बेटा देखता रहा जब कर्नल पिता ने माँ को चेन, सुई, हुक और खून से पूरी तरह तोड़ दिया। हर रात और क्रूर, और गहरा, और बेशर्म।
ये कहानी उस रात की है जब मैं, रोहित शर्मा, उम्र 22 साल, दिल्ली यूनिवर्सिटी से अपनी अंतिम सेमेस्टर की छुट्टियों में घर लौटा। घर नहीं—मैं कहता हूँ जेल। हाँ, मेरे माँ-बाप का वो घर जो बाहर से साधारण लगता था, अंदर से एक काली भूख का अड्डा था। मेरे पिता कर्नल विक्रम सिंह, उम्र 48 साल, रिटायर्ड आर्मी मैन, छह फुट दो इंच लंबे, सीने पर पुराने जख्मों के निशान, और एक ऐसा लंड जो आराम की हालत में भी नौ इंच का था।
माँ सुनीता सिंह, उम्र 42 साल, पाँच फुट सात इंच, कमर इकतीस इंच, छाती छत्तीस डी, और गांड इतनी गोल-मोटी कि बैठने पर कुर्सी छिप जाती थी। हम लोग रह रहे थे लखनऊ के गोमती नगर के एक बड़े बंगले में। पिताजी की पेंशन और पुरानी मिल्कियत से घर शानदार था, लेकिन रातें… रातें नरक से भी गंदी थीं।
मैं जल्दी लौट आया था क्योंकि परीक्षा खत्म हो गई थीं। शाम के साढ़े सात बजे जब मैंने गेट खोला तो अंदर से आवाजें आ रही थीं—चाबुक की फटकार, माँ की दबी हुई चीख, और पिताजी की गहरी गुर्राहट। मैं चुपके से साइड गेट से अंदर घुसा। लिविंग रूम खाली था। आवाजें ऊपर के बेडरूम से आ रही थीं। मैंने सीढ़ियाँ धीरे-धीरे चढ़ीं। दरवाजा आधा खुला था। अंदर का नजारा देखकर मेरे पैर जड़ हो गए।
माँ पूरी नंगी थीं। उनके दोनों हाथ ऊपर से बेड के हेडबोर्ड में चेन से बंधे हुए थे। पैर फैलाए हुए, टखनों में चमड़े के कफ। पिताजी उनके पीछे खड़े थे, सिर्फ एक काली चमड़े की बेल्ट कमर में बाँधे हुए। उनके हाथ में एक मोटा काला चमड़ा का चाबुक था। माँ की गांड पर पहले से ही लाल-लाल निशान पड़े हुए थे। पिताजी ने चाबुक उठाया और जोर से फटकारा—“थप्प!” माँ की गांड पर। माँ चीखी, लेकिन आवाज दबी हुई थी क्योंकि उनके मुँह में एक मोटा बॉल-गैग ठूसा हुआ था। लार उनके गालों से बह रही थी।
पिताजी बोले, आवाज में कोई प्यार नहीं, सिर्फ हुक्म—“रंडी, गिन। हर मार पर गिन।” माँ ने गैग के बीच से कुछ बुदबुदाया। पिताजी ने दोबारा मारा। “एक…” माँ की आवाज फटी हुई थी। तीसरी मार। “दो…” चौथी। “तीन…” पाँचवीं मार इतनी जोरदार थी कि माँ का पूरा शरीर झटका खा गया। उनकी गांड पर गाढ़ा लाल निशान उभर आया।
पिताजी ने चाबुक नीचे रखा और माँ की गांड के दोनों लोब को अपने बड़े हाथों से पकड़कर फैलाया। बीच में गुलाबी छेद सिकुड़ रहा था। उन्होंने थूक जमाया और एक मोटी उंगली अंदर धकेल दी। माँ की कमर उछली। पिताजी ने दूसरी उंगली भी डाल दी और घुमाने लगे। “तेरी गांड आज खून रोएगी। समझी?”
मैं दरवाजे के किनारे छिपकर देख रहा था। मेरा अपना लंड पहले ही कसा हुआ था। पिताजी ने उंगलियाँ निकालीं। उन पर खून की हल्की रेखा थी। उन्होंने माँ के गैग को खोला। माँ ने गहरी साँस ली तो पिताजी ने अपना लंड उनके मुँह में ठूंस दिया। नौ इंच का मोटा लंड माँ के गले तक चला गया। माँ ने खाँसी, आँखों से पानी निकला, लेकिन पिताजी ने उनके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे झटके देने शुरू कर दिए।
गले की आवाज “घुर्र-घुर्र” की आ रही थी। पिताजी गाली दे रहे थे—“चूस, रंडी। तेरे पति का लंड चूस। तेरी कोख से निकला बेटा भी अगर देखे तो समझ जाए कि उसकी माँ कितनी बेशर्म है।”
माँ की आँखें सफेद हो रही थीं। पिताजी ने लंड निकाला। लार और थूक की डोर माँ के होंठों से लटकी हुई थी। फिर उन्होंने माँ को बेड पर घुमाया। अब माँ पेट के बल लेटी हुई थीं, गांड ऊपर उठी हुई। पिताजी ने एक बड़ी काली डिल्डो निकाली—लगभग बारह इंच लंबी, मोटी। उस पर तेल लगाया और माँ की गांड के छेद पर लगाकर धीरे-धीरे धकेलने लगे।
माँ चिल्लाई—“नहीं… बहुत बड़ा है… फट जाएगी…” पिताजी हँसे। “फटेगी तो फटने दे। आज तेरी गांड को नया आकार दूँगा।” डिल्डो आधी अंदर चली गई। माँ की मुट्ठियाँ भींच गईं। पिताजी ने बाकी हिस्सा भी जबरदस्ती ठेल दिया। माँ की चीख कमरे में गूँज गई।
फिर पिताजी ने अपना लंड माँ की चूत में पेल दिया। एक साथ दोनों छेद भरे हुए थे—गांड में डिल्डो, चूत में लंड। पिताजी ने कमर हिलानी शुरू की। हर धक्के के साथ माँ की छाती बेड से टकरा रही थी। उनके बड़े दूध दबे जा रहे थे। पिताजी ने माँ के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में फुसफुसाए—“बोल, तू क्या है?” माँ रोते हुए बोली—“मैं… आपकी रंडी हूँ… आपकी गांड-चोद रंडी…” पिताजी ने और जोर से धक्के दिए। “जोर से बोल!” “मैं आपकी कुतिया हूँ! मेरी गांड फाड़ दो! मेरी चूत को कीमा बना दो!”
मैंने देखा कि माँ की चूत से पानी की धारा बह रही थी। पिताजी का लंड चमक रहा था। उन्होंने डिल्डो को निकालकर फेंक दिया और अपना लंड माँ की गांड में सरका दिया। माँ की आवाज बदल गई—दर्द और मजे का मिश्रण। पिताजी ने पूरा लंड अंदर धकेल दिया और रुक गए। “सिकुड़। अपनी गांड सिकुड़। मेरे लंड को निचोड़।” माँ ने कोशिश की। पिताजी ने थप्पड़ मारा गांड पर—“जोर से!” फिर उन्होंने चेन खोल दी। माँ के हाथ आजाद हुए तो पिताजी ने उन्हें पीठ के पीछे बाँध दिया। अब माँ पूरी तरह लाचार थीं।
पिताजी ने माँ को उठाया और दीवार के सामने खड़ा कर दिया। माँ के चेहरे को दीवार से सटाया। फिर पीछे से गांड में लंड घुसाया और जोर-जोर से धक्के देने लगे। हर धक्के के साथ माँ का शरीर दीवार से टकरा रहा था। पिताजी ने एक हाथ से माँ के गले को दबाया। साँस रुकने लगी। माँ की आँखें फटी हुई थीं। पिताजी ने गला छोड़ा तो माँ ने खाँसते हुए साँस ली। फिर दोबारा दबाया।
इस बार ज्यादा देर तक। माँ का चेहरा लाल हो गया। पिताजी ने गला छोड़ा और लंड निकालकर माँ को घुटनों पर बिठा दिया। “मुँह खोल।” माँ ने मुँह खोला। पिताजी ने लंड अंदर डालकर गले तक ठेल दिया और पानी छोड़ दिया। माँ ने पूरा निगल लिया। कुछ बाहर निकलकर उनके ठुड्डी पर टपक गया।
लेकिन पिताजी रुके नहीं। उन्होंने माँ को दोबारा बेड पर लिटाया। इस बार उन्होंने एक पतली चमड़े की रस्सी निकाली और माँ के दोनों स्तनों के चारों ओर बाँध दी। स्तन सूज गए, लाल हो गए। फिर उन्होंने निप्पल्स को क्लिप से दबा दिया। माँ चीखी। पिताजी ने क्लिप को खींचा। “दर्द अच्छा लग रहा है ना, रंडी?” माँ ने सिर हिलाया। पिताजी ने माँ की टाँगें कंधों पर रखीं और चूत में लंड पेल दिया।
अब धक्के इतने तेज थे कि बेड की चरपई चरमरा रही थी। माँ की चीखें कमरे से बाहर तक जा रही थीं। पिताजी बीच-बीच में माँ के चेहरे पर थप्पड़ मार रहे थे—“चुप रह। सिर्फ सिसकारियाँ निकाल। चीख मत।”
एक घंटे तक यही सिलसिला चला। पिताजी ने माँ को कुतिया बनाकर रेंगवाया। माँ को अपने जूते चाटने को कहा। माँ ने चाटे। फिर पिताजी ने माँ की चूत पर बैठकर अपना वजन डाला। माँ की साँस उखड़ गई। पिताजी ने माँ के बालों में मुँह घुसाया और गांड चाटी। फिर लंड दोबारा गांड में डाला। इस बार उन्होंने एक वायब्रेटर माँ की चूत में लगा दिया। दोनों छेद एक साथ काम कर रहे थे।
माँ झड़ गई—पहली बार। शरीर में ऐंठन। पिताजी रुके नहीं। उन्होंने माँ को उल्टा लटकाया—हाथों से बेड के ऊपरी हिस्से से बाँधकर। माँ का सिर नीचे, गांड ऊपर। पिताजी ने खड़े होकर गांड चोदी। खून की कुछ बूँदें फर्श पर टपकीं। पिताजी ने देखा और मुस्कुराए। “अच्छा हुआ। अब याद रहेगा।”
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रात के दो बज गए थे। पिताजी ने आखिरकार माँ को छोड़ा। माँ बेड पर गिर गईं—शरीर पर निशान, गांड से सफेद पानी रिसता हुआ, चूत सूजी हुई, आँखों के नीचे काले घेरे। पिताजी ने माँ के पास लेटकर उनका चेहरा सहलाया। पहली बार आवाज में नरमी आई—“सुनीता… तुम मेरी हो। पूरी तरह।” माँ ने आँखें बंद करके सिर हिलाया। “हाँ… आपकी…”
मैं वहाँ से चुपके से सरक गया। अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद किया। मेरा लंड इतना तना हुआ था कि दर्द हो रहा था। मैंने खुद को हिलाया—तेजी से, गुस्से और उत्तेजना के साथ। जब पानी निकला तो दीवार पर लग गया। मैं बिस्तर पर गिर गया। आँखों के सामने वही दृश्य घूम रहे थे—चाबुक, चेन, खून, गालियाँ, माँ की चीखें, पिताजी का क्रूर चेहरा।
सुबह जब मैं नीचे गया तो माँ किचन में चाय बना रही थीं। उनकी गर्दन पर हल्के नीले निशान थे। उन्होंने मुझसे आँखें नहीं मिलाईं। पिताजी अखबार पढ़ रहे थे। दोनों बिल्कुल सामान्य। जैसे रात कुछ हुआ ही न हो। लेकिन मैं जानता था। मैंने देखा था। और अब हर रात जब घर में सन्नाटा छाता, मुझे पता चल जाता कि ऊपर क्या चल रहा है। कभी चाबुक की आवाज, कभी जंजीरों की खनक, कभी माँ की दबी हुई प्रार्थना—“और जोर से… और गहरा…”
एक हफ्ते बाद की बात है। मैंने फिर से देखा। इस बार पिताजी ने माँ को एक लोहे के फ्रेम पर बाँध रखा था जो उन्होंने खुद बनाया था। माँ की गांड में एक बड़ा प्लग था जिससे एक पतली चेन निकली हुई थी। पिताजी चेन खींचते तो प्लग अंदर-बाहर होता। माँ रो रही थीं और साथ ही झड़ भी रही थीं। पिताजी ने माँ के पूरे शरीर पर मोम टपकाया—गर्म मोम। माँ चीखीं। फिर पिताजी ने मोम को खुरचकर हटाया और जगह-जगह काटा। खून की पतली रेखाएँ बनीं। पिताजी ने खून चाटा। “मेरी रंडी का खून मीठा है।”
फिर उन्होंने माँ को फर्श पर लिटाया और अपने जूते से उनकी चूत को कुचला। धीरे-धीरे, फिर जोर से। माँ की आवाज अब सिर्फ कराह बन गई थी। पिताजी ने जूता हटाया और लंड चूत में डालकर आखिरी पानी छोड़ा। माँ की चूत से सफेद पानी बाहर निकलकर फर्श पर फैल गया। पिताजी ने माँ का मुँह उस पानी में दबाया—“चाट। अपनी गंदगी चाट।” माँ ने चाटा।
मैंने उस रात फैसला किया। मैं घर नहीं छोड़ूँगा। मैं और देखूँगा। हर रात। क्योंकि जो कुछ हो रहा था, वह सिर्फ सेक्स नहीं था। वह सत्ता थी, दर्द था, स्वामित्व था। और मैं, उनका बेटा, चुपचाप उस अंधेरे का गवाह बन गया था।
अब जब भी मैं घर आता हूँ, मेरी नींद उड़ जाती है। क्योंकि मुझे पता है कि दीवारों के उस पार मेरी माँ की गांड फट रही होती है, उनके स्तन दबे होते हैं, उनका गला पिताजी के हाथों में होता है। और पिताजी—वे कभी थकते नहीं। उनकी भूख असीम है। माँ की भूख भी। दोनों एक-दूसरे को नष्ट करते हुए भी जीवित रहते हैं। और मैं… मैं सिर्फ देखता हूँ। देखता रहता हूँ। क्योंकि उस नजारे से ज्यादा क्रूर, ज्यादा तीव्र, ज्यादा बेशर्म कुछ इस दुनिया में नहीं।
रातें बीतती रहीं। मैं रोहित शर्मा, उस बंगले का चुपचाप साया बन गया था। हर रात वही सन्नाटा, वही आवाजें। लेकिन जो कुछ आगे हुआ, वह पहले की किसी भी रात से ज्यादा क्रूर, ज्यादा गहरा और ज्यादा बेशर्म था।
तीसरे हफ्ते की एक रात, जब घड़ी में रात के बारह बज रहे थे, मैं फिर से ऊपर की सीढ़ियों पर बैठा। बेडरूम का दरवाजा इस बार पूरी तरह खुला था। अंदर का दृश्य देखकर मेरी साँस अटक गई। माँ सुनीता पूरी तरह एक लोहे के क्रॉस पर बाँधी हुई थीं। हाथ और पैर फैलाए हुए, कलाई और टखनों में मोटी चमड़े की पट्टियाँ।
उनके मुँह में अब बॉल-गैग की जगह एक बड़ा मेटल रिंग था, जिससे उनका मुँह खुला ही रह जाता। लार लगातार बह रही थी। छाती पर क्रॉस के आकार में काली टेप चिपकी हुई थी, निप्पल्स बाहर निकले हुए और उन पर छोटे-छोटे धातु के क्लैंप दबे हुए थे। हर साँस के साथ क्लैंप हिलते और माँ की आँखें सिकुड़ जातीं।
पिताजी कर्नल विक्रम सिंह नंगे खड़े थे। उनके हाथ में एक लंबा चमड़े का फ्लॉगर था—दर्जनों पतली पट्टियाँ, सिरों पर छोटी धातु की गोलियाँ। उन्होंने बिना एक शब्द कहे फ्लॉगर घुमाया और माँ की जाँघों के अंदरूनी हिस्से पर दे मारा। “थप-थप-थप!” माँ की कमर झटकी। पिताजी ने दूसरी तरफ मारा। फिर पेट पर। फिर सीधे स्तनों पर। क्लैंप हिल गए।
माँ की चीख रिंग-गैग से फूटकर निकली, लेकिन साफ नहीं सुनाई दी—सिर्फ गले की कड़वी आवाज। पिताजी पास आए, माँ के बाल पकड़े और उनके कान में बोले—“आज तुम्हारी सीमा तोड़नी है। बोल, तैयार हो?” माँ ने आँखों से हाँ कहा। पिताजी ने गैग खोला। माँ ने फटी आवाज में कहा—“तोड़ दो… पूरी तरह तोड़ दो…”
पिताजी ने एक नया सामान निकाला। एक मोटी, काँटेदार रबर की छड़ी। उस पर तेल लगाया और माँ की चूत के मुँह पर लगाकर धीरे-धीरे धकेलने लगे। काँटे अंदर घुसते गए। माँ की टाँगें काँपने लगीं। पिताजी ने पूरा अंदर कर दिया और घुमाने लगे। “सिकुड़। अपनी चूत से इसे पकड़।” माँ ने कोशिश की। पिताजी ने छड़ी निकाली—उस पर खून की पतली रेखाएँ थीं। उन्होंने मुस्कुराते हुए छड़ी माँ के मुँह के पास लाई—“चाट।” माँ ने चाटा। खून और अपने रस का स्वाद।
फिर पिताजी ने माँ को क्रॉस से उतारा। शरीर ढीला पड़ चुका था। उन्होंने माँ को फर्श पर घुटनों के बल बैठाया और पीछे से हाथ बाँध दिए। एक मोटी चेन निकालकर माँ के गले में कॉलर पहनाया। चेन को छत के हुक से बाँध दिया। अब माँ का सिर ऊपर उठा हुआ था, साँस लेना मुश्किल। पिताजी ने अपना लंड माँ के मुँह में ठूंस दिया और गले तक धकेल दिया। माँ की आँखों से पानी की धारा बहने लगी। पिताजी ने बाल पकड़कर सिर को जबरदस्ती आगे-पीछे किया।
गले की आवाज “घुर्र-घुर्र-घुर्र” कमरे में गूँज रही थी। जब माँ का चेहरा नीला पड़ने लगा तो पिताजी ने लंड निकाला। माँ ने जोर से साँस ली, फिर पिताजी ने दोबारा ठूंस दिया। इस बार पानी छोड़ दिया—सीधे गले में। माँ ने निगला, लेकिन कुछ बाहर निकलकर छाती पर बह गया।
पिताजी रुके नहीं। उन्होंने माँ को पेट के बल लिटाया। गांड ऊपर उठाई। एक बड़ा मेटल हुक निकाला—उसके सिरे पर गोला। हुक को माँ की गांड में धकेला और चेन से बाँध दिया। अब हर बार जब माँ हिलती, हुक अंदर खिंचता। पिताजी ने फ्लॉगर दोबारा उठाया और गांड पर बरसाने लगे। एक के बाद एक। पट्टियाँ काटतीं, धातु की गोलियाँ चुभतीं।
माँ की गांड पहले लाल, फिर बैंगनी होने लगी। खून की छोटी-छोटी बूँदें निकलने लगीं। पिताजी ने बीच-बीच में रुका और खून को उंगली से पोतकर माँ के मुँह में डाल दिया। “अपना खून चख। याद रख।”
फिर उन्होंने एक बड़ा वायब्रेटिंग प्लग निकाला। उसे माँ की चूत में ठूंस दिया और चालू कर दिया। तेज कंपन। माँ की कमर अपने आप हिलने लगी। पिताजी ने उसी समय अपना लंड माँ की गांड में पेल दिया—हुक के साथ-साथ।
दो चीजें एक साथ अंदर। पिताजी ने धक्के शुरू किए। हर धक्के के साथ हुक और गहरा जाता। माँ की आवाज अब सिर्फ जानवर जैसी कराह बन चुकी थी। पिताजी ने माँ के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गला दबाया। साँस बंद। माँ का शरीर ऐंठन में चढ़ गया। पिताजी ने गला छोड़ा तो माँ ने जोर से खाँसा और साथ ही झड़ गई—चूत से पानी की धार फूटी, वायब्रेटर अभी भी अंदर काँप रहा था।
पिताजी ने लंड निकाला। गांड से सफेद पानी और खून मिला हुआ बह रहा था। उन्होंने माँ को पलटा। अब माँ पीठ के बल लेटी थीं। पिताजी ने दोनों स्तनों के क्लैंप को और कस दिया। माँ चीखी। फिर उन्होंने एक पतली सुई निकाली—डॉक्टर वाली। माँ की जाँघ की नरम त्वचा पर रखी और धीरे-धीरे चुभा दी। माँ की आँखें फटी रह गईं। पिताजी ने दूसरी सुई, तीसरी। जाँघों पर, पेट के निचले हिस्से पर, स्तनों के नीचे। हर सुई के साथ माँ का शरीर काँपता। पिताजी ने सुइयों को वहीं छोड़ दिया। खून की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही थीं।
“अब असली खेल,” पिताजी बोले। उन्होंने एक बड़ा इलेक्ट्रिक वैंड निकाला। उसे माँ की चूत पर लगाया और चालू कर दिया—सबसे तेज मोड पर। माँ का शरीर बिजली की तरह उछला। पिताजी ने वैंड को दबाए रखा। माँ झड़ती गई, एक के बाद एक। शरीर में ऐंठन, आँखें पलट गईं, मुँह से झाग आने लगा। पिताजी ने वैंड हटाया तो माँ बेहोश सी हो गईं। लेकिन पिताजी ने पानी के छींटे मारे। माँ की आँखें खुलीं। “अभी खत्म नहीं।”
पिताजी ने माँ को उठाकर बेड पर लिटाया। इस बार उन्होंने माँ के दोनों पैर फैलाकर घुटनों तक बाँध दिए। चूत पूरी तरह खुली। उन्होंने एक मोटा, काँटेदार डिल्डो निकाला—लगभग चौदह इंच। उसे तेल लगाकर माँ की चूत में धकेलने लगे। काँटे अंदर घुसते गए। माँ की चीख दीवारों से टकराई। पिताजी ने पूरा अंदर कर दिया और बाहर-अंदर करने लगे।
तेज, निर्दयी। बीच-बीच में अपना लंड भी चूत में डालते, फिर डिल्डो। माँ की चूत फूल गई, लाल हो गई, खून मिल गया। पिताजी ने आखिर में अपना लंड गांड में डाला और पानी छोड़ दिया—गहराई तक। माँ की गांड से पानी रिसता रहा।
सुबह के चार बज गए थे। पिताजी ने सारी सुइयाँ निकालीं, हुक निकाला, पट्टियाँ खोलीं। माँ बेड पर मरी हुई जैसी पड़ी थीं। शरीर पर निशान, खून, वीर्य, पसीना। पिताजी ने माँ के पास लेटकर उनके माथे को चूमा। “तुम मेरी सबसे अच्छी रंडी हो।” माँ ने आँखें बंद रखकर सिर्फ एक शब्द कहा—“और…
मैं वहाँ से सरका। अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद किया। शरीर काँप रहा था। मैंने खुद को इतनी जोर से हिलाया कि दर्द हो गया। जब पानी निकला तो बिस्तर गीला हो गया। लेकिन उत्तेजना शांत नहीं हुई। आँखों के सामने वही सुइयाँ, वही हुक, वही बिजली, वही खून घूम रहे थे।
अगली रात और भी आगे बढ़ गई। पिताजी ने माँ को एक लकड़ी के बॉक्स में बंद कर दिया—सिर्फ सिर बाहर।
अंदर से माँ की गांड और चूत निकली हुई थीं। पिताजी ने घंटों तक दोनों छेदों को बारी-बारी से चोदा, मारा, काँटे वाले खिलौने डाले। माँ का सिर बॉक्स से बाहर था, आँखें खुली, मुँह से सिर्फ सिसकारियाँ। पिताजी ने माँ के मुँह में भी लंड ठूंस दिया। तीनों छेद एक साथ भरे हुए। जब पिताजी ने पानी छोड़ा तो माँ के गले, चूत और गांड तीनों जगह से बह रहा था।
मैं देखता रहा। देखता ही रहा। क्योंकि वह दृश्य अब मेरी नींद, मेरी भूख, मेरी साँस बन चुका था। हर रात पिताजी माँ को थोड़ा और तोड़ते। हर रात माँ थोड़ा और माँगती। और मैं—उनका बेटा—उस अंधेरे का सबसे वफादार गवाह बनता जा रहा था।
कहानी यहीं नहीं रुकती। क्योंकि अगली रात पिताजी ने कुछ ऐसा किया जो मैंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था। उन्होंने माँ को पूरी तरह पागल बना दिया। और मैं… मैं सिर्फ देखता रहा।