42 साल की शादीशुदा औरत

42 साल की शादीशुदा औरत को एक जवान लड़के ने स्कूटी पर ही जकड़ लिया। कमरे में रस्सी, कोड़ा और गर्म मोम से उसकी रातें तोड़ दीं। हर साँस दर्द और मजबूर उत्तेजना से भरी थी milf porn stories ।

शाम के पाँच बजे थे। बेंगलुरु की सड़कों पर गर्मी अभी भी बाकी थी, लेकिन हवा में हल्की नमी थी। 42 साल की स्वाती शर्मा अपनी काली स्कूटी पर बैठी थी। जिम से निकलते समय उसने सिर्फ एक छोटा सा गहरा लाल क्रॉप टॉप पहना था, जो उसकी भारी, गोल और बड़ी छातियों को कसकर दबाए हुए था। नीचे एक टाइट ब्लैक लेगिन्स थी, जो उसकी मोटी जाँघों और गोल, भारी गाँड को साफ उभार रही थी। उसकी कमर पतली थी, लेकिन कूल्हे चौड़े। चेहरे पर हल्की पसीने की चमक थी और बाल खुले थे।

उसने स्कूटी स्टार्ट की ही थी कि एक लंबा, गोरा और मजबूत शरीर वाला लड़का उसके पास आया। उम्र करीब 22 साल। जीन्स और सफेद टी-शर्ट में। चेहरे पर मासूम मुस्कान, लेकिन आँखों में कुछ और था।
“मैडम, नमस्ते। मेरा नाम कबीर है। मेरे हॉस्टल जाने का रास्ता बंद हो गया है। क्या आप मुझे थोड़ी दूर तक लिफ्ट दे सकती हैं? सिर्फ 8 किलोमीटर।”
स्वाती ने उसे देखा। लड़का साफ-सुथरा लग रहा था। उसने सोचा, बेचारा है। “ठीक है, बैठ जाओ।”

कबीर पीछे बैठ गया। शुरू में वह थोड़ी दूरी बनाए हुए था, लेकिन जैसे ही ट्रैफिक बढ़ा, उसकी जाँघें स्वाती की गाँड से सटने लगीं। स्वाती ने कुछ नहीं कहा।
कुछ देर बाद कबीर ने धीरे से कहा, “मैडम, आपकी बॉडी बहुत टाइट है। जिम जाती हैं न?”
स्वाती मुस्कुराई, “हाँ।”
“आप दिखने में इतनी जवान लगती हैं। कोई विश्वास नहीं करेगा कि आपकी उम्र 40 पार है।”

बातें चलती रहीं। अचानक स्कूटी को ब्रेक लगा तो कबीर का पूरा शरीर स्वाती की पीठ से चिपक गया। उसके दोनों हाथ स्वाती के कंधों पर आ गए और नहीं हटे।
“सॉरी मैडम,” उसने कहा, लेकिन हाथ वहीं रहे। फिर धीरे-धीरे वे हाथ उसकी बाहों पर फिसल गए, फिर कमर पर।
स्वाती ने सिर घुमाकर देखा, “क्या कर रहे हो?”
कबीर ने उसके कान में फुसफुसाया, “गिरने का डर है। और आपकी खुशबू… जिम के बाद भी इतनी तेज है।”
उसकी गर्माहट वाली साँस से स्वाती के शरीर में कंपन हो गया। कबीर ने उसकी गर्दन पर हल्की सी जीभ फेर दी।

“रुको… यह गलत है,” स्वाती ने कहा।
“गलत क्या है?” कबीर की आवाज अब ठंडी और दबाव वाली हो गई थी। “तुम जैसी माल सड़क पर घूम रही हो, टाइट कपड़ों में, और हमें लिफ्ट दे रही हो। हम सेवा न करें तो क्या करें?”
उसने एक हाथ आगे बढ़ाया और सीधे स्वाती की बड़ी छाती पर रख दिया। जैकेट नहीं थी, सिर्फ क्रॉप टॉप। उसने जोर से दबाया। स्वाती की साँस अटक गई।
“छोड़ो… ट्रैफिक में…”

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“कोई नहीं सुन रहा,” कबीर ने कहा और टॉप को ऊपर की ओर खींच दिया। उसकी बड़ी, गोल चूचियाँ बाहर आ गईं। कबीर ने एक को मुट्ठी में भरकर मसलना शुरू कर दिया। निप्पल कड़े हो चुके थे। उसने उन्हें उंगलियों से दबाया, खींचा।
स्वाती दर्द से कराह उठी, “आह… धीरे…”
“दर्द में ही मजा है,” कबीर ने कहा और दूसरा हाथ उसकी जाँघ के अंदर घुसा दिया। लेगिन्स के ऊपर से ही उसने उसकी चूत को दबाया।
ट्रैफिक जाम में स्कूटी लगभग रुकी हुई थी। कबीर ने स्वाती की कमर कसकर पकड़ी और अपना लंड उसकी गाँड की दरार में रगड़ने लगा। कपड़ों के ऊपर से ही वह सख्त हो चुका था।

“मेरे कमरे चलो,” उसने आदेश दिया। “नहीं तो यहीं सड़क पर तुम्हारी गाँड फाड़ दूँगा।”
स्वाती का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। डर और अजीब उत्तेजना दोनों एक साथ। उसने चुपचाप स्कूटी मोड़ ली। कबीर ने रास्ता बताया। रास्ते भर उसने उसकी चूचियाँ मसलते रहे, निप्पल्स को मरोड़ा, गर्दन चाटी।
हॉस्टल के पीछे एक अलग कमरा था। कबीर ने दरवाजा खोला और स्वाती को अंदर घसीट लिया। दरवाजा बंद होते ही उसने उसे दीवार से धक्का दिया।

“कपड़े उतार,” उसने हुक्म दिया।
स्वाती काँप रही थी। “मैं… मैं शादीशुदा हूँ…”
कबीर हँसा, “और बेहतर। पति की बीवी को चोदूँगा।”
उसने खुद उसके क्रॉप टॉप को फाड़ दिया। चूचियाँ झूलने लगीं। फिर लेगिन्स को नीचे खींचकर फेंक दिया। स्वाती पूरी नंगी खड़ी थी। बड़ी छातियाँ, मोटी जाँघें, गोल गाँड और बीच में घनी काली झाड़ियाँ।
कबीर ने उसे बिस्तर पर धकेला। “घुटनों के बल बैठ।”

स्वाती ने इनकार किया तो उसने उसके बाल पकड़कर जबरदस्ती बैठा दिया। फिर अपनी पैंट खोली। उसका लंड मोटा, लंबा और सख्त बाहर निकला। उसने उसे स्वाती के मुँह में ठूंस दिया।
“चूसो। गहराई से।”

स्वाती की आँखों में आँसू आ गए। कबीर ने उसके सिर को दबाकर लंड को गले तक घुसाया। स्वाती ने गैग किया, लेकिन कबीर नहीं रुका। वह उसके मुँह में जोर-जोर से हिला रहा था। थूक बहने लगा।
थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला और स्वाती को पीठ के बल लिटा दिया। उसके पैर फैलाए और बिना किसी तैयारी के अपना मोटा लंड उसकी चूत में धकेल दिया।
“आआाहह… दर्द… निकल…” स्वाती चिल्लाई।
कबीर ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। “चिल्ला मत। मजा ले।”

वह जोर-जोर से धक्के मारने लगा। हर धक्के पर स्वाती की बड़ी चूचियाँ हिल रही थीं। कबीर ने उन्हें पकड़कर मसलना शुरू कर दिया, निप्पल्स को दाँतों से काटा।
“तेरी चूत कितनी टाइट है… 42 साल की होकर भी।”
वह और तेज होने लगा। बिस्तर चरमरा रहा था। स्वाती रो रही थी, लेकिन उसका शरीर प्रतिक्रिया दे रहा था। चूत गीली हो चुकी थी।
कबीर ने अचानक लंड निकाला और उसे पलट दिया। “गाँड उठा।”

स्वाती ने मना किया तो उसने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और एक जोर का थप्पड़ उसकी गाँड पर मारा। लाल निशान पड़ गया। फिर उसने थूक लगाकर अपना लंड उसकी गाँड की छेद में धकेलना शुरू किया।
“नहीं… वहाँ नहीं… दर्द होगा…”
कबीर ने और जोर लगाया। आधा लंड घुस गया। स्वाती चीख पड़ी। कबीर ने उसके मुँह में कपड़ा ठूंस दिया और पूरा लंड अंदर धकेल दिया। फिर जोर-जोर से गांड मरने लगा। हर धक्के पर स्वाती का शरीर आगे-पीछे हो रहा था।
“तेरी गाँड भी टाइट है… पति ने कभी नहीं मारी होगी।”

वह एक हाथ से उसकी चूत में उंगलियाँ घुसा रहा था, दूसरे से चूची मसल रहा था। थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला और फिर चूत में डाल दिया। अब वह दोनों छेदों में बारी-बारी से घुस रहा था।
स्वाती का शरीर काँप रहा था। दर्द और मजे का मिश्रण। कबीर ने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया और कान में कहा, “अब से जब भी बुलऊँगी, तू आएगी। समझी?”

स्वाती ने सिर हिलाया।
कबीर और बर्बर हो गया। उसने स्वाती को कुत्ते की तरह घुमाया, गाँड पर थप्पड़ मारे, चूचियों को मरोड़ा, गर्दन काटी। उसने उसके हाथ पीछे बाँध दिए और बिना रुके चोदता रहा।
अंत में उसने अपनी गाड़ी चूत के अंदर ही छोड़ दी। गर्म वीर्य अंदर भर गया। फिर उसने लंड निकालकर उसके मुँह में ठूंस दिया। “चाट। साफ कर।”
स्वाती ने आँसू भरी आँखों से उसके लंड को चाटा।

कबीर बिस्तर पर बैठ गया। “अब जा सकती है। लेकिन याद रखना, अगली बार और सख्त होगा।”
स्वाती ने अपने फटे कपड़े समेटे। शरीर दर्द से भरा हुआ था, चूत और गाँड दोनों जल रहे थे। वह काँपते हुए बाहर निकली।
बाहर अंधेरा हो चुका था। उसने स्कूटी स्टार्ट की। शरीर में दर्द था, लेकिन मन में एक अजीब खालीपन और डर दोनों। कबीर का नंबर उसके फोन में सेव हो चुका था। वह जानती थी, यह सिर्फ शुरुआत है।

रात भर उसकी नींद नहीं आई। हर बार आँख बंद करते ही कबीर का चेहरा, उसके हाथ, उसके धक्के याद आ जाते। सुबह जब उसने आईना देखा तो गर्दन पर काटने के निशान, चूचियों पर नीले दाग और गाँड पर थप्पड़ों के निशान साफ दिख रहे थे।
उसने पति को मैसेज किया कि ऑफिस में देर हो जाएगी। फिर कबीर का मैसेज आया:
“आज शाम 7 बजे उसी कमरे में। और कोई लेट नहीं। वरना तेरे घर तक आऊँगा।”

स्वाती ने फोन देखा। उंगलियाँ काँप रही थीं। उसने जवाब नहीं दिया, लेकिन मन में जानती थी कि वह जाएगी। क्योंकि अब उसके पास कोई विकल्प नहीं बचा था।
शाम को वह फिर उसी कमरे के बाहर खड़ी थी। दरवाजा खुला। कबीर अंदर बैठा था। उसके हाथ में रस्सी और एक काला कपड़ा था।
“अंदर आ। आज की रात लंबी होने वाली है।”

दरवाजा बंद होते ही कबीर ने स्वाती को बालों से पकड़कर अंदर घसीट लिया। कमरे में सिर्फ एक कमजोर बल्ब जल रहा था। बिस्तर के किनारे रस्सियाँ, काला कपड़ा, एक मोटी बेल्ट और कुछ मोटे मोमबत्तियाँ रखी थीं।
“कपड़े उतार। एक सेकंड भी मत लगा,” कबीर की आवाज ठंडी और हुक्म वाली थी।
स्वाती के हाथ काँप रहे थे। उसने अपना टॉप और लेगिन्स उतारे। शरीर पर कल के नीले-लाल निशान साफ दिख रहे थे। कबीर ने उसे घूरते हुए कहा, “आज और गहरा निशान छोड़ूँगा।”

उसने काला कपड़ा उठाया और स्वाती की आँखों पर कसकर बाँध दिया। फिर उसके दोनों हाथ पीछे करके मोटी रस्सी से बाँध दिए। रस्सी इतनी कस थी कि कलाईयाँ जलने लगीं।
“घुटनों के बल,” उसने आदेश दिया।

स्वाती घुटनों के बल बैठ गई। कबीर ने अपनी पैंट खोली और मोटा, सख्त लंड उसके मुँह के सामने लाया। “खोल।”
जैसे ही स्वाती ने मुँह खोला, उसने पूरा लंड गले तक ठूंस दिया। स्वाती ने गैग किया, आँसू बहने लगे, लेकिन कबीर ने उसके सिर को दोनों हाथों से पकड़कर और जोर से धकेलना शुरू कर दिया। हर धक्के पर लंड गले में समा जाता, थूक बहकर छाती पर गिरता।
“चूस। और गहरा। तेरे पति ने कभी इतना नहीं भरा होगा मुँह,” कबीर गुर्राया।

वह लगभग दस मिनट तक उसके मुँह को बर्बर तरीके से इस्तेमाल करता रहा। फिर अचानक लंड निकाला और स्वाती को बिस्तर पर धकेल दिया। आँखें बँधी, हाथ बँधे। कबीर ने उसके पैर फैलाए और बिना किसी चेतावनी के अपना लंड उसकी अभी भी सूजी हुई चूत में जोर से धकेल दिया।
“आआाहह… दर्द… निकल…” स्वाती चिल्लाई।

कबीर ने उसके मुँह पर हाथ रख दिया। “चिल्ला। और जोर से चिल्ला। कोई नहीं आएगा।”
वह जानवर की तरह धक्के मारने लगा। हर धक्के पर स्वाती का शरीर आगे खिसकता, चूचियाँ हिलतीं। कबीर ने एक हाथ से उसकी एक चूची पकड़ी और निप्पल को उंगलियों से मरोड़ते हुए खींचा। दर्द से स्वाती का शरीर ऐंठ गया।
थोड़ी देर बाद उसने लंड निकाला और बेल्ट उठाई। “गाँड ऊपर कर।”

स्वाती ने धीरे से गाँड उठाई। कबीर ने बेल्ट को हवा में घुमाया और जोर का वार उसकी बाईं गाँड पर मारा। चमड़ी पर तुरंत लाल निशान उभर आया। फिर दाईं तरफ। फिर बीच में। हर वार पर स्वाती चीखती, शरीर काँपता। दस-बारह वार के बाद उसकी गाँड जल रही थी, सूज रही थी।
कबीर ने थूक लगाकर अपना लंड उसकी गाँड की छेद पर लगाया। “अब अंदर जाएगा। पूरा।”

उसने जोर लगाया। आधा लंड घुसते ही स्वाती ने जोर से चीख मारी। कबीर ने रुकने की बजाय और जोर से धकेल दिया। पूरा लंड उसकी गाँड में समा गया। फिर वह बर्बर गति से गांड मारने लगा। हर धक्के पर स्वाती का शरीर लड़खड़ाता, आँसू कपड़े को गीला कर देते।
“तेरी गाँड कितनी गरम है… कस रही है मेरे लंड को,” कबीर हँसते हुए बोला। उसने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और जोर-जोर से दबाने लगा।

उसने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम की कुछ बूँदें स्वाती की पीठ पर गिराईं। फिर चूचियों पर। फिर निप्पल्स पर। गर्म मोम लगते ही स्वाती ने जोर से चीख मारी, शरीर उछल पड़ा, लेकिन हाथ बँधे होने की वजह से वह कुछ नहीं कर सकी।
कबीर ने लंड गाँड से निकाला और फिर चूत में डाल दिया। अब वह दोनों छेदों में बारी-बारी से घुस रहा था। कभी चूत, कभी गाँड। कभी दोनों में उंगलियाँ। उसने स्वाती के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और उसके कान में दाँत गड़ा दिए।
“आज रात मैं तुझे तोड़ने वाला हूँ। समझी?”

स्वाती सिर्फ रो रही थी। उसका शरीर दर्द और जबरदस्ती की उत्तेजना से काँप रहा था। चूत और गाँड दोनों से पानी और थूक बह रहा था।
कबीर ने उसे पलट दिया। आँखों का कपड़ा अभी भी बँधा था। उसने स्वाती के पैर उसके कंधों तक मोड़ दिए और पूरा वजन उसके ऊपर डालकर चोदने लगा। इतनी गहराई से कि स्वाती को लगा उसका पेट फट

जाएगा। हर धक्के पर कबीर उसकी गर्दन दबाता, कभी साँस रोक देता, फिर छोड़ देता।
“तेरे पति को पता है उसकी बीवी की गाँड और चूत कितनी अच्छी चुदती है?” वह हँसता रहा।
घंटों तक यह सिलसिला चला। कबीर थकता नहीं था। वह बीच-बीच में रुककर बेल्ट से मारता, मोम गिराता, चूचियों को दाँतों से काटता, निप्पल्स को खींचता। स्वाती कई बार बेहोशी की कगार पर पहुँची, लेकिन कबीर पानी के छींटे मारकर फिर से जगा देता।
आखिर में उसने स्वाती को कुत्ते की पोजीशन में किया। हाथ अभी भी पीछे बँधे। उसने दोनों छेदों में बारी-बारी से अपना लंड ठूंसते हुए

आखिरी जोर लगाया और अपनी गाड़ी पहले उसकी गाँड में, फिर चूत में छोड़ दी। गर्म वीर्य दोनों जगह भर गया, बहकर जाँघों पर गिरने लगा।
कबीर ने लंड निकाला और स्वाती के मुँह के पास लाया। “चाट। दोनों जगह का। साफ कर।”
आँखें बँधी, हाथ बँधे, स्वाती ने जीभ निकाली। कबीर ने उसका मुँह लंड से भर दिया। वह थूक और वीर्य चाटती रही जब तक कबीर संतुष्ट नहीं हो गया।

उसने रस्सी खोली, लेकिन आँखों का कपड़ा नहीं हटाया। “अब सो जा। सुबह तक यहीं रहेगी। मैं अभी बाहर जा रहा हूँ। लौटने तक अगर हिली तो और सख्त सजा मिलेगी।”
दरवाजा बंद हुआ। स्वाती अंधेरे में, नंगी, दर्द से भरी, वीर्य बहते हुए बिस्तर पर पड़ी रही। शरीर का हर हिस्सा जल रहा था। गाँड और चूत सूज चुकी थीं। चूचियों पर मोम के निशान और दाँतों के निशान साफ थे।

कुछ घंटे बाद दरवाजा फिर खुला। कबीर लौट आया था। उसके हाथ में एक नई मोटी रस्सी और एक छोटा सा चमड़े का कोड़ा था।
“उठ,” उसने कहा। “रात अभी खत्म नहीं हुई। अब असली खेल शुरू होगा।”
उसने स्वाती को फिर से बाँधा। इस बार हाथ ऊपर, पैर फैलाकर बिस्तर के चारों कोनों से। शरीर पूरी तरह तना हुआ। फिर कोड़े से पहली वार उसकी जाँघ पर पड़ी।

स्वाती की चीख कमरे में गूँज उठी।
कबीर मुस्कुराया। “आज सुबह होने तक तुझे याद रहेगा कि असली मालिक कौन है।”
और फिर कोड़े की बारीक आवाजें कमरे में गूँजने लगीं। हर वार के साथ स्वाती का शरीर ऐंठता, चीख निकलती, और कबीर और गहराई तक उतरता जाता।
रात लंबी थी। और स्वाती के लिए यह सिर्फ शुरुआत थी।

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