गांव की नहर किनारे बँधी अंजलि की चीखें, फटी बुर, जली गांड, खून-मिर्च-अदरक से सनी क्रूर बीडीएसएम चुदाई। विक्रम हर दिन और तोड़ता, वो और गिड़गिड़ाती। दर्द ही उसका मज़ा।
यह कहानी राजस्थान के बीकानेर जिले के एक छोटे से गाँव की है, जहाँ रेगिस्तान की गर्म हवाएँ और नहर का ठंडा पानी दोनों ही जिंदगी का हिस्सा हैं। मेरा नाम विक्रम सिंह राठौर है। उम्र 24 साल। मैं जयपुर में पुलिस की भर्ती की तैयारी कर रहा हूँ। शरीर से हट्टा-कट्टा हूँ, ऊँचाई छह फीट एक इंच। सीना चौड़ा, कंधे मज़बूत, और जाँघें लोहे जैसी। मेरा लंड सात इंच लंबा और मोटाई में इतना कि मुट्ठी मुश्किल से घेरे। गाँव में मेरे घर के पास से एक पुरानी नहर बहती है। गर्मियों में दोपहर का समय सबसे खाली होता है। घर वाले सो जाते हैं और नहर पर सिर्फ कुछ लड़कियाँ नहाने आती हैं।
एक दोपहर मैं बोरियत से तंग आकर नहर पहुँचा। पानी में उतरते ही ठंडक ने शरीर को जकड़ लिया। तैरते-तैरते मैं किनारे के पास आया तो देखा—एक लड़की सलवार-कमीज में पानी में खड़ी है। नाम अंजलि। उम्र 21। गोरी त्वचा, पतली कमर, और स्तन इतने भरे हुए कि कमीज के बटन तने हुए दिखते। जाँघें गोल और कसी हुई। पहले कभी इतनी नज़दीकी से नहीं देखा था उसे। वो मेरे घर से तीन घर आगे रहती है। पिता किसान, माँ घर का काम। अंजलि कॉलेज जाती है लेकिन गर्मियों की छुट्टी में गाँव आ जाती है।
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वो पानी में खड़ी-खड़ी बाल गीले कर रही थी। मेरी नज़र उसकी गीली कमीज पर जा अटकी। स्तनों की आकृति साफ उभर रही थी। मैं पास गया। उसने सिर घुमाया।
“तैरना सिखा दोगे?” उसकी आवाज़ में हल्की हिचक थी।
मैंने सिर हिलाया। पानी में उसे अपनी बाँहों में थामा। कमर पतली थी, हाथ फिसल गए तो सीधा स्तनों पर पहुँच गए। बड़े, मुलायम, और ठंडे पानी से सिकुड़े निप्पल। उसने कुछ नहीं कहा। बस साँस तेज़ हो गई। मैंने जानबूझकर दोनों हथेलियों से दबाया। मांस उछला। वो थोड़ी सहम गई लेकिन पीछे नहीं हटी।
लंड पानी के अंदर पूरी तरह तन चुका था। मैंने उसे अपनी छाती से सटाया। उसके नितंब मेरे लंड पर रगड़ने लगे। गीली सलवार के नीचे पैंटी नहीं थी—यह साफ महसूस हुआ। मैंने एक हाथ नीचे सरकाया। उंगलियाँ उसकी गांड की दरार में घुस गईं। उसने दाँत भींचे लेकिन आवाज़ नहीं निकाली।
“बाहर आ,” मैंने कहा।
किनारे पर पहुँचकर मैंने उसे एक पेड़ की छाँव में खींचा। कोई नहीं था। दोपहर की तपिश में सिर्फ हम दोनों। मैंने उसकी कमीज के बटन एक-एक करके खोले। स्तन बाहर निकले—बड़े, भारी, निप्पल गहरे गुलाबी। मैंने मुँह लगा दिया। दाँतों से काटा, जीभ से चाटा, मुट्ठी में भरकर मसला। वो कराह उठी।
“दर्द हो रहा है…” उसकी आवाज़ काँप रही थी।
मैंने और ज़ोर से दबाया। निप्पल को दाँतों के बीच पकड़कर खींचा। उसकी कमर झुक गई। फिर सलवार का नाड़ा खींचा। सलवार घुटनों तक फिसल गई। बुर बालों से भरी हुई, थोड़ी सी गीली। मैंने दो उंगलियाँ अंदर धकेल दीं। तंग था। कुँवारी। दीवार जैसी सख्त। उसने दर्द से चीख निकाली।
“चुप रह,” मैंने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। उंगलियाँ अंदर-बाहर करने लगा। खून की एक बूँद उंगली पर लग गई। मैंने उसे चखा। फिर लंड बाहर निकाला। सात इंच का मोटा लंड उसकी जाँघ पर पटक दिया।
उसने आँखें बंद कर लीं। मैंने उसे घुटनों के बल झुकाया। गांड ऊपर। बुर पूरी तरह खुली। मैंने लंड का मुँह बुर पर रखा और एक झटके में आधा धकेल दिया। वो चीखी। शरीर काँप उठा। मैंने और अंदर धकेला। पूरा लंड घुस गया। खून लंड पर लग गया। उसकी कुँवारी बुर फट गई थी।
मैंने दोनों हाथ उसकी कमर पर रखे और धक्के लगाने शुरू किए। तेज़, कठोर, बिना रुकें। हर धक्के पर उसकी गांड मेरे पेट से टकराती। आवाज़ गप्प-गप्प की। वो रो रही थी लेकिन पीछे नहीं हट रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। गर्दन नंगी हो गई। मैंने दाँत गड़ा दिए। काटा। निशान पड़ गया।
दस मिनट तक इसी तरह पीटा। फिर उसे पलटा। पीठ के बल लिटाया। टाँगें कंधों पर चढ़ाईं। लंड फिर से अंदर घुसाया। इस बार और गहरा। गर्भ तक। वो हाथ-पैर पटकने लगी। मैंने दोनों कलाई पकड़कर सिर के ऊपर दबा दीं। शरीर उसका पूरा मेरे नीचे दब गया। स्तन मेरे सीने से दब रहे थे। निप्पल रगड़ खा रहे थे।
मैंने धीरे-धीरे गति बढ़ाई। फिर अचानक रुक गया। लंड अंदर ही अंदर घुमाया। उसने आँखें खोलीं। आँसू बह रहे थे।
“अब और…” मैंने कहा और फिर से पीटना शुरू किया। इस बार इतना तेज़ कि उसके नितंब लाल हो गए। हाथ से थप्पड़ मारा गांड पर। एक, दो, तीन। लाल निशान उभर आए। वो कराह रही थी—दर्द और मज़े का मिश्रण।
मैंने लंड निकाला। खून और पानी मिला हुआ। फिर मुँह उसके बुर पर लगा दिया। जीभ अंदर घुसाई। खून चाटा। उसने जाँघें कस लीं। मैंने और गहरा चाटा। क्लिटोरिस को दाँतों से हल्के से काटा। वो झटके मारने लगी। पानी निकलने लगा। मैंने मुँह भर लिया।
फिर लंड वापस अंदर। इस बार डॉगी स्टाइल में। बाल पकड़कर खींचा। दूसरी हाथ से स्तन मसले। निप्पल को मोड़ा। वो चीख रही थी लेकिन आवाज़ दबा रही थी। डर था कि कोई सुन ले। मैंने और ज़ोर लगाया। लंड पूरा अंदर-बाहर। हर बार गर्भ से टकराता। उसकी बुर अब ढीली पड़ने लगी थी लेकिन फिर भी तंग।
अचानक उसने अपनी गांड और ऊपर उठाई। मैंने समझ लिया—झड़ने वाली है। मैंने गति और तेज़ कर दी। उसके शरीर में कंपन दौड़ गया। पानी की धार निकल पड़ी। पच-पच की आवाज़ तेज़ हो गई। उसी समय मेरा भी वीर्य फूटा। गर्म, गाढ़ा। अंदर ही अंदर भर दिया। इतना कि बाहर भी निकलने लगा।
हम दोनों हाँफ रहे थे। मैंने लंड अंदर ही रखा। बाहर नहीं निकाला। उसके शरीर पर लेटा रहा। स्तन दबाए। होंठ चूसे। जीभ अंदर घुसाई। दस मिनट बाद लंड फिर तन गया। अंदर ही अंदर।
“फिर से,” मैंने कहा।
उसने सिर हिलाया। “नहीं… दर्द हो रहा है…”
मैंने नहीं माना। लंड फिर हिलाने लगा। इस बार और क्रूर। बिना रुके। उसकी कलाई बाँध दी अपनी बेल्ट से। पेड़ से बाँध दिया। अब वो भाग नहीं सकती थी। मैंने उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। चीखें दब गईं। फिर पीटना शुरू किया। गांड पर थप्पड़। स्तन पर दाँत। बुर में लंड। हर चीज़ कठोर।
मैंने उसे उल्टा लटकाया। सिर नीचे, गांड ऊपर। लंड गांड की तरफ ले गया। उंगली से पहले फैलाया। फिर लंड का सिरा रखा। धीरे-धीरे धकेला। गांड की दीवार फटी। खून निकला। वो तड़प रही थी। मैंने पूरा अंदर कर दिया। गांड की चुदाई शुरू की। तंग, गर्म, खून से चिकनी। धक्के तेज़। उसके बाल ज़मीन पर रगड़ खा रहे थे। मैंने स्तन नीचे से पकड़कर खींचे।
आधा घंटा तक दोनों छेदों में बारी-बारी से। बुर, गांड, फिर बुर। खून, पानी, वीर्य सब मिला हुआ। आखिर में मैंने उसके मुँह से कपड़ा निकाला और लंड मुँह में ठूँस दिया। गले तक। उसने उल्टी की कोशिश की लेकिन मैंने सिर पकड़ रखा था। वीर्य दूसरी बार उसके गले में उतार दिया। उसने निगल लिया। मजबूरी में।
जब छोड़ा तो वो काँप रही थी। शरीर पर नीले-लाल निशान। स्तनों पर दाँतों के निशान। गांड और बुर सूजी हुई। खून अभी भी रिस रहा था। मैंने उसे पानी से धोया। सलवार-कमीज पहनाई। बाल सुलझाए।
“कल फिर आना,” मैंने कहा। आवाज़ में हुक्म था।
वो सिर झुकाए चली गई। घर पहुँचकर मैंने दो बार मुठ मारी। उसी खून और पानी की याद में।
अगले दिन वो आई। इस बार खुद सलवार ढीली करके। डर और चाह का मिश्रण आँखों में। मैंने उसे घर के पीछे वाले कमरे में ले जाया। माँ-बाप सो रहे थे। दरवाज़ा बंद किया। इस बार रस्सी लाया था। हाथ-पैर बाँधे। आँखों पर पट्टी। मुँह में गेंद जैसा कपड़ा। फिर शुरू किया।
पहले कोड़े की तरह बेल्ट से गांड पर मारे। दस थप्पड़। लाल हो गई। फिर मोमबत्ती जलाकर स्तनों पर टपकाई। गर्म मोम। उसने तड़पना चाहा लेकिन बँधी थी। फिर लंड। इस बार तीन बार झड़ा। एक बुर में, एक गांड में, एक मुँह में। बीच-बीच में उसकी बुर में अदरक का टुकड़ा डाल दिया। जलन। वो पागलों की तरह काँपने लगी। मैंने हँसते हुए और अंदर धकेला।
हर दिन कुछ नया। कभी ठंडे पानी की बौछार शरीर पर, कभी गर्म। कभी उसके स्तनों को रस्सी से बाँधकर लटकाया। कभी बुर में बर्फ के टुकड़े। कभी लंड पर मिर्च लगाकर अंदर। दर्द और मज़े का खेल। वो रोती थी, भीख माँगती थी, लेकिन अगले दिन फिर आती थी। उसके स्तन और बड़े हो गए। निप्पल काले पड़ गए काटने से। बुर हमेशा सूजी रहती। लेकिन वो सहती रही।
एक दिन मैंने उसकी छोटी बहन को भी देखा। लेकिन वो बाद की बात है। अभी अंजलि। हर दोपहर नहर या घर के पीछे। बँधी हुई, पीटी हुई, चुदी हुई। खून, आँसू, वीर्य। उसकी आँखों में अब सिर्फ समर्पण था। डर नहीं, चाह।
रात को जब वो घर जाती तो मैं उसके पीछे-पीछे। खिड़की से देखता। वो अकेले में अपनी सूजी बुर सहलाती। उंगलियाँ अंदर डालती। मेरे नाम लेती। फिर मैं अंदर घुस जाता। बिना बताए। मुँह दबाकर चुदाई। सुबह तक। घर वाले कुछ नहीं जानते।
अब दो साल बीत गए। अंजलि अभी भी आती है। शरीर पर स्थायी निशान हैं। स्तनों पर दाँतों के निशान, गांड पर बेल्ट के। बुर इतनी आदी हो गई है कि बिना दर्द के मज़ा नहीं आता। मैं जितना क्रूर होता हूँ, वो उतना और माँगती है। कभी-कभी खुद रस्सी लेकर आती है। “आज और ज़ोर से…” कहती है।
दो साल बीत चुके थे लेकिन अंजलि का शरीर अभी भी मेरे लिए नया लगता। हर निशान, हर सूजन, हर काटा हुआ निप्पल मुझे याद दिलाता कि ये मांस अब मेरा है। मैंने उसे पूरी तरह तोड़ दिया था और वो टूटकर और ज़्यादा चिपक गई थी।
एक रविवार की दोपहर। घर वाले शहर गए हुए थे। पूरा मकान खाली। मैंने अंजलि को पहले से बता रखा था—दोपहर दो बजे आना, सिर्फ एक पतली साड़ी पहनकर, अंदर कुछ नहीं। वो आई। साड़ी पीली थी, भीगी हुई सी लग रही थी पसीने से। स्तन बिना ब्लाउज के साड़ी के पारदर्शी कपड़े से उभर रहे थे। निप्पल कड़े। गांड की आकृति साफ।
जैसे ही दरवाज़ा बंद हुआ, मैंने उसके बाल पकड़कर खींचा। मुँह पर थप्पड़ मारा। जोर का। गाल लाल हो गया। आँखों में पानी आ गया लेकिन वो मुस्कुराई।
“आज बहुत देर हो गई,” मैंने कहा और उसे घसीटते हुए पिछले कमरे में ले गया। वहाँ पहले से तैयार था सब कुछ। लोहे की चारपाई, रस्सियाँ, बेल्ट, मोमबत्तियाँ, अदरक, मिर्च का पाउडर, बर्फ के टुकड़े, और एक मोटी लकड़ी की छड़ी।
मैंने उसकी साड़ी एक झटके में खींच ली। नंगी। शरीर पर पुराने निशान—स्तनों पर दाँतों के गड्ढे, जाँघों पर बेल्ट के निशान, गांड पर छड़ी के लाल निशान जो कभी पूरी तरह गए ही नहीं। मैंने उसे चारपाई पर लिटाया। हाथ ऊपर, कलाई बाँधी। टाँगें फैलाईं और टखनों को चारपाई के पायों से बाँध दिया। पूरी तरह फैली हुई। बुर खुली, गांड थोड़ी सी ऊपर उठी हुई।
पहले बर्फ। एक बड़ा टुकड़ा उसकी बुर पर रखा। ठंडक से वो काँप उठी। मैंने बर्फ को अंदर धकेल दिया। उंगलियों से गहरा। फिर दूसरा टुकड़ा गांड में। ठंड से उसकी मांसपेशियाँ सिकुड़ गईं। मैंने हँसते हुए उसके स्तनों पर भी बर्फ रगड़ी। निप्पल काले पड़ गए ठंड से। फिर गर्म मोमबत्ती जलाई। मोम पिघला और सीधा उसके बाएँ स्तन पर टपकाया। चीख निकल गई। मोम जमा हो गया। फिर दाएँ स्तन पर। फिर पेट पर। फिर सीधे क्लिटोरिस पर। जलन और ठंड का मिश्रण। वो तड़प रही थी, रस्सियाँ खिंच रही थीं।
मैंने छड़ी उठाई। गांड पर पहला वार। आवाज़ कड़क की। लाल निशान तुरंत उभर आया। दूसरा वार। तीसरा। दस वार। गांड जल रही थी। खून की छोटी रेखाएँ दिखने लगीं। मैंने छड़ी बुर पर भी मारी। हल्की लेकिन सीधी क्लिटोरिस पर। वो पागलों की तरह झटके मारने लगी।
“अब मिर्च,” मैंने कहा। लाल मिर्च का पाउडर अपनी उंगली पर लिया और उसकी बुर के अंदर रगड़ दिया। जलन शुरू हुई। वो चीखी।
आँसू बहने लगे। मैंने और पाउडर गांड में भी डाल दिया। फिर लंड निकाला। सात इंच का मोटा लंड पहले से तना हुआ। मैंने उसके मुँह में ठूँस दिया। गले तक। उसने गैग किया। लार बहने लगी। मैंने सिर पकड़कर धक्के लगाने शुरू किए। गला चोद रहा था। आँखों से पानी, नाक से स्राव। जब साँस फूलने लगी तो निकाला। लार और मेरे लंड का पानी उसके चेहरे पर लगा।
फिर बुर में। मिर्च की जलन के साथ लंड घुसा। तंग नहीं रह गई थी अब, लेकिन सूजन के कारण अभी भी पकड़ थी। मैंने पूरे जोर से धक्के लगाए। हर धक्के पर उसकी गांड चारपाई से टकराती। छड़ी के निशान और गहरे होते। मैंने दोनों स्तन पकड़कर मसले। निप्पल को मोड़ा, खींचा, दाँतों से काटा जब झुका। खून की बूँद निप्पल से निकली। मैंने चाट ली।
बीस मिनट तक सिर्फ बुर। फिर निकाला और गांड में धकेल दिया। मिर्च और खून मिला हुआ। गांड की दीवार फटी हुई पुरानी जगह से फिर खून रिसने लगा। मैंने और गहरा। अंदर तक। उसके पेट में उभार दिखने लगा लंड का। मैंने बाहर से दबाया। वो रो रही थी लेकिन हिप्स ऊपर उठा रही थी। और माँग रही थी।
मैंने रस्सी थोड़ी ढीली की। उसे पलटा। अब पेट के बल। गांड ऊपर। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और लंड फिर गांड में। इस बार एक हाथ से गर्दन दबाई। साँस कम। चेहरा लाल। मैंने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया। वो काँप रही थी। ऑर्गैज्म आ गया। पानी की धार बुर से निकल पड़ी। पच-पच। मैंने उसी समय अपना वीर्य गांड में उतार दिया। इतना कि बाहर बहने लगा।
लेकिन रुका नहीं। लंड अंदर ही रखा। दस मिनट बाद फिर तन गया। इस बार बुर में। फिर गांड में। बारी-बारी। तीसरी बार जब झड़ा तो उसके मुँह में। गले में भर दिया। उसने निगल लिया। मजबूरन। लार और वीर्य मिलाकर उसके स्तनों पर थूक दिया। फिर रगड़ा।
अब अदरक। ताज़ा अदरक का मोटा टुकड़ा छीलकर उसकी बुर में ठूँस दिया। जलन पागल कर देने वाली। वो चीखने लगी। मैंने दूसरा टुकड़ा गांड में। फिर लंड उसके मुँह में ताकि चीखें दब जाएँ। अदरक की जलन में वो झटके मार रही थी। ऑर्गैज्म के बाद भी शरीर नहीं रुक रहा था। मैंने छड़ी फिर उठाई। इस बार जाँघों के अंदर। संवेदनशील जगह। वार। वार। लाल धारियाँ। खून की बूँदें।
चार घंटे तक चला यह सिलसिला। बीच-बीच में पानी पिलाया ताकि बेहोश न हो। फिर से बाँधा। इस बार उल्टा—सिर नीचे, टाँगें ऊपर चारपाई से बँधी। खून सर में चढ़ गया। मैंने लंड उसके मुँह में और बुर में उंगलियाँ। फिर उलट दिया। अब कुत्ते की तरह। रस्सी गर्दन में फँसाई हल्की। जितना धक्का उतना गर्दन में दबाव। साँस और चुदाई का खेल।
शाम हो गई। उसका शरीर पूरा नीला-लाल। स्तन सूजे। निप्पल कटे। बुर और गांड दोनों से खून और वीर्य मिश्रित पानी रिस रहा था। जाँघों पर छड़ी के गहरे निशान। गाल पर थप्पड़ के निशान। गर्दन पर रस्सी के। मैंने उसे खोला। वो फर्श पर गिर गई। काँप रही थी।
मैंने उसके बाल पकड़कर उठाया। “अब चाट,” कहा और अपना लंड उसके मुँह के सामने किया। जो खून, मिर्च, अदरक, वीर्य लगा था सब। उसने चाटा। जीभ से साफ किया। फिर मेरी गांड भी। मैंने उसे घोड़े की तरह बैठकर अपनी गांड उसके चेहरे पर दबाई। उसने चाटा। गंदी जगह तक।
रात को मैंने उसे नहलाया। ठंडे पानी से। घावों पर नमक जैसा महसूस हो रहा था पानी। वो रोई लेकिन सहती रही। फिर मैंने उसे अपने बिस्तर पर लिटाया। नंगी। बाँहों में भर लिया। लंड फिर उसके जाँघों के बीच। धीरे-धीरे रगड़ा। आधी रात को फिर से चुदाई। इस बार धीमी लेकिन गहरी। बिना बाँधे। सिर्फ वजन से दबाए रखा। उसके कान में कहा, “तुम अब इंसान नहीं रह गई हो। तुम मेरी चीज़ हो। जितना तोड़ूँगी उतना और मेरी हो जाएगी।”
सुबह जब उठी तो चल नहीं पा रही थी। मैंने उसे नाश्ता कराया। फिर फिर से बाँधा। इस बार सिर्फ कलाई। और पूरे दिन इस्तेमाल किया। कभी कुर्सी पर बैठाकर, कभी दीवार से सटाकर, कभी फर्श पर घसीटते हुए। लंड, उंगलियाँ, छड़ी, मोम, बर्फ, मिर्च—सब बारी-बारी। उसके मुँह से अब सिर्फ कराहें और “और… और ज़ोर से…” निकल रहा था।
शाम को जब घर वाले लौटने वाले थे, मैंने उसे कपड़े पहनाए। साड़ी। अंदर खून के धब्बे। चलते समय लंगड़ा रही थी। दरवाज़े पर खड़ी होकर बोली, “कल नहर पर… रात को। कोई नहीं होगा।”
मैंने उसके गाल पर थप्पड़ मारा हल्का। “आना। और इस बार अपनी बहन को भी लाना मत… अभी नहीं। पहले तुझे और तोड़ना है।”
वो चली गई। मैंने खिड़की से देखा। उसकी चाल में दर्द था लेकिन कंधे सीधे थे। समर्पण का सीधापन।
रात को मैं अकेला बैठा रहा। लंड फिर तन गया उसकी याद से। अगले दिन और कुछ नया सोचा। बिजली का तार, थोड़ा करंट। या फिर उसके स्तनों को लंबे समय तक बाँधकर लटकाए रखना। या फिर सार्वजनिक जगह—नहर के किनारे रात में, जहाँ कोई देख ले तो भी। डर और उत्तेजना का नया स्तर।
अंजलि अब सिर्फ शरीर नहीं रह गई थी। वो मेरी क्रूरता की जीवित निशानी थी। हर घाव एक कहानी। हर चीख एक जीत। और मैं अभी थमा नहीं था। जितना गहरा उतारूँगा, उतना और नीचे ले जाऊँगा। उसके अस्तित्व के आखिरी कण तक। नहर का पानी फिर बहेगा, रेत फिर गर्म होगी, और अंजलि फिर मेरे सामने नंगी खड़ी होगी—बाँधने, पीटने, चोदने और तोड़ने के लिए।
कहानी यहीं नहीं रुकती। अगली सुबह जब वो आई तो उसके हाथ में एक काला कपड़ा था और आँखों में वो भूख जो सिर्फ और दर्द माँगती है। मैंने दरवाज़ा बंद किया। और फिर से शुरू किया—इस बार पहले से ज़्यादा क्रूर, ज़्यादा गहरा, ज़्यादा अपना।
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