कुंवारी की चीखें और खून की रातें

ऑफिस की नई लड़की को घर बुलाकर राघव ने उसकी सब सीमाएँ तोड़ दीं। दर्द, आँसू और जबरदस्ती के उस खेल में वह बार-बार टूटती गई, फिर भी बच नहीं सकी।

मेरा नाम राघव मेहरा है। उम्र 32 साल। मैं पुणे के हिंजवड़ी आईटी पार्क में एक प्राइवेट फर्म के प्रोडक्ट डिज़ाइन विभाग का सीनियर इंजीनियर हूँ। देखने में औसत से थोड़ा ऊपर, कंधे चौड़े, दाढ़ी साफ-सुथरी, और आवाज़ में वो गंभीरता जो ज्यादातर लड़कियों को प्रभावित करती है।

उस दिन विभाग में एक नई जॉइनिंग हुई। नाम – अदिति राव। उम्र 25। नागपुर की रहने वाली, पुणे में किराये के फ्लैट में अकेली रहती थी। पहली नज़र में ही साफ था कि वह वर्जिन है – आँखों में वो घबराहट, बदन में वो कसाव, और बोलने का वो तरीका जो अनुभवहीन लड़कियों में होता है। गोरी-गोरी त्वचा, गोल-मटोल चेहरा, छोटे लेकिन सख्त और उभरे हुए स्तन, पतली कमर, और भारी-भरकम जांघें। उसने पहना था काला फॉर्मल टॉप और स्किनी ब्लैक पैंट्स, जिससे उसके नितंबों की गोलाई साफ उभर रही थी।

बॉस ने मुझे बुलाया। “राघव, अदिति आज से तुम्हारे अंडर में काम करेगी। रिपोर्टिंग तुम्हें ही। ध्यान रखना, नई है।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “जी सर।” अदिति की आँखें मेरे चेहरे पर टिकी रहीं। मैंने मन ही मन सोचा – आज से यह कुंवारी चूत मेरी है। धीरे-धीरे गरम करूँगा, फिर तोड़ूँगा।

पहले दो हफ्ते मैंने सिर्फ काम सिखाया। लेकिन हर मौके पर छूता रहा। कभी उसके कंधे पर हाथ, कभी कमर के पास से गुजरते हुए उंगलियों का हल्का स्पर्श, कभी कुर्सी के नीचे उसके घुटने से अपना घुटना सटाना। वह शरमाती, लेकिन हटती नहीं थी। एक दिन मैंने जानबूझकर उसके जांघ पर हाथ रखा। वह झपक कर उठी और बाहर चली गई। दस मिनट बाद लौटी तो आँखों में आँसू थे।
मैंने धीरे से कहा, “सॉरी। गलती हो गई।”

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वह बोली, “एक शर्त पर माफ करूँगी। आज शाम अपने फ्लैट पर डिनर इनवाइट करो।”
मैंने तुरंत हाँ कर दी।
शाम 8 बजे वह मेरे फ्लैट पहुँची। छोटे काले स्कर्ट और डीप नेक टॉप में। स्तनों की गोलियाँ साफ दिख रही थीं। मैंने व्हिस्की निकाली। उसने पहले मना किया, फिर एक पेग पीया, फिर दूसरा। तीसरे पेग के बाद उसकी आँखें लाल हो गईं और साँसें तेज।
मैंने उसका हाथ पकड़ा और सोफे पर खींच लिया। वह विरोध नहीं कर सकी। मैंने उसके टॉप के ऊपर से ही स्तनों को जोर से मसलना शुरू किया। “आह… धीरे…” उसने कहा, लेकिन आवाज़ में विरोध नहीं, मज़ा था।

मैंने टॉप ऊपर खींचा। ब्रा नहीं थी। छोटे-छोटे, गुलाबी निप्पल वाले स्तन बाहर निकल आए। मैंने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दूसरी तरफ हाथ से मसलता रहा। वह कराह उठी। “राघव… दर्द हो रहा है…”
“दर्द ही मज़ा है,” मैंने कहा और दाँतों से निप्पल को हल्के से काटा। वह झटक उठी। मैंने दोनों स्तनों को एक साथ पकड़कर निचोड़ा। उसकी पीठ झुक गई।
फिर मैंने उसका स्कर्ट ऊपर कर दिया। पैंटी नहीं थी। चूत पहले से गीली थी। मैंने दो उंगलियाँ अंदर घुसा दीं। वह चीखी। “बहुत टाइट है… निकालो…”

मैंने उंगलियाँ और अंदर धकेल दीं। कुंवारी चूत की दीवारें मेरे अंगुलियों को कस रही थीं। मैंने उंगलियों को मोड़कर ऊपर की तरफ दबाया। वह तड़पने लगी। “बस करो… प्लीज…”
मैंने नहीं सुना। उंगलियाँ निकालकर उसके मुँह में ठूँस दीं। “चाट। अपनी चूत का स्वाद।” वह झिझकी, फिर चाटने लगी।
मैंने उसे बेड पर पटक दिया। उसके हाथों को सिर के ऊपर बाँध दिया – अपने बेल्ट से। पैरों को फैलाकर टखनों से बेड के पैरों से बाँध दिया। अब वह पूरी तरह बेबस थी।

मैंने अपना लंड निकाला। 7.5 इंच, मोटा, नसों से भरा हुआ। उसके चेहरे के पास ले जाकर मुँह में ठूँस दिया। “चूसो। गला तक।” वह घबरा गई। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे किया। लंड उसके गले में धँस रहा था। आँसू निकल आए, लार बहने लगी, लेकिन मैं रुका नहीं। जब वह लगभग साँस फूलने लगी तब निकाला।
फिर मैंने उसके पैरों के बीच घुटने टिकाए। लंड के सिरे को चूत के मुँह पर रखा। “देख, अब तेरी सील तोड़ता हूँ।”

एक जोरदार धक्का। आधा लंड अंदर घुस गया। वह चीख पड़ी। खून निकल आया। मैं रुका नहीं। दूसरा धक्का – पूरा लंड अंदर। उसकी चूत फट गई थी। खून मेरे लंड पर लग रहा था। मैंने उसके मुँह पर हाथ रखकर चीखें दबा दीं और जोर-जोर से हिलने लगा। हर धक्के पर उसकी चूत और फैल रही थी, खून और पानी मिलकर चिपचिपा हो रहा था।
“दर्द हो रहा है ना?” मैंने उसके कान में कहा। “यह दर्द याद रखना। आज से तू मेरी कुतिया है।”

मैंने 20 मिनट तक बेरहमी से पेला। वह रो रही थी, कराह रही थी, कभी “निकल जा” कह रही थी, कभी “और जोर से”। जब वह झड़ गई तो उसके पूरे बदन में कंपन था। मैंने बाहर निकाला और उसके चेहरे पर पानी छोड़ दिया। खून मिला हुआ वीर्य उसके गालों, होंठों, आँखों पर लगा।

बाँध खोले बिना मैंने उसे पलट दिया। अब गांड मेरे सामने थी। मैंने थूक लगाकर एक उंगली अंदर डाली। वह फिर चीखी। “वहाँ मत…”
मैंने उंगली निकालकर लंड लगा दिया। धीरे-धीरे नहीं – एक ही धक्के में आधा अंदर। उसकी गांड की दीवारें फटने को थीं। मैंने दोनों हाथों से उसके नितंबों को पकड़कर जोर-जोर से हिलाना शुरू किया। हर धक्के पर वह कराहती, रोती, गालियों की भीख माँगती। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “आज से तेरी गांड भी मेरी है। जब चाहूँगा, जहाँ चाहूँगा, जितनी देर चाहूँगा।”

मैंने उसकी गांड में झड़ने से पहले बाहर निकाला और फिर से चूत में डाल दिया। इस बार खून कम था, लेकिन चूत अभी भी बहुत टाइट थी। मैंने उसके स्तनों को पीछे से मसलते हुए और 15 मिनट पेला। जब दूसरी बार झड़ा तो वह बेहोशी की हालत में थी।
रात भर मैंने उसे चार बार लिया। दो बार चूत, एक बार गांड, एक बार मुँह। हर बार बाँधकर, थप्पड़ मारकर, बाल खींचकर, निप्पल काटकर। सुबह तक उसकी चूत और गांड दोनों सूज गए थे, खून के धब्बे चादर पर फैले थे, आँखें सूजी हुई थीं।

मैंने उसे नहलाया, खाना खिलाया, फिर से बाँध दिया। “अब तू जा नहीं सकती। ऑफिस में भी तू मेरी रहेगी। हर हफ्ते कम से कम तीन रात यहीं सोएगी। समझी?”
वह आँखों में आँसू लिए हामी भर गई।

अगली रात मैंने उसे और आगे ले गया। उसके निप्पलों पर क्लिप्स लगाए, चूत में वाइब्रेटर डालकर बांध दिया, और खुद सिर्फ देखता रहा जब तक वह रो-रोकर झड़ नहीं गई। फिर मैंने उसे कुत्ते की तरह रेंगने को मजबूर किया, पैरों पर चाटना सिखाया, और आखिर में फिर से दोनों छेदों में बारी-बारी से पेला।
अब अदिति राव सिर्फ मेरी जूनियर नहीं रही। वह मेरी निजी कुतिया बन चुकी थी – जो दर्द माँगती है, जो खून देखकर उत्तेजित होती है, और जो हर रात मेरे लंड के लिए तड़पती है।जारी…

अगली सुबह अदिति अभी भी मेरे बेड पर बाँधी हुई थी। हाथ सिर के ऊपर, टखने बिस्तर के पैरों से बँधे। उसकी चूत और गांड दोनों सूजे हुए थे, हल्के खून के धब्बे जांघों तक फैले थे। मैंने कॉफी बनाई, उसके मुँह के पास ले जाकर जबरदस्ती पिलाई। वह गटक गई। आँखों में अभी भी डर और वासना का मिश्रण था।
“आज ऑफिस जाना है,” मैंने कहा। “लेकिन पहले एक सबक और।”

मैंने उसके निप्पलों पर छोटे मेटल क्लिप्स लगा दिए। दर्द से वह तन गई। फिर मैंने एक छोटा वाइब्रेटर उसकी चूत में घुसाया और टेप से चिपका दिया। गांड में एक पतला बट-प्लग ठूँस दिया। कपड़े पहनने दिए – ब्लैक फॉर्मल ड्रेस, अंदर कुछ नहीं। क्लिप्स और वाइब्रेटर के साथ।
ऑफिस में वह मेरी कुर्सी के बगल में बैठी। हर बार जब मैं रिमोट दबाता, वाइब्रेटर जोर से काँपता। वह होंठ काटती, पसीना आने लगता, लेकिन आवाज नहीं निकालती। लंच ब्रेक में मैंने उसे स्टोर रूम में खींचा।

दीवार से लगाकर ड्रेस ऊपर की, क्लिप्स और जोर से दबाए, और मुँह में लंड ठूँस दिया। “चाट। पूरा गला तक।” वह आँसू बहाते हुए चूसने लगी। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर को आगे-पीछे किया जब तक उसकी नाक मेरे पेट से नहीं सट गई। लार और आँसू उसके गालों पर बह रहे थे। मैंने उसके मुँह में झड़ दिया और कहा, “निगल। एक बूँद भी बाहर नहीं।”

शाम को घर लौटे तो मैंने उसे सीधे बेड पर पटक दिया। इस बार रस्सियाँ नहीं, चेन। हाथों को सिर के ऊपर चेन से बाँधा, पैरों को फैलाकर अलग-अलग बाँधा। उसके सामने एक आईना रखा ताकि वह सब कुछ देख सके।
मैंने पहले उसके स्तनों पर काम किया। क्लिप्स हटाए तो खून की छोटी-छोटी बूँदें निकलीं। मैंने जीभ से चाटा, फिर दाँतों से निप्पल काटते हुए खींचा। वह चिल्लाई। “चुप,” मैंने थप्पड़ मारा। गाल लाल हो गया। दूसरा थप्पड़। फिर मैंने मोमबत्ती जलाई और गर्म मोम उसके स्तनों, पेट और जांघों पर टपकाया। हर बूँद पर वह तड़पती। मोम ठंडा होते-होते उसकी त्वचा पर सफेद धब्बे बन गए।

फिर मैंने उसकी चूत पर ध्यान दिया। उंगलियाँ अंदर घुसाईं – तीन एक साथ। कुंवारी वाली टाइटनेस अब कम हो चुकी थी, लेकिन अभी भी कसकर पकड़ रही थी। मैंने उंगलियों को जोर से मोड़ा, ऊपर की तरफ दबाया जहाँ उसकी संवेदनशील जगह थी। वह कमर उठा-उठाकर हिलने लगी। “माफ़ करो… बहुत हो गया…”
“अभी तो शुरू हुआ है,” मैंने कहा और चौथी उंगली भी अंदर धकेल दी। फिर पूरा हाथ। उसकी चूत मेरे मुक्के को निगल रही थी। मैंने मुक्का अंदर-बाहर किया। खून फिर निकल आया। वह रो रही थी, लेकिन हिप्स मेरे हाथ की तरफ धकेल रही थी।

जब वह लगभग बेहोश होने वाली थी तब मैंने मुक्का निकाला और लंड डाल दिया। इस बार कोई धीरे-धीरे नहीं। एक ही धक्के में पूरा। फिर जानवरों की तरह पेला। हर धक्के पर उसके स्तन काँप रहे थे, मोम के धब्बे टूट रहे थे। मैंने उसका गला हल्के से दबाया। आँखें फटी की फटी रह गईं। साँसें रुकने लगीं तो छोड़ा, फिर दोबारा दबाया। वह झड़ गई – पूरे बदन में कंपन, चूत मेरे लंड को और कस रही थी।

मैं बाहर निकला और उसे पलट दिया। गांड के छेद में अभी भी बट-प्लग था। निकाला तो वह खुला और लाल था। मैंने थूक लगाकर लंड घुसा दिया। इस बार पूरी तरह। उसकी गांड की दीवारें फटने को थीं। मैंने दोनों हाथों से नितंबों को फैलाकर रखा और जोर-जोर से धकेले। हर धक्के पर वह चीखती, लेकिन चीखें तकिये में दब जातीं। मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में बोला, “तेरी गांड अब मेरी निजी टॉयलेट है। जब चाहूँगा इस्तेमाल करूँगा।”

मैंने गांड में झड़ने से पहले निकाला, फिर चूत में डालकर दूसरी बार भरा। वीर्य खून के साथ बाहर बह रहा था।
रात के दो बजे मैंने उसे खोला। वह चल भी नहीं पा रही थी। मैंने उसे बाथरूम ले जाकर नहलाया, लेकिन नहलाते समय भी उंगलियाँ चूत और गांड में घुसाए रखा। फिर बेड पर लिटाया और उसके पैरों के बीच अपना मुँह लगा दिया। खून और वीर्य चाटते हुए उसकी चूत को जीभ से फाड़ने लगा। वह कमजोर आवाज में कराह रही थी। जब दोबारा झड़ी तो मैंने उसके ऊपर चढ़कर फिर से लंड अंदर किया – इस बार धीरे, लेकिन गहरा। हर धक्का उसके गर्भ तक पहुँच रहा था।

सुबह चार बजे तक मैंने उसे छह बार लिया। चूत, गांड, मुँह – बारी-बारी। बीच-बीच में थप्पड़, बाल खींचना, निप्पल काटना, गला दबाना। उसके शरीर पर नील के निशान, दाँतों के निशान, मोम के धब्बे और खून के धब्बे थे।
अगले दिन रविवार था। मैंने उसे पूरे दिन बाँधकर रखा। सुबह नाश्ता उसके मुँह में खुद खिलाया, लेकिन खाना खत्म होते ही लंड मुँह में ठूँस दिया। दोपहर में मैंने उसके स्तनों को रस्सी से बाँधा – इतना कसकर कि वे बैंगनी पड़ने लगे। चूत में एक बड़ा डिल्डो ठूँसकर टेप कर दिया और वाइब्रेटर मोड ऑन कर दिया। फिर मैं लैपटॉप पर काम करने बैठ गया। हर आधे घंटे बाद जाकर उसके गाल पर थप्पड़ मारता, निप्पल मरोड़ता, और पूछता, “मजा आ रहा है ना कुतिया?”

वह सिर्फ हामी भरती। आँसू बह रहे थे, लेकिन निचला हिस्सा लगातार काँप रहा था।
शाम को मैंने डिल्डो निकाला। चूत पूरी तरह खुली और लाल थी। मैंने उसे कुत्ते की पोजीशन में किया, हाथ पीछे बाँधे, और गांड में फिर से घुसा। इस बार एक हाथ से उसका गला दबाए रखा, दूसरे से बाल। धक्के इतने जोर के थे कि बेड की हेडबोर्ड दीवार से टकरा रही थी। वह अटकी-अटकी आवाजें निकाल रही थी। जब मैंने गला और कस लिया तो उसकी आँखें ऊपर फिर गईं और वह झड़ गई – इतनी जोर से कि उसके पेशाब भी निकल आए। मैंने उसी हाल में लंड अंदर रखते हुए कहा, “अब से जब भी झड़ेगी, पेशाब भी करेगी। समझी?”

रात को मैंने एक नया खेल खेला। उसके हाथ-पैर बाँधकर आईने के सामने खड़ा किया। पीछे से लंड गांड में डाले रखा और उसके कान में धीरे-धीरे बताया कि अगले हफ्ते मैं उसके ऑफिस के एक कॉलीग को बुलाऊँगा। वह देखेगा जबकि मैं उसे चोदूँगा। अदिति की आँखों में भय था, लेकिन चूत से पानी टपक रहा था।
“नहीं… प्लीज अकेला ही रखो…” वह बोली।
मैंने जोर का धक्का मारा। “मेरी मर्जी। तू सिर्फ सहने वाली है।”

मैंने उस रात उसे तीन बार और लिया। आखिरी बार जब झड़ा तो उसके मुँह में। उसने पूरा निगल लिया। फिर मैंने उसे अपनी छाती से लगा लिया। उसके शरीर पर मेरे बनाए सभी निशान चमक रहे थे।
“अब तू पूरी तरह मेरी हो चुकी है,” मैंने उसके बाल सहलाते हुए कहा। “दर्द तेरा प्यार है, खून तेरा मेकअप है, और मेरा लंड तेरी साँस है। भागने की कोशिश मत करना। अगली बार और बुरा होगा।”

अदिति ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठ मेरे सीने पर थे। वह थक चुकी थी, टूट चुकी थी, और फिर भी उसके निचले हिस्से से हल्की सिहरन आ रही थी – मानो और माँग रही हो।
अगली सुबह ऑफिस जाते समय मैंने उसके अंदर एक छोटा रिमोट-कंट्रोल्ड अंडा डाल दिया। पूरे दिन मैं मीटिंग्स के बीच-बीच में रिमोट दबाता रहा। वह अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे काँपती रही, होंठ काटती रही, और कभी-कभी मेरी तरफ ऐसी निगाहों से देखती रही मानो और सजा माँग रही हो।

शाम को घर पहुँचते ही मैंने उसे दीवार से लगाकर ड्रेस फाड़ दी। इस बार कोई प्रस्तावना नहीं। सीधे लंड चूत में। खड़े-खड़े, एक पैर उठाकर, बाल पकड़कर। धक्के इतने तेज कि दीवार से उसके सिर की टक्कर की आवाज आ रही थी। वह चिल्ला रही थी – दर्द और मजे के मिश्रण से। जब वह झड़ी तो मैंने उसे फर्श पर गिरा दिया, मुँह के बल, और गांड में घुसा दिया। फर्श पर उसके स्तन रगड़ खा रहे थे, निप्पल छिल रहे थे। मैंने दोनों हाथों से उसके कूल्हे पकड़कर ऐसे पेला जैसे कोई मशीन हो।

रात के दस बजे तक वह फिर से बेहोशी के करीब थी। मैंने उसे उठाकर बेड पर डाला, पानी पिलाया, और फिर से उसके पैर फैला दिए।
“सोने से पहले एक और राउंड,” मैंने कहा और लंड उसके मुँह में डाल दिया। इस बार वह खुद चूसने लगी – थकी हुई, टूटी हुई, लेकिन आज्ञाकारी। जब मैंने उसके गले में झड़ा तो उसने आँखें बंद करके पूरा निगल लिया।
मैं उसके पास लेट गया। उसका शरीर मेरे शरीर से चिपका हुआ था – पसीना, खून, वीर्य और मोम के धब्बों से सना हुआ। उसकी साँसें अभी भी तेज थीं।

“कल नया कुछ होगा,” मैंने अंधेरे में कहा। “तेरी गांड में आज से बड़ी चीज जाएगा। और अगर तू रोई तो और बड़ा।”
अदिति ने कुछ नहीं कहा। बस मेरे हाथ को अपनी चूत पर रख लिया – मानो कह रही हो कि वह तैयार है। या फिर उसके पास अब कोई और विकल्प बचा ही नहीं था।
और राघव मेहरा मुस्कुराया। क्योंकि यह तो अभी भी बस शुरुआत थी। उसकी असली टूटने वाली रातें अभी बाकी थीं।

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