जयपुर की एक ठंडी रात में अजनबी औरत ने युवक को अपने पंजे में जकड़ लिया। दर्द की लहरों, जकड़ी साँसों और बेबस शरीर के बीच वो रात गुलामी की नई परिभाषा बन गई। हर अगली मुलाकात और भी निर्दय।
दोस्तो, मेरा नाम रोहित है और मैं राजस्थान के जयपुर शहर का रहने वाला हूँ। उम्र 24 साल है, शरीर मजबूत और सांवला, कद 5’9″, और मेरा लंड 7.5″ लंबा और मोटा है। आज मैं आपको अपनी जिंदगी का सबसे क्रूर, सबसे बर्बर और सबसे तीव्र अनुभव बताने जा रहा हूँ। ये कहानी पढ़ने के बाद आप खुद को रोक नहीं पाएँगे।
ये बात ठंड के मौसम की है। दिसंबर की एक शाम। मैं अपने ऑफिस से निकलकर बाइक पर घर जा रहा था। रास्ते में एक महिला खड़ी थी। उसकी उम्र करीब 35 साल लग रही थी। गोरा रंग, लंबे काले बाल, तंग जींस और हाई हील्स। चेहरा तीखा, आँखें तेज, होंठ मोटे। उसने हाथ हिलाकर लिफ्ट माँगी। मैंने रोका।
“कहाँ जाना है?” मैंने पूछा।
“माल रोड की तरफ। देर हो गई है,” उसने कहा। आवाज में एक अजीब सी कड़वाहट थी।
मैंने उसे पीछे बिठाया। बाइक चलते ही उसकी जाँघें मेरी कमर से चिपक गईं। ठंडी हवा में उसकी साँस मेरे गले पर महसूस हो रही थी। कुछ देर बाद उसने कहा, “आज मेरा पति घर नहीं है। वो बाहर शहर गया है तीन दिन के लिए।”
मैं चुप रहा। तभी उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और मेरी जाँघ पर रखा। धीरे-धीरे ऊपर सरकाते हुए मेरे लंड को छुआ। मैंने ब्रेक मारा।
“क्या कर रही हो?”
वह हँसी। “डर गए? मुझे लगता है तुम भी अकेले हो।”
मैंने सोचा और बाइक फिर से चलाई। मैंने एक सस्ते होटल की तरफ रुख किया जो शहर के बाहर था। वहाँ पहुँचकर रूम लिया। नंबर 217। कमरा छोटा था, एक बिस्तर, एक कुर्सी, और एक बड़ी खिड़की जिस पर पर्दे नहीं थे।
अंदर जाते ही उसने दरवाजा बंद किया और ताला लगा दिया। फिर मुड़कर मेरी तरफ देखा। आँखों में एक भूख थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी थी।
“कपड़े उतारो,” उसने हुक्म दिया। आवाज में कोई नरमी नहीं थी।
मैंने शर्ट उतारी। उसने पास आकर मेरी छाती पर जोर से थप्पड़ मारा। दर्द से मैं पीछे हटा।
“जोर से!” उसने फिर मारा। बाईं छाती पर लाल निशान पड़ गया। फिर उसने मेरे बाल पकड़कर मेरे मुँह में अपनी उंगलियाँ ठूँस दीं। “चाटो इन्हें। गंदी कुतिया की तरह।”
मैंने चाटा। उसने उंगलियाँ गले तक धकेल दीं। मेरी आँखों से पानी निकलने लगा। फिर उसने मेरे बाल खींचकर मुझे घुटनों पर बैठा दिया।
“पेंट खोलो और अपना लंड निकालो।”
मैंने निकाला। वह खड़ी होकर मेरी तरफ देखती रही। फिर अचानक झुकी और मेरे लंड पर जोर से थप्पड़ मारा। दर्द से मेरा शरीर काँप गया। फिर उसने अपने दाँत से धीरे से काटा। खून नहीं निकला लेकिन दर्द तेज था।
“आज तुम मेरे कुत्ते हो,” उसने कहा। “जो कहूँगी करोगे। नहीं तो मैं तुम्हें यहाँ छोड़कर चली जाऊँगी और तुम्हारा नंबर पुलिस को दे दूँगी।”
मैंने सिर हिलाया।
उसने अपनी जींस उतारी। उसके नीचे कोई पेंटी नहीं थी। चूत चिकनी और गुलाबी थी। उसने मुझे खींचकर बिस्तर पर लिटाया। फिर मेरे ऊपर चढ़ गई और अपनी चूत मेरे मुँह पर बैठा दी।
“चाटो। गहराई तक। जीभ अंदर डालो।”
मैंने चाटा। उसने मेरे सिर को दोनों हाथों से दबाया। उसकी चूत मेरे नाक-मुँह पर पूरी तरह चिपक गई। साँस लेना मुश्किल हो गया। वह अपनी कमर घुमा रही थी। जब मैंने विरोध किया तो उसने मेरे बाल और जोर से खींचे।
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“रुको मत। चाटते रहो कुत्ते।”
पंद्रह मिनट तक वह मेरे मुँह पर बैठी रही। उसकी चूत से पानी मेरे गले में जा रहा था। फिर वह उठी और मेरे लंड पर बैठ गई। बिना किसी तैयारी के। एक झटके में पूरा लंड अंदर चले गया। दर्द और मजे का मिश्रण था।
वह ऊपर-नीचे होने लगी। जोर-जोर से। हर बार जब नीचे बैठती तो मेरे अंडे दब जाते। उसने मेरे गले पर हाथ रखा और दबाया। साँस रुकने लगी। आँखों के आगे अंधेरा छा गया। फिर उसने छोड़ दिया।
“अभी मत झड़ना,” उसने धमकी दी। “अगर झड़ गए तो मैं तुम्हारे लंड को काट दूँगी।”
वह उतर गई। फिर बिस्तर से एक बेल्ट निकाली जो उसके बैग में थी। उसने मुझे पेट के बल लिटाया और दोनों हाथ पीछे बाँध दिए। फिर बेल्ट से मेरी गांड पर जोरदार वार करने लगी।
एक… दो… तीन… दस। हर वार पर मेरी गांड जल रही थी। लाल हो गई थी। मैं चिल्लाया तो उसने मेरे मुँह में अपना कपड़ा ठूँस दिया।
“चुपचाप सहो।”
बीस वार के बाद उसने बेल्ट फेंक दी। फिर मेरे पीछे घुटनों के बल बैठी और अपनी उंगलियाँ मेरी गांड में धकेल दीं। दो उंगलियाँ। फिर तीन। दर्द तेज था। वह अंदर-बाहर कर रही थी।
“आज मैं तुम्हारी गांड फाड़ दूँगी,” उसने कहा।
फिर उसने अपना लंड जैसा कुछ नहीं, बल्कि अपनी मुट्ठी बनाने की कोशिश की। मैंने विरोध किया तो उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा।“
शांत रहो वरना और बुरा होगा।”
उसने लार लगाई और धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ बढ़ाईं। मेरी गांड फैल रही थी। दर्द असहनीय था लेकिन वह नहीं रुकी। आखिरकार चार उंगलियाँ अंदर चली गईं। वह उन्हें घुमा रही थी।
फिर वह उठी और मेरे लंड को हाथ में लेकर जोर-जोर से हिलाने लगी। दूसरी तरफ अपनी उंगलियाँ गांड में घुमाती रही। मैं झड़ने वाला था।
“अंदर मत निकालना,” उसने चेताया। “मेरे मुँह में डालना।”
जैसे ही मैं झड़ने लगा उसने अपना मुँह मेरे लंड पर लगा लिया। पूरा वीर्य उसके गले में चला गया। उसने निगल लिया। एक बूँद भी बाहर नहीं निकली।
फिर वह मुड़ी और मेरे मुँह के पास आई। “अब चाटो अपनी गंदगी।”
मैंने उसके मुँह से अपना वीर्य चाटा। कड़वा स्वाद था।
रात अभी शुरू ही हुई थी।
उसने मुझे खोल दिया लेकिन हाथ फिर से बाँध दिए। इस बार सामने से। फिर बिस्तर के पाये से बाँध दिया। मैं फैला हुआ था। उसने अपनी हाई हील्स उतारी और एक एड़ी मेरे अंडकोष पर रख दी। धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया।
“दर्द हो रहा है?”
मैंने सिर हिलाया।
“अच्छा लग रहा है न?” उसने और दबाव बढ़ाया।
फिर उसने एड़ी हटाई और मेरे लंड पर थूक कर फिर से चूसने लगी। इस बार दाँत लगाकर। दर्द और मजा एक साथ। जब लंड फिर से सख्त हो गया तो वह मेरे ऊपर चढ़ गई। इस बार पीठ के बल। उसने मेरे गले पर दोनों हाथ रख दिए और दबाते हुए चुदवाने लगी।
“चोदो मुझे। जोर से। मारो मुझे।”
मैं ऊपर की तरफ धक्के दे रहा था लेकिन हाथ बंधे होने के कारण पूरा जोर नहीं लगा पा रहा था। उसने खुद अपनी कमर को पागलों की तरह हिलाया। हर धक्के के साथ मेरे लंड पर बैठती और मेरे गले को और कसती।
अचानक उसने मेरा गला छोड़ दिया और मेरे चेहरे पर थप्पड़ मारने लगी। बाएँ-दाएँ। मेरे गाल जल रहे थे।
“और जोर से चोदो कुत्ते!”
मैंने कमर उठाई और जितना जोर लगा सका उतने धक्के दिए। उसकी चूत से आवाजें आ रही थीं। पानी बिस्तर पर फैल गया था।
फिर वह उतर गई। उसने मुझे घुमाया और गांड की तरफ किया। बेल्ट फिर से निकाली। इस बार गांड और जाँघों पर मारने लगी। तीस वार। मेरी गांड सूज गई थी।
फिर उसने अपने बैग से एक छोटी सी बोतल निकाली। लुब्रिकेंट। लगाकर अपनी तीन उंगलियाँ फिर से मेरी गांड में डाल दीं। इस बार और गहराई तक।
“आज तुम्हारी गांड मेरी है,” उसने कहा। “मैं जो चाहूँगी करूँगी।”
उंगलियाँ निकालकर उसने अपना एक अजीब सा खिलौना निकाला। काला, मोटा। उसने उसे मेरे मुँह में ठूँस दिया। “गीला करो।”
मैंने चाटा। फिर उसने उसे मेरी गांड में धकेलना शुरू किया। धीरे-धीरे। दर्द से मेरी आँखें बंद हो गईं। पूरा अंदर चला गया। उसने उसे अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया। साथ ही मेरे लंड को हाथ से हिला रही थी।
मैं फिर से झड़ने वाला था। उसने लंड छोड़ दिया और खिलौना जोर से अंदर धकेल दिया।
“अभी नहीं।”
पंद्रह मिनट तक वह मुझे इस तरह सताती रही। जब मैं लगभग बेहोश होने वाला था तब उसने खिलौना निकाला और मेरे ऊपर चढ़ गई। इस बार उसने मेरे हाथ खोल दिए।
“अब मुझे चोदो जैसे कुत्ते को चोदते हैं। कोई रहम नहीं।”
मैंने उसे पकड़ा। इस बार मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और जोर-जोर से धक्के देने लगा। हर धक्के के साथ उसकी चूत से आवाज आ रही थी। उसने अपने नाखून मेरी पीठ में गड़ा दिए। खून निकल आया।
मैंने उसके गले पर हाथ रखा और दबाया। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं लेकिन वह मुस्कुरा रही थी।
“और जोर से… मार डाल मुझे…”
मैंने जितना जोर लगा सका उतना दबाया और धक्के दिए। उसकी चूत कस रही थी। अचानक वह काँपने लगी और झड़ गई। पानी मेरे लंड और जाँघों पर फैल गया।
मैं रुका नहीं। मैंने उसे पेट के बल लिटाया और पीछे से फिर से घुसेड़ दिया। एक हाथ उसके बालों में और दूसरा उसकी गांड पर मारते हुए।
थप्पड़… थप्पड़… थप्पड़…
उसकी गांड लाल हो चुकी थी। मैंने लंड निकाला और उसकी गांड में ठेलना शुरू किया। लुब्रिकेंट की वजह से आसानी से चला गया। वह चिल्लाई लेकिन मैंने उसके मुँह में तकिया दबा दिया।
पूरा लंड अंदर। फिर जोर-जोर से धक्के। उसकी गांड फैल रही थी। मैंने दोनों हाथों से उसके कूल्हे पकड़कर अपने अंदर खींचे।
“ले कुतिया… ले…”
मैं झड़ने वाला था। मैंने पूछा नहीं। सीधा उसकी गांड के अंदर ही सब कुछ उड़ेल दिया। गरम वीर्य उसकी गांड में भर गया। कुछ बाहर निकलकर उसकी जाँघों पर बहने लगा।
मैं ऊपर गिर गया। दोनों हाँफ रहे थे।
लेकिन वह नहीं रुकी। पाँच मिनट बाद वह उठी और मेरे लंड को फिर से मुँह में ले लिया। गंदी गांड का स्वाद था लेकिन उसने चूसा। लंड फिर सख्त हो गया।
रात के दो बजे तक हम रुक नहीं पाए। उसने मुझे कुर्सी से बाँधा। मोमबत्ती जलाई और मेरे छाती पर मोम गिराया। जलन तेज थी। फिर उसने अपने एड़ी से मेरे लंड को कुचला। फिर खुद मेरे ऊपर बैठकर चुदवाई।
दोस्तो, वो सुबह सिर्फ शुरुआत थी। तीन दिन बाद ही उसका फोन आया। आवाज में वही कड़वाहट।
“आज रात दस बजे। वही होटल। रूम 217। देर मत करना। और इस बार नंगा आकर अंदर घुसना।”
मैं पहुँचा। दरवाजा खुला था। अंदर अंधेरा। सिर्फ एक मोमबत्ती जल रही थी। वह बिस्तर पर बैठी थी। पूरे शरीर पर काला चमड़े का कॉर्सेट, गर्दन में धातु का कॉलर, हाथों में लंबी दस्ताने। पैरों में नुकीली एड़ियाँ। हाथ में एक लंबी चमड़े की चाबुक।
जैसे ही मैं अंदर घुसा उसने चाबुक फटकारा। हवा में आवाज गूंजी।
“दरवाजा बंद कर। ताला लगा। फिर घुटनों पर बैठ।”
मैंने वैसा ही किया। उसने पास आकर मेरे बाल पकड़े और मुँह में अपनी एड़ी ठूँस दी।
“चाट। गंदी कुतिया की तरह साफ कर।”
मैंने चाटा। ठंडी धातु और पसीने का स्वाद। फिर उसने एड़ी निकाली और मेरे गले पर कॉलर जैसा चमड़े का पट्टा कस दिया। साँस लेने में तकलीफ होने लगी।
“आज तुम बोल नहीं सकते। सिर्फ सह सकते हो।”
उसने मुझे बिस्तर पर पेट के बल लिटाया। दोनों हाथ और पैर रस्सी से बाँध दिए। फिर चाबुक उठायी।
पहला वार पीठ पर पड़ा। जलन तेज। दूसरा वार गांड पर। तीसरा जाँघों पर। वह गिनती नहीं कर रही थी। बस मारती जा रही थी। बीस… तीस… चालीस। मेरी पीठ और गांड आग की तरह जल रही थी। खून की छोटी-छोटी लकीरें उभर आईं।
फिर उसने चाबुक फेंका और अपने बैग से धातु के क्लैम्प्स निकाले। दोनों निप्पल्स पर लगा दिए। जकड़ इतनी तेज थी कि आँखों से पानी बहने लगा। फिर एक क्लैम्प मेरे अंडकोष पर भी लगा दिया। दर्द दिमाग तक पहुँच गया।
“अब चुपचाप लेटे रहो।”
वह मेरे ऊपर चढ़ गई। अपनी चूत मेरे मुँह पर बैठा दी। इस बार और जोर से दबाया। नाक बंद हो गई। साँस नहीं आ रही थी। वह अपनी कमर घुमाती रही। जब मैं छटपटाने लगा तो उसने और दबाया।
“मरने वाला है तो मर जा। लेकिन चाटना मत छोड़।”
दस मिनट बाद उसने मुँह हटाया। मैं हाँफ रहा था। फिर उसने लुब्रिकेंट लगाकर एक मोटा काला डिल्डो निकाला। पहले मेरे मुँह में ठूँसा। गले तक। फिर निकाला और सीधे मेरी गांड में धकेल दिया। एक झटके में आधा अंदर।
मैं चिल्लाया लेकिन आवाज नहीं निकली क्योंकि उसने मेरा मुँह बंद कर रखा था। पूरा डिल्डो अंदर चला गया। वह उसे अंदर-बाहर करने लगी। जोर-जोर से। साथ ही क्लैम्प्स को खींचती रही।
अचानक उसने डिल्डो अंदर ही छोड़ दिया और अपना लंड जैसा कुछ नहीं, बल्कि खुद मेरे ऊपर बैठ गई। पीछे की तरफ। गांड में डिल्डो और चूत में मेरा लंड। दोनों साथ।
वह पागलों की तरह उछलने लगी। हर बार जब नीचे बैठती तो डिल्डो और गहराई तक चला जाता। क्लैम्प्स झूल रहे थे। दर्द और मजे का मिश्रण असहनीय था।
“झड़ मत जाना कुत्ते। वरना कल रात और बुरा होगा।”
मैं नियंत्रण खो रहा था। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले का पट्टा और कस दिया। साँस लगभग बंद। उसी पल वह झड़ गई। उसकी चूत ने मेरे लंड को जकड़ लिया। पानी की धार निकलने लगी।
मैं भी नहीं रोक पाया। उसके अंदर ही सब कुछ उड़ेल दिया। लेकिन वह रुकी नहीं। डिल्डो निकाले बिना वह फिर से हिलने लगी। मेरा लंड अभी भी अंदर था। संवेदनशीलता चरम पर। दर्द शुरू हो गया।
“आज तुम दो बार झड़ोगे। जबरदस्ती।”
उसने क्लैम्प्स खोले। खून रुकने जैसा अहसास हुआ फिर तेज दर्द। फिर उसने मुझे खोल दिया लेकिन सिर्फ इसलिए कि मुझे कुर्सी पर बैठा सके। हाथ पीछे बाँधे। पैर फैलाए। फिर मोमबत्ती ली और मेरे लंड पर सीधा मोम गिराना शुरू कर दिया।
गर्म मोम लंड पर चिपक रहा था। जलन पागल कर देने वाली। फिर उसने मोम के ऊपर से ही मुँह में ले लिया और दाँत लगाकर चूसने लगी। मोम और लार मिलकर बह रहे थे।
रात के तीन बजे तक वह थकी नहीं। उसने मुझे फर्श पर लिटाया। अपना पैर मेरे गले पर रखा और दबाते हुए खुद हस्तमैथुन करने लगी। जब झड़ी तो अपना पानी मेरे मुँह में गिरा दिया।
“पी जा। एक बूँद भी मत गिरा।”
मैंने पिया।
सुबह जब वह जा रही थी तो मेरे शरीर पर एक इंच जगह भी बिना निशान के नहीं बची थी। पीठ, गांड, छाती, जाँघें सब लाल और सूजे हुए।
दरवाजे पर खड़ी होकर उसने कहा, “अगली बार जंगल में मिलेंगे। वहाँ कोई नहीं सुनेगा तुम्हारी चीखें। और इस बार मैं तुम्हें पूरे बारह घंटे बाँधकर रखूँगी। खाना नहीं, पानी नहीं। सिर्फ मेरा इस्तेमाल।”
फोन रख दिया।
दोस्तो, उसके बाद जो हुआ वो और भी बर्बर था। लेकिन वो कहानी अगली बार। अभी सिर्फ इतना समझ लो कि उस रात के बाद मेरा शरीर उसका गुलाम हो चुका था। और मैं खुद इसे रोकना नहीं चाहता था।
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