जबकि मौसी के आने का समय नज़दीक था। कभी बालकनी में, जहाँ पड़ोसी देख सकते थे। कभी उसकी गांड में मोमबत्ती जलाकर मोम गिराया। कभी उसके निप्पल पर क्लिप लगाकर छोड़ दिया पूरे दिन के लिए।

एक रात मैंने उसे पूरी तरह बाँध दिया—हाथ पीछे, टाँगें फैली हुई। आँखों पर पट्टी। फिर आइस क्यूब उसकी चूत में डाले और तुरंत गरम लंड। नीलम पागल हो गई थी। वह खुद माँगने लगी—“और ज़ोर से… मारो… तोड़ दो मुझे…”
मैंने उसकी चूत को इतना चौड़ा कर दिया कि मेरी मुट्ठी अंदर तक चली जाती थी। वह चीखती, रोती, फिर झड़ती। मैंने उसके मुँह में अपना मोजा ठूँस दिया था ताकि आवाज़ न निकले।

आखिरी हफ़्ते में मौसी-मौसा घर आने वाले थे। नीलम ने कहा, “अमित… शादी की बात चल रही है। अगले महीने किसी से…”
मैंने उसके बाल पकड़कर सर पीछे खींचा। “शादी के बाद भी जब मैं बोलूँगा, तुम आओगी। समझी? वरना तुम्हारे पति को सारी तस्वीरें भेज दूँगा जो मैंने बनाई हैं।”

उसकी आँखों में डर था, लेकिन चूत गीली हो गई थी।
उस रात मैंने उसे आखिरी बार इतना बर्बर तरीके से लिया कि सुबह वह बिस्तर से उठ ही नहीं पाई। कमर में दर्द, गांड में जलन, चूत सूजी हुई। मैंने उसके माथे पर किस किया और कहा, “याद रखना—तुम मेरी प्रॉपर्टी हो। शादी सिर्फ़ कागज़ है।”
अब जब भी मैं लखनऊ जाता हूँ, नीलम खुद मेसेज करती है—“कब आ रहे हो… मुझे ज़रूरत है…”
और हर बार मैं उसे तोड़ता हूँ। थोड़ा और। थोड़ा क्रूर। क्योंकि वह चाहती है। और मैं देता हूँ।

शादी के छह महीने बाद पहली बार नीलम मेरे शहर आई। 15 तारीख की रात। मैंने एक पुराना गेस्ट हाउस बुक किया था—बाहर से साधारण, अंदर से पूरी तरह साउंडप्रूफ। कमरे में सिर्फ एक लोहे का बिस्तर, मोटी चेनें, चमड़े की पट्टियाँ, मोमबत्तियाँ, और एक काला बैग जिसमें मेरे खास खिलौने थे।

नीलम दरवाज़े पर खड़ी थी। लाल साड़ी में, सिंदूर भरा माथा, मंगलसूत्र गले में। लेकिन आँखों में वही पुरानी भूख। मैंने उसे अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद करते ही साड़ी का पल्लू फाड़ दिया।
“पति के घर से भागकर आई है अपनी असली जगह पर?”
उसने सिर नीचे किया। “हाँ… मुझे तुम्हारी ज़रूरत है।”

मैंने उसके बाल पकड़कर दीवार से टिका दिया। एक हाथ से गला दबाया, दूसरे से साड़ी और ब्लाउज़ फाड़कर फेंक दिए। सिर्फ पेटीकोट रह गया। मैंने उसे घुटनों के बल बैठाया और अपना लंड उसके माथे पर थपथपाया।
“खोल। आज सिर्फ मुँह नहीं, पूरा गला। अगर उबकाई दी तो गाल पर दस थप्पड़।”

नीलम ने मुँह खोला। मैंने पूरा 8.5 इंच एक झटके में गले तक धकेल दिया। उसकी आँखें फटी रह गईं, नाक से पानी बहने लगा, लेकिन मैंने सर पकड़ रखा था। आगे-पीछे, गहरा, बिना रुके। जब लार और बलगम उसके सीने पर टपकने लगे, तब मैंने निकाला। उसने खाँसते हुए कहा, “और… और डालो…”

मैंने उसे बिस्तर पर धकेल दिया। हाथ ऊपर करके कलाईयों को मोटी चेन से बाँध दिया। टाँगें फैलाकर टखनों को बिस्तर के कोनों से बाँध दिया। वह पूरी तरह खुली पड़ी थी—36 के मम्मे फैले हुए, निप्पल सख्त, चूत पहले से गीली।
मैंने काले बैग से दो मेटल क्लिप निकाले। निप्पलों पर लगा दिए और चेन से खींचकर बिस्तर के हेडबोर्ड से बाँध दिया। नीलम चीखी। “आह… खींच रहा है… बहुत…”

“और खींचेगा।” मैंने क्लिप और कस दिए।
फिर मैंने उसकी चूत में तीन उँगलियाँ डालीं और फैलाया। अंदर तक। फिर चौथी। नीलम की कमर उठने लगी। मैंने एक मोटा वाइब्रेटर निकाला—सिलिकॉन का, नसों वाला, 9 इंच। बिना क्रीम के उसकी चूत में धकेल दिया। फुल स्पीड पर चालू कर दिया। नीलम की चीखें कमरे में गूँजने लगीं। मैंने उसका मुँह अपने मोज़े से बंद कर दिया।

जब वह पहली बार झड़ी, तो उसके पैर काँप रहे थे। मैंने वाइब्रेटर नहीं निकाला। बल्कि और गहरा धकेल दिया और उसी हालत में अपना लंड उसकी गांड पर रखा। सूखा।
“नहीं… वहाँ मत… फट जाएगी…”

मैंने एक थप्पड़ उसकी गांड पर मारा—लाल निशान पड़ गया। फिर सुपारा अंदर धकेला। धीरे-धीरे, लेकिन बिना रुके। आधा। फिर पूरा। नीलम की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन चूत से पानी की धारा बह रही थी। मैंने गांड में पूरा लंड डालकर पेलना शुरू किया। हर झटके पर उसके मम्मे क्लिप की वजह से और खिंच रहे थे।

बीस मिनट बाद मैंने उसकी गांड में ही झड़ दिया। गर्म रस बाहर निकलकर जाँघों पर बह रहा था। मैंने लंड निकाला तो उसकी गांड खुली हुई, लाल, थोड़ी खून की धार के साथ दिख रही थी। मैंने उँगली डालकर अपना ही रस निकाला और उसके मुँह के मोज़े हटाकर उसमें ठूँस दिया।
“चाट। अपना खून और मेरा पानी।”
नीलम ने चाटा। रोते हुए।
रात अभी शुरू हुई थी।

मैंने उसे खोला, लेकिन सिर्फ इसलिए कि नई पोजिशन में बाँध सकूँ। इस बार उसे घोड़ी बनाकर हाथ पीछे बाँधे। कमर में चमड़े की पट्टी कस दी। फिर उसकी चूत में एक बड़ा एनाल प्लग डाला—मोटा, नुकीला। गांड में पहले वाला छोटा प्लग। दोनों तरफ भरी हुई।
मैंने उसके बाल पकड़कर सर पीछे खींचा और पीछे से चोदना शुरू किया। इतनी ज़ोर से कि बिस्तर की लोहे की सलाखें खनक रही थीं। हर धक्के पर प्लग उसकी गांड में और गहरा जा रहा था। नीलम पागल हो रही थी। वह खुद धक्के मारने लगी।

“और ज़ोर से… मारो… तोड़ दो…”
मैंने उसके गले में चमड़े का कॉलर पहनाया और अपनी कमर से बाँध लिया। अब हर धक्के के साथ वह घुट रही थी। मैंने उसके निप्पलों के क्लिप को और कस दिया। एक मोमबत्ती जलाई और गर्म मोम उसके पीठ पर गिराया। फिर गांड पर। फिर खुली चूत पर। नीलम चीख उठी, लेकिन कॉलर की वजह से आवाज़ दब गई।

तीसरी बार जब वह झड़ी, तो उसके पूरे शरीर में ऐंठन चल रही थी। मैं रुका नहीं। मैंने लंड निकालकर उसके मुँह में ठूँस दिया—गंदा, गांड और चूत के रस से लथ-पथ। उसने चूसा जैसे भूखी हो।

मैंने फिर से खड़ा किया। इस बार उसे उल्टा लटकाया—सिर नीचे, पैर ऊपर, चेन से। गुरुत्वाकर्षण की वजह से खून उसके सर में भर गया। मैंने नीचे से उसकी चूत में लंड डालकर पेलना शुरू किया। हर झटके पर उसकी चीखें गूँज रही थीं। मैंने एक पतली बेंत निकाली और उसकी जाँघों पर, गांड पर, मम्मों पर मारना शुरू किया। लाल धारियाँ पड़ गईं। कुछ जगहों से खून की बूँदें निकलीं।

“ गिन। हर मार के साथ बोल—धन्यवाद मालिक।”
नीलम ने गिना। पच्चीस तक। आवाज़ टूट रही थी।
जब मैंने उसे उतारा तो वह चल नहीं पा रही थी। मैंने उसे गोद में उठाया और बाथरूम ले गया। ठंडे पानी से नहलाया। खून और मोम धोए। फिर तौलिया से पोंछकर बिस्तर पर लिटा दिया।
लेकिन आराम नहीं।

मैंने उसके दोनों निप्पलों में सुई जैसी पतली पिनें चुभा दीं—सिर्फ थोड़ी सी, खून की एक-एक बूँद निकली। फिर उसकी चूत के दोनों होंठों को क्लिप से पकड़कर फैला दिया। अंदर तक दिख रहा था—लाल, सूजा हुआ, मेरे रस से भरा। मैंने एक लंबा, मोटा ग्लास डिल्डो निकाला और अंदर तक धकेल दिया। फिर वाइब्रेटर मोड ऑन।

मैं उसके ऊपर बैठ गया। अपना लंड उसके मुँह में और अंडकोश उसके नाक पर दबा दिए। “साँस लेना है तो मेरे अंडे चाट।”
नीलम ने चाटा। रोते हुए, कराहते हुए, झड़ते हुए।
सुबह चार बजे तक मैंने उसे सात बार लिया। तीन बार चूत में, दो बार गांड में, दो बार मुँह में। हर बार नया दर्द, नई बेबसी। आखिर में जब मैंने उसके पूरे शरीर पर अपने रस की बौछार की—चेहरे पर, मम्मों पर, खुली चूत पर—तो वह बेहोश सी पड़ी थी।
मैंने उसे खोला।

शरीर पर नीले-काले निशान, काटने के निशान, मोम के धब्बे, खून के धब्बे। मैंने उसके कान में कहा, “अगले महीने और बुरा होगा। आज तो मैंने बख्श दिया।”
नीलम ने आँखें खोलीं। आँसू और मेरे रस से लथपथ चेहरे के साथ मुस्कुराई। “और बुरा करो… मुझे और तोड़ो… मैं तुम्हारी कुतिया हूँ…”
मैंने उसके माथे पर किस किया। “जा। अपने पति के पास। लेकिन याद रखना—जब भी मैं बोलूँगा, तू दौड़ी चली आएगी। वरना तेरी शादीशुदा जिंदगी की तस्वीरें सोशल मीडिया पर होंगी।”

वह काँपते हुए उठी। साड़ी के फटे टुकड़े इकट्ठे किए। सिंदूर फिर से लगाया। दरवाज़े पर खड़ी होकर पीछे मुड़ी।
“अमित… अगली 15 तारीख को… और ज़्यादा चेन लाना… और वो वाली मोटी वाली बेंत…”
मैंने सिर हिलाया। दरवाज़ा बंद हुआ।

कमरे में सिर्फ उसकी चीखों की गंध और खून के धब्बे बचे थे।
अगले महीने मैंने और तैयारियाँ कीं। लोहे का एक पिंजरा मँगवाया। बिजली वाला शॉक कॉलर। और एक खास मशीन—जो अपने आप पेलती रहे घंटों तक।

15 तारीख फिर आई। नीलम फिर आई। इस बार साड़ी में नहीं, बल्कि अपने पति की शर्ट में। अंदर कुछ नहीं।
मैंने दरवाज़ा खोला ही था कि उसने खुद घुटनों के बल बैठकर मेरे जूते चाटने शुरू कर दिए।
“मालिक… आज मुझे पिंजरे में डाल दो… पूरे तीन दिन… पति को बोल दिया हूँ कि नानी के घर गई हूँ…”

मैंने उसके बाल पकड़कर अंदर खींचा। पिंजरा खोला। उसे नंगा करके अंदर धकेल दिया। कॉलर पहनाया। चेन से बाँधा।
फिर मशीन चालू की। मोटा डिल्डो उसकी चूत में और एक छोटा उसकी गांड में। स्पीड मिडियम।
मैं कुर्सी पर बैठकर सिगरेट पीने लगा। नीलम पिंजरे में कराह रही थी, झड़ रही थी, रो रही थी, फिर माँग रही थी और ज़ोर से।

तीन दिन तक मैंने उसे वहीं रखा। खाना मुँह में थूककर दिया। पानी कुत्ते की तरह पिलाया। कभी शॉक कॉलर चालू करके उसे छटपटाया। कभी पिंजरे के बाहर निकालकर फर्श पर घसीटा और चोदा। कभी उसके पूरे शरीर पर मोमबत्ती का पानी बहाया। कभी सुइयों से उसके निप्पलों और चूत के होंठों को छेदा।

तीसरे दिन जब मैंने पिंजरा खोला तो नीलम पहचान में ही नहीं आ रही थी। शरीर भर निशान, आँखें खोखली, लेकिन चूत अभी भी गीली।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और अपनी चूत पर रखा। “और… मशीन फिर से चालू करो… मुझे होश नहीं आना चाहिए जब तक तुम कहो…”
मैंने मशीन फिर चालू की। स्पीड फुल।
और बाहर जाकर दरवाज़ा बंद कर दिया।

अब हर 15 तारीख को नीलम आती है। कभी तीन दिन, कभी पाँच। कभी पिंजरे में, कभी सिर्फ चेन से बँधी हुई छत से लटकी। कभी उसके पति के फोन पर मैंने उसकी चीखें रिकॉर्ड करके रखी हैं—बस चेतावनी के लिए।
वह शादीशुदा है। समाज में इज्जतदार बहु है। लेकिन मेरे कमरे में वह सिर्फ एक चीज़ है—मेरी तोड़ी हुई, खून से लथपथ, पूरी तरह टूटी हुई गुलाम।

और हर बार वह खुद माँगती है, “इस बार और क्रूर होना… पिछले से भी ज़्यादा…”
मैं देता हूँ।

क्योंकि दुनिया में कोई और नहीं दे सकता जो मैं देता हूँ।
और नीलम जानती है—अगली 15 तारीख फिर आएगी। और तब काला बैग में नए खिलौने होंगे। नई चेनें। नई बेंतें। और नई दर्द की सीमाएँ जो तोड़नी होंगी।

शादीशुदा कजिन की पिंजरा-गुलामी

दिल्ली के फ्लैट में दो बहनों की रात

बेटा देखता रहा माँ को पूरी तरह तोड़ दिया

कॉलेज फ्रेंड की छोटी बहन निशा

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