बाबूजी की खूनी रस्सियाँ

बरसात की रात ससुर ने बहू को रस्सियों से बाँधा, गांड-चूत दोनों फाड़े, बेल्ट-छड़ी से पीटा, खून और वीर्य मिलाकर बनाया अपनी क्रूर मैल। दर्द में डूबी रांड अब हर रात और जोर से माँगती है।

हेलो दोस्तों… मेरा नाम रश्मि है। उम्र बत्तीस साल। शादी को आठ साल हो चुके थे लेकिन पेट में कोई निशान नहीं था। पति जयपुर में ऑफिस की नौकरी करता था और साल में मुश्किल से एक बार घर आता था। जब आता भी था तो उसका काम दो मिनट में खत्म हो जाता। छोटा, पतला और बेजान। मेरी भूख कभी नहीं बुझती थी।

मैं गाँव में सास-ससुर के साथ रहती थी। सास दो साल पहले गुजर गई थीं। ससुर राजेन्द्र सिंह, उनसठ साल के। लंबे, चौड़े कंधे, खेती की मेहनत से शरीर पत्थर जैसा सख्त। ऊंचाई छह फुट दो इंच। जब वे खेत से लौटते तो पसीने से भीगी बनियान उनके सीने पर चिपक जाती और मैं चुपके से देखती रह जाती।


मेरा शरीर साँवला लेकिन गदराया हुआ। छाती छत्तीस, कमर अट्ठाईस, नितंब छत्तीस। शहर से आई हुई थी इसलिए साड़ी पहनने का तरीका भी अलग था। ब्लाउज पीछे से खुला, साड़ी पतली, अंदर कभी-कभी कुछ नहीं। खेत में काम करते वक्त या नहाने के बाद तौलिया लपेटे उनके सामने से गुजरना मेरी आदत बन गई थी। उनकी नजरें मेरी छाती और कमर पर रुक जातीं। मैं जानती थी।

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एक शाम उन्होंने कहा, “बहू, रात को नहर की तरफ जाना है। पानी का रास्ता ठीक करना है। देर हो सकती है।”
मैंने झट से जवाब दिया, “मैं भी चलूँगी बाबूजी। अकेले घर में डर लगता है।”
वे हँसे, “ठीक है। लेकिन वहाँ क्या करेगी?”
“जो आप कहेंगे।”

खाना जल्दी बनाया। खाया। साइकिल निकाली। मैं आगे वाली छड़ पर बैठी। उन्होंने लुंगी और बनियान पहनी थी, अंदर कुछ नहीं। मैंने साड़ी पहनी, ब्रा-पैंटी दोनों नहीं। साइकिल चलते वक्त उनके जांघें मेरी गांड से रगड़ खा रही थीं। छाती मेरी पीठ से सट गई थी क्योंकि ब्लाउज खुला था।

बीस मिनट का रास्ता था लेकिन आधे रास्ते में काली घटा छा गई। जोर की बारिश शुरू हो गई।
हम एक पुराने बरगद के नीचे रुके। चारों तरफ अंधेरा। बारिश की आवाज और बिजली की कड़क। मुझे ठंड लगने लगी और साथ ही पेशाब की तेज इच्छा।

“बाबूजी… मुझे बहुत जोर से आ रहा है।”
“यहीं कर ले। आगे अंधेरा है, सांप-बिच्छू का डर।”
मैं चार कदम दूर साड़ी ऊपर करके बैठ गई। मूत की धार निकलने लगी। वे भी दूसरी तरफ लुंगी ढीली करके खड़े हो गए। तिरछी नजर से मैंने देखा—उनका लंड मोटा, लंबा, लगभग दस इंच, और तीन इंच से ज्यादा मोटा।

नसों वाली। मूत की धार सीधी निकल रही थी।
तभी जोर की बिजली कड़की। मैं डर के मारे चीखते हुए सीधे उनसे चिपक गई। हलचल में उनकी लुंगी नीचे खिसक गई। मेरी नंगी चूत उनके आधे खड़े लंड से सट गई। उनके हाथ खुद-ब-खुद मेरी कमर पर आ गए।

“क्या हुआ बहू? इतना डर गई?”
“बिजली… मेरा पेशाब भी रुक गया।”
फिर एक और जोरदार कड़क। डर के मारे मेरा बाकी पेशाब उनके लंड पर ही निकल गया। गर्म धार उनके मोटे लंड पर बहने लगी। वे आँखें बंद करके बोले, “ओह… ठंडी बारिश में तेरा गरम मूत… जादू कर रहा है बहू।”

मैं काँप रही थी। उनके लंड पर मेरा मूत और उनकी मूत की धार मेरी चूत के मुँह पर मिल रही थी। दोनों का पानी गरम-गरम मिलकर मेरी गांड और जांघों पर बह रहा था।
तभी मेरे पैर के नीचे कुछ रेंगा। मैं चीखकर उछली। दोनों पैर उनकी कमर में लिपट गए। मेरी चूत सीधे उनके लंड पर बैठ गई। सपोर्ट के लिए उनके दोनों हाथ मेरी नंगी गांड पर आ गए। एक उंगली गांड की दरार में घुस गई।

“अह्ह्ह… बाबूजी…”
“तेरी गांड में एक बाल भी नहीं कुतिया। और तू मेरे लंड पर बैठकर मूत रही है।”
मैंने जवाब दिया, “तेरा बेटा मेरी प्यास नहीं बुझाता… बाप है कि चूत पर मूत रहा है।”
उन्होंने जोश में उंगली और अंदर धकेल दी। दर्द हुआ लेकिन साथ में अजीब सुकून भी। मैं सिसकते हुए उनकी उंगली पर अपनी गांड घुमाने लगी। लंड मेरी गीली चूत पर रगड़ खा रहा था।

वे मुझे नीचे उतारे। साड़ी फाड़कर फेंक दी। बनियान उतारी। दोनों नंगे। बारिश की बूंदें हमारे शरीर पर पड़ रही थीं। मिट्टी गीली। मैंने उनके गांड की दरार में उंगली डाल दी।
“साली रांड… अपने ससुर की गांड में उंगली… अब चाटेगी क्या?”

मैंने चाट लिया। कड़वी-मीठी। फिर घुटनों के बल बैठ गई। “बाबूजी… अपना खंबा मेरी गांड में डाल दो। कुत्ते-कुतिया की तरह चोदो। मेरे बूब्स पीकर अपनी औलाद जैसा सुख दो।”
वे पीछे आए। पहले चूत में। मोटा लंड अंदर घुसते वक्त मुझे लगा जैसे कोई लोहे का डंडा फाड़ रहा हो।
“आह्ह्ह… आराम से बाबूजी… बहुत बड़ा है…”

“चुप रंडी। ले अपने बाप का लंड। तेरी टाइट चूत का भोसड़ा बना दूँगा।”
धक्के शुरू हुए। जोर के। क्रूर। हर धक्के पर मेरी छाती आगे को झूल रही थी। वे बाल पकड़कर पीछे खींच रहे थे। एक हाथ से मेरे बूब्स कुचल रहे थे। निप्पल इतने जोर से पिंच किए कि आँसू निकल आए।
“मार… जोर से मार… तेरा बेटा तो कुछ नहीं करता… तू मार…”

लंड बाहर निकाला और मेरे मुँह में ठूंस दिया। गला तक। मैं उल्टी जैसी कर रही थी लेकिन वे बाल पकड़कर और अंदर धकेल रहे थे।
“पी जा साली… सारा माल पी।”
फिर गांड की बारी। उन्होंने थूक लगाकर एक झटके में घुसा दिया। दर्द से मैं चीखी। आवाज जंगल में गूँज गई।
“अह्ह्ह मादरचोद… फाड़ मत डाल…”

“फाड़ूँगा ही रांड। तेरी गांड मेरी है अब।”
धक्के और तेज। हर धक्के पर उनकी उंगलियाँ मेरी चूत में घुसकर क्लिट को कुचल रही थीं। बारिश में कीचड़ लग रहा था। मेरे घुटने मिट्टी में धंस गए। वे मुझे कुतिया की तरह घसीटते हुए एक पेड़ के तने से सटा दिए। हाथ पीछे बाँध दिए अपनी लुंगी से। फिर से गांड में।
“अब तू सिर्फ मेरे लिए है। समझी?”

“हाँ… बाबूजी… सिर्फ आपकी…”
वे झड़ गए। गर्म माल मेरी गांड के अंदर भर गया। कुछ बाहर निकलकर जांघों पर बहने लगा। उन्होंने उंगली से निकाल-निकालकर मेरे मुँह में डाल दिया।
“चाट अपनी गांड का जूस।”
मैंने चाटा।

उस रात हम घर नहीं लौटे। बरगद के नीचे ही उन्होंने मुझे तीन बार और लिया। चूत, गांड, मुँह। बीच-बीच में थप्पड़, बाल खींचना, निप्पल दबाना। मैं रो भी रही थी और माँग भी रही थी।
सुबह जब घर पहुँचे तो शरीर पर नील और खरोंच थे। लेकिन अंदर एक अजीब शांति थी।

उसके बाद हमारी चुदाई रुकी नहीं। खेत में, घर में, रात में, दोपहर में। कभी वे मुझे रस्सी से बाँधकर चारपाई से लटका देते। कभी मुँह में कपड़ा ठूंसकर चुपचाप चोदते। कभी मेरे पति के फोन पर बात करते वक्त ही पीछे से घुस जाते।
मैं गर्भवती हो गई।

जब पेट निकला तो सबने सोचा जयपुर वाले दामाद का है। मैंने भी वही कहा। लेकिन रात को जब बाबूजी मेरे बड़े होते पेट को सहलाते और फिर धीरे-धीरे अंदर घुसते तो फुसफुसाते, “ये मेरा है रश्मि… तेरे अंदर मेरा खून है।”
अब बच्चा दो साल का हो गया है। गोरा, मजबूत, बाबूजी जैसा। पति कभी-कभी आता है, उपहार लाता है, बच्चे को गोद में लेकर खुश होता है। मैं मुस्कुराती हूँ।

रात को जब सब सो जाते हैं तो बाबूजी मेरे कमरे में आते हैं। दरवाजा बंद होता है। फिर वही क्रूर हाथ, वही मोटा लंड, वही गालियाँ।
“आज गांड मारूँगा या चूत?”
“जो चाहो बाबूजी… मैं आपकी रांड हूँ।”
और फिर अंधेरे में दर्द और मजे का वो खेल शुरू हो जाता है जो कभी खत्म होने वाला नहीं।

मैं खुश हूँ। तगड़े लंड के साथ एक बच्चा भी मिल गया। और एक ऐसा मालिक जो मेरी हर भूख को क्रूरता से मिटा देता है।
रातें अब और भी काली और लंबी हो गई थीं। बच्चा दो साल का हो चुका था। नाम रखा था अरुण। गोरा, मजबूत कंधे, बाबूजी जैसी तेज आँखें। दिन में मैं उसे गोद में लेकर घूमती, दूध पिलाती, खिलाती। पड़ोसी और रिश्तेदार सब कहते, “देखो न, दामाद का खून है। जयपुर वाले की औलाद।” मैं मुस्कुरा देती।

अंदर से जानती थी कि ये खून बाबूजी का है। हर रात जब अरुण सो जाता, दरवाजा बंद होता, तो सच्चाई बाहर आ जाती।
एक रात खास थी। बाबूजी ने पहले से ही तैयारी कर रखी थी। कमरे में मोटी रस्सियाँ, एक पुरानी चमड़े की बेल्ट, और खेत से लाई हुई पतली बांस की छड़ी। बच्चे को दूसरी कोठरी में सुला दिया था। दरवाजा अंदर से बंद किया।

वे नंगे खड़े थे। लंड पहले से ही सख्त, नसों से भरा, दस इंच लंबा और तीन इंच से ज्यादा मोटा। सिरे से पहले से ही पानी टपक रहा था।
“आज सिर्फ गांड नहीं। आज पूरा शरीर मेरा है। समझी रांड?”
मैं घुटनों के बल बैठ गई। “हाँ बाबूजी… पूरा।”

उन्होंने मेरी दोनों कलाई पीछे बाँध दीं। इतनी कसकर कि खून का बहाव रुकने लगा। फिर टखनों को भी बाँधकर घुटनों से सटा दिया। मैं कुतिया की तरह चारों तरफ से बंधी हुई थी। मुँह में उन्होंने अपना अंडरवियर ठूंस दिया। गला बंद। साँस लेने में तकलीफ।
पहले थप्पड़। इतने जोर का कि गाल जल उठा। फिर दूसरा। तीसरा। आँखों से पानी निकलने लगा। वे हँस रहे थे।
“रो मत। आज और रोएगी।”

बेल्ट निकाली। पहली मार मेरी नंगी गांड पर पड़ी। आवाज कमरे में गूँजी। दूसरी, तीसरी, दसवीं। गांड लाल हो गई, सूजने लगी। हर मार के साथ मैं सिसक रही थी लेकिन आवाज अंडरवियर में दब जा रही थी। वे बीच-बीच में उंगली गांड की दरार में घुसाकर घुमाते। दर्द और जलन एक साथ।
“अब चूत की बारी।”

उन्होंने मुझे पेट के बल लिटाया। टाँगें फैला दीं। बांस की छड़ी से चूत पर धीरे-धीरे मारने लगे। हल्की लेकिन लगातार। क्लिट पर सीधी चोट। मैं उछल रही थी, रस्सियाँ कस रही थीं। खून की कुछ बूँदें निकल आईं। वे उंगली से चाट गए।
“मीठा खून है तेरा।”

फिर लंड। बिना थूक के, बिना तैयारी के, सीधे गांड में। एक झटका। पूरा अंदर। दर्द इतना तेज कि मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वे रुके नहीं। धक्के शुरू हो गए। जोर के, क्रूर, जैसे कील ठोक रहे हों। हर धक्के पर मेरी छाती फर्श से रगड़ खा रही थी। निप्पल घिस रहे थे।
बीच में उन्होंने मुँह से कपड़ा निकाला। “अब बोल। क्या कहती है?”

“बाबूजी… फाड़ दो… मार डालो… लेकिन रुको मत…”
वे और तेज हो गए। एक हाथ से मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। दूसरा हाथ गले पर दबाया। साँस रुकने लगी। उसी हालत में वे झड़ गए। गर्म माल गांड के अंदर फूट पड़ा। इतना कि बाहर निकलकर जांघों पर बहने लगा।
लेकिन खत्म नहीं हुआ।

उन्होंने लंड बाहर निकाला और मेरे मुँह में ठूंस दिया। “चाट। अपनी गांड का जूस और मेरा माल दोनों।”
मैंने चाटा। कड़वा, नमकीन, मिट्टी और पसीने की गंध। वे संतुष्ट नहीं हुए। फिर से खड़ा कर दिया। इस बार चूत में। इतनी जोर से कि गर्भाशय तक धक्के पहुँच रहे थे। वे मेरे पेट पर हाथ रखकर दबा रहे थे।
“ये अरुण यहीं बना था। याद है? आज फिर से भरूँगा।”

मैं पागलों की तरह चीख रही थी। “हाँ… भर दो… अपना दूसरा बीज डाल दो…”
रात भर ये सिलसिला चला। कभी रस्सी से लटकाकर, कभी फर्श पर घसीटकर, कभी दीवार से सटाकर। बेल्ट से पीटना, निप्पल पर क्लिप लगाना (खेत की पुरानी लोहे की क्लिप), गांड में उंगलियाँ फैलाना, मुँह में थूकना। वे गालियाँ बकते जा रहे थे—रांड, कुतिया, भोसड़ी, अपने ससुर की मैल।

सुबह चार बजे जब रुके तो मेरा पूरा शरीर नीला-लाल था। गांड से खून और वीर्य मिला हुआ बह रहा था। चूत सूजी हुई। गले पर उंगलियों के निशान। वे मुझे खोलकर चारपाई पर लिटा गए। खुद पास लेट गए।
“सो जा। कल रात और नया खेल है।”

मैं सो नहीं पाई। शरीर जल रहा था लेकिन अंदर एक अजीब संतुष्टि थी। दर्द में मजा, अपमान में सुकून।
अगले दिन पति का फोन आया। “मैं अगले हफ्ते आ रहा हूँ। अरुण के लिए खिलौने लाऊँगा।”
मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है।” फोन काटकर बाबूजी की तरफ देखा। वे खेत से लौट रहे थे। नजरें मिलीं। उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
रात को फिर वही। लेकिन इस बार और क्रूर। उन्होंने मुझे अरुण की पालने के पास ले जाकर बाँध दिया। बच्चा सो रहा था।

वे मेरे मुँह में कपड़ा ठूंसकर पीछे से घुसे। हर धक्के के साथ पालना हिल रही थी। डर और उत्तेजना का मिश्रण। अगर बच्चा जाग गया तो?
लेकिन वे नहीं रुके। बल्कि और जोर से। “देख, तेरा बेटा सो रहा है और तू उसके बाप के बाप से चुदवा रही है।”
मैं आँसू बहाते हुए चरम पर पहुँची। शरीर काँप रहा था। वे भी उसी पल झड़ गए।

उस रात के बाद से नियम और सख्त हो गए। दिन में मैं घर का काम करती, बच्चे को संभालती, लेकिन रात को बाबूजी का हुक्म। कभी वे मुझे खेत में ले जाते, पेड़ से बाँधते, पूरे गाँव के सोने के बाद जोर-जोर से चोदते। कभी घर में ही, रसोई में, आँगन में। कभी मेरे पति के फोन पर वीडियो कॉल करते वक्त पीछे से उंगली डाले रखते। मैं मुस्कुराती रहती।

एक रात उन्होंने नया खेल सिखाया। मुझे उलटा लटकाया। सिर नीचे, पैर ऊपर। फिर मुँह में लंड ठूंसकर गांड में छड़ी घुमाई। खून निकला। वे खुश हुए।
“अब तू पूरी तरह मेरी मैल है। कोई और तुझे छू भी नहीं सकता।”
मैंने वही दोहराया, “हाँ बाबूजी… सिर्फ आपकी।”

समय बीतता गया। अरुण तीन साल का हो गया। पति साल में एक-दो बार आता। उपहार देता, बच्चे को गोद में लेकर खेलता, फिर चला जाता। मैं रात भर बाबूजी के नीचे कराहती रहती।
कभी-कभी बाबूजी इतने क्रूर हो जाते कि मुझे लगता अब मर ही जाऊँगी। लेकिन हर बार बच जाती। और अगली रात फिर खुद ही दरवाजा खोलकर इंतजार करती।

एक ठंडी रात उन्होंने मुझे आँगन में नंगा बाँध दिया। सर्दी में शरीर काँप रहा था। उन्होंने ठंडा पानी डाला। फिर गरम लंड गांड में घुसाया। ठंड और गर्मी का खेल। मैं पागल हो गई थी। चीखें निकल रही थीं लेकिन मुँह बंद था।
अंत में जब वे झड़कर मुझे खोलते, तो धीरे से मेरे बाल सहलाते और कहते, “अच्छी रांड है तू। मेरी।”
मैं उनकी छाती से चिपक जाती। शरीर दर्द से भरा, लेकिन मन शांत।

अब सालों बीत चुके हैं। अरुण स्कूल जाता है। पति अभी भी जयपुर में है। और मैं… मैं बाबूजी की निजी वस्तु बन चुकी हूँ। हर रात नया अत्याचार, नई यातना, नया मजा। रस्सियाँ, बेल्ट, छड़ी, थप्पड़, गला दबाना, बाल खींचना, खून निकलना—सब सामान्य हो गया है।
कभी-कभी मैं खुद माँगती हूँ, “आज और जोर से मारना बाबूजी। आज गांड फाड़ देना।”

वे हँसते हैं और वही करते हैं।
कहानी खत्म नहीं होती। हर रात एक नया अध्याय शुरू होता है। दर्द का, अपमान का, और उस क्रूर सुख का जो सिर्फ बाबूजी दे सकते हैं। और मैं… मैं उनकी रांड बनी रहती हूँ। हमेशा के लिए।

गला दबती शादीशुदा औरत कुतिया

माँ की दोनों छेदों की बर्बर लूट

नहर किनारे बँधी अंजलि की चीखें

कॉलेज गर्ल प्रिया खून-चाबुक वाली गुलाम चूत

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