पुणे की अमीर बहू मजदूरों के हवाले

पति के बाहर जाते ही पुणे की अमीर बहू अनन्या खुद को नौकर और मजदूरों के हवाले कर देती है। रस्सियाँ, चाबुक, मोम और कई मोटे लंड उसे पूरी तरह तोड़ डालते हैं। हर रात और क्रूर।

मेरा नाम अनन्या मेहता है। उम्र 35 साल। शरीर कसा हुआ, कसावट भरा। छाती 36 इंच की गोल-मटोल और भारी, कमर 28 इंच की पतली और सख्त, और गांड 42 इंच की मोटी-मोटी, गोल, जो हर कदम पर हिलती है तो आदमी के लंड में खून दौड़ने लगता है। गोरा रंग, लंबे काले बाल, और आवाज में एक ऐसी मिठास जो सुनने वाले को पागल कर दे। मैं पुणे के एक बड़े बंगले में रहती हूँ। पति अमित अक्सर बाहर रहते हैं बिजनेस के लिए। घर में तीन नौकर हैं, लेकिन मुख्य है विक्रम—28 साल का, मजबूत, कंधे चौड़े, छाती बालों से भरी, और लंड जो देखकर सांस अटक जाए।

एक शाम की बात है। बारिश हो रही थी। पति दिल्ली गए हुए थे तीन दिन के लिए। घर में सिर्फ मैं और विक्रम। बाकी नौकर छुट्टी पर। मैंने एक पतला काला साड़ी पहना था, बिना ब्लाउज के। सिर्फ एक छोटी पैंटी। साड़ी गीली हो चुकी थी बारिश की नमी से। विक्रम किचन में खाना बना रहा था। मैं उसके पास गई।

“विक्रम,” मैंने धीरे से कहा, “आज रात खाना बाद में बना। पहले मेरे कमरे में आ।”
उसने सिर उठाया। आँखों में वही भूख थी जो हमेशा छिपाता था। “मालकिन…?”
मैंने साड़ी का पल्लू गिरा दिया। छाती नंगी। निप्पल कड़े। “आ। और दरवाजा बंद कर।”
वह आया। दरवाजा बंद किया। मैंने बिस्तर के पास खड़े होकर साड़ी पूरी खोल दी। सिर्फ पैंटी। विक्रम ने एक पल देखा, फिर झपटा। उसने मुझे दीवार से सटा दिया। एक हाथ से गला दबाया, दूसरे से छाती मसल दी।

“साली… आज तो तुझे छोड़ूँगा नहीं,” उसने गुर्राते हुए कहा।
मैंने उसकी पैंट का हुक खोला। लंड बाहर निकला—मोटा, लंबा, नसों से भरा, सिर पहले से गीला। मैंने घुटनों पर बैठकर उसे मुँह में लिया। पूरा। गले तक। उसने मेरे बाल पकड़कर जोर से धक्के मारे। थूक बहने लगा। आवाजें गूंजने लगीं—गच गच गच।
पंद्रह मिनट बाद उसने खींच लिया। “बिस्तर पर। चारों हाथ-पैर फैला।”
मैं लेट गई। उसने अलमारी से मोटी रस्सियाँ निकालीं। दोनों कलाई बिस्तर के सिरहाने से बाँध दीं। टांगें फैलाकर दोनों टखनों को भी बाँध दिया। मैं बिलकुल बेबस। पैंटी फाड़ दी उसने। चूत पहले से गीली।

पहले थप्पड़। गांड पर। जोर का। फिर दूसरा। तीसरा। लाल हो गई। वह हँस रहा था। “मालकिन बनती है साली, अब रंडी बन।” फिर उसने मेरी गांड के दोनों फाँके फैलाए और थूक लगाकर एक उंगली घुसा दी। सीधी। जोर से। मैं चिल्लाई।
“आह्ह्ह… धीरे…!”

“धीरे? तूने मुझे धीरे करने को कहा था कभी?” उसने दूसरी उंगली भी पेल दी। दोनों उंगलियाँ अंदर-बाहर। फिर तीन। गांड फैल रही थी। दर्द और मजा एक साथ। वह झुका और मेरी चूत चाटने लगा। जीभ अंदर तक। दाने को दाँतों से काटते हुए। मैं रस्सियों में तड़प रही थी। कमर उछल रही थी।
अचानक उसने सिर उठाया। “आज सिर्फ मैं नहीं। दो और हैं नीचे। दोनों को बुलाऊँ?”
मेरी सांस रुक गई। “कौन?”

“राजू और सलीम। दोनों मजदूर। एक कचरा उठाता है, एक बाग का काम करता है। दोनों के लंड मुझसे भी मोटे।”
मैंने आँखें बंद कीं। फिर खोलीं। “बुला।”
वह फोन पर बोला। पाँच मिनट में दोनों कमरे में थे। राजू काला, मोटा, दाढ़ी वाला। सलीम पतला लेकिन लंड बाहर निकालते ही साफ दिख रहा था—मोटा और टेढ़ा। दोनों ने मुझे बाँधा हुआ देखा और हँस पड़े।
विक्रम ने कहा, “शुरू करो।”

पहले राजू आया। उसने अपनी पैंट उतारी। लंड मेरी चूत पर रगड़ा। फिर एक झटके में पूरा घुसा दिया। मैं चीख पड़ी। रस्सियाँ खिंच गईं। वह धक्के मारने लगा—जोर के, गहरे। हर धक्के पर मेरे स्तन हिल रहे थे। सलीम ने मेरे मुँह में अपना लंड ठूंस दिया। गला भर गया। आँखों से पानी आने लगा। विक्रम गांड में उंगलियाँ चला रहा था।

राजू चोदता रहा। दस मिनट बाद उसने खींचा और सलीम की जगह ले ली। सलीम ने चूत में घुसाया। टेढ़ा लंड अंदर घूम रहा था। दर्द हो रहा था, लेकिन मजा भी। विक्रम ने मेरी गांड पर तेल लगाया और अपना लंड सेट किया। एक धक्का। गांड फटती महसूस हुई। मैं चीखी—लंबी, कर्कश। तीनों एक साथ। एक चूत में, एक गांड में, एक मुँह में।

कमरे में सिर्फ आवाजें थीं—फट फट, गच गच, और मेरी दबी हुई कराहें। राजू गालियाँ दे रहा था। “साली अमीर रंडी… मजदूरों से चुद रही है। तेरी गांड कितनी गरम है।” सलीम मेरे बाल खींच रहा था। विक्रम गांड में पूरा पैल कर रहा था।
आधा घंटा बाद उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मुझे घोड़ी बनाया। विक्रम ने पीछे से गांड में फिर घुसाया। राजू ने नीचे लेटकर अपना लंड मेरी चूत में डाल दिया। दो लंड एक साथ। सलीम ने मेरे मुँह में। मैं तीनों को ले रही थी। शरीर कांप रहा था। पसीना, थूक, और रस सब मिला हुआ।

फिर उन्होंने मुझे खड़ा किया। दीवार से सटाया। हाथ ऊपर बाँधे। विक्रम ने बेल्ट निकाली और गांड पर मारना शुरू किया। लाल निशान। फिर राजू ने थप्पड़ मारे छाती पर। निप्पल काटे। सलीम ने घुटनों पर बैठाकर लंड चूसाया। जब मुँह से झाग आने लगा तो खींच लिया और चेहरे पर थूक दिया।

रात गहरी हो चुकी थी। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। इस बार बिना रस्सी के। लेकिन मैं खुद नहीं हिल रही थी। विक्रम ने कहा, “अब तू बोल कि तू क्या है।”
मैंने आवाज में कांपते हुए कहा, “मैं तुम्हारी रंडी हूँ… तीनों की… चूत और गांड दोनों तुम्हारी हैं…”

उन्होंने फिर शुरू किया। इस बार और क्रूर। राजू ने मेरी टांगें कंधों पर रखीं और चूत को इतना जोर से चोदा कि बिस्तर चरमराया। सलीम ने गांड में मुट्ठी तक उंगली घुसाने की कोशिश की। विक्रम ने मेरे गले पर हाथ रखा और दबाया जबकि चोद रहा था। सांस रुकने लगी तो छोड़ा। फिर दोबारा।

मैं कई बार झड़ चुकी थी। शरीर ढीला पड़ गया था। लेकिन वे नहीं रुके। आखिर में तीनों ने बारी-बारी से मेरे मुँह में, छाती पर, और चूत के अंदर छोड़ दिया। गर्म, गाढ़ा। चेहरा, बाल, स्तन सब गीले।
सुबह चार बजे वे गए। विक्रम ने मुझे नहलाया। शरीर पर निशान थे—लाल, नीले। गांड में जलन, चूत में सूजन। लेकिन आँखों में वही भूख बची थी।

उसने कहा, “अगली बार और बुलाऊँगा। चार-पाँच।”
मैंने सिर्फ सिर हिलाया।
दो दिन बाद अमित फिर दिल्ली चला गया। तीन रात के लिए। शाम होते ही विक्रम ने घर के सारे दरवाजे बंद कर दिए। खिड़कियों के परदे गिरा दिए। मैंने खुद ही काला साड़ी पहना था, नीचे कुछ नहीं। सिर्फ शरीर।
विक्रम आया। हाथ में मोटी चमड़े की पट्टियाँ, लोहे की जंजीरें और एक काला कपड़ा। “आज संख्या ज्यादा है,” उसने सीधा कहा। “पाँच और। सब तैयार हैं।”

मैंने कुछ नहीं बोला। वह मुझे बेडरूम में ले गया। बिस्तर के चारों कोनों पर पहले से लोहे के छल्ले लगे थे। उसने मुझे नंगी कर दिया। पहले दोनों कलाई पीछे बाँधीं। फिर टांगें फैलाकर टखनों को छल्लों से जकड़ दिए। छाती पर चमड़े की पट्टियाँ कस दीं ताकि सांस लेना भी मुश्किल हो। मुँह में एक मोटा गैग ठूंस दिया—कपड़े का, जो गले तक चला गया। आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया।
अंधेरा। सिर्फ आवाजें। दरवाजा खुला। कई कदम। भारी साँसें। कोई हँसा। कोई थूका।

पहले हाथ आया। मोटा, खुरदरा। मेरी छाती मसली। निप्पल को दो उंगलियों से दबाया और मोड़ा। दर्द तेज। फिर थप्पड़। दोनों स्तनों पर बारी-बारी। लाल होने तक। कोई और हाथ गांड पर आया। दोनों फाँके फैलाए और थूक की जगह तेल डालकर तीन उंगलियाँ एक साथ घुसा दीं। जबरदस्ती। मैं गैग में कराह उठी।
“साली आज पूरी खुली हुई है,” कोई बोला। आवाज राजू की थी।

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फिर सलीम। फिर तीन नए। एक का नाम रफीक था—लंबा, दुबला, लेकिन लंड जो हाथ में आने पर भी मुट्ठी से बाहर निकला। दूसरा कालू—काला, मोटा, पेट निकला हुआ, लेकिन ताकतवर। तीसरा दीपक—छोटा कद, लेकिन आँखों में भूख।
उन्होंने मुझे बिस्तर से उठाया। रस्सियाँ ढीली कीं लेकिन हाथ पीछे बंधे रहे। दीवार से सटा दिया। विक्रम ने कहा, “अब गिनती शुरू।”
पहले बेल्ट। चमड़े की। गांड पर। एक। दो। तीन। दस तक। हर मार पर शरीर झटका खाता। त्वचा जल रही थी। फिर चाबुक। पतला। पीठ पर। स्तनों पर। अंदर की तरफ जांघों पर। मैं गैग में चीख रही थी लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी।

फिर उन्होंने मुझे फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। पाँच लंड सामने। एक-एक करके मुँह में ठूंसे। गला फाड़ते हुए। थूक और लार फर्श पर गिर रहे थे। कोई बाल पकड़कर सिर हिला रहा था। कोई गाल पर थप्पड़ मार रहा था। जब एक झड़ने वाला होता तो चेहरे पर छोड़ देता। गर्म। गाढ़ा। आँखों में, बालों में, नाक में।

फिर घोड़ी बना दिया। हाथ-पैर बाँधकर। विक्रम ने पीछे से गांड में अपना लंड घुसाया। पूरा। एक झटके में। मैं तड़पी। राजू ने नीचे से चूत में घुसाया। दो लंड एक साथ। फैल रही थी दोनों जगह। दर्द और जलन। सलीम ने गैग निकाला और अपना लंड मुँह में डाल दिया। तीनों एक साथ पेल रहे थे। बाकी दो मेरे स्तन मसल रहे थे, निप्पल काट रहे थे।
“और जोर से,” विक्रम गुर्राया। “ये अमीर रंडी है। इसे महसूस होना चाहिए।”

धक्के तेज हुए। बिस्तर नहीं, फर्श। शरीर सरक रहा था। पसीना, तेल, थूक सब मिला हुआ। कोई ने गांड पर थप्पड़ मारे जबकि चोद रहा था। कोई ने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। मैं कई बार झड़ चुकी थी लेकिन वे नहीं रुके।
आधा घंटा बाद उन्होंने मुझे खड़ा किया। हाथ ऊपर जंजीर से बाँध दिए। पैर फैलाए। कालू आया। उसने अपनी मोटी उंगलियाँ चूत में घुसाईं—चार। फिर मुट्ठी बनाने की कोशिश। धीरे-धीरे। दर्द इतना कि आँखों के आगे अंधेरा छा गया। फिर रफीक ने गांड में वही किया। दोनों तरफ मुट्ठियाँ। मैं लटकी हुई थी। शरीर कांप रहा था। आंसू बह रहे थे।

विक्रम ने गैग फिर लगा दिया। “अब चुपचाप ले।”
उन्होंने बारी-बारी से चोदा। एक चूत में, एक गांड में। फिर दोनों जगह एक साथ। कोई चेहरे पर बैठकर मुँह चोद रहा था। कोई स्तनों के बीच लंड रगड़ रहा था। गालियाँ लगातार। “रंडी… कुतिया… मजदूरों की रखैल… तेरी गांड आज फट जाएगी…”
रात के दो बज गए थे। शरीर पर नीले-लाल निशान। चूत और गांड दोनों सूजे हुए, खुले हुए। वे थके नहीं। विक्रम ने एक मोटी मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम मेरे निप्पलों पर टपकाया। जलन तेज। फिर जांघों के अंदर। फिर गांड की दरार पर। मैं गैग में चीख रही थी।

फिर उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। इस बार हाथ-पैर चारों दिशाओं में बाँध दिए। पूरी तरह फैली हुई। दीपक ने एक पतली रस्सी ली और निप्पलों के चारों तरफ कसकर बाँधी। खींचा। दर्द। फिर चूत के ऊपर की त्वचा को भी बाँधा। खींचने पर और संवेदनशील।
अब वे एक-एक करके आए। धीरे नहीं। जबरदस्ती। पूरा लंड एक झटके में। कुछ देर चोदकर निकाला और दूसरे को जगह दी। कोई बीच में थप्पड़ मारता। कोई गला दबाता। कोई बाल खींचता।

आखिर में पाँचों ने मुझे घेर लिया। एक चूत में, एक गांड में, दो मुँह और हाथों में, एक स्तनों के बीच। वे एक साथ झड़े। अंदर, बाहर, चेहरे पर, बालों में। शरीर उनका रस चूस रहा था।
सुबह पाँच बजे उन्होंने रस्सियाँ खोलीं। मैं हिल नहीं पा रही थी। विक्रम ने पानी लाकर पिलाया। बाकी चले गए। वह मेरे पास बैठ गया।
“अगली बार और होंगे,” उसने धीरे से कहा। “और सामान भी। आज तो सिर्फ शुरुआत थी।”
मैंने आँखें बंद कीं। शरीर जल रहा था। हर जगह दर्द। लेकिन अंदर कहीं एक भूख और जाग गई थी।

दोपहर तक मैं नहा चुकी थी। निशान छिपाने के लिए ढीले कपड़े पहन लिए। विक्रम किचन में खाना बना रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जब उसकी निगाह मुझ पर पड़ी तो उसने सिर्फ इतना कहा—
“रात को दरवाजा फिर बंद रहेगा।”
तीसरे दिन शाम ढलते ही अमित का फोन आया। वापसी दो दिन और टल गई। विक्रम ने फोन सुनते ही दरवाजे की चाबी घुमा दी। मैं पहले से नंगी खड़ी थी। उसने कुछ नहीं पूछा। बस मुझे बेडरूम में धकेल दिया।

आज सामान अलग था। लोहे का एक मोटा फ्रेम खड़ा किया गया था कमरे के बीच में। हाथ-पैर फैलाने वाले छल्ले। उसने मुझे उस पर बाँध दिया। कलाई ऊपर, टखने नीचे, शरीर पूरी तरह तना हुआ। छाती आगे निकली हुई, गांड पीछे। आँखों पर काला कपड़ा। मुँह में लोहे का गैग—दांतों में फंसा हुआ, जीभ बाहर नहीं निकल सकती।
दरवाजा खुला। सात आदमी। पिछले पाँच और दो नए। एक बहुत मोटा, पेट निकला, लंड हाथ जितना मोटा। दूसरा लंबा, दुबला, लेकिन आँखों में पागलपन।

पहले चाबुक। पतला चमड़े का। पीठ पर। एक के बाद एक। गिनती नहीं हो रही थी। त्वचा फटने लगी। खून की पतली लकीरें। फिर स्तनों पर। निप्पल पर सीधा वार। दर्द इतना कि शरीर झटके खा रहा था लेकिन रस्सियाँ नहीं छोड़ रहीं।
गांड पर बारी आई तो उन्होंने दोनों फाँके फैलाए और चाबुक अंदर की त्वचा पर मारा। मैं गैग में चीख रही थी। आवाज नहीं निकल रही थी, सिर्फ गले से घर्र-घर्र।

फिर उंगलियाँ। पहले चूत में चार। फिर मुट्ठी। धीरे नहीं, जबरदस्ती। घुमाते हुए अंदर-बाहर। गांड में भी वही। दोनों तरफ मुट्ठियाँ एक साथ। शरीर कांप रहा था। पसीना और खून मिला हुआ बह रहा था।
लंड आने शुरू हुए। एक चूत में, एक गांड में। दोनों जगह एक साथ पेल। कोई गला दबा रहा था। कोई बाल पकड़कर सिर पीछे खींच रहा था। गैग के बावजूद थूक बह रहा था। वे बारी-बारी बदल रहे थे। कोई दो मिनट, कोई पाँच। हर कोई पहले से जोर से।

मोटे आदमी ने अपनी जगह ली। लंड इतना मोटा कि चूत पूरी फैल गई। उसने धक्के मारते हुए मेरे निप्पल काटे। खून आया। फिर गांड में घुसाया। दर्द से आँखों के आगे अंधेरा छा गया।
वे थके नहीं। फ्रेम से उतारा। फर्श पर घुटनों के बल। हाथ पीछे बाँधे। सातों लंड बारी-बारी मुँह में। गला फाड़ते हुए। जब कोई झड़ता तो चेहरे पर, बालों में, आँखों में छोड़ देता। फिर अगला।

रात के तीन बज गए। शरीर अब उनका खिलौना भर रह गया था। उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया। हाथ-पैर चारों तरफ बाँध दिए। फिर मोमबत्ती। गर्म मोम निप्पलों पर, चूत की फाँकों पर, गांड की दरार पर। जलन तेज। उसके ऊपर फिर लंड।
आखिर में विक्रम ने सबसे क्रूर तरीका चुना। उसने एक मोटी लकड़ी की छड़ी ली और चूत के ऊपर की संवेदनशील जगह पर मारना शुरू किया। हल्के नहीं। जोर के। हर वार पर शरीर उछलता। फिर उसी जगह लंड घुसा दिया।

सुबह छः बजे उन्होंने छोड़ा। मैं हिल नहीं पा रही थी। शरीर पर निशान, खून के धब्बे, सूजन। विक्रम ने पानी पिलाया। बाकी चले गए।
वह मेरे कान के पास झुका और बोला, “अगली बार और सामान आएगा। और आदमी भी। तू तैयार रह।”
मैंने आँखें बंद कीं। दर्द में भी अंदर वही भूख जाग रही थी। दरवाजा फिर बंद होने वाला था। और इस बार और गहरा अंधेरा।

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