कामुक घरवाली रुचि को पानवाले रविंदर ने रस्सियों से बाँधकर बेंत से पीटा, गाँड फाड़ी, गला दबाकर कुत्ते की तरह घसीटा। दर्द, चीख और वीर्य से भरी एक निर्दय रात।
रुचि शर्मा उन्तीस साल की थी। गोरी, मध्यम कद की, मगर शरीर ऐसा कि किसी भी मर्द की नींद उड़ जाए। तैंतीस इंच की छाती, छब्बीस इंच की कमर और चालीस इंच की गोल-मटोल गाँड। जाँघें मोटी और चिकनी, जैसे दूध में नहाई हों। बाल काले और घने, कमर तक।
शादीशुदा थी। पति आईटी कंपनी में जॉब करता था और सुबह नौ बजे निकल जाता था, शाम आठ बजे लौटता। घर कानपुर के पुराने इलाके में था, सिविल लाइंस के पास एक छोटे से मोहल्ले में।
मोहल्ले के कोने पर एक छोटी सी पान की दुकान थी। दुकान का मालिक था रविंदर यादव। उम्र पैंतालीस। काला, मोटा, बाल झड़ चुके, पेट बाहर निकला हुआ। मगर लंड ऐसा कि गाँव के किसी बैल से कम न हो। दस इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा। दुकान के पीछे एक छोटा सा कमरा था जहाँ वह सामान रखता था। उसी कमरे में वह कई औरतों को चोद चुका था।
रुचि रोज शाम को पान लेने आती थी। पहले सिर्फ पान। फिर बातें। फिर छूना। फिर एक दिन रविंदर ने उसकी गाँड दबा दी थी सलवार के ऊपर से। रुचि ने विरोध किया था, मगर शरीर ने जवाब दे दिया था। चूत गीली हो गई थी। फिर दूसरी बार, तीसरी बार। आज तीसरी मुलाकात थी।
दोपहर के तीन बजे थे। गर्मी तेज थी। रुचि ने हल्की गुलाबी सलवार-कमीज़ पहनी थी। अंदर कोई ब्रा नहीं। सिर्फ पतली सफेद पैंटी। पति ऑफिस में था। बच्चा स्कूल में। वह पान की दुकान की तरफ बढ़ी। दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
रविंदर ने देखा तो आँखें चमक उठीं। “आ गई रानी? आज जल्दी।”
रुचि ने चारों तरफ देखा। गली खाली थी। “अंदर ले चलो।”
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रविंदर ने शटर आधा बंद किया, पीछे के कमरे का दरवाजा खोला। कमरा अंधेरा था। एक पुरानी चारपाई, दीवार पर टंगी हुई धोतियाँ, फर्श पर पान की पत्तियों की गंध। रुचि अंदर घुसी। रविंदर ने दरवाजा बंद कर के कुंडी लगा दी।
जैसे ही अंधेरा हुआ, रविंदर ने रुचि को दीवार से चिपका दिया। उसके मोटे काले हाथों ने उसकी पतली कमर पकड़ी और मुँह उसके मुँह पर रख दिया। किस क्रूर थी। जीभ अंदर घुस गई, दाँत होंठ काट रहे थे। रुचि की साँस फूल गई। वह भी जवाब देने लगी। जीभ से जीभ लड़ने लगी।
रविंदर ने कमीज़ ऊपर उतार दी। गोरी छाती सामने आ गई। तैंतीस इंच के मोटे-मोटे स्तन। निप्पल कड़े हो चुके थे। रविंदर ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से चूसा। दाँतों से काटा। रुचि की चीख निकल गई।
“आह्ह्ह्ह… धीरे…”
“धीरे नहीं चलेगा आज। आज पूरा लेना है।”
रविंदर ने दूसरा स्तन भी मुँह में भर लिया। चूसते-चूसते दोनों हाथों से गाँड दबाई। सलवार के ऊपर से गोल-मटोल मांस को मसलने लगा। फिर नाड़ा खींच दिया। सलवार फर्श पर गिर गई। पैंटी भी। रुचि नंगी खड़ी थी। सिर्फ चप्पल पहने।
रविंदर घुटनों के बल बैठ गया। उसकी काली जीभ ने गोरी चूत पर वार किया। चूत पहले से गीली थी। पानी टपक रहा था। रविंदर ने होंठ चूत पर चिपकाए और जोर-जोर से चूसा। जीभ अंदर घुसाई, क्लिट को दाँतों से हल्का काटा। रुचि की टाँगें काँपने लगीं। उसने रविंदर के सिर को दोनों हाथों से पकड़ लिया।
“आह्ह्ह… रविंदर… रुको मत… और अंदर…”
रविंदर ने दोनों हाथों से गाँड की गोलइयाँ फैलाईं और जीभ को चूत से पीछे की छेद तक घुमाया। गाँड की छेद पर जीभ घुमाई, थूक लगाया, फिर उंगली अंदर घुसा दी। रुचि चीख पड़ी।
“नहीं… वहाँ मत… अह्ह्ह्ह…”
“वहाँ भी लेना पड़ेगा आज। पूरी खुली रहेगी।”
रविंदर ने उंगली और अंदर धकेल दी। साथ ही चूत को चाटता रहा। रुचि की आवाजें दबने लगीं। वह दीवार को पकड़े हुए काँप रही थी। तभी बाहर आवाज आई।
“रविंदर भैया… पान दो ना!”
रविंदर रुक गया। गुस्से से दाँत पीसने लगा। उसने रुचि को इशारे से चुप रहने को कहा। खुद धोती ठीक करके बाहर निकला। रुचि नंगी खड़ी रही। दिल जोर से धड़क रहा था। डर और वासना दोनों एक साथ।
बाहर ग्राहक ने दो पान लिए और चला गया। रविंदर लौटा। दरवाजा बंद किया। रुचि अभी भी नंगी थी। चूत से पानी जाँघों तक बह रहा था।
“अब कोई नहीं आएगा। अब तेरी बारी।”
रविंदर ने अपनी धोती फेंक दी। दस इंच का काला मोटा लंड सीधा खड़ा था। नसें फूली हुईं। रुचि की आँखें फटी रह गईं। इतना मोटा पहले कभी नहीं देखा था।
“मुँह खोल।”
रुचि झुकी। लंड मुँह में घुसा। रविंदर ने सिर पकड़ कर जोर से धक्का मारा। लंड गले तक पहुँच गया। रुचि की आँखों से आँसू निकल आए। वह घुटने टेक कर बैठी और मुँह से लंड चूसने लगी। थूक टपक रहा था। रविंदर उसके बालों को मुट्ठी में भर कर धक्के मार रहा था।
“चूस रानी… पूरा निगल… आज तेरी चूत और गाँड दोनों फाड़ दूँगा।”
रुचि की आँखें लाल हो गईं। लंड मुँह से निकालते-निकालते वह हाँफ रही थी। रविंदर ने उसे उठाया और चारपाई पर पेट के बल लिटा दिया। गाँड ऊपर। दोनों गोलइयाँ फैलाईं। थूक लगाया। फिर लंड चूत पर सेट किया।
एक जोरदार धक्का। पूरा लंड अंदर घुस गया। रुचि की चीख निकल गई। चारपाई चरमरा उठी।
“आह्ह्ह्ह्ह… मर गई… इतना मोटा… अह्ह्ह्ह…”
रविंदर रुका नहीं। दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। काला लंड गोरी चूत में अंदर-बाहर हो रहा था। पानी की आवाज आ रही थी। थप-थप-थप। रुचि की गाँड थरथरा रही थी। स्तन चारपाई से रगड़ खा रहे थे।
“तेरी चूत कितनी टाइट है रानी… पहली बार जैसे लग रही है।”
रविंदर ने गति बढ़ा दी। अब धक्के इतने जोर के थे कि रुचि की साँस फूल गई। वह चारपाई की लकड़ी को पकड़े हुए सिसकारियाँ ले रही थी। अचानक रविंदर ने लंड बाहर निकाला और गाँड की छेद पर लगा दिया।
“नहीं… वहाँ मत डालो… फट जाएगी…”
“फटनी है तो फटे। आज पूरी लेनी है।”
एक धक्का। आधा लंड गाँड में घुस गया। रुचि की चीख इतनी तेज थी कि रविंदर ने उसका मुँह अपने हाथ से दबा दिया। दूसरा धक्का। पूरा लंड अंदर। रुचि की आँखें फटी रह गईं। दर्द और मजे का मिश्रण। रविंदर अब गाँड में धक्के मार रहा था। एक हाथ से उसकी चूत मसल रहा था। उंगलियाँ क्लिट पर।
“आह्ह्ह… रविंदर… धीरे… अह्ह्ह्ह… और अंदर…”
रविंदर पागल हो चुका था। वह गाँड चोदते-चोदते रुचि को घुमा कर ऊपर ले आया। अब रुचि उसके ऊपर बैठी थी। लंड अभी भी गाँड में था। रविंदर ने दोनों स्तन मुँह में भर लिए और नीचे से धक्के मारने लगा। रुचि खुद भी कमर हिलाने लगी। दर्द कम हो रहा था। मजा बढ़ रहा था।
थोड़ी देर बाद रविंदर ने लंड निकाला और चूत में डाल दिया। अब दोनों छेद बारी-बारी इस्तेमाल हो रहे थे। कभी चूत, कभी गाँड। रुचि की आवाजें बदल रही थीं। कभी दर्द की, कभी मजे की। शरीर पसीने से नहाया हुआ। बाल बिखरे। होंठ सूजे।
अचानक बाहर फिर आवाज आई।
“रविंदर भैया… एक पान…”
रविंदर गुस्से से गुर्राया। उसने रुचि को चारपाई पर ही छोड़ दिया और धोती लपेट कर बाहर गया। रुचि नंगी पड़ी रही। लंड का पानी चूत और गाँड दोनों से बह रहा था। वह अपने मुँह पर हाथ रखे हुए काँप रही थी।
ग्राहक गया। रविंदर लौटा। उसने दरवाजा बंद किया और बिना एक शब्द कहे रुचि को उठाया। दीवार से लगा दिया। एक टाँग ऊपर उठाई और लंड चूत में घुसा दिया। अब खड़े-खड़े चोदाई हो रही थी। रविंदर के मोटे शरीर का वजन रुचि पर पड़ रहा था। हर धक्के के साथ उसकी पीठ दीवार से टकरा रही थी।
“आज तेरी चूत में पानी नहीं डालूँगा। मुँह में लेना पड़ेगा।”
रुचि ने सिर हिलाया। रविंदर की गति पागलों जैसी हो गई। धक्के इतने जोर के कि रुचि की चीखें दबने लगीं। अचानक रविंदर ने लंड निकाला, रुचि को घुटनों पर बिठाया और मुँह में डाल दिया। एक सेकंड बाद गर्म गाढ़ा पानी उसके मुँह और गले में भर गया। रुचि निगलने की कोशिश कर रही थी। थूक और पानी दोनों गालों से बह रहे थे।
रविंदर हाँफते हुए पीछे हट गया। रुचि फर्श पर बैठ कर मुँह पोंछ रही थी। शरीर काँप रहा था। चूत और गाँड दोनों खुले और लाल।
रविंदर ने एक पान की पत्ती ली और रुचि की जाँघों को साफ करने लगा। फिर उसे कपड़े पहनाए। सलवार, कमीज़। खुद भी कपड़े पहन लिए।
“कल फिर आना। कल और जोर से लूँगा।”
रुचि ने कुछ नहीं कहा। बस सिर नीचे किए हुए बाहर निकल गई। गली में धूप तेज थी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। गाँड में अभी भी दर्द था। चूत से पानी रिस रहा था। मगर आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
घर पहुँच कर उसने नहाया। पति शाम को आया तो वह सामान्य लग रही थी। खाना बनाया, टीवी देखा, सो गई। मगर रात को नींद नहीं आई। शरीर याद कर रहा था। काला मोटा लंड, जोर के धक्के, गाँड में दर्द, मुँह में पानी।
अगली सुबह पति ऑफिस गया। रुचि ने फिर वही गुलाबी सलवार पहनी। कोई ब्रा नहीं। सिर्फ पैंटी। और पान की दुकान की तरफ निकल पड़ी।
रविंदर इंतजार कर रहा था। शटर आधा बंद। पीछे का कमरा तैयार। चारपाई पर एक रस्सी रखी हुई। आज और कुछ होने वाला था।
रुचि अंदर घुसी। दरवाजा बंद हुआ। रविंदर ने उसकी कमीज़ फाड़ दी। स्तन बाहर। फिर सलवार। फिर पैंटी। नंगी।
“आज हाथ बाँधूँगा।”
रुचि की साँस तेज हो गई। रविंदर ने उसकी दोनों कलाई पीछे बाँध दीं। रस्सी कस दी। फिर चारपाई पर पेट के बल लिटाया। गाँड ऊपर। टाँगें फैलाईं।
आज कोई रोकने वाला नहीं था। कोई ग्राहक नहीं। पूरा दोपहर।
रविंदर ने पहले चूत चाटी। फिर गाँड। फिर दोनों में बारी-बारी लंड घुसाया। रुचि की चीखें कमरे में गूँज रही थीं। हाथ बँधे होने के कारण वह कुछ कर नहीं पा रही थी। सिर्फ सह रही थी। और मजा ले रही थी।
धक्के तेज होते गए। शरीर पसीने से भीग गया। स्तन चारपाई से रगड़ खा रहे थे। निप्पल लाल हो गए। रविंदर ने बीच-बीच में उसके बाल खींचे, गाल पर थप्पड़ मारे, गर्दन काटी।
“तेरी जैसी औरत को ऐसे ही चोदना चाहिए। पूरी खुली, पूरी बेबस।”
रुचि सिर्फ सिसकारियाँ ले रही थी। आँखें बंद। मुँह खुला। शरीर काँपता हुआ।
आखिर में रविंदर ने लंड गाँड में डाल कर पानी छोड़ दिया। गर्म तरल अंदर भर गया। फिर लंड निकाल कर रुचि के मुँह में डाल दिया। बची हुई बूँदें उसने चाट लीं।
रस्सी खोली गई। रुचि चारपाई पर गिर गई। शरीर में जान नहीं थी। रविंदर उसके बगल में लेट गया। काला हाथ गोरी गाँड पर फेर रहा था।
“अब तू मेरी है। जब चाहूँगा, बुलाऊँगा। और तू आएगी।”
रुचि ने आँखें खोलीं। मुस्कुराई नहीं। सिर्फ सिर हिलाया।
बाहर दोपहर की धूप थी। पान की दुकान फिर से खुलने वाली थी। और रुचि शर्मा अब सिर्फ घर की बीवी नहीं रह गई थी। वह रविंदर यादव की रखैल बन चुकी थी। पूरी तरह। बिना शर्त।
रुचि ने सिर हिलाया था, मगर उसके शरीर में अभी भी काँप थी।
रविंदर का काला हाथ उसकी गोरी गाँड पर घूम रहा था। उंगलियाँ गाँड की गोलइयों को मसल रही थीं, बीच की दरार में घुस कर चूत का पानी छू रही थीं। कमरे में पान और सेक्स की मिली-जुली गंध फैली हुई थी। चारपाई की रस्सियाँ अभी भी फर्श पर पड़ी थीं।
रविंदर उठा। उसने रुचि के बाल मुट्ठी में भर लिए और खींच कर खड़ा कर दिया। रुचि की टाँगें अभी भी काँप रही थीं। गाँड से उसका पानी धीरे-धीरे जाँघों पर बह रहा था।
“अब घर नहीं जाएगी। आज पूरा दिन यहीं रहेगी।”
रुचि की आँखें फैलीं। “पति… शाम को…”
“पति को फोन कर के बोल दे कि सहेली के घर गई है। रात को रहेगी।” रविंदर की आवाज में हुक्म था। कोई पूछने का अधिकार नहीं।
रुचि ने काँपते हाथों से मोबाइल निकाला। आवाज थर्रा रही थी। “हाँ… मैं मीना के यहाँ हूँ… रात को रह जाऊँगी… हाँ… ठीक है।” फोन रखा तो रविंदर मुस्कुराया। उसके दाँत पीले थे, मगर आँखों में भूख।
उसने रुचि को फिर से चारपाई पर धकेल दिया। इस बार पीठ के बल। दोनों हाथ ऊपर खींच कर चारपाई के सिरहाने से बाँध दिए। रस्सी इतनी कस दी कि कलाईयाँ लाल हो गईं। फिर दोनों टाँगें फैला कर अलग-अलग बाँध दीं। रुचि पूरी तरह खुली पड़ी थी। चूत और गाँड दोनों हवा में। स्तन ऊपर को उठे हुए, निप्पल कड़े।
रविंदर ने अपनी धोती फेंकी। दस इंच का मोटा काला लंड फिर से तन चुका था। उसने रुचि की चूत पर थप्पड़ मारा। जोर से। चटाक। रुचि चीखी। फिर दूसरा थप्पड़। तीसरा। चूत लाल हो गई। पानी और भी निकलने लगा।
“आज तेरी चूत और गाँड दोनों फाड़ दूँगा। और मुँह में भी पूरा डालूँगा।”
उसने लंड रुचि के मुँह में ठूंस दिया। पूरा। गले तक। रुचि की आँखों से आँसू बहने लगे। वह साँस नहीं ले पा रही थी। रविंदर उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़ कर धक्के मारने लगा। गला भर गया। थूक और लार मुँह के कोनों से बह रही थी। कभी-कभी वह खांस पड़ती, तो रविंदर और जोर से धकेल देता।
“निगल। पूरा निगल। आज तेरा गला भी मेरा है।”
पाँच मिनट तक वह मुँह चोदता रहा। फिर लंड निकाला। रुचि हाँफ रही थी। गाल लाल, होंठ सूजे, आँखों में पानी। रविंदर ने तुरंत लंड उसकी चूत में डाल दिया। एक ही धक्के में पूरा। रुचि की कमर उछल गई, मगर रस्सियाँ ने रोक लिया।
अब धक्के शुरू हुए। क्रूर। तेज। बिना किसी रहम के। हर धक्के के साथ चारपाई चरमराती। रुचि की चीखें कमरे में गूँजतीं। रविंदर एक हाथ से उसका गला दबाए हुए था। साँस फूल रही थी। चेहरा लाल हो रहा था। दूसरे हाथ से स्तन मसल रहा था। निप्पल को मोड़ रहा था, खींच रहा था।
“आह्ह्ह्ह… छोड़… साँस… अह्ह्ह्ह…”
“साँस बाद में लेगी। पहले मेरा पानी ले।”
रविंदर ने गति और बढ़ा दी। लंड इतनी तेजी से अंदर-बाहर हो रहा था कि चूत से सफेद झाग बनने लगा। पानी की आवाज तेज हो गई। थप-थप-थप। अचानक उसने लंड निकाला और गाँड की छेद पर लगा दिया। बिना थूक लगाए। बिना किसी तैयारी के। एक जोरदार धक्का।
रुचि की चीख ऐसी निकली जैसे कोई जानवर मर रहा हो। आधा लंड गाँड में घुस गया। दर्द से उसकी आँखें फटी रह गईं। शरीर अकड़ गया।
रविंदर रुका नहीं। दूसरा धक्का। पूरा लंड अंदर। अब वह गाँड चोद रहा था। दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ कर जोर-जोर से झटके दे रहा था।
“देख… तेरी गोरी गाँड मेरे काले लंड को कैसे निगल रही है। फट रही है ना? फटने दे।”
रुचि रो रही थी। आँसू गालों पर बह रहे थे। मगर चूत से पानी रुकने का नाम नहीं ले रहा था। दर्द और मजे का मिश्रण उसके शरीर को हिला रहा था। रविंदर कभी गाँड में, कभी चूत में। बारी-बारी। कभी दोनों उंगलियाँ चूत में डाल कर लंड गाँड में। रुचि की आवाजें अब सिसकी और चीख का मिश्रण बन गई थीं।
थोड़ी देर बाद रविंदर रुका। उसने रस्सियाँ खोलीं। रुचि की कलाईयाँ और टखने लाल और सूजे हुए थे। वह उठने की कोशिश करती तो गिर जाती। रविंदर ने उसे फर्श पर घुटनों के बल बिठाया। पीछे से बाल पकड़ कर सिर ऊपर खींचा।
“अब कुत्ते की तरह चलेगी।”
उसने रुचि के गले में अपनी धोती का एक सिरा बाँध दिया। जैसे रस्सी। फिर खींचने लगा। रुचि हाथ-पैरों के बल फर्श पर चलने लगी। नंगी। गाँड ऊपर उठी हुई। चूत और गाँड दोनों खुले। पानी टपकता हुआ। रविंदर उसे कमरे में घुमाता रहा। कभी रोक कर गाँड पर थप्पड़ मारता, कभी चूत में उंगली घुसा कर मसलता।
“भोंक। कुत्ती की तरह भोंक।”
रुचि ने शर्म से सिर झुकाया। रविंदर ने जोर से गाँड पर थप्पड़ मारा। चटाक। “भोंक नहीं तो और जोर से मारूँगा।”
रुचि ने आवाज निकाली। कमजोर। “भउ… भउ…”
“जोर से।”
“भउऊऊ… भउऊऊ…”
रविंदर हँसने लगा। उसने रुचि को फिर चारपाई पर लिटाया। इस बार पेट के बल। हाथ पीछे बाँधे। टाँगें फैलाईं। फिर उसने कमरे के कोने से एक पतली बेंत निकाली। पुरानी, मगर मजबूत।
“आज गिनती सिखाऊँगा।”
पहला वार गाँड पर पड़ा। रुचि चीखी। लाल निशान उभर आया। दूसरा वार। तीसरा। हर वार के साथ वह गिनती बोलवा रहा था। “एक… दो… तीन…” रुचि की आवाज टूट रही थी। गाँड जल रही थी। लाल हो चुकी थी। जगह-जगह उभरे हुए निशान। बीस वार के बाद रविंदर रुका। बेंत फेंक दी। उसकी साँस तेज चल रही थी। लंड फिर तना हुआ था।
उसने लंड सीधा जलती हुई गाँड में घुसा दिया। रुचि की चीख और तेज हो गई। अब दर्द दोगुना था। बेंत के निशानों पर लंड रगड़ खा रहा था। रविंदर पागलों की तरह धक्के मार रहा था। पसीना उसके काले शरीर से टपक रहा था। रुचि के बाल उसके मुँह में जा रहे थे। वह बालों को काट-काट कर थूक रहा था।
“आज तेरे अंदर इतना पानी भरूँगा कि एक हफ्ते तक बहता रहे।”
उसने लंड गाँड में ही छोड़ दिया। गर्म गाढ़ा पानी अंदर फूट पड़ा। इतना ज्यादा कि बाहर निकलने लगा। रुचि की गाँड से सफेद तरल बह रहा था। रविंदर लंड अंदर ही रखे हुए था। जब तक आखिरी बूँद न निकल गई। फिर उसने लंड निकाला और रुचि के मुँह में ठूंस दिया।
“साफ कर। अपनी गाँड का पानी चाट।”
रुचि ने आँखें बंद कर लीं और चाटने लगी। स्वाद कड़वा और नमकीन। रविंदर का लंड उसके मुँह में साफ हो रहा था। थूक और पानी मिला जुला।
रविंदर ने उसे छोड़ दिया। रुचि फर्श पर गिर गई। शरीर में एक भी हड्डी सीधी नहीं लग रही थी। गाँड जल रही थी। चूत सूजी हुई। गला दर्द कर रहा था। कलाईयों पर रस्सी के निशान। गले पर धोती के निशान।
रविंदर चारपाई पर लेट गया। “अब आ। ऊपर चढ़। खुद चोद।”
रुचि काँपते शरीर से उठी। चारपाई पर चढ़ी। रविंदर के लंड के ऊपर बैठी। पहले चूत में डाला। फिर खुद कमर हिलाने लगी। आँसू अभी भी बह रहे थे। मगर वह हिला रही थी। ऊपर-नीचे। गोल-गोल। स्तन उसके चेहरे पर झूल रहे थे। रविंदर दोनों स्तन मुँह में भर कर काट रहा था। निप्पल पर दाँत गड़ाए हुए।
“जोर से। और जोर से। आज थकने के बाद ही जाने दूँगा।”
रुचि थक चुकी थी। पसीने से तरबतर। बाल चेहरे पर चिपक गए थे। मगर रविंदर बार-बार थप्पड़ मार कर कह रहा था। “रुक मत। हिला।” वह हिलाती रही। जब तक रविंदर का लंड फिर से नहीं तन गया। फिर उसने रुचि को उतारा। पीछे से खड़ा किया। कुत्ते की पोजीशन। और फिर से गाँड में लंड डाल दिया।
इस बार धक्के और क्रूर थे। एक हाथ से बाल खींचे हुए। दूसरे हाथ से गला दबाए हुए। रुचि की आवाज अब निकलनी बंद हो गई थी। सिर्फ गले से अजीब सी आवाजें आ रही थीं। शरीर झटके खा रहा था। आँखें ऊपर को पलट रही थीं।
रविंदर ने आखिर में फिर से पानी छोड़ा। इस बार चूत में। इतना जोर से कि रुचि की कमर अकड़ गई। फिर वह उसके ऊपर गिर पड़ा। दोनों हाँफ रहे थे। कमरे में सिर्फ साँसों की आवाज थी।
बहुत देर बाद रविंदर उठा। उसने रुचि को पानी का एक गिलास दिया। वह पी नहीं पा रही थी। हाथ काँप रहे थे। रविंदर ने खुद उसके मुँह में पानी डाला। फिर एक पान की पत्ती से उसकी जाँघों और गाँड को साफ करने लगा। पानी और वीर्य मिला जुला।
“अब सो जा। शाम को फिर उठाऊँगा। रात भर और लेना है।”
रुचि ने आँखें बंद कर लीं। शरीर दर्द से सुन्न हो चुका था। मगर एक अजीब सी संतुष्टि भी थी। जैसे कोई भूख आखिरकार भर गई हो। वह चारपाई पर करवट लेकर लेट गई। गाँड अभी भी जल रही थी। चूत से पानी रिस रहा था।
बाहर पान की दुकान का शटर अभी भी आधा बंद था। गली में बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही थीं। रुचि शर्मा अब घर नहीं जा रही थी। कम से कम आज नहीं। वह रविंदर यादव के छोटे से अंधेरे कमरे में नंगी पड़ी थी। हाथों पर निशान। गाँड पर बेंत के लाल निशान। गले पर रस्सी के निशान। और अंदर उसके शरीर में रविंदर का पानी।
रविंदर दरवाजे के पास खड़ा सिगरेट पी रहा था। उसकी नंगी पीठ पर पसीना चमक रहा था। वह कभी-कभी मुड़ कर रुचि को देख लेता। मुस्कुरा देता। जैसे कोई शिकारी अपने शिकार को देख कर संतुष्ट हो।
शाम ढलने वाली थी। और रात अभी बाकी थी। लंबी रात। जिसमें और भी कुछ होने वाला था। रस्सियाँ फिर से बँधने वाली थीं। बेंत फिर से उठने वाली थी। और रुचि की आवाजें फिर से कमरे की दीवारों से टकराने वाली थीं।
रविंदर ने सिगरेट बुझाई। कमरे में अंधेरा गहरा रहा था। उसने रुचि के पास जा कर उसकी गोरी पीठ पर हाथ फेरा। उंगलियाँ बेंत के निशानों पर घूमीं। रुचि की साँस तेज हो गई। आँखें अभी बंद थीं। मगर शरीर जानता था। अभी और बाकी है। बहुत कुछ बाकी है।
देवर ने भाभी को बेड से बांधकर बेरहम पेलाई की
पड़ोस की औरत कविता की गांड में लंड