प्रोफेसर घर पर थे। रसोई में क्लिप और बेलन से निशा ने कबीर को चुपचाप तोड़ा। तीन कदम दूर खतरा खड़ा था, फिर भी वो और सज़ा माँगता रहा।
सुबह की पहली रोशनी खिड़की से अंदर आ रही थी जब मेरी आँख खुली। शरीर एक जगह से हिल भी नहीं पा रहा था। हाथ अभी भी छत की कड़ी से बंधे थे। निशा मेरे ऊपर सोई हुई थीं। उनका पूरा वजन मेरे सीने पर था और मेरा लंड अभी भी उनकी चूत के अंदर था—पूरा रात भर।
लंड सुन्न पड़ चुका था। कभी-कभी सख्त हो जाता, कभी ढीला। निशा की चूत ने उसे पूरी रात कसकर पकड़े रखा। मेरी बाँहें सुन्न हो चुकी थीं। कंधों में जलन इतनी तेज़ थी कि साँस लेते समय भी दर्द हो रहा था।
निशा की आँख खुली। उन्होंने मेरे चेहरे को देखा और धीरे से मुस्कुराईं।
“अभी निकला नहीं… अच्छा कुत्ता।”
उन्होंने कूल्हे हल्के से हिलाए। मेरा आधा सुन्न लंड उनकी चूत के अंदर हिला। दर्द और अजीब सी सनसनाहट एक साथ हुई। निशा ने मेरे गाल पर थूक दिया और उसे अपनी उंगली से मेरे मुँह में रगड़ दिया।
“चाट।”
मैंने चाटा। निशा उठ बैठीं। मेरा लंड उनकी चूत से बाहर निकला—गीला, चिपकचिपा और लाल। उन्होंने उसे देखा और नाखून से उसके सिरे को दबाया।
“रात भर अंदर रहने के बाद भी तन रहा है। आज और तोड़ना होगा।”
उन्होंने मुझे नीचे उतारा लेकिन हाथ नहीं खोले। फर्श पर घुटनों के बल बैठा दिया। फिर एक लंबी पतली लोहे की छड़ निकाली। उसके एक सिरे पर छोटी सी गोल नोक थी। निशा ने मेरे अंडकोष को अपने हाथ में लिया और छड़ की नोक को धीरे-धीरे उसके नीचे की त्वचा पर दबाना शुरू किया।
“चिल्ला मत। सिर्फ साँस ले।”
नोक और अंदर धँसती गई। दर्द इतना तेज़ था कि मेरी आँखों से आँसू की धारा बह निकली। निशा ने नोक को थोड़ा घुमाया। मैं दाँत भींचकर सह रहा था। फिर उन्होंने छड़ निकाल दी। खून की एक पतली लकीर बहने लगी। निशा ने उसे अपनी उंगली से पोंछा और मेरे मुँह में ठूंस दिया।
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“अपना खून चख।”
मैंने निगल लिया।
उसके बाद निशा ने मुझे फिर से लटका दिया। इस बार दोनों पैर भी रस्सी से बाँध दिए। शरीर पूरी तरह हवा में लटक रहा था। उन्होंने मेरे मुँह में फिर से कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया। आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया। अब न दिख रहा था, न बोल पा रहा था।
अचानक ठंडी धातु मेरे लंड पर छुई। निशा ने एक लंबी पतली धातु की पाइप ली और उसे मेरे लंड के मुहाने पर रखा। धीरे-धीरे अंदर धकेलने लगीं। जलन और दबाव एक साथ। पाइप अंदर जाती गई। मैं हवा में तड़प रहा था। निशा ने पाइप को आधा अंदर तक पहुँचा दिया और वहीं छोड़ दिया।
“अब ये अंदर रहेगा जब तक मैं न निकालूँ।”
फिर छड़ी की आवाज़ आई। गांड पर जोरदार वार। एक के बाद एक। गिनती खो गई। हर वार के साथ शरीर झूलता और अंदर की पाइप हिलती। दर्द दोहरी हो गई थी। निशा कभी जाँघों पर मारतीं, कभी पीठ पर, कभी अंडकोष के पास। त्वचा फटने के कगार पर थी।
लगभग चालीस मिनट तक लगातार मारने के बाद निशा रुकीं। उन्होंने मेरे मुँह से टेप हटाया।
“बोल।”
“माफ़ कीजिए… और सज़ा दीजिए…”
निशा ने संतुष्ट होकर पाइप को धीरे-धीरे बाहर खींचा। लंड से खून और पानी मिला हुआ द्रव निकला। उन्होंने उसे अपनी हथेली में लिया और मेरे चेहरे पर मल दिया।
फिर वे कुर्सी पर बैठ गईं और मुझे अपने करीब खींचा। मेरा लटकता शरीर उनके सामने था। उन्होंने मेरे लंड को अपनी गांड में डाल लिया—एक झटके में पूरा। फिर मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और झुलाना शुरू कर दिया।
“खुद को चोदो। अगर रुके तो पाइप फिर डाल दूँगी।”
मैंने बाजुओं में बाकी बची ताकत लगाई। शरीर आगे-पीछे झूलने लगा। हर बार उनका मोटा गांड का मांस मेरे लंड को निगल लेता। निशा मेरे निपल्स को नाखूनों से नोच रही थीं। खून फिर निकल आया। वे मेरे गाल पर थप्पड़ मार रही थीं—बायें, दायें, लगातार।
एक घंटे तक इसी तरह चलता रहा। मेरी बाँहें अब पूरी तरह जवाब दे चुकी थीं। दर्द इतना था कि रोना भी बंद हो गया था। सिर्फ सिसकियाँ निकल रही थीं। निशा चरम पर पहुँचीं। उनकी गांड ने मेरे लंड को इतनी जोर से निचोड़ा कि मैं भी बिना इच्छा के फट गया। वीर्य उनकी गांड में जा रहा था लेकिन शरीर में कोई मज़ा नहीं बचा था—सिर्फ थकान और जलन।
निशा उतर गईं। उन्होंने मुझे नीचे उतारा। हाथ अभी भी बंधे थे। फर्श पर लिटा दिया। फिर अपने दोनों घुटनों से मेरे सीने को दबाया और मुँह मेंथूक दिया।
“आज से तुम रोज़ सुबह यहीं सोकर उठोगे। चाहे प्रोफेसर घर हो या न हो। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने रस्सी खोली। मेरे हाथ नीचे गिरे—बिल्कुल बेजान। वे उठकर कमरे से बाहर चली गईं। कुछ देर बाद वापस आईं। हाथ में एक गिलास पानी था। उन्होंने मेरे मुँह में पानी डाल दिया। कुछ पानी गले से नीचे गया, कुछ बाहर गिर गया।
“कपड़े पहनो और जाओ। कल सुबह सात बजकर तीस मिनट पर फिर आना। देर की तो आज वाली सज़ा दोबारा मिलेगी… और बढ़कर।”
मैं लड़खड़ाते हुए उठा। शरीर पर खून, वीर्य, थूक और छड़ी के निशान फैले हुए थे। कपड़े पहनने में भी दर्द हो रहा था। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते साँस फूल गई।
बाहर निकलते समय निशा ने पीछे से आवाज़ दी,
“कबीर… तुम्हारा लंड अब सिर्फ मेरा है। किसी और के बारे में सोचा तो अंडकोष में सुई चुभा दूँगी।”
मैंने बिना मुड़े सिर हिलाया और गली में निकल गया। हर कदम पर जाँघें जल रही थीं। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल फिर वही समय, वही दरवाज़ा, और निशा की वह ठंडी आवाज़।
सुबह सात बजकर पच्चीस मिनट पर मैं फिर उसी गली में खड़ा था। शरीर कल के निशानों से भरा हुआ था। लंड के अंदर वाली जलन अभी भी बाकी थी। जाँघों और गांड पर छड़ी के गहरे निशान थे। फिर भी पैर रुक नहीं रहे थे।
दरवाज़ा खोला तो निशा ने मुझे अंदर खींचा और फुसफुसाकर कहा,
“आज प्रोफेसर घर पर हैं। ऊपर सो रहे हैं। आवाज़ निकली तो दोनों मर जाएंगे। समझे?”
मैंने सिर हिलाया। निशा ने ताला लगाया और मुझे सीधे रसोई की तरफ ले गईं। वहाँ उन्होंने एक मोटी काली पॉलीथीन बिछाई और मुझे उसके ऊपर नंगा कर दिया। हाथ पीछे बाँध दिए। मुँह में कपड़ा ठूंसकर टेप लगा दिया। आँखें खुली छोड़ दीं ताकि मैं सब देख सकूँ।
निशा ने रसोई की दराज से कई कपड़े के क्लिप्स निकाले। छोटे-छोटे मजबूत क्लिप्स। उन्होंने मेरे दोनों निपल्स को पकड़ा और क्लिप्स कसकर लगा दिए। दर्द तुरंत तेज़ हो गया। फिर उन्होंने मेरे अंडकोष की त्वचा को खींचकर चार क्लिप्स और लगा दिए। हर क्लिप खींच रहा था। लंड तनकर खड़ा हो गया।
“आज चुप रहना। एक भी आवाज़ निकली तो ये क्लिप्स रात भर रहेंगे।”
निशा ने मेरे लंड को अपनी हथेली में लिया और जोर से मसलना शुरू किया। ऊपर से नीचे, नाखून से नसों को दबाना। मैं दाँत भींचकर सह रहा था। अचानक ऊपर से प्रोफेसर की खाँसी की आवाज़ आई। निशा रुक गईं। दोनों ने साँस रोक ली। कुछ देर बाद फिर सन्नाटा।
निशा मुस्कुराईं। उन्होंने एक लंबी लकड़ी की चम्मच निकाली और मेरे गांड पर जोर से पटका। एक, दो, तीन… लगातार दस वार। हर वार के साथ क्लिप्स हिलते और निपल्स व अंडकोष और खिंचते। आँखों से आँसू बह रहे थे लेकिन आवाज़ नहीं निकल रही थी।
फिर निशा ने मुझे घुटनों के बल बैठाया और अपनी साड़ी उठाई। उनकी चूत मेरे मुँह के सामने थी। उन्होंने मेरे सिर को पकड़कर चूत पर दबा दिया।
“चाटो। बिना आवाज़ के। जीभ गहराई तक।”
मैंने चाटना शुरू किया। निशा मेरे बालों को कसकर पकड़े हुए थीं। कभी-कभी वे अपना वजन और बढ़ा देतीं जिससे मेरी नाक बंद हो जाती। साँस लेने के लिए संघर्ष हो रहा था। ऊपर कमरे से प्रोफेसर के चलने की आवाज़ आ रही थी। खतरा हर पल बढ़ रहा था। निशा जानबूझकर और जोर से सिसकियाँ ले रही थीं—धीरे से, ताकि ऊपर सुनाई न दे लेकिन मुझे पता चले कि वे मज़ा ले रही हैं।
बीस मिनट तक लगातार चाटने के बाद मेरी जीभ सुन्न पड़ गई। निशा ने अपना पानी मेरे मुँह में छोड़ दिया। मुझे निगलना पड़ा। फिर उन्होंने मुझे लिटा दिया। क्लिप्स अभी भी लगे थे। निशा ने एक और क्लिप निकाला और मेरे लंड के सिरे के सबसे संवेदनशील हिस्से पर कसकर लगा दिया। दर्द इतना तेज़ था कि मेरा शरीर ऐंठ गया।
“अब ये रहेगा जब तक मैं न हटाऊँ।”
निशा ने अपनी साड़ी पूरी तरह हटा दी और मेरे ऊपर सवार हो गईं। चूत में लंड डालते समय उन्होंने क्लिप को और दबाया। मैं सिसक रहा था लेकिन आवाज़ दबी हुई थी। निशा धीरे-धीरे हिलने लगीं। हर बार जब वे नीचे बैठतीं तो क्लिप लंड के सिरे को चीरता। ऊपर से प्रोफेसर के बाथरूम जाने की आवाज़ आई। निशा और तेज़ हो गईं। जानबूझकर। खतरा उन्हें और उत्तेजित कर रहा था।
वे मेरे कान में फुसफुसाईं,
“अगर वो नीचे आ गए तो तुम्हें फ्रिज के पीछे छिपाना पड़ेगा। और मैं वहीं तुम्हारी गांड में उंगली डालूँगी।”
मैं डर और उत्तेजना से काँप रहा था। निशा अपनी गति बढ़ाती गईं। क्लिप्स खिंच रहे थे। निपल्स सुन्न होने लगे थे लेकिन दर्द कम नहीं हो रहा था। अचानक ऊपर से सीढ़ियों की आहट आई। निशा झट से उठीं। उन्होंने मुझे खींचकर रसोई के फ्रिज के पीछे धकेल दिया। जगह बहुत तंग थी। शरीर सिकुड़ गया। क्लिप्स अभी भी लगे थे।
प्रोफेसर नीचे आए। निशा ने जल्दी से साड़ी पहन ली और चाय बनाने का नाटक करने लगीं। प्रोफेसर रसोई में आ गए। मुझसे सिर्फ तीन कदम दूर। मैं साँस तक नहीं ले पा रहा था। क्लिप का दर्द बढ़ता जा रहा था। निशा प्रोफेसर से बात कर रही थीं—सामान्य आवाज़ में। कभी-कभी उनकी नज़र फ्रिज की तरफ चली जाती और वे हल्के से मुस्कुरा देतीं।
प्रोफेसर ने चाय पी और वापस ऊपर चले गए। निशा ने दरवाज़ा बंद किया और फ्रिज के पीछे से मुझे खींचा। उनके चेहरे पर एक क्रूर खुशी थी।
“तुम मरने वाले थे… और मुझे और मज़ा आ रहा था।”
उन्होंने क्लिप्स एक-एक करके उतारे। निपल्स और अंडकोष पर गहरे लाल निशान रह गए। खून की छोटी-छोटी बूँदें निकल रही थीं। निशा ने उन्हें चाटा। फिर उन्होंने मुझे फिर से पॉलीथीन पर लिटाया। इस बार उन्होंने रसोई की भारी सिलवट वाली बेल्ट निकाली और मेरे गांड पर बेरहमी से मारना शुरू किया। हर वार के साथ मेरी गांड जल रही थी। मैं मुँह में कपड़ा होने की वजह से सिर्फ गुनगुना पा रहा था।
तीस वार के बाद निशा रुकीं। उन्होंने मेरे मुँह से टेप हटाया।
“बोलो क्या चाहिए।”
“सज़ा… और सज़ा…”
निशा ने मुझे पलट दिया। घुटनों के बल किया। फिर उन्होंने रसोई की मोटी लकड़ी की बेलन ली और उसे मेरे गांड के मुहाने पर रखा। थूक लगाकर धीरे-धीरे धकेलना शुरू किया। बेलन मोटी थी। गांड फटने के कगार पर थी। निशा रुक-रुककर अंदर करती गईं। जब आधा अंदर चला गया तो उन्होंने उसे वहीं छोड़ दिया और मेरे लंड को अपनी चूत में ले लिया।
अब मैं दोनों तरफ़ से भरा हुआ था। निशा जोर-जोर से हिलने लगीं। हर धक्के के साथ बेलन और अंदर जाता। दर्द और भरन एक साथ। निशा मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींच रही थीं। उनकी सिसकारियाँ दबी हुई थीं लेकिन तेज़।
“आज तुम्हारी गांड में ये बेलन रात भर रहेगा अगर प्रोफेसर फिर नीचे आए।”
मैं रो रहा था। असली आँसू। निशा चरम पर पहुँचीं। उनकी चूत ने मेरे लंड को निचोड़ा। मैं भी फट गया। वीर्य उनकी चूत में जा रहा था लेकिन शरीर में सिर्फ जलन बची थी। निशा उतर गईं। बेलन अभी भी अंदर थी। उन्होंने उसे धीरे-धीरे बाहर निकाला। गांड खुली और जलती हुई रह गई।
निशा मेरे पास बैठ गईं और मेरे बाल सहलाते हुए बोलीं,
“कल फिर आना। अगली बार मैं तुम्हें प्रोफेसर के सोते समय उनके बेडरूम के बाहर खड़ा रखूँगी। नंगा। और तुम्हारे लंड पर वजन लटकाऊँगी। अगर आवाज़ निकली तो दोनों खत्म।”
उन्होंने मेरे कपड़े फेंके। मैं लड़खड़ाते हुए उठा। शरीर पर क्लिप्स के निशान, बेल्ट के लाल निशान और गांड की जलन साफ दिख रही थी। दरवाज़े तक पहुँचते-पहुँचते मेरे पैर काँप रहे थे।
बाहर निकलते समय निशा ने पीछे से कहा,
“कबीर… तुम्हारा डर मेरा नशा बन गया है। कल और बड़ा जोखिम लेंगे।”
मैं गली में निकल आया। धूप में आँखें चौंधिया गईं। हर कदम पर गांड जल रही थी। लेकिन दिमाग में सिर्फ एक बात घूम रही थी—कल फिर वही घर, वही खतरा, और निशा की वह भूखी क्रूरता।
अब मैं जानता था कि ये खेल अब सिर्फ दर्द का नहीं रह गया था। ये मौत के किनारे का खेल बन चुका था। और मैं खुद उस किनारे पर बार-बार लौटने को बेताब था।
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