सिंदूर की जंजीर

कनेरपुर के सूखे घर में उन्नीस साल का लड़का एक रात में बीवी बन जाता है। गले की चाबी, फटी गांड और खून से सनी चादरें अब उसकी नई जिंदगी हैं। वापसी का कोई रास्ता नहीं।

उस सुबह के बाद से कनेरपुर का वह कच्चा घर नरक बन गया था मेरे लिए। लेकिन नरक ऐसा जिसमें मैं खुद को बार-बार धकेलता रहा। वीरेंद्र खेत से लौटते ही दरवाज़ा बंद करता। कुंडी लगती। फिर वही आवाज़—“कपड़े उतार। कॉलर पहना रह।”
कॉलर कभी नहीं उतरा। चाबी हमेशा उसकी जेब में रहती। गले में वह काला चमड़ा इतना कस जाता कि साँस लेते समय भी रगड़ती। रात को सोते समय भी वही। सुबह उठते समय भी वही।

दूसरे दिन शाम को वह आया तो उसके हाथ में नया सामान था। एक मोटी लोहे की चेन। एक छोटा सा ताला। और एक काला, मोटा रबर का डildo—मेरे मुट्ठी से भी मोटा।
“आज तेरी गांड को और खोलना है,” उसने कहा। आवाज़ में कोई भावना नहीं थी। बस आदेश।
उसने मुझे चारपाई पर घुटनों के बल बिठाया। हाथ पीछे बाँधे। चेन से कॉलर को चारपाई के पाए से बाँध दिया। अब मैं न तो आगे जा सकता था, न पीछे। सिर नीचे। गांड ऊपर।

पहले उसने अपनी दो उंगलियाँ अंदर घुसाईं। जोर से। बिना थूक के। दर्द ने आँखों से पानी निकाल दिया। फिर तीन। फिर चार। मेरी गांड फटने लगी। खून की हल्की धार टपकने लगी चारपाई पर।
“देख, खून निकल रहा है। अच्छी बात है। जल्दी ढीली हो जाएगी।”

उसने डildo निकाला। उस पर सिर्फ अपना थूक लगाया। फिर एक झटके में अंदर धकेल दिया। पूरा। मैं चिल्लाया। आवाज़ निकलते ही उसने मेरा मुँह कपड़े से बंद कर दिया। डildo अंदर-बाहर होने लगा। तेज़। बेदर्द। हर धक्के पर मेरी आँतें जैसे मुड़ रही थीं। पेट में मरोड़ उठने लगा।

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आधा घंटा चला। जब उसने निकाला तो मेरी गांड खुली रह गई थी। गोल छेद। लाल। सूजा हुआ। खून और मल की मिलावट टपक रही थी।
वीरेंद्र ने अपना लंड निकाला। वह पहले से भी ज़्यादा तना हुआ था। नसें फूली हुई। सिर चमक रहा था। उसने बिना किसी तैयारी के घुसा दिया। डildo के बाद भी दर्द कम नहीं हुआ। उल्टा और बढ़ गया। क्योंकि उसका लंड गर्म था, धड़क रहा था, और हर धक्के में और गहरा जा रहा था।

“तेरी भाभी की गांड भी ऐसी ही थी पहली हफ्ते। फिर आदत पड़ गई। तू भी आदी हो जाएगा।”
वह एक हाथ से मेरी कमर पकड़े हुए धक्के मार रहा था। दूसरे हाथ से चाबुक। पीठ पर। गांड पर। जाँघों के अंदर। हर वार के साथ लाल लकीरें उभर आतीं। कुछ जगहों पर खाल उधड़ गई। खून रिसने लगा।
मैं रो रहा था। लेकिन आवाज़ बंद थी। कपड़ा मुँह में ठूँसा हुआ था। आँसू नाक में घुस रहे थे। साँस रुक रही थी।

वीरेंद्र ने झड़ते समय मेरा कॉलर और कस दिया। गला दब गया। आँखों के सामने काले धब्बे नाचने लगे। वह अंदर ही अंदर झड़ा। गर्म। गाढ़ा। फिर लंड बाहर निकाला तो सफेद और लाल मिलाजुला तरल बह निकला।
उसने चेन खोली। मुझे फर्श पर गिरा दिया। मैं करवट लेकर लेट गया। शरीर काँप रहा था। गांड से लगातार कुछ बह रहा था।
“अब चाट,” उसने आदेश दिया।

मैंने सिर उठाया। उसका लंड अभी भी आधा तना हुआ था। खून और वीर्य से सना। मैंने मुँह खोला। चाटा। स्वाद कड़वा था। धातु जैसा। उसने मेरे बाल पकड़कर गले तक धकेल दिया। मैंने खाँसा। लार और खून दोनों मुँह से निकले।
रात भर वह मुझे उसी हालत में सोने दिया। हाथ पीछे बँधे। कॉलर चेन से बँधा। गांड खुली। सुबह जब उठा तो शरीर में इतना दर्द था कि चल भी नहीं पा रहा था।
तीसरे दिन उसने नया खेल शुरू किया।

सुबह खेत जाने से पहले उसने मुझे रसोई में घुटनों के बल बैठाया। कॉलर को चूल्हे के पास वाली कड़ी से बाँध दिया।
“दिन भर यहीं रहना। पानी सिर्फ मैं दूँगा। खाना नहीं। पेशाब भी यहीं करना।”
मैंने दिन भर उसी हालत में बिताया। पेशाब टपकता रहा फर्श पर। प्यास से जीभ सूख गई। दोपहर में वह आया। पानी की एक चुस्की दी। फिर अपना लंड मेरे मुँह में ठूँस दिया।
“पी। यही तेरा पानी है।”

मैंने पी लिया। गरम। नमकीन। उसने पूरा झाड़ दिया मेरे गले में। फिर चला गया।
शाम को जब लौटा तो उसके हाथ में एक नया चाबुक था—पतला, लंबा, सिरे पर छोटी सी गाँठ। और एक जोड़ी निप्पल क्लैंप। काले लोहे के।
उसने मेरी ब्रा उतारी। क्लैंप दोनों निप्पल्स पर कस दिए। दर्द ने बिजली की तरह झटका दिया। आँखें फटी की फटी रह गईं। फिर उसने चाबुक से उन क्लैंप्स को बार-बार मारा। हर वार पर निप्पल और सूज जाते। खून की बूँदें टपकने लगीं।
“अब तेरे स्तन भी मेरी बीवी जैसे हो जाएँगे। काले और फटे हुए।”

रात को उसने मुझे उल्टा लटकाया। रस्सी से टखनों को बाँधकर छत की कड़ी से लटका दिया। सिर नीचे। खून दिमाग में भर गया। उसने मेरी गांड में फिर से डildo घुसाया—इस बार और मोटा वाला। और फिर अपना लंड मेरे मुँह में। दोनों तरफ से भर दिया।
धक्के इतने तेज़ थे कि मेरी गर्दन झटकों से मुड़ने लगी। साँस नहीं ले पा रहा था। जब वह झड़ा तो वीर्य नाक से भी निकलने लगा।
उसने मुझे उतारा तो मैं बेहोश जैसा पड़ गया। उसने पानी के छींटे मारे। होश आया तो देखा वह मुस्कुरा रहा है।
“तेरी गांड अब मेरी मुट्ठी समा सकती है। कल आजमाएँगे।”
चौथे दिन उसने वाकई मुट्ठी आजमाई।

पहले तेल लगाया—बहुत कम। फिर उंगलियाँ एक-एक करके। जब चार हो गईं तो उसने अंगूठा भी अंदर धकेल दिया। पूरा हाथ। मेरी गांड चीख उठी। दर्द ऐसा था जैसे कोई तलवार घुमा रहा हो अंदर। मैंने चिल्लाना शुरू किया तो उसने मेरा मुँह फिर से बंद कर दिया।
हाथ अंदर-बाहर होने लगा। कलाई तक। मैंने पेशाब कर दिया दर्द से। फर्श गीला हो गया। वह हँसता रहा।
“देख, तेरी गांड अब सही मायनों में मेरी हो गई। कोई और आदमी यहाँ घुसेगा तो फट जाएगी।”
रात को जब उसने लंड घुसाया तो वह आसानी से अंदर चला गया। लेकिन वह संतुष्ट नहीं था। उसने दो लंड एक साथ चाहे—अपना और डildo। दोनों एक साथ। गांड पूरी तरह फैल गई। खून फिर बहने लगा।

मैं रो रहा था। शरीर काँप रहा था। लेकिन कहीं अंदर एक अजीब सी गर्मी भी थी। दर्द के बीच में मज़ा। शर्म के बीच में समर्पण।
पाँचवें दिन उसने मुझे गाँव के बाहर खेत में ले गया। रात के अँधेरे में। कॉलर में चेन बाँधकर। जैसे कुत्ता।
खेत के बीचोंबीच एक पेड़ था। उसने मुझे उस पेड़ से बाँध दिया। नंगा। सिर्फ कॉलर और क्लैंप्स।
“अब भौंक,” उसने कहा।

मैंने भौंका। आवाज़ निकलते ही उसने चाबुक मारा। फिर से भौंका। फिर चाबुक।
रात भर वह मुझे वहीं इस्तेमाल करता रहा। कभी खड़ा करके, कभी घुटनों के बल, कभी पेड़ से लटकाकर। मच्छर काट रहे थे। ठंड लग रही थी। लेकिन वह रुका नहीं।
सुबह जब गाँव लौटे तो मेरे शरीर पर निशान इतने थे कि कपड़े भी दर्द देते। गांड से लगातार तरल बह रहा था। निप्पल्स काले पड़ गए थे। गला कॉलर से छिला हुआ था।
वीरेंद्र ने मुझे बिस्तर पर लिटाया। बालों में हाथ फेरा।

“अब तू पूरी तरह मेरी बीवी है। कोई तुझे छुएगा तो मैं उसकी आँखें निकाल दूँगा। समझा?”
मैंने सिर हिलाया। आँखों में आँसू थे। लेकिन मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला—“हाँ… पति।”
उसने मुस्कुराया। पहली बार असली मुस्कान।
“अच्छा। तो आज रात तुझे गर्भवती बनाने की कोशिश करेंगे। भले ही तू लड़का है। लेकिन मैं तेरी गांड में इतना भरूँगा कि तू फूल जाए।”
रात गहरी हो चुकी थी। बाहर सियार फिर से रो रहे थे। अंदर वीरेंद्र ने तेल की बोतल खोली। इस बार ज्यादा। फिर उसने मुझे गोद में लिया। जैसे कोई असली बीवी।

लंड अंदर गया। धीरे। फिर तेज़। फिर जानवर की तरह।
हर धक्के के साथ वह दोहरा रहा था—“मेरी औरत… मेरी गांड… मेरी बीवी…”
मैंने अपने नाखून उसकी पीठ में गाड़ दिए। खून निकला। वह और जोश में आ गया।
जब वह झड़ा तो इतना था कि बाहर निकलकर जाँघों तक बह गया। उसने निकाला नहीं। अंदर ही रखा। पूरी रात।

सुबह जब मैं उठा तो शरीर उसका था। कॉलर उसका था। गांड उसकी थी। साँस उसकी थी।
कनेरपुर के उस सूखे गाँव में अब कोई अभि नहीं रह गया था। सिर्फ वीरेंद्र की बीवी रह गई थी—नंगी, द asc, खून से सनी, और हर रात और ज़्यादा टूटने को तैयार।
और यह सिलसिला रुकने वाला नहीं था। कभी नहीं।

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