रियासत की मालकिन एक मजदूर के सामने घुटने टेक देती है। बेटा अंधेरे में खड़ा सब देखता रहता है। हर रात नई यातना, नई समर्पण की सीमा टूटती है makan malkin ki chudai ।
राजस्थान के उदयपुर शहर से थोड़ी दूर बसे एक पुराने रियासत जैसे इलाके में ठाकुर हवेली खड़ी थी। हवेली इतनी बड़ी थी कि पूरे इलाके में उसकी बराबरी कोई नहीं कर सकता था। हवेली की मालकिन थीं रानी साहिबा मीरा सिंह। उम्र 46 साल। शरीर अभी भी कसा हुआ, कमर पतली, जांघें गोल-मटोल और छातियां भारी। वे हमेशा साड़ी या नाइटी में ऐसी सजतीं कि देखने वाला एक नजर में ही अटक जाए। उनके पति की मौत हुए सात साल हो चुके थे। तब से वे अकेली हवेली की सारी जायदाद संभालती थीं—तीन मार्बल की खदानें, दो होटल और सैकड़ों एकड़ खेती।
घर में चार लोग रहते थे। मीरा, उनका बड़ा बेटा विक्रम (28 साल, शादीशुदा), दूसरा बेटा अर्जुन (25 साल, कुंवारा) और सबसे छोटा बेटा आयुष। आयुष की उम्र 19 साल थी। आयुष ही इस कहानी का गवाह बना।
कोरोना के बाद हवेली के पुराने नौकर बिखर गए थे। तब एक नया आदमी आया—कमल। कमल की उम्र 32 साल थी। कद 6 फुट 6 इंच। शरीर लोहे जैसा। कंधे चौड़े, बाजू मोटे और आवाज गहरी। वह पहले खदान में मजदूर था। मीरा ने उसे हवेली का मुख्य नौकर बना लिया। कमल धीरे-धीरे हवेली का असली मालिक बन गया। बाकी नौकर उसकी आंखों में आंखें मिलाकर बात तक नहीं करते थे।
एक दिन मीरा को जयपुर जाना पड़ा। होटल का कुछ काम था और नई साड़ियां खरीदनी थीं। आयुष ने कहा, “मां, कमल को साथ ले लो। वह गाड़ी भी चला लेगा।” मीरा ने सिर हिलाया। तीनों जयपुर पहुंचे। आयुष ने शहर पहुंचते ही कहा कि वह अपने कॉलेज के दोस्त के पास जा रहा है और रात वहीं रुकेगा। कमल और मीरा उसे छोड़कर हवेली के जयपुर वाले बंगले की तरफ चले गए।
आयुष का दोस्त अचानक रिश्तेदारों के यहां चला गया। आयुष मायूस होकर वापस बंगले पहुंचा। दरवाजा बंद था। उसने साइड की दीवार फांदकर अंदर घुसा। नौकरों वाला कमरा खाली था। वह सीढ़ियों की तरफ बढ़ा तो ऊपर से आवाजें आने लगीं—महिला की दबी हुई कराहें और थप्पड़ों की आवाज।
आयुष ने मां के कमरे का दरवाजा हल्का धकेला। अंदर जो नजारा था, उससे उसकी सांस अटक गई।
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कमल ने मीरा को चारपाई पर घोड़ी बना रखा था। मीरा की साड़ी कमर तक उठी हुई थी। कमल उनके पीछे खड़ा था। उसका लंड 8.5 इंच लंबा और मोटा था। वह उसे मीरा की गांड में पूरी ताकत से धंस रहा था। हर धक्के के साथ मीरा की छातियां हिल रही थीं और उनके मुंह से “आह… मार… और जोर से…” निकल रहा था। कमल एक हाथ से उनके बाल पकड़े हुए था और दूसरे हाथ से उनकी गांड पर जोर-जोर से चांटे मार रहा था। गांड पहले से ही लाल हो चुकी थी।
“साली रानी… इतनी अकड़ दिखाती थी… अब देख, तेरी गांड कैसे फाड़ रहा हूं।” कमल की आवाज में गुस्सा और मजा दोनों था। वह और जोर से धक्के लगाने लगा। मीरा का शरीर आगे-पीछे हिल रहा था। उनकी आंखें बंद थीं, मुंह半खुला।
आयुष चुपचाप दरवाजे के पीछे खड़ा देखता रहा। कमल ने अचानक मीरा के बाल और जोर से खींचे और अपना लंड उनकी गांड से निकाला। लंड चमक रहा था। उसने मीरा को घुमाया और उनके मुंह के सामने लाकर खड़ा कर दिया।
“चूस। पूरे लंड को गले तक ले जा।”
मीरा ने बिना किसी हिचक के मुंह खोला। कमल ने उनका सिर पकड़कर अपना लंड उनके गले में धंसाना शुरू कर दिया। मीरा की आंखों से आंसू निकलने लगे, लेकिन उन्होंने विरोध नहीं किया। कमल उनके मुंह की चुदाई करने लगा। हर धक्के के साथ मीरा का गला भर जाता और लार टपकने लगती।
“रंडी… तेरा मुंह भी गांड जितना ही अच्छा है।” कमल ने कहा और अपना पानी उनके मुंह में छोड़ दिया। मीरा ने सब निगल लिया। लंड अभी भी खड़ा था।
कमल ने उन्हें उठाया। मीरा का वजन उसके बाजुओं में कुछ भी नहीं लग रहा था। उसने उन्हें दीवार से सटाया, दोनों टांगें अपनी कमर पर चढ़ाईं और एक ही झटके में अपना लंड उनकी चुत में धंसा दिया। मीरा जोर से चीखी। कमल बिना रुके धक्के लगाने लगा। एक हाथ से उनकी गर्दन दबाए हुए था और दूसरे हाथ से उनकी छातियों को मसल रहा था।
“तेरी चुत इतनी गीली क्यों है, रानी साहिबा? गांव के मजदूर का लंड इतना पसंद है?”
मीरा ने आंखें खोलीं और हांफते हुए कहा, “हां… तेरा लंड ही मुझे चाहिए… बाकी सब बेकार हैं…”
कमल और क्रूर हो गया। उसने उन्हें चारपाई पर पटक दिया, पेट के बल लिटाया और फिर से गांड में घुस गया। इस बार उसने उनके दोनों हाथ पीछे बांध दिए। मीरा अब पूरी तरह बेबस थीं। कमल ने उनकी गांड पर और चांटे मारे, बाल खींचे और गाली दी।
“आज से तू मेरी रंडी है। जब चाहूं, जहां चाहूं, जैसे चाहूं—चोदूंगा। समझी?”
मीरा ने सिर हिलाया। “हां… मैं तेरी रंडी हूं… जितना चाहे फाड़…”
रात भर यही सिलसिला चला। कमल ने उन्हें हर पोजीशन में लिया—दीवार से सटाकर, गोद में उठाकर, घुटनों पर बैठाकर, बाल पकड़कर घसीटकर। मीरा कई बार झड़ चुकी थीं, लेकिन कमल नहीं रुका। आखिर में उसने उन्हें बिस्तर पर लिटाया, उनके ऊपर चढ़ा और आखिरी बार उनकी चुत में पानी छोड़ दिया।
सुबह जब आयुष उठा तो दोनों बिल्कुल सामान्य लग रहे थे। मीरा ने नाश्ता बनाया, कमल गाड़ी तैयार कर रहा था। आयुष चुप रहा।
दो दिन बाद वापस हवेली आई। उसी रात आयुष ने फिर देखा। मीरा आधी रात को काली नाइटी पहनकर कमल के कमरे में गईं। कमल नंगा लेटा था। मीरा ने नाइटी उतारी और उसके ऊपर चढ़ गईं। कमल ने उनकी पैंटी फाड़ दी और उनकी चुत चाटने लगा। मीरा की आवाजें पूरे कमरे में गूंज रही थीं।
“चाट… और जोर से चाट… मेरी चुत तेरे मुंह की है…”
कमल ने चाटते-चाटते उनकी गांड में उंगली घुसेड़ दी। फिर उन्हें घुमाया और बिना कंडोम के चुत में घुस गया। इस बार उसने उनके गले में चमड़े का पट्टा बांध लिया था जो उसने जयपुर से लाया था। हर धक्के के साथ वह पट्टा खींचता और मीरा की सांस रुक जाती।
“बोल… तू कौन है?”
“तेरी रंडी… तेरी कुतिया…”
“और जोर से बोल।”
“मैं तेरी रांड हूं… तेरा लंड ही मेरा मालिक है…”
कमल ने उन्हें उलटा लिटाया, पैर कंधों तक मोड़े और इतनी ताकत से धक्के मारे कि चारपाई की लकड़ी चरमरा उठी। मीरा की आवाज अब चीख बन चुकी थी। कमल ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया ताकि आवाज बाहर न जाए।
रात के तीन बजे तक यह खेल चला। आखिर में कमल ने उन्हें फर्श पर गिराया, घुटनों के बल बैठाया और उनके मुंह में पानी छोड़ दिया। मीरा ने सब पी लिया और फिर कमल के पैर चूमने लगीं।
अगली सुबह हवेली में सब सामान्य था। मीरा नाश्ता परोस रही थीं। कमल बगीचे में पौधों को पानी दे रहा था। आयुष रसोई के कोने से देख रहा था। उसके मन में अब सिर्फ एक ही बात घूम रही थी—अगली बार कब यह नजारा दोबारा देखेगा।
उसके बाद के हफ्तों में यह सिलसिला नियमित हो गया। कभी हवेली के पुराने तहखाने में, कभी खदान के पास बने छोटे बंगले में, कभी रात को बगीचे के अंधेरे में। कमल ने मीरा को पूरी तरह तोड़ दिया था। वह अब खुद ही रात को उसके कमरे के बाहर खड़ी हो जातीं और इंतजार करतीं। कमल जब चाहता, उन्हें घसीटकर ले जाता, बांधता, चांटे मारता, गाली देता और घंटों चोदता।
एक रात कमल ने उन्हें हवेली के मुख्य हॉल में ही ले लिया। पूरे हॉल में सिर्फ उनके शरीर की आवाजें गूंज रही थीं। मीरा फर्श पर नंगी पड़ी थीं। कमल उनके ऊपर बैठा था और उनके मुंह में अपना लंड धंसाए हुए था। दूसरी तरफ आयुष अंधेरे में खड़ा सब देख रहा था। उसका शरीर कांप रहा था, लेकिन वह नजर नहीं हटा पाया।
हवेली की रातें अब पहले जैसी नहीं रहीं। दीवारें चुप थीं, लेकिन उनके अंदर दबी कराहें और चमड़े की आवाजें गूंजती रहतीं। आयुष हर रात अपने कमरे से निकलकर अंधेरे गलियारों में घूमता। उसका शरीर कांपता, लेकिन पैर अपने आप कमल के कमरे की तरफ बढ़ जाते।
उस रात भी वही हुआ। आधी रात के करीब आयुष ने देखा कि मां का कमरा खाली है। वह धीरे-धीरे नीचे की तरफ बढ़ा। तहखाने का लोहे का दरवाजा आधा खुला था। अंदर से हल्की रोशनी और आवाजें आ रही थीं—थप्पड़ों की कड़कड़ाहट, जंजीरों की खनक और मीरा की दबी हुई चीखें।
आयुष ने दरवाजे के छेद से झांका। अंदर जो नजारा था, वह पहले के सब दृश्यों से कहीं ज्यादा क्रूर था।
मीरा पूरी तरह नंगी थीं। उनके हाथ ऊपर की तरफ मोटी लोहे की जंजीर से बंधे हुए थे। पैर भी फैलाकर फर्श पर लगे हुक्स से जकड़े गए थे। कमर में चमड़े का मोटा पट्टा कसा हुआ था जिससे सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था। उनकी गांड और जांघों पर पहले से ही लाल-नीले निशान थे। कमल उनके पीछे खड़ा था। उसके हाथ में चमड़े का चाबुक था।
“गिन।” कमल की आवाज ठंडी थी।
चाबुक हवा में लहराया और मीरा की गांड पर पड़ा। “एक…” मीरा ने हांफते हुए कहा।
दूसरा वार। “दो…”
तीसरा। “तीन… आह…”
कमल ने दस तक गिना। हर वार के साथ मीरा का शरीर लरज उठा। गांड पर लकीरें उभर आईं। कमल ने चाबुक फेंका और उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।
“बोल, तू क्या है?”
“तेरी… कुतिया…”
“जोर से।”
“मैं तेरी रांड हूं… तेरा लंड मेरा मालिक है… चाहे तो मार डाल…”
कमल हंसा। उसने अपना 8.5 इंच का मोटा लंड निकाला जो पहले से ही तनाव में खड़ा था। वह मीरा के सामने आया, उनके मुंह के पास लाया और बिना किसी चेतावनी के गले तक धंसा दिया। मीरा की आंखें फटी की फटी रह गईं। लार टपकने लगी। कमल ने दोनों हाथ उनके सिर पर रखे और मुंह की चुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ मीरा का गला भर जाता। आंसू बह रहे थे, लेकिन उन्होंने मुंह नहीं बंद किया।
पांच मिनट बाद कमल ने लंड निकाला। लार से लथपथ। उसने मीरा को जंजीरों से थोड़ा ढीला किया, लेकिन हाथ अभी भी बंधे थे। फिर उन्हें घुटनों के बल फर्श पर गिराया और पीछे से उनकी चुत में एक ही झटके में घुस गया।
“आह्ह्ह… फट गई…” मीरा चीखी।
कमल ने उनके बाल पकड़े और इतनी ताकत से धक्के मारे कि मीरा का माथा बार-बार फर्श से टकराने लगा। एक हाथ से वह उनके गले का पट्टा खींच रहा था। मीरा की सांसें उखड़ रही थीं। उनका चेहरा लाल हो चुका था।
“आज मैं तेरी दोनों छेद फाड़ दूंगा,” कमल ने कहा। “पहले चुत, फिर गांड। और तू मना मत करना।”
वह बिना रुके चोदता रहा। मीरा कई बार झड़ चुकी थीं। उनका रस जांघों से बहकर फर्श पर गिर रहा था। कमल अचानक रुका, लंड निकाला और उनकी गांड के छेद पर लगा दिया।
“नहीं… अभी… तैयार नहीं…” मीरा ने कमजोर आवाज में कहा।
कमल ने जवाब में उनके गाल पर जोरदार थप्पड़ जड़ा। “रंडी को इजाजत नहीं। खोल।”
उसने थूक लगाकर धीरे-धीरे लेकिन मजबूती से अपना लंड उनकी गांड में धंसाना शुरू किया। मीरा की चीख तहखाने में गूंज उठी। कमल रुकने वाला नहीं था। आधा लंड अंदर जाने के बाद उसने पूरा धंसा दिया और फिर धक्के लगाने लगा। एक हाथ से उनके बाल, दूसरे से गले का पट्टा।
“दर्द हो रहा है ना? अच्छा लगता है ना तुझे?”
मीरा सिर्फ कराह रही थीं। आंसू बह रहे थे, लेकिन उनके शरीर में कम्पन था—दर्द और मजे का मिलाजुला। कमल ने उन्हें जंजीरों से पूरी तरह खोल दिया, उठाया और दीवार से सटा दिया। अब वह उनकी गांड में ही चोद रहा था। मीरा के पैर उसके कंधों पर थे। पूरा वजन कमल के बाजुओं पर।
आयुष दरवाजे के पीछे से देख रहा था। उसका अपना लंड तन चुका था, लेकिन वह छू नहीं रहा था। सिर्फ देख रहा था—अपनी मां को एक मजदूर की पूरी तरह से गुलाम बनी हुई।
कमल ने आखिर में मीरा को फर्श पर पटक दिया। उन्हें पेट के बल लिटाया, घुटने मोड़े और फिर से गांड में घुस गया। इस बार उसने उनके दोनों हाथ पीछे बांध दिए और इतनी बर्बरता से चोदा कि मीरा की आवाज भी नहीं निकल पा रही थी। सिर्फ सिसकियां।
रात के दो बज चुके थे जब कमल ने अपना पानी उनकी गांड में छोड़ दिया। वह लंड अंदर ही रखे हुए बोला, “अब से हर रात तू यहां आएगी। जंजीरें तैयार रहेंगी। समझी?”
मीरा ने सिर हिलाया। “हां… मालिक…”
कमल ने उन्हें छोड़ा। मीरा जंजीरों के पास ही गिर गईं। शरीर पर पसीना, लार, रस और निशान। कमल ने पानी की बोतल उठाई, उनके मुंह में उड़ेल दी और खुद एक तरफ बैठ गया।
आयुष चुपचाप पीछे हटा और अपने कमरे में चला गया। उसका दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
अगली रात फिर वही। और उसके बाद की रात भी। कमल अब नई-नई चीजें लाने लगा था। कभी मोटी रस्सी जिससे वह मीरा को इतना
कसकर बांधता कि उनकी त्वचा में निशान पड़ जाते। कभी लोहे के क्लैंप जो उनकी निपल्स पर लगा देता और फिर खींचता। कभी मोमबत्ती जिससे गर्म मोम उनकी गांड और जांघों पर गिराता।
एक रात उसने मीरा को हवेली के पुराने घोड़े के अस्तबल में ले जाया। वहां उन्होंने उन्हें लकड़ी के तख्ते पर लिटाया, हाथ-पैर फैलाकर बांधे और फिर घंटों चोदा—कभी मुंह, कभी चुत, कभी गांड। बीच-बीच में चाबुक और थप्पड़। मीरा की आवाज अब सिर्फ “मालिक… और… फाड़ दो…” तक सिमट गई थी।
आयुष हर बार छिपकर देखता। कभी तहखाने से, कभी अस्तबल की खिड़की से, कभी कमल के कमरे के दरवाजे के पीछे से। वह जानता था कि अगर पकड़ा गया तो क्या होगा, लेकिन रुक नहीं पाता था।
एक रात कमल ने अचानक दरवाजा खोल दिया। आयुष वहीं खड़ा था। दोनों की नजरें मिलीं। कमल के चेहरे पर कोई हैरानी नहीं थी। उसने सिर्फ मुंह से इशारा किया—अंदर आ।
आयुष कांपते पैरों से अंदर गया। मीरा जंजीरों में लटक रही थीं। उनका शरीर पसीने और निशानों से चमक रहा था। कमल ने आयुष की तरफ देखा और बोला, “देखता रह। सीख। एक दिन तुझे भी अपनी मां को इसी तरह संभालना पड़ सकता है।”
फिर उसने मीरा के बाल पकड़े और आयुष के सामने ही उनकी गांड में घुस गया। इस बार धक्के पहले से भी ज्यादा बर्बर थे। मीरा चीख रही थीं, लेकिन उनकी आंखें आयुष पर टिकी थीं। शर्म नहीं, सिर्फ समर्पण।
कमल ने उस रात मीरा को पूरी तरह तोड़ दिया। आखिर में जब वह फर्श पर गिर गईं तो कमल ने आयुष से कहा, “अब तू जा। और जो देखा है, वही देखता रह। बोलने की जरूरत नहीं।”
आयुष निकल गया। लेकिन उसके बाद की रातें और भी अंधेरी हो गईं। कमल अब मीरा को सिर्फ रात में नहीं, कभी-कभी दोपहर में भी तहखाने में ले जाने लगा। हवेली के बाकी लोग या तो डर से चुप थे या अनजान बनते थे।
मीरा अब खुद ही शाम होते-होते काली नाइटी पहनकर तहखाने के दरवाजे के पास खड़ी हो जातीं। जंजीरें, चाबुक, क्लैंप—सब तैयार। कमल जब आता तो वे खुद घुटनों के बल बैठ जातीं और उसका लंड मुंह में ले लेतीं।
और आयुष? वह अब सिर्फ दर्शक नहीं रह गया था। वह हर रात वहीं खड़ा रहता—देखता, सुनता और अपने अंदर उठती हुई अजीब सी आग को महसूस करता। हवेली की दीवारें अब इन आवाजों की आदी हो चुकी थीं। और यह सिलसिला थमने वाला नहीं था।
कमल ने एक दिन मीरा से कहा था, “जब तक मैं चाहूं, तू मेरी रांड रहेगी। और तेरा बेटा देखता रहेगा। यही तेरी सजा है… और तेरा मजा भी।”
मीरा ने सिर झुकाया। “जैसी आपकी मर्जी, मालिक।”
और रात फिर गहरा गई। जंजीरें खनक उठीं। चाबुक हवा में लहराया। और हवेली के अंदर एक और क्रूर अध्याय शुरू हो गया।
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