कबीर-निशा पार्ट 8

प्रोफेसर अंदर बात कर रहे थे। दरवाज़े के पीछे खड़ा कबीर। निशा ने गांड में बर्फ के टुकड़े धकेलते हुए उसे चुपचाप ठंडा किया। हर टुकड़े पर बदन काँपता रहा, फिर भी वो हिला नहीं chut fad story ।

कबीर-निशा पार्ट 7 chut fad story

सुबह सात बजते ही मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर खड़ा था। कल मोम की जलन अभी भी अंडकोष पर बाकी थी। चलते समय हल्का दर्द उठता था। फिर भी घंटी दब गई।
निशा ने दरवाज़ा खोला। आँखों में वही शांत लेकिन गहरी भूख थी। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“प्रोफेसर स्टडी टेबल पर बैठकर काम कर रहे हैं। तुम टेबल के नीचे बैठोगे। मैं तुम्हारे लंड पर सुई की नोक से हल्के-हल्के रेखाएँ खींचती रहूँगी। अगर एक भी बार हिले तो और गहराई तक चुभा दूँगी।”

वे मुझे ऊपर ले गईं। स्टडी रूम में प्रोफेसर टेबल पर झुके हुए किताबें और कागज़ देख रहे थे। टेबल बड़ी और भारी थी। निशा ने मुझे टेबल के नीचे धीरे से धकेला। जगह तंग थी। मैं घुटनों के बल सिकुड़कर बैठ गया। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप कस दिया।
निशा ने एक पतली चमकदार सुई निकाली। मेरे लंड को सीधा पकड़ा और नोक को सिरे के पास रखा। बहुत हल्के से त्वचा पर रेखा खींचनी शुरू की। पहली लकीर पतली और सतही थी। हल्की जलन हुई। निशा दूसरी लकीर खींचने लगीं—लंबी, सीधी। फिर तीसरी। वे बहुत धीरे और सावधानी से खींच रही थीं ताकि खून न निकले, सिर्फ जलन हो।

प्रोफेसर के पैर मेरे सिर के पास थे। उनकी कलम की आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। निशा लकीरें खींचती रहीं। लंड के ऊपर, नीचे, साइड में। छोटी-छोटी लाल रेखाएँ बनने लगीं। जलन बढ़ रही थी। मैंने खुद को पूरी तरह स्थिर रखा।
अचानक प्रोफेसर ने कुर्सी खिसकाई। उनका पैर मेरे कंधे से छू गया। मेरी साँस रुक गई। निशा ने सुई की नोक को थोड़ा और दबा दिया। एक लकीर थोड़ी गहरी हो गई। हल्का खून निकला। निशा ने फुसफुसाकर कहा,
“हिले मत।”

प्रोफेसर वापस लिखने लगे। निशा ने फिर से हल्की लकीरें खींचनी शुरू कर दीं। अब वे लंड के सबसे संवेदनशील हिस्से पर ध्यान दे रही थीं। नोक घुमाते हुए छोटी-छोटी वक्र रेखाएँ बना रही थीं। जलन तेज़ हो गई थी। आँखों से आँसू बहने लगे। टेप के किनारे थूक निकल रहा था।
लगभग पैंतीस मिनट बीत चुके होंगे। लंड पर दर्जनों पतली लाल रेखाएँ छा चुकी थीं। कुछ जगहों पर हल्का खून जम रहा था। निशा ने सुई की नोक को एक जगह रोक दिया और हल्का दबाव बढ़ाया। नोक त्वचा में थोड़ी धँस गई। दर्द तेज़ हो गया। मैंने सिसका लेकिन आवाज़ दब गई।

निशा ने कई और गहरी लकीरें खींचीं। अब खून की पतली धारें टपकने लगी थीं। वे जानबूझकर उन जगहों पर नोक फेर रही थीं जहाँ पहले से लकीरें थीं। दर्द दोबारा तेज़ हो रहा था। प्रोफेसर ने अचानक अखबार उठाया। पन्ने पलटने की आवाज़ आई। निशा ने सुई को और गहराई तक दबा दिया। एक छोटी सी चुभन हुई। मैंने दाँत भींच लिए।

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एक घंटे के करीब निशा रुकीं। लंड पूरी तरह लाल रेखाओं और छोटे खून के निशानों से भरा था। निशा ने सुई रख दी। फिर उन्होंने मेरे लंड को पकड़ा और धीरे-धीरे मसलना शुरू किया। रेखाओं पर उंगली फिरने से नई जलन होती। दर्द और उत्तेजना एक साथ मिल रहे थे।
“इसी जलन के साथ निकालो,” निशा ने फुसफुसाया। “बिना हिले।”

उनकी हथेली तेज़ हो गई। शरीर में लहर दौड़ी। मैं काँप रहा था लेकिन जगह से नहीं हिला। अचानक वीर्य निकलने लगा—रेखाओं और खून के ऊपर। निशा ने उसे अपने हाथ में लिया और मेरे चेहरे पर मल दिया। फिर टेप हटाया।
“चाटो।”
मैंने चाटा। निशा ने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ सुन्न थे। लंड पर लकीरें और जलन साफ दिख रही थी। निशा ने हल्के से छुआ तो नई दर्द की लहर उठी।

“आज सुई से खूब लकीरें खींचीं,” निशा ने कहा। “कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बेडरूम के दरवाज़े के पीछे खड़ा रखूँगी। जब वो अंदर बात कर रहे होंगे, मैं तुम्हारे गांड में बर्फ का टुकड़ा धकेलती रहूँगी। और अगर हिले तो और बड़ा टुकड़ा डाल दूँगी।”
मैं लड़खड़ाते हुए टेबल के नीचे से निकला। पैर काँप रहे थे। लंड पर हर हल्की छुअन जलन पैदा कर रही थी। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।

दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके स्वर में वही गहरी भूख थी।
“कबीर… तुम्हारे लंड पर आज खूब लकीरें बन गईं। कल बर्फ अंदर तक जाएगी।”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम पर लंड में जलन उठ रही थी। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल दरवाज़े के पीछे, बर्फ का टुकड़ा, और निशा की वह चुपचाप सज़ा chut fad story ।
सुबह सात बजते ही मैं फिर उस घर के दरवाज़े पर खड़ा था। कल सुई की लकीरों की जलन अभी भी लंड पर बाकी थी। कपड़ा छूते ही हल्की जलन होती। फिर भी घंटी दब गई।

निशा ने दरवाज़ा खोला। आँखों में वही शांत लेकिन गहरी भूख थी। उन्होंने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“प्रोफेसर बेडरूम में हैं। तुम दरवाज़े के ठीक पीछे खड़े रहोगे। मैं तुम्हारी गांड में बर्फ का टुकड़ा धकेलती रहूँगी। अगर एक भी बार हिले तो और बड़ा टुकड़ा डाल दूँगी।”

वे मुझे ऊपर ले गईं। बेडरूम का दरवाज़ा आधा खुला था। अंदर प्रोफेसर किसी से फोन पर बात कर रहे थे। आवाज़ साफ सुनाई दे रही थी। निशा ने मुझे दरवाज़े के पीछे की दीवार से सटा दिया। जगह इतनी कम थी कि मेरी पीठ ठंडी दीवार से चिपक गई। निशा ने मुझे नंगा किया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप कस दिया।
निशा ने फ्रिज से लाया छोटा बर्फ का टुकड़ा निकाला। मेरे गांड के दोनों हिस्से फैलाए और ठंडे टुकड़े को मुहाने पर रखा। ठंडक तुरंत अंदर तक पहुँची। उन्होंने धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया। बर्फ अंदर सरकती गई। ठंडक इतनी तेज़ थी कि शरीर काँप उठा। निशा ने टुकड़े को और अंदर धकेल दिया। अब वह पूरी तरह अंदर था। ठंडक फैल रही थी।

प्रोफेसर अंदर फोन पर बात कर रहे थे। उनकी आवाज़ साफ आ रही थी। निशा ने दूसरा छोटा टुकड़ा लिया और पहले वाले के पीछे धकेल दिया। अब दो टुकड़े अंदर थे। ठंडक बढ़ गई। गांड सिकुड़ रही थी लेकिन बर्फ पिघलने से पानी भी निकल रहा था। निशा ने तीसरा टुकड़ा भी धकेल दिया। अब ठंडक असहनीय हो चली थी। आँखों से आँसू बहने लगे।

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अचानक प्रोफेसर की आवाज़ करीब आई। वे दरवाज़े की तरफ बढ़ रहे थे। निशा ने मुझे और दीवार से सटा दिया। मेरी साँस रुक गई। प्रोफेसर दरवाज़े के पास आकर बात जारी रखी। उनकी आवाज़ बस एक फुट दूर थी। निशा ने उसी समय एक और बड़ा बर्फ का टुकड़ा जोर से धकेल दिया। ठंडक की तेज़ लहर दौड़ी। मैंने सिसका लेकिन आवाज़ दब गई। प्रोफेसर वापस अंदर चले गए।

निशा ने अब बड़े टुकड़े इस्तेमाल करने शुरू कर दिए। एक के बाद एक। हर टुकड़ा पहले से बड़ा था। गांड फैल रही थी। ठंडक अंदर तक फैलकर पेट तक पहुँच रही थी। बर्फ पिघलकर टाँगों से बह रहा था। निशा जानबूझकर रुक-रुककर धकेलतीं ताकि ठंडक और देर तक रहे। शरीर काँप रहा था लेकिन मैंने खुद को स्थिर रखा।
लगभग पैंतालीस मिनट बीत चुके होंगे। गांड में अब कई टुकड़े पिघल चुके थे और पानी की धारा बह रही थी। ठंडक सुन्न करने लगी थी लेकिन नई बूँदें फिर जलन पैदा करतीं। निशा ने एक बहुत बड़ा टुकड़ा लिया। मुहाना पहले से खुला था। उन्होंने जोर लगाकर उसे अंदर धकेल दिया। ठंडक इतनी तेज़ थी कि मेरी आँखें बंद हो गईं। आँसू और थूक टेप के किनारे बह रहे थे।

प्रोफेसर ने फोन रखा। कमरे में सन्नाटा हो गया। निशा ने मौके का फायदा उठाया और एक और बड़ा टुकड़ा धकेल दिया। अब गांड पूरी तरह ठंडी और खुली हुई थी। निशा ने अपना हाथ अंदर भेजा और पिघलते बर्फ को और गहराई तक धकेला। ठंडक हड्डी तक उतर रही थी।
निशा ने मेरे लंड को पकड़ा। वह ठंडक के बावजूद तना हुआ था। उन्होंने उसे जोर से मसलना शुरू किया। गांड में ठंडक और लंड का मसाज एक साथ चल रहा था। शरीर में अजीब सी लहर दौड़ने लगी।
“इसी ठंडक के साथ निकालो,” निशा ने फुसफुसाया। “बिना हिले।”

उनकी हथेली तेज़ हो गई। मैं काँप रहा था लेकिन दीवार से चिपका रहा। अचानक वीर्य निकलने लगा। निशा ने उसे अपने हाथ में लिया और मेरे चेहरे पर मल दिया। फिर टेप हटाया।
“चाटो।”
मैंने चाटा। निशा ने हाथ की रस्सी खोली। मेरे हाथ सुन्न थे। गांड से ठंडा पानी अभी भी रिस रहा था। ठंडक अंदर तक बनी हुई थी। निशा ने हल्के से छुआ तो नई लहर उठी।

“आज बर्फ खूब अंदर गई,” निशा ने कहा। “कल सुबह सात बजे आना। अगली बार मैं तुम्हें उनके बाथरूम के आईने के सामने खड़ा रखूँगी। जब वो नहा रहे होंगे, मैं तुम्हारे निपल्स पर गरम चम्मच से दबाव डालती रहूँगी। और अगर हिले तो और गरम चम्मच लगा दूँगी।”
मैं लड़खड़ाते हुए दरवाज़े के पीछे से निकला। पैर काँप रहे थे। गांड में ठंडक और खुलापन अभी भी बाकी था। सीढ़ियों से नीचे उतरना मुश्किल हो रहा था।
दरवाज़े पर निशा ने मुझे रोका। उनके स्वर में वही गहरी भूख थी।
“कबीर… तुम्हारी गांड आज खूब ठंडी हो गई। कल गरम चम्मच से जलाएँगे।”

मैंने सिर हिलाया। निशा ने दरवाज़ा खोला। मैं गली में निकल आया। सुबह की रोशनी में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम पर गांड में ठंडक का अहसास बाकी था। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल आईने के सामने, गरम चम्मच, और निशा की वह चुपचाप सज़ा।
अब ये सिलसिला एक साँस की तरह जरूरी बन चुका था। हर दिन नया खतरा, नया दर्द। और मैं खुद को उससे दूर करने की बजाय और गहराई में उतरता जा रहा था।

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