पति की उपेक्षा सहती कविता को देवर ने तीन मर्दों के साथ पुराने गोदाम में घसीटा। रस्सियों से बाँधकर monochrome रातभर बारी-बारी से तोड़ा, निशान छोड़े और वापस घर भेज दिया। अगली बार और ज्यादा मर्द आने वाले हैं।
मेरा नाम कविता है। उम्र 32 साल। रंग साँवला-गोरा मिश्रित, कद 5 फीट 5 इंच। शरीर गदराया हुआ—स्तन 38, कमर 30, नितंब 40। शादी हुए आठ साल हो चुके थे। दो बच्चे—आरव और दिशा। पति राजेश की छोटी सी वर्कशॉप है इंदौर के बाहरी इलाके में। घर-खेती का भी कुछ काम है। शुरू-शुरू में प्यार और सेक्स दोनों पूरे थे। लेकिन पिछले दो साल से राजेश थकने लगे। महीने में एक-दो बार भी मुश्किल से हाथ लगता। मेरी देह भूखी रहती। रातें लंबी हो जातीं। चूत में आग लग जाती पर कोई बुझाने वाला नहीं।
राजेश की मौसी की बेटी सीमा की तबीयत अचानक खराब हो गई। इलाज के लिए भोपाल जाना पड़ा। साथ में मैं, सीमा और उसका छोटा भाई रोहित। रोहित उम्र 29 का। शरीर मजबूत, कंधे चौड़े, हाथ मोटे। आँखों में हमेशा भूख सी चमकती रहती। भोपाल के एक छोटे अस्पताल में कमरा लिया। सीमा को बेड पर लिटाया। रात के करीब 11 बजे डॉक्टर ने नींद की गोली दे दी। सीमा गहरी नींद में सो गई।
मैं गलियारे में खड़ी थी। रोहित पीछे से आया। उसकी साँस मेरे गले पर पड़ी। “भाभी… इतनी रात तक जाग रही हो?” आवाज में हल्की सी धमकी थी। मैंने मुड़कर देखा। उसकी आँखें मेरी छाती पर टिकी थीं। ब्लाउज का ऊपर वाला बटन खुला था। सफेद ब्रा का किनारा दिख रहा था।
उसने बिना पूछे मेरा हाथ पकड़ लिया। अंगुलियाँ कस गईं। “आओ कमरे में। बाहर खड़े-खड़े क्या फायदा।” मैंने मना किया। उसने और जोर से खींचा। अस्पताल खाली था। नर्स स्टेशन दूर था। उसने मुझे कमरे के अंदर धकेल दिया। दरवाजा बंद किया। कुंडी लगा दी।
सीमा बेड पर सो रही थी। रोहित ने मुझे दीवार से सटा दिया। एक हाथ गले पर रखा, दूसरा स्तन पर। “इतने दिन से देख रहा हूँ तुझे। गांव में भैया सोए रहते हैं। तू अकेली जलती रहती होगी। आज बुझाऊँगा।” उसकी उँगलियाँ ब्लाउज के अंदर घुस गईं। ब्रा को ऊपर धकेल दिया। गोल-मटोल स्तन बाहर निकल आए। उसने एक निप्पल मुँह में ले लिया और दाँत से काटा। दर्द हुआ। मैं चीखी। उसने मुँह दबा दिया।
“चुप रह। दीदी जाग गई तो दोनों को मारूँगा।” उसने ब्लाउज फाड़ दिया। बटन बिखर गए। साड़ी खींचकर फर्श पर फेंक दी। पेटीकोट का नाड़ा तोड़ दिया। अब मैं सिर्फ पैंटी और खुली ब्रा में थी। उसने ब्रा के हुक तोड़ दिए। दोनों स्तन आजाद हो गए। उसने दोनों हाथों से उन्हें पकड़ा और जोर-जोर से मसला। निप्पल लाल हो गए। उसने एक को मुँह में लिया, दूसरे को उँगलियों से मरोड़ा।
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फिर पैंटी में हाथ डाला। उँगली चूत पर फिसली। गीली थी। उसने हँसते हुए कहा, “देख… भैया नहीं करते तो देवर के लिए गीली हो जाती है।” उसने पैंटी नीचे खींच दी। मेरे बाल छोटे-छोटे थे। उसने दो उँगलियाँ अंदर घुसा दीं। जोर से धक्का दिया। दर्द और मजा दोनों मिले। उसने उँगलियाँ निकालकर मेरे मुँह में ठूँस दीं। “चाट। अपनी चूत का पानी।” मैंने चाट लिया।
उसने अपने कपड़े उतारे। पैंट और अंडरवियर एक साथ नीचे गिरे। लंड बाहर निकला—मोटा, लंबा, नसों से भरा। सिर काला और चमकदार। उसने मेरे बाल पकड़कर घुटनों पर बैठा दिया। “मुँह खोल।” मैंने मना किया। उसने बाल और कस दिए। दर्द हुआ। मुँह खुल गया। उसने लंड अंदर ठूँस दिया। गले तक। मैंने उबकाई की। उसने और गहरा धकेला। “गला खोल। पूरा ले।” वह मेरे सिर को आगे-पीछे करने लगा। लंड गले में रगड़ता रहा। थूक बहने लगा। आँखों से पानी निकला।
जब वह संतुष्ट हो गया तो मुझे पेट के बल फर्श पर लिटा दिया। दोनों टाँगें फैला दीं। उसने चूत पर थूक गिराया और बिना किसी तैयारी के लंड धकेल दिया। आधा ही घुसा। मैं चीखी। उसने मुँह दबाया और पूरा अंदर घुसेड़ दिया। दर्द तेज था। चूत फटने जैसी लग रही थी। उसने धक्के शुरू कर दिए। तेज, कठोर, बिना रुकने वाले। हर धक्के पर मेरे स्तन फर्श पर रगड़ते। उसने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “साली… इतने दिन से भूखी थी। अब भर जा।”
उसने पोजीशन बदली। मुझे घोड़ी बनाया। कमर पकड़ी और और तेज चोदने लगा। थप्पड़ मारे नितंबों पर। लाल हो गए। फिर एक हाथ आगे लाकर निप्पल मरोड़े। दूसरे हाथ से गर्दन दबाई। साँस रुकने लगी। वह और जोर से धकेलता रहा। अंदर पानी छोड़ने के करीब था तो बाहर निकाला और मेरे मुँह पर थूक दिया। “चाट।” मैंने चाटा। फिर दोबारा अंदर घुसा दिया।
रात भर वह नहीं रुका। कभी दीवार से सटाकर खड़े-खड़े चोदा। कभी मुझे अपने कंधों पर बिठाकर। कभी चूत चाटी—लेकिन दाँतों से काटते हुए। जब मैं सिसकने लगी तो उसने मुँह में अंडरवियर ठूँस दिया। सीमा बेड पर करवट बदलती रही लेकिन जागी नहीं। सुबह चार बजे उसने आखिरी बार अंदर पानी छोड़ा। गर्म धारा चूत में भर गई। वह बाहर निकला। लंड अभी भी तना हुआ था। उसने मेरे बाल पकड़कर साफ करवाया।
अगले दिन सीमा की हालत थोड़ी सुधरी। लेकिन रोहित ने मौका नहीं छोड़ा। दोपहर को जब नर्स चली गई तो उसने मुझे बाथरूम में घसीटा। दरवाजा बंद किया। मुझे सिंक पर झुका दिया। साड़ी ऊपर चढ़ाई। पैंटी फाड़ दी। पीछे से लंड घुसा दिया। एक हाथ से मुँह दबाया, दूसरे से स्तन मसला। पानी की आवाज में मेरी चीखें दब गईं। उसने बाथरूम के शीशे में मुझे दिखाया। “देख… कैसी लग रही है तू। भैया की औरत देवर की रांड बन गई।”
रात को फिर वही। उसने रस्सी निकाली। मेरे हाथ पीछे बाँध दिए। आँखों पर कपड़ा बाँधा। फिर चूत में उँगलियाँ, फिर लंड। कभी निप्पल पर क्लिप जैसी चीज दबाई—दर्द तेज था। कभी नितंबों पर चमड़े की बेल्ट से मारा। लाल निशान पड़ गए। वह कहता रहा, “तू मेरी है। जब तक भोपाल में हूँ, हर रात तेरी चूत मेरी है।” मैं विरोध करती लेकिन शरीर जवाब दे देता। हर बार गीली हो जाती। हर बार चरम पर पहुँच जाती।
पंद्रह दिन बीते। सीमा ठीक हुई। वापसी का दिन आया। आखिरी रात रोहित ने मुझे कमरे में बंद किया। सीमा को दूसरे कमरे में सुला दिया। उसने मुझे बिस्तर पर लिटाया। हाथ-पाँव बाँधे। फिर घंटों चोदा। कभी मुँह में, कभी चूत में, कभी पीछे के छेद में—धीरे-धीरे लेकिन गहराई तक। जब मैं रोने लगी तो उसने थप्पड़ मारा। “रो मत। मजा ले।” आखिर में उसने दोनों स्तनों के बीच लंड रखकर पानी छोड़ा। चेहरे पर गिर गया। उसने मुझे चाटने को मजबूर किया।
सुबह गाड़ी में बैठे। रोहित मेरे बगल में। हाथ छुपाकर मेरी जाँघ दबाता रहा। इंदौर पहुँचे। घर आया। राजेश ने पूछा, “सब ठीक?” मैंने सिर हिलाया। रात को राजेश सो गए। मैं बाथरूम में गई। आईने में अपने शरीर को देखा—निप्पल पर काटने के निशान, नितंबों पर लाल निशान, चूत में अभी भी उसका पानी। मैंने उँगली अंदर डाली। रोहित की याद आई। शरीर काँप गया।
अगले हफ्ते रोहित गांव आया। राजेश वर्कशॉप गए हुए थे। बच्चे स्कूल। रोहित दरवाजे पर खड़ा था। आँखों में वही भूख। उसने मुझे अंदर धकेला। कुंडी लगाई। बिना बात किए कपड़े फाड़ने लगा। इस बार और बर्बर। उसने मुझे रसोई की मेज पर लिटाया। टाँगें फैलाईं। लंड धकेल दिया। बर्तन गिरने लगे। वह हँसता रहा। “अब घर में भी। जब चाहूँगा तब आऊंगा।” उसने मेरी चूत से खून निकाला—नाखून से। फिर चाटा। फिर चोदा।
महीनों बीत गए। रोहित जब भी आता, मुझे ले लेता। कभी खेत के पीछे झाड़ियों में। कभी वर्कशॉप के स्टोर रूम में। कभी रात को छत पर। हर बार रस्सी, थप्पड़, काटना, गला दबाना। कभी वह मुझे अपने दोस्त के सामने नंगा करता—लेकिन छूने नहीं देता। सिर्फ दिखाता। “देख… मेरी भाभी।” मैं शर्म से मर जाती लेकिन शरीर और गीला हो जाता।
एक रात राजेश देर से आए। रोहित अभी भी घर में था। हम दोनों बिस्तर पर थे। रोहित मेरे ऊपर। लंड अंदर। दरवाजा खुला। राजेश खड़े रह गए। रोहित रुका नहीं। उसने और जोर से धक्के दिए। राजेश की आँखें फटी रह गईं। रोहित ने कहा, “भैया… तुम्हारी औरत अब मेरी है। तुम थके रहते हो। मैं नहीं।” राजेश कुछ नहीं बोले। बाहर चले गए।
उस रात रोहित ने मुझे और बर्बर तरीके से लिया। हाथ बाँधे। मुँह में कपड़ा। घंटों। सुबह राजेश ने कहा, “जो करना है कर। मुझे मत बता।” उसके बाद घर में कोई रोक नहीं रही। रोहित जब चाहता आता। मुझे नंगा करता। चोदता। कभी बच्चों के सोने के बाद। कभी दोपहर को। मेरी चूत हमेशा उसके लंड की आदी हो गई। दर्द मजे में बदल गया। भूख और बढ़ गई।
अब साल भर हो गया। कविता अब सिर्फ राजेश की पत्नी नहीं। रोहित की रांड है। हर रात उसके निशान शरीर पर होते हैं। हर सुबह आईने में देखती है—लाल निप्पल, काटे हुए स्तन, थप्पड़ों के निशान। और मुस्कुराती है। क्योंकि भूख अब बुझती है। बर्बर तरीके से। पूरा।रोहित ने वादा किया था। और उसने वादा तोड़ा नहीं।
तीन हफ्ते बाद एक शनिवार की रात को राजेश वर्कशॉप में ही सो गए। बच्चे नानी के घर थे। रोहित ने फोन किया। आवाज में कोई मिठास नहीं थी, सिर्फ हुक्म। “रात के बारह बजे तैयार रह। काली साड़ी पहन। नीचे कुछ मत पहनना। मैं आने वाला हूँ।”
मैंने वही किया। काली साड़ी, बिना ब्रा, बिना पैंटी। शरीर काँप रहा था। दरवाजे की घंटी बजी तो दिल जोर से धड़का। रोहित अकेला नहीं था। उसके साथ दो और मर्द थे। एक लंबा, काला, नाम अनिल। दूसरा मोटा, गंजा, नाम सुरेश। दोनों की आँखों में वही भूख जो रोहित की आँखों में हमेशा रहती है।
रोहित ने मुझे देखते ही साड़ी का पल्लू खींच लिया। स्तन बाहर निकल आए। अनिल ने सीटी बजाई। सुरेश ने नीचे थूक गिराया। रोहित ने कहा, “आज सिर्फ मेरी नहीं। आज सबकी। भोपाल वाले कमरे से भी आगे।”
उसने मुझे कार में बैठाया। आँखों पर काला कपड़ा बाँध दिया। हाथ पीछे बाँध दिए। गाड़ी एक घंटे चली। जब कपड़ा हटा तो मैं एक पुराने गोदाम में खड़ी थी। दीवारें काली, फर्श पर लोहे की जंजीरें, छत से लटकती रस्सियाँ, एक बड़ा लोहे का बेड जिसके कोनों पर कड़े लगे थे। एक टेबल पर चाबुक, क्लिप, मोमबत्ती, लोहे के छल्ले और एक बड़ा काला डिल्डो रखा था।
रोहित ने साड़ी फाड़ दी। पूरी नंगी। अनिल और सुरेश ने कपड़े उतारे। तीनों के लंड बाहर थे—रोहित का सबसे मोटा, अनिल का सबसे लंबा, सुरेश का मोटा और टेढ़ा। रोहित ने मुझे बेड पर धकेला। हाथ-पाँव चारों कोनों पर बाँध दिए। जंजीरें खनक उठीं। मैं बिलकुल फैली हुई पड़ी थी। चूत खुली, स्तन तने हुए।
रोहित ने सबसे पहले चाबुक उठाया। “गिनती शुरू कर।” पहला वार नितंब पर पड़ा। जलन इतनी तेज कि मैं चीखी। दूसरा वार जाँघ के अंदर। तीसरा स्तन पर। निप्पल पर सीधा। दर्द से आँखें फट गईं। उसने दस वार किए। हर वार पर मेरी चीखें गूँजती रहीं। नितंब लाल हो गए, कुछ जगहों से खून की बूँदें रिसने लगीं।
फिर क्लिप लगाईं। दोनों निप्पलों पर। इतनी कसकर कि आँसू बह निकले। क्लिप से छोटी-छोटी जंजीरें लटकी थीं। रोहित ने उन्हें खींचा। निप्पल खिंच गए। दर्द दिमाग में गूँजने लगा। अनिल ने मेरे मुँह में अपना लंड ठूँस दिया। गले तक। सुरेश ने चूत पर थूक गिराया और बिना रुके अपना टेढ़ा लंड अंदर घुसेड़ दिया। एक साथ तीनों। मुँह में अनिल, चूत में सुरेश, और रोहित निप्पल की जंजीरें खींचता हुआ।
सुरेश ने धक्के तेज किए। हर धक्के पर मेरी कमर बेड से उठती। अनिल ने बाल पकड़कर सिर स्थिर किया और गले में लंड रगड़ता रहा। थूक और आँसू मिलकर गले से बह रहे थे। रोहित ने अचानक क्लिप खोल दीं। निप्पल में खून की लहर दौड़ गई। उसने मोमबत्ती जलाई। गर्म मोम दोनों स्तनों पर टपकाया। जलन इतनी कि मैं अनिल के लंड को दाँतों से काटने वाली थी। उसने थप्पड़ मारा। “दाँत मत लगा। वरना निप्पल काट दूँगा।”
एक घंटे तक यही चला। फिर पोजीशन बदली। मुझे उलटा लटकाया—सिर नीचे, टाँगें ऊपर। रस्सियाँ छत से बँधी थीं। खून सिर में चढ़ गया। रोहित ने पीछे के छेद में उँगली डाली। फिर दो। फिर काला डिल्डो। धीरे-धीरे लेकिन पूरा। दर्द ऐसा कि साँस रुक गई। अनिल ने सामने से चूत में लंड डाला। सुरेश ने मुँह में। तीनों छेद भरे हुए। वे बारी-बारी से गति बढ़ाते। कभी एक साथ जोर से। मेरी चीखें गूँजतीं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं था।
रोहित ने डिल्डो निकालकर अपना लंड पीछे डाल दिया। इतनी गहराई तक कि मुझे लगा अंदर कुछ फट गया। उसने कमर पकड़कर बर्बर धक्के मारे। हर धक्के पर मेरा शरीर झूलता। अनिल और सुरेश ने स्तन मसले, निप्पल मरोड़े, जाँघों पर थप्पड़ मारे। जब रोहित अंदर पानी छोड़ने वाला था तो बाहर निकाला और मेरे चेहरे पर छोड़ दिया। आँखों में, मुँह में, बालों में। अनिल ने भी मुँह में छोड़ दिया। सुरेश ने चूत में। गर्म धाराएँ बह रही थीं।
उन्होंने मुझे नीचे उतारा। लेकिन आराम नहीं दिया। रोहित ने फर्श पर जंजीर से बाँध दिया। घुटनों के बल। फिर तीनों ने बारी-बारी से मुँह चोदा। गले में इतनी गहराई तक कि उल्टी आने लगी। उन्होंने मना किया। “निगल। एक बूँद भी बाहर नहीं।” मैंने निगला। कड़वाहट गले में उतरती गई।
रात के तीन बज गए थे। उन्होंने मुझे बेड पर वापस लिटाया। इस बार हाथ ऊपर, टाँगें फैलीं। रोहित ने चाबुक फिर उठाया। लेकिन इस बार चूत पर। हल्के वार। फिर जोर के। चूत सुज गई, लाल हो गई। उसने उँगली अंदर डालकर खून चखा। “मीठा हो गया तेरा।” फिर तीनों ने एक साथ चोदा—एक चूत में, एक पीछे, एक मुँह में। शरीर हिल नहीं सकता था। सिर्फ कंपन और दर्द।
सूरज निकलने से पहले उन्होंने मुझे खोला। शरीर पर नीले-लाल निशान, मोम के धब्बे, खून की धारियाँ, थूक और पानी। रोहित ने मेरे बाल पकड़कर आईने के सामने खड़ा किया। “देख। अब तू सिर्फ रांड है। भैया की पत्नी नहीं। हमारी।” मैंने देखा। आँखों में आँसू थे लेकिन चूत अभी भी धड़क रही थी। भूख और बढ़ गई थी।
वापस घर पहुँचे तो सुबह के छह बज रहे थे। राजेश अभी सो रहे थे। रोहित ने मुझे नहाने नहीं दिया। “ऐसे ही सो। निशान रहने चाहिए।” मैं बिस्तर पर लेटी। शरीर जल रहा था। हर हरकत पर दर्द। लेकिन अंदर एक अजीब सी शांति थी। भूख बुझी थी। बर्बर तरीके से।
अगले दिन रोहित ने फोन किया। “अगले हफ्ते और बड़ा इंतजाम है। चार मर्द। और एक कमरा जहाँ कैमरे भी लगेंगे। तैयार रह।”
मैंने फोन रखा। आईने में अपने निप्पल देखे—अभी भी सूजे हुए, काले निशान। नितंबों पर चाबुक के निशान। चूत में अभी भी उनका पानी। मैंने उँगली अंदर डाली। दर्द हुआ। लेकिन मुस्कुराई।
क्योंकि अब वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं था। रोहित की रस्सियाँ, अनिल का लंबा लंड, सुरेश का टेढ़ा धक्का—ये सब मेरी जिंदगी का हिस्सा बन चुके थे। और अगली बार… और ज्यादा बर्बर होने वाला था।
रात गहराती गई। शरीर में दर्द था। लेकिन मन में एक ही बात घूम रही थी—अगली बार जब जंजीरें खनकेंगी, जब चाबुक फटेगा, जब तीन नहीं चार लंड एक साथ अंदर होंगे… तब क्या होगा।
मैंने आँखें बंद कीं। और इंतजार करने लगी।
भतीजे ने चाची को कमरे में कैद किआ
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