बहन ने नौकरानी के शरीर को खोल दिया

जयपुर के खाली मकान में बहन ने नौकरानी के शरीर को चीरकर खोल दिया। भाई ने हर छेद में अपनी हवस उतार दी। दर्द चिल्लाया, आँसू बहे, फिर भी वो लौटती रही। एक ऐसी रात जो हड्डियों में उतर जाए।

राहुल मेरा नाम है। उम्र उस समय अट्ठाईस साल थी। मैं जयपुर के पुराने शहर के एक बड़े से मकान में रहता था अपनी माँ-बाप और बड़ी बहन प्रिया के साथ। प्रिया मुझसे तीन साल बड़ी थी, यानी इकत्तीस साल की। घर में सिर्फ मुझे ही पता था कि वो औरतों की तरफ पागल थी। लेस्बियन। उसका शरीर देखकर कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता था। गेहुँआ साफ़ रंग, लंबे घने बाल जो वो अकसर खुले छोड़ती, भरे हुए स्तन जो शर्ट के अंदर से भी साफ दिखते, और जाँघें इतनी मोटी कि जींस फटने को तैयार रहती। लेकिन उसकी आँखों में एक क्रूर भूख रहती थी। वो जब किसी औरत को देखती तो जैसे शिकार चुन रही हो।

हमारे घर काम करने आती थी मीना। पैंतीस साल की। शादीशुदा। पति गाँव में रहता था और साल में दो-तीन बार ही आता। मीना का शरीर आग था। साँवला रंग, भारी स्तन जो ब्लाउज़ के हुक फाड़ने को तैयार रहते, पतली कमर, और विशाल नितंब जो साड़ी के नीचे हिलते-डुलते। उसकी आँखों में हमेशा एक अधूरी प्यास झलकती। वो झुककर झाड़ू लगाती तो प्रिया उसके पीछे खड़ी होकर घूरती रहती। मैंने कई बार देखा था।

एक दिन मैंने पूछ ही लिया। “दीदी, मीना को इतना क्यों घूरती हो?”
प्रिया ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “राहुल, वो अंदर से भूखी है। मर्द उसे संतुष्ट नहीं कर पाते। मुझे पता है। एक दिन मैं उसे तोड़कर रख दूँगी।”
उसकी आवाज़ में इतनी ठंडक थी कि मेरी रीढ़ में करंट सा दौड़ गया।
फिर वह दिन आया जब माँ-बाप तीन हफ्ते के लिए पुणे चले गए। घर में सिर्फ हम तीन। शुक्रवार की दोपहर। मौसम भारी था। बादल घिरे हुए। मैं अपने कमरे में लैपटॉप पर काम कर रहा था तभी किचन से प्रिया की आवाज़ आई।

“मीना… इधर आ।”
मैं चुपके से दरवाज़े के पास गया। प्रिया मीना के बहुत करीब खड़ी थी। एक हाथ उसकी कमर पर, दूसरा उसके गाल पर।
“तुम्हारे पति तुम्हें चोदते भी हैं या सिर्फ इस्तेमाल करते हैं?” प्रिया की आवाज़ सीधी थी।
मीना शर्मा गई। “दीदी… ऐसी बातें…”
“जवाब दो।”
“वो… वो जल्दी कर लेते हैं। मुझे कुछ महसूस ही नहीं होता।”

प्रिया ने उसके होंठों पर उँगली फेरते हुए कहा, “आज तुम्हें महसूस करवाऊँगी। इतना कि तुम रोने लगोगी।”
फिर उसने मीना के होंठों पर अपना मुँह रख दिया। जोर से। दाँत से निचोड़ते हुए। मीना पहले झिझकी, फिर उसके हाथ प्रिया की पीठ पर चढ़ गए। चुम्बन गहरा होता गया। जीभें लड़ रही थीं। प्रिया ने मीना की साड़ी का पल्लू खींचकर फर्श पर फेंक दिया। ब्लाउज़ के हुक एक-एक करके खोले। भारी, साँवले स्तन बाहर आ गए। निप्पल पहले से सख्त। प्रिया ने एक स्तन मुँह में ले लिया और दाँतों से काटा। मीना चीख पड़ी।
“आह्ह्ह… दीदी… दर्द हो रहा है…”

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“दर्द ही असली मज़ा है।” प्रिया ने दूसरा स्तन भी काटा। निप्पल पर दाँत गड़ाए रखे। मीना का शरीर काँप रहा था। उसकी साँसें उखड़ रही थीं।
मैं अभी भी छिपकर देख रहा था। मेरा लंड पैंट में पत्थर हो चुका था। प्रिया ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई।
“राहुल, अंदर आ। आज मीना को पूरा तोड़ना है।”
मैं अंदर गया। मीना की आँखों में शर्म और हवस दोनों थे। प्रिया ने मुझे इशारा किया। मैंने मीना के होंठों को पकड़ लिया और जोर से चूसा।

उसके मुँह में अपनी जीभ ठूँस दी। प्रिया ने पीछे से उसका पेटीकोट और पैंटी एक साथ खींचकर उतार दी। मीना अब पूरी नंगी थी। उसकी चुत पहले से भीगी हुई थी। बाल काले और घने। प्रिया ने उसकी जाँघों को जोर से फैलाया और दो उँगलियाँ अंदर धकेल दीं।
“इतनी गीली… और कहती थी पति संतुष्ट नहीं करता।”
मीना कराह उठी। प्रिया ने उँगलियाँ तेजी से अंदर-बाहर करने लगीं। फिर तीसरी उँगली भी डाल दी। मीना का मुँह खुला रह गया। मैंने उसके स्तनों को दोनों हाथों से मसलना शुरू किया। निप्पल को घुमाते हुए खींचा। प्रिया ने अचानक उसकी चुत से उँगलियाँ निकालीं और मीना को घुटनों के बल बिठा दिया।

“अब अपना मुँह खोल।”
मीना ने आज्ञा मान ली। प्रिया ने अपनी जींस उतारी। उसके नीचे कोई पैंटी नहीं थी। उसकी चुत भी भीगी हुई थी। उसने मीना के मुँह पर अपनी चुत रख दी।
“चाट। जोर से। अगर ठीक से नहीं चाटा तो आज रात तुझे छोड़ूँगी नहीं।”
मीना ने जीभ निकाली। प्रिया उसके सिर को पकड़कर जोर-जोर से अपनी चुत रगड़ने लगी। मीना का चेहरा भीग चुका था। प्रिया कराह रही थी।

“हाँ… ऐसे ही… और गहरा…”
मैंने अपनी पैंट खोली। मेरा लंड बाहर निकला—मोटा, लंबा, नसों से भरा हुआ। मीना की आँखें उस पर ठहर गईं। प्रिया ने देखा और हँसी।
“अब इसे भी चूस। दोनों का काम एक साथ।”
मीना ने एक हाथ से मेरा लंड पकड़ा और मुँह में ले लिया। प्रिया अभी भी उसके चेहरे पर बैठी हुई थी। मीना दोनों तरफ से घिरी हुई थी। उसका गला भर रहा था। आँसू निकल आए। प्रिया ने उसके बाल पकड़कर और जोर से दबाया।
“गला खोल। पूरा अंदर ले।”

मैंने आगे धक्का दिया। मेरा लंड उसके गले तक चला गया। मीना ने गैग किया लेकिन प्रिया ने सिर नहीं छोड़ा। थूक और लार उसके ठोड़ी से टपक रहे थे। मैंने कुछ देर गले में ठूँसा फिर निकाला। मीना हाँफ रही थी।
प्रिया उठ खड़ी हुई। उसने मीना को सोफे पर पेट के बल लिटा दिया। उसके नितंब ऊपर थे। विशाल, गोल, काँपते हुए। प्रिया ने अपने हाथ से जोर का थप्पड़ मारा। आवाज़ पूरे घर में गूँजी। मीना चीख पड़ी। दूसरा थप्पड़। फिर तीसरा। लाल निशान पड़ गए। प्रिया ने थप्पड़ मारते हुए कहा,

“तुम सिर्फ कामवाली नहीं हो। तुम हमारी कुतिया हो। समझी?”
“हाँ… दीदी… कुतिया हूँ…”
“और जोर से बोल।”
“मैं आपकी कुतिया हूँ!”
प्रिया ने उसकी चुत में फिर उँगलियाँ डाल दीं। इस बार चार। मीना तड़प रही थी। मैं उसके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मेरा लंड उसके मुँह के पास। उसने खुद मुँह खोल दिया। मैंने फिर से गले तक ठूँसना शुरू किया। प्रिया पीछे से उँगलियों से उसकी चुत फाड़ रही थी। मीना की आवाज़ दब गई थी। सिर्फ गले की आवाज़ें आ रही थीं।

कुछ देर बाद प्रिया ने कहा, “अब चोदो इसे। लेकिन धीरे नहीं। तोड़ दो।”
मैंने मीना को पलटा। पीठ के बल लिटाया। उसकी टाँगें अपने कंधों पर उठा लीं। चुत पूरी तरह खुली हुई थी। लाल और सूजी हुई। मैंने लंड का मुँह वहाँ लगाया और एक झटके में पूरा अंदर धकेल दिया। मीना की चीख घर में गूँज गई।
“आआह्ह्ह्ह… बहुत मोटा है… निकल जाएगा…”

मैं रुकने वाला नहीं था। जोर-जोर से धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ उसके स्तन उछल रहे थे। प्रिया उसके सिर के पास बैठ गई। उसने मीना के दोनों हाथ पकड़कर सिर के ऊपर बाँध दिए। फिर उसके निप्पल को दाँतों से काटने लगी। मैं नीचे से चोद रहा था। प्रिया ऊपर से यातना दे रही थी। मीना रो रही थी लेकिन उसकी चुत और ज्यादा भीग रही थी।
“राहुल… और जोर से… इसे याद रहे आज की रात…”

मैंने गति बढ़ा दी। सोफा चरमरा रहा था। मीना का शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था। उसकी आँखें पलट रही थीं। प्रिया ने अचानक उसकी गर्दन दबा दी।
“साँस मत ले। जब तक मैं कहूँ।”
मीना का चेहरा लाल हो गया। मैं अभी भी अंदर-बाहर कर रहा था। जब प्रिया ने हाथ छोड़ा तो मीना ने जोर से साँस ली और साथ ही उसका शरीर ऐंठ गया। वो झड़ गई। उसकी चुत ने मेरे लंड को जोर से भींच लिया। रस बह निकला।
मैंने लंड बाहर निकाला। प्रिया ने तुरंत मीना को घुटनों के बल कर दिया।

“अब गाँड में लो।”
मीना ने सिर हिलाया। “नहीं दीदी… वो नहीं… बहुत दर्द होगा…”
प्रिया ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “तुम्हारी मर्जी नहीं चलती यहाँ। खोल।”

मैंने लंड पर थूक लगाया। फिर उसके गाँड के छेद पर रखा। धीरे से दबाव दिया। मीना चीख रही थी। प्रिया ने उसका मुँह दबा रखा था। मैंने और जोर लगाया। आधा अंदर चला गया। मीना का शरीर काँप रहा था। फिर पूरा। मैंने रुककर साँस ली फिर धक्के शुरू किए। हर धक्के के साथ मीना की आवाज़ बदल रही थी। दर्द से कराह, फिर अजीब सी मस्ती। प्रिया उसके नीचे लेट गई और उसकी चुत चाटने लगी। अब मीना दोनों तरफ से भरी हुई थी। आगे प्रिया की जीभ, पीछे मेरा लंड।

मैंने काफी देर तक उसकी गाँड चोदी। जब लगा कि अब नहीं रोक पाऊँगा तो बाहर निकाला और उसका मुँह खोलकर पूरा माल उसके गले में उड़ेल दिया। मीना ने निगल लिया। कुछ बाहर निकलकर उसके होठों पर लग गया। प्रिया ने उसे चाट लिया।
हम थोड़ी देर रुके। फिर प्रिया ने मीना को बेडरूम में घसीटा। वहाँ उसने अलमारी से रस्सी निकाली। मीना के हाथ पीछे बाँध दिए। टाँगें फैलाकर बिस्तर के कोनों से बाँध दीं। अब वो पूरी तरह बेबस थी। प्रिया ने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम उसके स्तनों पर टपकाने लगी। मीना चीख रही थी लेकिन हाथ-पैर हिल नहीं सकते थे। प्रिया एक-एक करके निप्पल पर मोम गिराती रही। फिर नीचे। चुत के ऊपर। मीना पागल हो रही थी।

मैंने फिर से लंड सख्त किया। प्रिया ने इशारा किया। मैंने उसकी खुली चुत में फिर से प्रवेश किया। इस बार और क्रूर। धक्के इतने जोर के कि बिस्तर की दीवार से टकरा रही थी। प्रिया उसके मुँह में अपनी उँगलियाँ ठूँसकर रखी हुई थी।
“आज तुम हमारी हो। कल भी आओगी। और जब तक हम कहेंगे, चुत और गाँड दोनों खुली रखोगी।”
मीना ने आँसुओं भरी आवाज़ में कहा, “हाँ… दीदी… राहुल… मैं तुम्हारी कुतिया हूँ… जितना चाहो इस्तेमाल करो…”

रात गहरी हो गई। हमने उसे कई बार चोदा। कभी प्रिया उसके मुँह पर बैठती, कभी मैं उसकी गाँड में। बीच-बीच में थप्पड़, बाल खींचना, गर्दन दबाना। मीना कई बार झड़ी। उसके शरीर पर लाल निशान, काटने के निशान, मोम के दाग। जब आखिर में हम रुके तो वो बिस्तर पर पड़ी हुई काँप रही थी। मुँह से लार बह रही थी। आँखें आधी बंद।

प्रिया ने रस्सी खोली। मीना उठ भी नहीं पाई। हमने उसे नहलाया। उसके शरीर को साबुन से रगड़ा। प्रिया ने उसके घावों पर ठंडा पानी डाला। मीना सिसक रही थी लेकिन विरोध नहीं कर रही थी।
सुबह जब वो जाने लगी तो प्रिया ने उसके बाल पकड़कर कहा, “कल फिर आना। और पैंटी मत पहनना। सीधे किचन में नंगी होकर खड़ी हो जाना।”
मीना ने सिर झुकाया। “जी दीदी।”
दरवाज़ा बंद होते ही प्रिया ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही क्रूर मुस्कान थी।
“ये तो बस शुरुआत है राहुल। अब ये घर सिर्फ हमारा नहीं। ये हमारा शिकारगाह है।”

उस दिन के बाद मीना सिर्फ काम करने नहीं आती थी। वो हमारे लिए आती थी। कभी रस्सियों में बँधी, कभी घुटनों के बल फर्श पर रेंगती हुई, कभी दोनों के बीच में पिसी हुई। प्रिया की भूख और मेरी हवस ने मिलकर उसे पूरी तरह अपना बना लिया था। और मीना… वो अब खुद माँगती थी। और जोर से। और क्रूर। क्योंकि दर्द में ही उसे सुकून मिलता था।

और मैं… मैं अपनी बहन के साथ मिलकर एक ऐसी दुनिया में रह रहा था जहाँ कोई सीमा नहीं थी। सिर्फ भूख थी। और उस भूख को मिटाने के लिए एक शरीर… जो कभी इंकार नहीं करता था।
अगले दिन सुबह नौ बजे मीना दरवाज़े पर खड़ी थी। चेहरे पर रात के निशान साफ दिख रहे थे—गर्दन पर उँगलियों के निशान, निप्पल पर दाँत के निशान, जाँघों पर थप्पड़ों के लाल दाग। उसने साड़ी पहनी थी लेकिन जैसे ही प्रिया ने दरवाज़ा खोला, मीना ने खुद ही पल्लू गिरा दिया। ब्लाउज़ के हुक पहले से खुले हुए थे। स्तन बाहर। नीचे कोई पेटीकोट या पैंटी नहीं।

प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा, “अच्छी कुतिया। किचन में जा। घुटनों के बल। हाथ पीछे।”
मीना चुपचाप चली गई। किचन के ठंडे फर्श पर घुटने टेक दिए। हाथ पीठ के पीछे जोड़ लिए। प्रिया ने रस्सी निकाली और उसके हाथ कसकर बाँध दिए। फिर उसकी टाँगें फैलाकर दोनों टखनों को अलग-अलग कुर्सियों से बाँध दिया। अब मीना का शरीर पूरा खुला हुआ था—चुत और गाँड हवा में।

मैंने चाय बनाते हुए देखा। मेरा लंड पहले से सख्त हो चुका था। प्रिया ने फ्रिज से बर्फ का टुकड़ा निकाला। मीना की चुत पर रगड़ने लगी। ठंडक से मीना का शरीर झटका खा गया।
“आह्ह्ह… ठंडा… दीदी…”
प्रिया ने बर्फ को उसकी चुत के अंदर धकेल दिया। फिर दूसरा टुकड़ा गाँड में। मीना तड़पने लगी लेकिन रस्सियाँ कस गई थीं। प्रिया ने तीसरा टुकड़ा उसके मुँह में ठूँस दिया।
“चुप रह। आज तुझे सिर्फ सहना है।”

मैं पीछे गया। लंड निकालकर उसकी गाँड के छेद पर रखा जो बर्फ से सिकुड़ा हुआ था। एक झटके में आधा अंदर धकेल दिया। मीना की चीख दब गई क्योंकि मुँह में बर्फ था। मैंने पूरा धकेल दिया। बर्फ पिघल रही थी और उसके शरीर से पानी बह रहा था। मैंने जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू किए। हर धक्के के साथ उसकी गाँड फैल रही थी। प्रिया ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गाल पर थप्पड़ मारा।
“गिन। हर धक्के की गिनती कर।”

मीना ने दबी आवाज़ में गिनना शुरू किया। “एक… दो… तीन…” जब तीस तक पहुँची तो उसका गला बैठ चुका था। मैंने लंड बाहर निकाला। गाँड का छेद खुला और लाल हो चुका था। प्रिया ने वहाँ दो उँगलियाँ डालकर फैलाया।
“अब इसमें और कुछ जाएगा।”

उसने किचन की ड्रॉअर से लकड़ी का मोटा रोलिंग पिन निकाला। तेल लगाया और धीरे-धीरे मीना की गाँड में धकेलने लगी। मीना का शरीर ऐंठ गया। आँसू बह रहे थे। रोलिंग पिन आधा अंदर चला गया। प्रिया ने उसे अंदर-बाहर करना शुरू किया। मैं सामने आकर उसका मुँह खोला और अपना लंड ठूँस दिया। अब मीना दोनों तरफ से भरी हुई थी—आगे मेरा लंड, पीछे लकड़ी का पिन। प्रिया पिन को घुमा-घुमाकर अंदर कर रही थी। मीना की आवाज़ सिर्फ गले से निकल रही थी।

जब पिन पूरा अंदर चला गया तो प्रिया ने उसे वहीं छोड़ दिया। मैंने मीना के मुँह से लंड निकाला और उसकी चुत में डाल दिया। अब तीनों छेद भरे हुए थे। मैंने तेजी से चोदना शुरू किया। प्रिया उसके स्तनों को दोनों हाथों से मसल रही थी, निप्पल को घुमाते हुए खींच रही थी। मीना कई बार झड़ी। उसकी चुत से रस बहकर फर्श पर गिर रहा था। लेकिन हम रुके नहीं।

दोपहर तक हमने उसे किचन में ही रखा। कभी थप्पड़, कभी बाल खींचना, कभी गर्दन दबाना। एक बार प्रिया ने उसके मुँह में कपड़े का टुकड़ा ठूँस दिया और सिर्फ उसके शरीर को यातना दी। गर्म चम्मच उसके निप्पल पर दबाया। मीना की आँखें फटी की फटी रह गईं लेकिन आवाज़ नहीं निकल सकी।

शाम को प्रिया ने रस्सियाँ खोलीं। मीना फर्श पर गिर पड़ी। शरीर काँप रहा था। प्रिया ने उसके बाल पकड़कर खींचा।
“बेडरूम में रेंगकर जा।”
मीना ने हाथ-घुटनों के बल रेंगना शुरू किया। रास्ते में उसके स्तन फर्श से रगड़ खा रहे थे। प्रिया ने पीछे से उसके नितंब पर थप्पड़ मारते हुए कहा, “तेज। कुतिया की तरह।”

बेडरूम में पहुँचते ही प्रिया ने उसे बिस्तर पर पेट के बल लिटाया। हाथ-पैर फिर से बाँध दिए। इस बार बिस्तर के चारों कोनों से। प्रिया ने अलमारी से चमड़े की बेल्ट निकाली। पहले नितंब पर जोर का वार किया। आवाज़ गूँजी। लाल धारी पड़ गई। दूसरा वार। तीसरा। मीना चीख रही थी। दस वार के बाद दोनों नितंब सूज चुके थे। प्रिया ने बेल्ट उसकी चुत पर भी मारी। मीना का शरीर उछल पड़ा।

मैंने लंड उसके मुँह में दे दिया। प्रिया पीछे से उसकी चुत में तीन उँगलियाँ डालकर फाड़ रही थी। फिर चार। मीना का मुँह मेरे लंड से भरा हुआ था इसलिए चीख नहीं सकती थी। सिर्फ गले से आवाज़ आ रही थी। प्रिया ने उँगलियाँ निकालकर अपना चेहरा उसकी चुत पर रख दिया और जोर-जोर से चाटने लगी। दाँतों से क्लिट को काटती हुई। मीना झड़ गई। उसका शरीर ऐंठकर रस्सियों को खींच रहा था।

रात गहरी हो गई। हमने उसे बाँधे रखा। बीच-बीच में पानी की कुछ घूँट दीं। फिर फिर से शुरू किया। प्रिया ने उसके स्तनों पर मोमबत्ती का गर्म मोम टपकाया। निप्पल पूरी तरह ढक गए। फिर ठंडा पानी डाला। मीना पागल हो रही थी। मैंने उसकी गाँड में फिर से प्रवेश किया। इस बार बिना किसी तैयारी के। दर्द से उसकी आँखें निकल आईं। प्रिया उसके मुँह में उँगलियाँ ठूँसकर रखी हुई थी।
“आज तुम सो नहीं पाओगी। जब तक हम थक नहीं जाते, तुम्हारी चुत और गाँड दोनों इस्तेमाल होंगी।”

सुबह चार बजे तक हम चले। मीना कई बार बेहोश होने के करीब पहुँची। हर बार प्रिया ने उसके गाल पर थप्पड़ मारकर जगाया। आखिर में जब मैंने अपना माल उसकी गाँड में छोड़ा तो प्रिया ने उसे बाहर निकालकर मीना के मुँह में ठूँस दिया।
“चाट। अपना ही गंदा रस चाट।”
मीना ने जीभ निकाली और चाटा। आँसू और थूक मिलाकर।

प्रिया ने रस्सियाँ खोलीं। मीना बिस्तर पर मरी हुई जैसी पड़ी थी। शरीर पर निशान, सूजन, दाग। प्रिया ने उसके बाल सहलाते हुए धीरे से कहा,
“कल फिर आना। और इस बार अपने पति का फोन लेकर आना। हम उसे भी सुनवाएँगे कि उसकी बीवी कितनी अच्छी कुतिया बन गई है।”
मीना की आँखें खुलीं। डर साफ दिख रहा था लेकिन उसने सिर हिलाया।
“जी… दीदी…”

मैंने खिड़की से बाहर देखा। जयपुर की सुबह हो रही थी। घर के अंदर हमारी भूख अभी भी बाकी थी। और मीना… वो अब सिर्फ शरीर नहीं रह गई थी। वो हमारा खिलौना बन चुकी थी। जिसे तोड़ना, भरना, रौंदना—यही हमारा रोज़ का काम था।
और ये सिलसिला रुकने वाला नहीं था।

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