छब्बीस साल के मोटे लंड वाले पड़ोसी ने अड़तीस साल की शादीशुदा औरत को बाँधकर बोतल ठूँसी, मुट्ठी घुसाई, गला दबाया और खून निकलने तक दोनों छेद फाड़ डाले। हर रात और क्रूर।
ये कहानी एकदम अलग है। नाम, उम्र, शहर, घर, शरीर के नाप-तोद, रिश्ते और पूरा माहौल बदला हुआ है। सब कुछ नया है।
रात के दस बज चुके थे जब विकास ने दरवाज़े पर दस्तक दी। वो 26 साल का था, लंबे कद का, कंधे चौड़े, छाती सख्त, और नीचे लटकता हुआ मोटा काला लंड जो आराम की हालत में भी 7 इंच से कम नहीं रहता था। खड़ा होने पर वो 9 इंच का हो जाता और मोटाई ऐसी कि मुट्ठी में पूरा न समाए। वो दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-15 में रहता था।
सामने वाली फ्लैट में रहती थी रेनू शर्मा। उम्र 38 साल। पति राजेश शर्मा 62 साल के थे, मोटे, साँस फूलने वाले, और पिछले चार साल से रेनू की चूत को ठीक से छू भी नहीं पाते थे। रेनू का शरीर अभी भी आग की तरह था—42 साइज़ के भारी, गोल, दूध भरे स्तन जिनकी निप्पल्स हमेशा थोड़ी सी खड़ी रहतीं, पतली कमर, चौड़ी गाँड़ जिसके दोनों गोल माँस के गोले हाथ से दबाने पर उँगली में गड्ढा बना देते, और चूत जो बाहर से छोटी और गुलाबी दिखती थी लेकिन अंदर गहरी और गीली रहती थी।
रेनू ने दरवाज़ा खोला। उसके शरीर पर सिर्फ एक पतला सा सफ़ेद साड़ी का पल्लू था, नीचे ब्लाउज़ और पेटीकोट भी नहीं। स्तन आधे बाहर निकले हुए थे। उसने विकास को अंदर खींचा और दरवाज़ा बंद कर दिया।
“आज रात पूरा समय है,” उसने धीमी आवाज़ में कहा। “राजेश अपनी बहन के यहाँ रुके हुए हैं। कल सुबह ही लौटेंगे।”
विकास ने बिना बात किए ही उसके साड़ी के पल्लू को खींचकर नीचे गिरा दिया। बड़े-बड़े स्तन झूलते हुए बाहर आ गए। उसने एक स्तन मुँह में भर लिया और जोर से चूसा। रेनू की कमर ऐंठ गई। विकास ने दाँत से निप्पल को दबाया। रेनू चीखी लेकिन आवाज़ दबा ली।
“ज़ोर से चूस… दाँत लगा… दर्द होना चाहिए,” उसने फुसफुसाया।
विकास ने दोनों स्तनों को दोनों हाथों से पकड़कर जोर-जोर से मसला। उँगलियाँ गड्ढे बना रही थीं। फिर उसने रेनू को दीवार से सटा दिया और घुटनों के बल बैठा दिया। अपना पैंट खोला। मोटा काला लंड बाहर निकला, नसों से भरा हुआ, सिर चमकता हुआ।
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रेनू ने मुँह खोला। विकास ने उसके बालों में हाथ डालकर सिर पकड़ा और एक झटके में पूरा लंड उसके गले में धकेल दिया। रेनू की आँखों में पानी आ गया। गला भर गया। उसने हाथों से विकास के जाँघों को धकेला लेकिन विकास ने और जोर से दबाया। लंड गले की दीवार से रगड़ खाता हुआ अंदर-बाहर होने लगा।
“चूस… और गहरा… वरना आज तुझे छोड़ूँगा नहीं,” विकास ने गुर्राकर कहा।
रेनू की आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन वो चूस रही थी। लार बहकर ठुड्डी से टपक रही थी। विकास ने उसके बालों को मुट्ठी में जकड़ लिया और अब पूरी क्रूरता से मुँह चोदने लगा। हर झटके में रेनू की गर्दन पीछे झुक जाती। दस मिनट तक ये चलता रहा। फिर विकास ने लंड बाहर निकाला। रेनू जोर-जोर से साँस ले रही थी, मुँह खुला, लार टपकती हुई।
“अब बिस्तर पर।”
रेनू बिस्तर पर लेट गई। विकास ने उसकी टाँगें फैला दीं। चूत पहले से गीली थी। उसने दो उँगलियाँ अंदर घुसा दीं और जोर से अंदर-बाहर करने लगा। फिर तीन। रेनू कराह उठी। विकास ने चौथी उँगली भी डाल दी और मुट्ठी बनाने की कोशिश की। रेनू चिल्लाई।
“आह… फट जाएगी… निकाल… निकाल…”
लेकिन विकास ने नहीं निकाला। उसने मुट्ठी अंदर घुमाई। रेनू की कमर उछल रही थी। आँसू बह रहे थे। फिर विकास ने मुट्ठी निकालकर अपनी जीभ चूत के अंदर डाल दी। चूसने लगा। चूत की दीवारों को चाटने लगा। रेनू का पानी उसके मुँह में भर रहा था।
“अब गाँड़ की बारी,” विकास ने कहा।
उसने रेनू को उल्टा कर दिया। गाँड़ के दोनों गोल माँस को जोर से फैलाया। छेद छोटा और सिकुड़ा हुआ था। उसने थूक लगाकर एक उँगली घुसाई। रेनू चीखी। फिर दो। फिर तीन। विकास ने कोई जेल नहीं लगाया। सिर्फ थूक और जबरदस्ती।
फिर उसने अपना लंड गाँड़ के छेद पर रखा और एक ही जोरदार झटके में आधा अंदर धकेल दिया। रेनू की चीख कमरे में गूँज गई। उसने चादर को मुट्ठी में जकड़ लिया।
“निकाल… दर्द… फट रही है…”
विकास ने सुना ही नहीं। उसने और जोर लगाया। पूरा 9 इंच गाँड़ के अंदर समा गया। रेनू का शरीर काँप रहा था। विकास ने उसके बालों को पकड़कर सिर पीछे खींचा और अब पूरी ताकत से गाँड़ चोदने लगा। हर झटके में उसकी जाँघें रेनू की गाँड़ से टकरातीं। आवाज़ गंदी और जोरदार थी।
“तेरी गाँड़ मेरे लंड के लिए बनी है,” उसने कहा। “आज इसे फाड़कर रख दूँगा।”
रेनू रो रही थी लेकिन उसके मुँह से “और… और जोर से…” भी निकल रहा था। विकास ने स्पीड बढ़ा दी। बीस मिनट तक लगातार गाँड़ मारता रहा। फिर उसने लंड बाहर निकाला। छेद खुला हुआ था, लाल और सूजा हुआ।
उसने रेनू को फिर सीधा किया और अब चूत में लंड घुसा दिया। चूत पहले से ही खुली हुई थी। लंड आसानी से अंदर चला गया। अब विकास ने कोई रहम नहीं रखा। दोनों हाथों से उसके स्तनों को पकड़कर जोर-जोर से दबाते हुए चूत को चोदने लगा। हर झटके में रेनू की चीख निकलती।
“चोद… फाड़ दे मेरी चूत… भोसड़ा बना दे…” रेनू पागलों की तरह चिल्ला रही थी।
विकास ने एक स्तन मुँह में लेकर दाँत गड़ा दिए। खून की बूँदें निकलीं। रेनू चीखी लेकिन विकास ने और जोर से काटा। दूसरा स्तन भी वैसा ही। दोनों निप्पल्स पर दाँतों के निशान और खून की धारियाँ थीं।
फिर विकास ने रेनू को घुटनों के बल बिठाया और पीछे से चोदने लगा। एक हाथ से उसके बाल खींचे, दूसरे हाथ से गला दबाया। साँस रुकने लगी। रेनू की आँखें फटी हुई थीं लेकिन चूत और जोर से सिकुड़ रही थी। विकास ने गला छोड़ दिया। रेनू जोर से साँस खींचने लगी।
“अब दोनों छेद एक साथ,” विकास ने कहा।
उसने अपनी दो उँगलियाँ गाँड़ में घुसा दीं और लंड चूत में। अब दोनों छेद एक साथ चोदे जा रहे थे। रेनू पागल हो चुकी थी। उसके मुँह से सिर्फ कराहें और गंदी गालियाँ निकल रही थीं।
एक घंटे तक ये सब चलता रहा। विकास ने तीन बार झड़ा। एक बार उसके मुँह में, एक बार गाँड़ में, एक बार चूत में। हर बार लंड को साफ किए बिना फिर से अंदर धकेल देता। रेनू का शरीर अब नीले-काले निशानों से भरा था—गले पर उँगलियों के निशान, स्तनों पर दाँतों के काट, जाँघों पर नाखूनों के खरोंच, गाँड़ लाल और सूजी हुई।
आखिर में विकास ने रेनू को बिस्तर पर फैला दिया। उसके दोनों पैर उसके कंधों पर रखे और अब सबसे क्रूर तरीके से चोदने लगा। लंड पूरा अंदर जाता और फिर बाहर निकलता। चूत से सफेद झाग बन रहा था। रेनू अब बोल भी नहीं पा रही थी। सिर्फ आँखें खुली थीं और मुँह से हल्की कराहें निकल रही थीं।
विकास ने आखिरी बार जोर से झाड़ा। पूरा माल चूत के अंदर। फिर लंड निकालकर उसके चेहरे पर रगड़ा। रेनू ने थकी हुई जीभ निकाली और चाट लिया।
सुबह चार बजे विकास उठा। रेनू अभी भी उसी हालत में लेटी थी—नंगी, शरीर पर निशान, चूत और गाँड़ से माल रिसता हुआ। विकास ने कपड़े पहने।
“कल रात फिर आऊँगा,” उसने कहा। “अगली बार और भी बुरा करूँगा। तेरी गाँड़ में बोतल घुसाऊँगा। चूत में मुट्ठी। समझी?”
रेनू ने आँखें खोलीं। मुँह से सिर्फ एक शब्द निकला—“हाँ…”
विकास निकल गया। रेनू बिस्तर पर लेटी रही। शरीर दर्द कर रहा था लेकिन अंदर एक अजीब सी तृप्ति थी। उसके पति को कभी पता नहीं चलेगा। और विकास अब उसका मालिक बन चुका था।
अगली रात साढ़े नौ बजे विकास फिर खड़ा था उसी दरवाज़े पर। उसके हाथ में एक काली बैग थी। अंदर बोतल, रस्सियाँ, क्लैम्प्स, मोमबत्तियाँ, और एक मोटी रबर की छड़ी। रेनू ने दरवाज़ा खोला। उसके शरीर पर सिर्फ एक पतला काला घाघरा था, ऊपर कुछ नहीं। स्तनों पर कल के दाँतों के निशान अभी भी लाल थे, निप्पल्स सूजे हुए।
विकास ने बिना एक शब्द बोले उसे बालों से पकड़कर अंदर घसीटा। दरवाज़ा बंद होते ही उसने रेनू को ज़ोर से दीवार से टकरा दिया। उसकी पीठ दीवार से टकराई, साँस अटक गई। विकास ने घाघरा नीचे खींचकर फाड़ दिया। अब रेनू पूरी नंगी थी।
“आज तू सिर्फ एक चीज़ है—मेरा कुत्ता,” विकास ने कहा। उसकी आवाज़ ठंडी और कड़क थी। “घुटनों पर।”
रेनू तुरंत घुटनों पर बैठ गई। विकास ने अपनी पैंट खोली। मोटा काला लंड पहले से ही पूरी तरह तना हुआ था, नसें फूली हुईं। उसने रेनू के बालों को मुट्ठी में जकड़ा और लंड उसके मुँह में धकेल दिया। इस बार कोई धीरे-धीरे नहीं। एक झटके में पूरा गले तक। रेनू की आँखें फटीं, गला भर गया, लेकिन विकास ने सिर दबाए रखा।
“साँस ले… या मत ले। मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
उसने अब पूरी क्रूरता से मुँह चोदना शुरू किया। हर झटके में लंड गले की दीवार से टकराता। रेनू की ठुड्डी पर लार की धार बह रही थी, आँखों से आँसू। पाँच मिनट बाद विकास ने लंड बाहर निकाला। रेनू जोर-जोर से खाँस रही थी, लेकिन विकास ने उसे खड़ा किया और बैग से मोटी रस्सी निकाली।
उसने रेनू के दोनों हाथ पीठ के पीछे बाँध दिए। फिर उसकी टाँगें फैलाकर टखनों को बिस्तर के पायों से बाँध दिया। रेनू अब पूरी तरह फैली हुई, असहाय। विकास ने क्लैम्प्स निकाले। एक-एक करके दोनों निप्पल्स पर लगा दिए। क्लैम्प कसते ही रेनू चीखी।
“आह… छोड़… बहुत दर्द…”
विकास ने हँसते हुए क्लैम्प और कस दिए। फिर उसने मोमबत्ती जलाई। पिघला हुआ मोम सीधा उसके बाएँ स्तन पर गिराया। रेनू की चीख कमरे में गूँज गई। मोम ठंडा होते ही सफेद परत बन गई। फिर दाएँ स्तन पर। फिर पेट पर। फिर जाँघों के अंदर। रेनू का शरीर काँप रहा था, लेकिन हाथ-पैर बँधे होने की वजह से वो सिर्फ कराह सकती थी।
विकास ने अब बोतल निकाली—एक मोटी, लंबी काँच की बोतल। उसने रेनू की गाँड़ के छेद पर थूका और बोतल का मुँह वहाँ दबा दिया।
“आहिस्ता… प्लीज़…” रेनू रो रही थी।
विकास ने एक ही जोरदार धक्के में बोतल का आधा हिस्सा गाँड़ में धकेल दिया। रेनू की चीख इस बार और तेज थी। आँसू बह रहे थे। विकास ने बोतल को अंदर-बाहर करना शुरू किया। हर बार थोड़ा और गहरा। बोतल की गर्दन पूरी अंदर चली गई। रेनू का शरीर ऐंठ रहा था।
“देख, तेरी गाँड़ अब बोतल खा रही है,” विकास ने कहा। “कल मैंने कहा था ना।”
उसने बोतल को पूरी तरह अंदर धकेल दिया। सिर्फ तली बाहर थी। फिर उसने लंड निकालकर रेनू की चूत में घुसा दिया। अब एक तरफ बोतल गाँड़ में, दूसरी तरफ लंड चूत में। विकास ने दोनों छेद एक साथ चोदने शुरू किए—लंड और बोतल। रेनू पागलों की तरह चिल्ला रही थी।
“फाड़ दे… फाड़ दे दोनों… मैं कुतिया हूँ… तेरी कुतिया…”
विकास ने स्पीड बढ़ा दी। हर झटके में रेनू की टाँगें काँपतीं। क्लैम्प्स निप्पल्स को खींच रहे थे। मोम की परतें टूट-टूटकर गिर रही थीं। बीस मिनट बाद विकास ने बोतल बाहर निकाली। छेद अब पूरी तरह खुला और लाल था। उसने तुरंत अपना लंड वहाँ घुसा दिया। गाँड़ में पूरा 9 इंच एक झटके में। रेनू की आवाज़ अब सिर्फ सिसकी बन चुकी थी।
विकास ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गला दबाया। साँस लगभग बंद। उसने उसी हालत में गाँड़ चोदनी जारी रखी। जब रेनू की आँखें उलटने लगीं तब उसने गला छोड़ा। रेनू जोर से साँस खींचने लगी, लेकिन विकास ने फिर से गला दबा दिया। ये खेल कई बार दोहराया।
फिर उसने लंड निकाला और रेनू के मुँह में ठूंस दिया। गाँड़ का स्वाद और गंदगी उसके मुँह में। रेनू ने बिना हिचक चूसा। विकास ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर मुँह चोदना शुरू किया। लंड गले तक जा रहा था। रेनू की आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
आखिर में विकास ने पहला झटका उसके गले में ही छोड़ दिया। माल सीधे पेट में उतर गया। रेनू खाँस रही थी, लेकिन विकास ने लंड बाहर नहीं निकाला। उसने उसे और गहरा दबाए रखा जब तक पूरा माल नहीं उतर गया।
फिर उसने रेनू के बंधन खोले। लेकिन आजादी सिर्फ इतनी कि उसे घुटनों के बल बिठाया। विकास ने बैग से रबर की छड़ी निकाली।
“गिन,” उसने कहा। “बीस।”
पहला वार गाँड़ पर पड़ा। तेज आवाज। लाल निशान। रेनू चीखी लेकिन गिनी—“एक…”
दूसरा, तीसरा… हर वार और जोरदार। दसवें वार तक गाँड़ पूरी लाल हो चुकी थी। पंद्रहवें पर खून की हल्की धार निकल आई। बीसवें वार पर रेनू रोते हुए सिर्फ फुसफुसा पाई—“बीस…”
विकास ने छड़ी फेंक दी। उसने रेनू को उल्टा लिटाया, टाँगें उसके कंधों पर रखीं और अब चूत में मुट्ठी घुसाने लगा। पहले चार उँगलियाँ, फिर अंगूठा। धीरे-धीरे पूरी मुट्ठी अंदर चली गई। रेनू की चीख अब दर्द और मजे का मिश्रण थी। विकास ने मुट्ठी अंदर घुमाई, आगे-पीछे की। चूत की दीवारें फैल चुकी थीं।
“आज तेरी चूत मेरी मुट्ठी की गुलाम है,” उसने कहा।
उसने मुट्ठी निकालकर तुरंत लंड घुसा दिया। अब चोदाई इतनी जोरदार थी कि बिस्तर की चरपई चरमरा रही थी। विकास ने दोनों हाथों से उसके गले को दबाया और अंतिम झटके लगाए। माल सीधे गर्भाशय में छोड़ दिया।
लेकिन खत्म नहीं हुआ। विकास ने फिर से खड़ा लंड निकाला। उसने रेनू को खड़ा किया, दीवार से सटाया और पीछे से दोनों छेद बारी-बारी चोदने लगा। कभी चूत, कभी गाँड़। हर बार पूरा अंदर, जोरदार धक्के। रेनू अब सिर्फ दीवार से चिपकी हुई कराह रही थी। उसके शरीर पर पसीना, लार, मोम, खून और माल सब मिला हुआ था।
तीसरी बार विकास ने उसके चेहरे पर झाड़ा। माल आँखों, नाक, मुँह सब पर। रेनू ने जीभ निकालकर चाटा। विकास ने उसके बाल पकड़कर चेहरा ऊपर किया।
“कल रात और भी बुरा होगा,” उसने धीरे से कहा। “अगली बार मैं तेरे पति के सामने नहीं, लेकिन उसके बिस्तर पर ही तुझे बाँधूँगा। समझी?”
रेनू की आँखों में अभी भी आँसू थे, लेकिन उसने सिर हिलाया।
“हाँ… मालिक।”
विकास ने कपड़े पहने, बैग उठाया और निकल गया। रेनू फर्श पर गिर गई। शरीर हिल नहीं रहा था। गाँड़ और चूत दोनों खुले और सूजे हुए थे। निप्पल्स पर क्लैम्प्स के गहरे निशान। पीठ और गाँड़ पर छड़ी के लाल-काले निशान। लेकिन अंदर एक भूख और भी बढ़ चुकी थी।
वो जानती थी—कल रात फिर वही दरवाज़ा खुलेगा। और तब विकास और भी क्रूर होकर आएगा। उसकी जान निकल जाएगी, लेकिन वो खुद दरवाज़ा खोलेगी।
क्योंकि अब वो सिर्फ रेनू नहीं रही थी। वो विकास की टूटी हुई, कुचली हुई, पूरी तरह उसकी कुतिया बन चुकी थी।