रुद्रक्ष-अनन्या भाग 9

तीन दिन अकेले कमरे में कैमरे घूमते रहे। संपत्ति ने अपनी मुट्ठी से खुद को बार-बार खोला। मालिक ने लौटकर जाँच की और सुबह से शाम तक खुली बालकनी का नया हुक्म सुना दिया।

रुद्रक्ष-अनन्या भाग 8

रात के आठ बजे बड़े हॉल में तीन पुरुष बैठे थे। रुद्रक्ष के पुराने व्यापारिक दुश्मन। एक भारी भरकम, एक दुबला तेज आँखों वाला, एक शांत लेकिन ठंडी मुस्कान वाला। मेज पर शराब की बोतलें, गिलास और महंगे खाने की प्लेटें सजी थीं। कमरे में हल्की रोशनी थी।
अनन्या नंगी खड़ी थी। सिर्फ गर्दन में कॉलर। शरीर पर पिछले दिनों के सारे निशान—छड़ी के, सुइयों के, सिगरेट के, नाखूनों के— Sab साफ दिख रहे थे। हाथ में शराब की ट्रे। पैरों में हल्की चेन। रुद्रक्ष सोफे पर बैठा सिगार पी रहा था। ठंडी आँखों से सब देख रहा था।
“परोसो।”

अनन्या काँपते कदमों से पहले भारी वाले के पास गई। गिलास भरकर दिया। उसके हाथ ने जानबूझकर उसके निप्पल को छुआ और दबाया। अनन्या की साँस रुक गई लेकिन वह चुप रही। गिनती दिमाग में शुरू हो गई—एक।
दूसरे के पास गई। दुबले वाले ने गिलास लेते समय उसकी जांघ के अंदरूनी हिस्से पर उंगलियाँ फेर दीं। ऊपर तक। अनन्या काँपी। दो।
तीसरे ने गिलास लिया और उसके नितंब पर जोर से थप्पड़ मारा। आवाज हॉल में गूँजी। तीन।

रुद्रक्ष ने उंगली उठाई। अनन्या समझ गई। वह भारी वाले के सामने घुटनों पर बैठ गई। उसने अपना लंड निकाला। अनन्या ने मुँह खोला। लंड गले तक चला गया। भारी वाला जोर-जोर से पेलने लगा। अनन्या की आँखों से पानी बहने लगा। लार ठोड़ी से टपक रही थी। कुछ देर बाद उसने अनन्या के बाल पकड़कर लंड निकाला और उसके चेहरे पर झड़ गया। गर्म पानी आँखों और होठों पर लगा।
“चार…” अनन्या की आवाज काँपी।

रुद्रक्ष ने फिर इशारा किया। अनन्या दुबले वाले के पास गई। इस बार उसने अनन्या को मेज पर पेट के बल लिटा दिया। गाँड फैलाई और अपना लंड एक धक्के में अंदर धकेल दिया। अनन्या की चीख निकली। दुबला वाला जोर-जोर से पेलने लगा। मेज हिल रही थी। खाने की प्लेटें खनकने लगीं। वह अंदर ही झड़ गया। पानी रिसने लगा।
“पाँच…”

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तीसरे के पास गई। उसने अनन्या को सोफे पर चित लिटाया। टाँगें कंधों पर रखीं और चूत में लंड धँस गया। गहराई तक। हर धक्के के साथ अनन्या का शरीर काँप रहा था। तीसरे ने निप्पल मरोड़ते हुए पेलना जारी रखा। आखिरकार अंदर झड़ गया।
“छह…”
तीनों ने बारी-बारी फिर से शुरू किया। कभी मुँह, कभी चूत, कभी गाँड। कभी दो एक साथ। अनन्या की गिनती बारह, तेरह, चौदह तक पहुँच गई। शरीर पर उनके नाखूनों के नए निशान पड़ गए। थूक, पानी और खून मिलकर चमकने लगा। रुद्रक्ष सिगार पीता रहा। कभी-कभी सिर हिलाकर अगला हुक्म देता।

आखिरी राउंड में तीनों ने अनन्या को बीच में लिटा दिया। एक ने मुँह में, एक ने चूत में, एक ने गाँड में। तीनों एक साथ पेलने लगे। अनन्या का शरीर उनके वजन से दब गया। आवाज नहीं निकल रही थी। सिर्फ अस्पष्ट सिसकियाँ। तीनों ने अंदर ही झड़ा। गिनती इक्कीस पर जाकर रुकी।
रुद्रक्ष उठा। उसने चेन पकड़ी और अनन्या को खींचकर अपने पास किया। तीनों दुश्मन संतुष्ट होकर बैठे रहे। रुद्रक्ष ने अनन्या के बाल पकड़कर मुँह ऊपर उठाया।
“अब इन्हें धन्यवाद दो।”
अनन्या की आवाज टूटी हुई थी। “धन्यवाद… कि आपने मुझे इस्तेमाल किया…”

तीनों हँसे। रुद्रक्ष ने उन्हें विदा किया। दरवाजा बंद होते ही हॉल में सिर्फ दो रह गए।
रुद्रक्ष ने अनन्या को सीधे शीशे वाले कमरे में घसीटा। बंधन कस दिए। शरीर पर दुश्मनों का पानी अभी भी चमक रहा था।
“अब बता। एक-एक नाम। एक-एक स्पर्श। कितनी बार। कहाँ। कैसे।”
अनन्या रोते हुए बताने लगी। भारी वाले ने पहले मुँह में झड़ा, दुबले वाले ने गाँड में दो बार भरा, तीसरे ने चूत में सबसे गहराई तक पेलना… हर विवरण। रुद्रक्ष सुनता रहा। कोई भाव नहीं।

जब वह खत्म हुई तो रुद्रक्ष ने छड़ी उठाई। पुराने निशानों पर नए वार शुरू कर दिए। नितंब, जांघें, पीठ। खून की नई धारें बहने लगीं। फिर उसने गाँड में लंड धकेल दिया। जोर से। जैसे दुश्मनों के निशान मिटा रहा हो। अनन्या अब सिर्फ सिसक रही थी। वह अंदर झड़ गया। फिर चूत में डालकर वहाँ भी झड़ गया।
उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा। “निगल। उनके और मेरे दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।

“नया नियम। आज से तू रोज़ रात मुझे बताएगी कि दिन भर तेरे शरीर के किस छेद ने सबसे ज्यादा भरने की माँग की। मुँह, चूत या गाँड। झूठ बोली तो फिर से उन तीनों के पास एक हफ्ते के लिए भेज दूँगा।”
अनन्या फर्श पर पड़ी काँप रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब और गहरा हो चुका था। तीन दुश्मनों की उंगलियाँ, उनके लंड और रुद्रक्ष की ठंडी निगाह सब मिलकर उसे अंदर से खा रहे थे।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।

“अगले हफ्ते मैं तुझे एक बंद कमरे में तीन कैमरों के साथ छोड़ दूँगा। अंदर सिर्फ एक कुर्सी और एक टेबल होगी। तू खुद तय करेगी कि कैसे अपने शरीर को कैमरों के सामने तोड़ना है। मैं बाहर से देखूँगा। अगर तोड़ना कम लगा तो मैं आकर उन तीनों दुश्मनों को फिर से बुला लूँगा और तुझे उनके सामने और गहराई तक खोलूँगा।”

अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ दुश्मनों के हाथों का नहीं, कैमरों के सामने खुद के हाथों का भी होने वाला था। अनन्या फर्श पर पड़ी-पड़ी काँप रही थी। शरीर पर तीन दुश्मनों का पानी अभी भी चिपका हुआ था। गाँड और चूत दोनों सूजकर दर्द कर रहे थे। निप्पल दबे हुए जल रहे थे। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—कैमरों वाला कमरा, खुद तोड़ना, नहीं तो फिर से वे तीनों।

दो दिन बाद वह कमरा तैयार हो गया। छोटी सी जगह। तीनों कोनों में काले कैमरे। बीच में एक लकड़ी की कुर्सी और एक निचली टेबल। कोई चेन नहीं, कोई बंधन नहीं। सिर्फ नंगी अनन्या और लाल बत्ती वाली कैमरे की आँखें।
रुद्रक्ष ने उसे अंदर धकेला। दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। अंदर सिर्फ उसकी साँसें और कैमरों की हल्की भनभनाहट रह गई।
पहले घंटे वह कुर्सी पर बैठकर काँपती रही। फिर उठी। कैमरों की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई। दोनों हाथों से अपने निप्पल मरोड़ने लगी। जोर से। दर्द से आँखें भर आईं। फिर एक हाथ नीचे ले जाकर चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं। अंदर-बाहर। कैमरे सब रिकॉर्ड कर रहे थे। वह जानती थी रुद्रक्ष बाहर स्क्रीन पर देख रहा है।

रात के दूसरे पहर में वह टेबल पर लेट गई। टाँगें फैलाकर मुट्ठी चूत में धकेलने की कोशिश करने लगी। आधा अंदर गया। चीख निकली। फिर और जोर से। पूरी मुट्ठी अंदर चली गई। वह कैमरों को दिखाते हुए मुट्ठी घुमाने लगी। पानी बहने लगा। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में डाल दी। और दर्द। और चीख। लेकिन रुकी नहीं। बारी-बारी दोनों जगह मुट्ठी घुमाती रही। जब गिरी तो फर्श पर लेटकर अपनी ही उंगलियों से खून को निप्पलों पर मलने लगी।

दूसरे दिन प्यास से जीभ सूख गई। उसने अपनी लार से उंगलियाँ गीली कीं और दोनों छेद एक साथ फैलाने लगी। चार उंगलियाँ चूत में, तीन गाँड में। शरीर काँप रहा था। आवाज निकाल-निकालकर कैमरों को दिखाती रही। कभी कुर्सी पर बैठकर निप्पल मुँह में ले लेती और काटती। खून का स्वाद लेती। कभी टेबल के किनारे से गाँड रगड़ती ताकि पुराने निशान फिर से खुल जाएँ।

तीसरे दिन शाम तक अनन्या का शरीर पूरी तरह थक चुका था। लेकिन अंदर की भूख और तेज हो गई थी। उसने कुर्सी को उल्टा किया। उसके पाये के सहारे अपनी चूत फैलाकर मुट्ठी अंदर तक डाल दी। जोर-जोर से। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में। दोनों जगह खून और पानी मिलकर बह रहा था। वह कैमरों के सामने घुटनों के बल बैठ गई और अपनी ही उंगलियों से चेहरा गीला करने लगी। आँसू, लार, खून सब मिला हुआ।

दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर खड़ा था। हाथ में छोटा स्क्रीन। उसने अनन्या को फर्श पर खून और पानी में सना देखा।
“तीन दिन में तूने खुद को इक्यावन बार तोड़ा। मुट्ठी चौंतीस बार। खून पंद्रह बार निकाला। बेहतर।”
अनन्या उठ नहीं पा रही थी। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा किया। शरीर लड़खड़ाया। उसने अनन्या को सीधे शीशे वाले कमरे में घसीटा। बंधन कस दिए।
“अब मैं चेक करूँगा।”

उसने अपनी मुट्ठी अनन्या की चूत में धकेल दी। आसानी से चली गई। घुमाई। फिर गाँड में डाली। और आसानी से। दोनों जगह बारी-बारी मुट्ठी घुमाता रहा। अनन्या की चीखें निकल रही थीं लेकिन शरीर अब विरोध नहीं कर रहा था।
“अब मेरी बारी।”
उसने लंड निकाला। पहले गाँड में जड़ तक धकेल दिया। जोर से पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल मरोड़ता। दूसरा हाथ चूत में उंगलियाँ घुमाता। अनन्या शीशे में अपनी थकी और खुली काया देख रही थी। रुद्रक्ष की लय तेज होती गई। जब अनन्या गिरी तो भी वह रुका नहीं। अंदर ही झड़ गया। फिर लंड निकालकर चूत में डाल दिया और वहाँ भी झड़ गया।

उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा। “निगल। तीन दिन का अपना और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ दो घंटे उस कैमरे वाले कमरे में बिताएगी। खुद को नए तरीके से तोड़ेगी। मैं स्क्रीन पर देखूँगा। अगर कोई दिन दोहराया या कम जोर से किया तो उन तीनों दुश्मनों को फिर बुलाकर तुझे उनके सामने पूरे दिन के लिए छोड़ दूँगा।”

अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब खुद को कैमरों के सामने तोड़ने की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक खुली बालकनी में बाँध दूँगा। सुबह से शाम तक। नीचे सड़क पर लोग गुजरते रहेंगे। तू नंगी खड़ी रहेगी। मैं कभी-कभी आकर तुझे भरूँगा। कभी नहीं भी आऊँगा। तू सिर्फ गिनेगी कि कितनी निगाहें तुझे छूती हैं। शाम को हिसाब देना होगा।”

अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ कैमरों और दुश्मनों का नहीं, सुबह की रोशनी और सड़क की निगाहों का भी होने वाला था। और अगली बालकनी पहले से कहीं ज्यादा खुली और लंबी होने वाली थी।अनन्या फर्श पर पड़ी-पड़ी काँप रही थी। शरीर पर तीन दुश्मनों का पानी अभी भी चिपका हुआ था। गाँड और चूत दोनों सूजकर दर्द कर रहे थे।

निप्पल दबे हुए जल रहे थे। रुद्रक्ष की आखिरी बात कानों में गूँज रही थी—कैमरों वाला कमरा, खुद तोड़ना, नहीं तो फिर से वे तीनों।
दो दिन बाद वह कमरा तैयार हो गया। छोटी सी जगह। तीनों कोनों में काले कैमरे। बीच में एक लकड़ी की कुर्सी और एक निचली टेबल। कोई चेन नहीं, कोई बंधन नहीं। सिर्फ नंगी अनन्या और लाल बत्ती वाली कैमरे की आँखें।

रुद्रक्ष ने उसे अंदर धकेला। दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। अंदर सिर्फ उसकी साँसें और कैमरों की हल्की भनभनाहट रह गई।
पहले घंटे वह कुर्सी पर बैठकर काँपती रही। फिर उठी। कैमरों की तरफ मुँह करके खड़ी हो गई। दोनों हाथों से अपने निप्पल मरोड़ने लगी। जोर से। दर्द से आँखें भर आईं। फिर एक हाथ नीचे ले जाकर चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं। अंदर-बाहर। कैमरे सब रिकॉर्ड कर रहे थे। वह जानती थी रुद्रक्ष बाहर स्क्रीन पर देख रहा है।

रात के दूसरे पहर में वह टेबल पर लेट गई। टाँगें फैलाकर मुट्ठी चूत में धकेलने की कोशिश करने लगी। आधा अंदर गया। चीख निकली। फिर और जोर से। पूरी मुट्ठी अंदर चली गई। वह कैमरों को दिखाते हुए मुट्ठी घुमाने लगी। पानी बहने लगा। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में डाल दी। और दर्द। और चीख। लेकिन रुकी नहीं। बारी-बारी दोनों जगह मुट्ठी घुमाती रही। जब गिरी तो फर्श पर लेटकर अपनी ही उंगलियों से खून को निप्पलों पर मलने लगी।

दूसरे दिन प्यास से जीभ सूख गई। उसने अपनी लार से उंगलियाँ गीली कीं और दोनों छेद एक साथ फैलाने लगी। चार उंगलियाँ चूत में, तीन गाँड में। शरीर काँप रहा था। आवाज निकाल-निकालकर कैमरों को दिखाती रही। कभी कुर्सी पर बैठकर निप्पल मुँह में ले लेती और काटती। खून का स्वाद लेती। कभी टेबल के किनारे से गाँड रगड़ती ताकि पुराने निशान फिर से खुल जाएँ।

तीसरे दिन शाम तक अनन्या का शरीर पूरी तरह थक चुका था। लेकिन अंदर की भूख और तेज हो गई थी। उसने कुर्सी को उल्टा किया। उसके पाये के सहारे अपनी चूत फैलाकर मुट्ठी अंदर तक डाल दी। जोर-जोर से। फिर मुट्ठी निकालकर गाँड में। दोनों जगह खून और पानी मिलकर बह रहा था। वह कैमरों के सामने घुटनों के बल बैठ गई और अपनी ही उंगलियों से चेहरा गीला करने लगी। आँसू, लार, खून सब मिला हुआ।

दरवाजा खुला। रुद्रक्ष अंदर खड़ा था। हाथ में छोटा स्क्रीन। उसने अनन्या को फर्श पर खून और पानी में सना देखा।
“तीन दिन में तूने खुद को इक्यावन बार तोड़ा। मुट्ठी चौंतीस बार। खून पंद्रह बार निकाला। बेहतर।”
अनन्या उठ नहीं पा रही थी। रुद्रक्ष ने बालों से खींचकर खड़ा किया। शरीर लड़खड़ाया। उसने अनन्या को सीधे शीशे वाले कमरे में घसीटा। बंधन कस दिए।

“अब मैं चेक करूँगा।”
उसने अपनी मुट्ठी अनन्या की चूत में धकेल दी। आसानी से चली गई। घुमाई। फिर गाँड में डाली। और आसानी से। दोनों जगह बारी-बारी मुट्ठी घुमाता रहा। अनन्या की चीखें निकल रही थीं लेकिन शरीर अब विरोध नहीं कर रहा था।
“अब मेरी बारी।”
उसने लंड निकाला। पहले गाँड में जड़ तक धकेल दिया। जोर से पेलने लगा। एक हाथ से निप्पल मरोड़ता। दूसरा हाथ चूत में उंगलियाँ घुमाता। अनन्या शीशे में अपनी थकी और खुली काया देख रही थी। रुद्रक्ष की लय तेज होती गई। जब अनन्या गिरी तो भी वह रुका नहीं। अंदर ही झड़ गया। फिर लंड निकालकर चूत में डाल दिया और वहाँ भी झड़ गया।

उंगलियों से पानी उठाकर अनन्या के मुँह में ठूंसा। “निगल। तीन दिन का अपना और मेरा दोनों।”
अनन्या ने निगल लिया।
रुद्रक्ष कुर्सी पर बैठ गया। सिगार जलाई। धुआँ उठ रहा था।
“नया नियम। आज से तू रोज़ दो घंटे उस कैमरे वाले कमरे में बिताएगी। खुद को नए तरीके से तोड़ेगी। मैं स्क्रीन पर देखूँगा। अगर कोई दिन दोहराया या कम जोर से किया तो उन तीनों दुश्मनों को फिर बुलाकर तुझे उनके सामने पूरे दिन के लिए छोड़ दूँगा।”

अनन्या फर्श पर पड़ी हांफ रही थी। शरीर जल रहा था। लेकिन अंदर वह खालीपन अब खुद को कैमरों के सामने तोड़ने की भूख बन चुका था।
रुद्रक्ष ने आखिरी कश लिया। आवाज और ठंडी हो गई।
“अगले हफ्ते मैं तुझे एक खुली बालकनी में बाँध दूँगा। सुबह से शाम तक। नीचे सड़क पर लोग गुजरते रहेंगे। तू नंगी खड़ी रहेगी। मैं कभी-कभी आकर तुझे भरूँगा। कभी नहीं भी आऊँगा। तू सिर्फ गिनेगी कि कितनी निगाहें तुझे छूती हैं। शाम को हिसाब देना होगा।”

अनन्या की आँखें अंधेरे में खुली रह गईं। नया डर। नई भूख। चेन हल्की सी खनकी। तोड़ना अब सिर्फ कैमरों और दुश्मनों का नहीं, सुबह की रोशनी और सड़क की निगाहों का भी होने वाला था। और अगली बालकनी पहले से कहीं ज्यादा खुली और लंबी होने वाली थी।

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