माँ की दोनों छेदों की बर्बर लूट

सौतेली माँ रानी को बेटा और दर्जी ने रस्सियों से बाँधकर चूत-गाँड दोनों फाड़ डाले। मोम, बेल्ट, डबल पेनिट्रेशन और क्रूर बीडीएसएम से भरी वह रात, जो जिंदगी भर नहीं भूली जा सकती।

मेरा नाम विकास है। उम्र बाईस साल। शरीर जिम की वजह से पत्थर जैसा कड़ा, कंधे चौड़े, सीना फूला हुआ और जांघें लोहे की तरह। लंड खड़ा होने पर नौ इंच लंबा, मोटा और नसों से भरा रहता था। पापा अक्सर मुंबई के बाहर बिजनेस ट्रिप पर रहते थे। घर सिर्फ मैं और मेरी सौतेली माँ रानी।


रानी की उम्र अड़तीस। गोरी चमकदार त्वचा, लंबे काले बाल, भारी भरे स्तन जो किसी भी ब्लाउज को फाड़ने को तैयार रहते, पतली कमर और गोल-मटोल गांड। वे क्लब गर्ल जैसी जिंदगी जीती थीं—महंगे कपड़े, लेट नाइट पार्टियां, और घर में बेपरवाह। मैं चार साल का था जब असली माँ नहीं रहीं। पापा ने रानी से शादी कर ली। रानी रिश्ते में दूर की मौसी भी थीं, लेकिन मैं उन्हें सिर्फ माँ कहता था। और वे मुझे अपने सीने से चिपकाकर, चूचियों से दबाकर प्यार जतातीं।


रानी घर में अक्सर सिर्फ पैंटी और ब्रा में घूमतीं। कभी-कभी तो सिर्फ पैंटी। मेरा लंड तुरंत खड़ा हो जाता। वे हंसतीं और कहतीं, “कितना बड़ा हो गया है तू… देख, कैसे फूल रहा है।” फिर मुझे गले लगातीं। उनके नरम गर्म स्तन मेरे सीने में धंस जाते। मैं कसमसाता रहता।


एक दिन रानी को नया लहंगा सिलवाना था। उन्होंने शहर के पुराने इलाके में सुरेंद्र नाम के दर्जी की दुकान चुनी। सुरेंद्र पैंतालीस का, काला मजबूत शरीर, मोटे हाथ और आंखों में गंदी चमक। दो दिन बाद जब रानी सूट लेकर आईं तो वह ढीला सिल दिया गया था। उस दिन करवा चौथ था। रानी पूरे दिन भूखी-प्यासी, सिंदूर लगाए, काली साड़ी और पीला स्लीवलेस ब्लाउज में। मंगलसूत्र उनके भारी स्तनों के बीच लटक रहा था। गुस्से में उन्होंने मुझे साथ लिया।

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दुकान पर पहुंचते ही रानी सुरेंद्र पर चिल्ला पड़ीं। सुरेंद्र ने ठंडी आवाज में कहा, “अंदर आ जाओ भाभी। दोबारा नाप ले लूंगा।” रानी अंदर गईं। मैं भी पीछे-पीछे। एक कामगार ने रोका तो सुरेंद्र बोला, “आने दे। आज इसके सामने ही इसकी माँ के कपड़े सही करूंगा।”
अंदर का कमरा अंधेरा और बंद था। सुरेंद्र ने झट से दरवाजा बंद किया। रानी गुस्से में बोलीं, “जल्दी नाप लो।” सुरेंद्र ने उनकी कमर दोनों हाथों से कसकर पकड़ी और गर्दन पर मुंह लगा दिया। जोर से चूसा। रानी चीखीं, “अरे… छोड़ो… बेटा सामने है!”


सुरेंद्र ने कान में गुर्राया, “चुप साली रंडी। आज तेरी सारी गर्मी निकालूंगा। बाहर इतनी अकड़ दिखा रही थी।” उसने रानी के दोनों हाथ ऊपर उठाए और बगलों को चूसने लगा। गर्मी से बगलों में पसीने की बूंदें थीं। सुरेंद्र ने उन्हें चाटा, चूसा, दांत गड़ाए। रानी तड़प रही थीं।
“व्रत है ना आज?” सुरेंद्र ने पूछा। “हां…” रानी ने कांपती आवाज में कहा। “तो आज तेरा व्रत मेरे लंड से तोड़ूंगा।”


उसने रानी को घुटनों पर बैठाया। अपना काला मोटा लंड निकाला—आठ इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा। रानी के मुंह में जबरदस्ती ठूंस दिया। रानी ने पहले विरोध किया लेकिन सुरेंद्र ने बाल पकड़कर सिर आगे-पीछे किया। गला भर गया। आंसू निकल आए। फिर भी उन्होंने चूसना शुरू कर दिया। दस मिनट तक लपलप आवाजें आती रहीं। सुरेंद्र ने जोर से धक्का दिया और पूरा माल रानी के मुंह में उड़ेल दिया। रानी ने निगल लिया। मुंह से सफेद द्रव टपक रहा था।


वे मेरी तरफ देखकर बोलीं, “बेटा… आंखें बंद कर ले।” लेकिन मेरा लंड पैंट में फटने को था। मैंने झूठ-मूठ आंखें बंद कीं फिर खोल लीं।
सुरेंद्र ने रानी को फर्श पर लिटाया। साड़ी और ब्लाउज फाड़ दिए। सिर्फ मंगलसूत्र और सिंदूर बचा। उसने रानी की चूत के होंठ खींच-खींचकर चूसे। जीभ अंदर घुसाई। रानी कराह उठीं। सुरेंद्र ने मुझे बुलाया, “आजा पट्ठे। अपनी माँ की चूत की खुशबू सूंघ।” उसने मेरा सिर नीचे दबाया। गरम, गीली, तीखी गंध। “कैसी है?” उसने थप्पड़ मारा। मैं बोला, “बहुत अच्छी।”


“बोल अपनी माँ से—मैं सुरेंद्र की रंडी हूँ।” रानी ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, “बेटा… मैं सुरेंद्र की रंडी हूँ।”
फिर सुरेंद्र ने अपना लंड रानी की चूत में धकेल दिया। एक झटके में पूरा। रानी चीखीं। सुरेंद्र ने दोनों टांगें कंधों पर चढ़ाईं और बर्बरता से धक्के लगाने लगा। चूत की फांके फैल गईं। पानी की आवाजें गूंजने लगीं। रानी की सिसकियां कमरे में गूंज रही थीं—“आह… आह… और जोर से…”
मैं पास बैठ गया। रानी ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने स्तनों पर रख दिया। “मसल… जोर से मसल।” मैंने दोनों स्तनों को मसला, निपल्स को दबाया, खींचा। सुरेंद्र हंस रहा था, “देख रंडी… तेरा बेटा भी तैयार है।”


रानी ने मुझसे कहा, “अपना लंड निकाल और मेरे मुंह में डाल।” मैंने पैंट खोली। मेरा नौ इंच का मोटा लंड बाहर निकला। रानी की आंखें चमक उठीं। “वाह… ये तो सुरेंद्र से भी बड़ा है।” उन्होंने मुंह खोला और पूरा अंदर ले लिया। गला भर गया फिर भी चूसती रहीं। उम्म… आह… उम्म…। मैंने उनके बाल पकड़कर और गहरा धकेल दिया। जल्दी ही मैं झड़ गया। रानी ने सारा माल निगल लिया।


सुरेंद्र ने चूत से लंड निकाला और फिर रानी के मुंह में ठूंस दिया। “अब मेरा भी चूस।” रानी ने दोनों लंड बारी-बारी चूसे। सुरेंद्र ने फिर से चूत में घुसेड़ दिया। इस बार और क्रूर। उसने रानी के गले पर हाथ रखा और दबाया। रानी की सांस उखड़ने लगी लेकिन आंखों में कामुकता थी। “और जोर… मुझे तोड़ डाल…”


मैंने रानी के स्तनों को मुंह में लिया। निपल्स को दांतों से काटा। रानी चीख रही थीं लेकिन मना नहीं कर रही थीं। सुरेंद्र ने उन्हें उल्टा कर दिया—कुत्ते की तरह। गांड ऊपर। उसने चूत में लंड डालते हुए गांड के छेद में उंगली घुसाई। रानी तड़प उठीं। “नहीं… वहां मत…” लेकिन सुरेंद्र ने दो उंगलियां अंदर कर दीं। फिर लंड निकालकर गांड में धकेलने लगा। धीरे-धीरे पूरा। रानी की आंखें पानी से भर गईं। “आह्ह्ह… फट गई…” सुरेंद्र ने बाल पकड़कर खींचे और जोर-जोर से धक्के मारे।


मैं सामने बैठा उनके मुंह में लंड डाले हुए था। रानी दोनों छेदों में भरी हुई थीं। सुरेंद्र ने कहा, “बोल… मैं क्या हूँ?” “तुम्हारी रंडी… बेटे की भी रंडी…”
थोड़ी देर बाद सुरेंद्र बाहर चला गया। कमरा सिर्फ हम दोनों का बचा। रानी ने मुझे ऊपर खींचा। “अब तू… मेरी चूत में डाल।” मैंने अपना लंड उनकी गीली, सूजी हुई चूत में घुसेड़ दिया। रानी ने पैर मेरे कमर पर लपेट लिए। “जोर से… जितना हो सके जोर से।” मैंने दोनों हाथ उनके गले पर रखे और बर्बरता से धक्के लगाने लगा। बिस्तर की जगह फर्श पर ही। चूत की आवाजें, रानी की चीखें, मेरे ग्रन्ट। मैंने उनके स्तनों को मुंह में भर लिया और काटा। निपल्स पर दांत के निशान पड़ गए।


रानी झड़ गईं। शरीर कांप उठा। मैंने लंड निकाला और उनके मुंह में डाल दिया। उन्होंने चूसते हुए मुझे फिर झाड़ दिया। सारा माल उनके मुंह और चेहरे पर।
हम कपड़े पहनने लगे तभी सुरेंद्र वापस आया। “अभी भी यहीं पड़ी है रंडी? निकल जा। धंधे का टाइम है।” रानी गुस्से में बोलीं, “सूट सही कर।” सुरेंद्र ने गाल पर थप्पड़ मारा और चुम्मा लिया। “एक घंटे में आना। वरना फिर से दोनों छेद फाड़ दूंगा।”


हम घर लौटे। रास्ते में रानी चुप थीं लेकिन आंखों में आग थी। घर पहुंचते ही उन्होंने दरवाजा बंद किया और मुझे बेडरूम में खींच लिया। “आज से तू जब चाहे… जहां चाहे।” उन्होंने खुद को मेरे आगे नंगा कर दिया। मैंने उन्हें दीवार से सटाया। एक पैर ऊपर उठाया और खड़े-खड़े चोदा। फिर बिस्तर पर। फिर बाथरूम में। रात भर।


उस दिन के बाद से घर का हर कोना हमारी चुदाई का गवाह बना। कभी रानी को रस्सी से बांधकर, कभी आंखों पर पट्टी बांधकर, कभी उनके मुंह में कपड़ा ठूंसकर। कभी सुरेंद्र भी बुला लिया जाता। तीनों मिलकर। रानी दोनों लंड एक साथ लेतीं—एक चूत में, एक मुंह में। कभी गांड में। वे खुद मांगतीं—“आज और क्रूर बनो… मुझे तोड़ दो।”


पापा जब आते तो सब सामान्य। लेकिन जैसे ही वे जाते, रानी मेरी रंडी बन जातीं। कभी वे खुद मुझे जगातीं और लंड मुंह में ले लेतीं। कभी मैं उन्हें सोते हुए पकड़ता और चूत में घुसेड़ देता। वे आधी नींद में कराहतीं और पैर फैला देतीं।
एक रात मैंने उन्हें पूरी तरह बांध दिया। हाथ-पैर बिस्तर से। आंखें ढक दीं। मोमबत्ती की मोम उनके स्तनों पर टपकाई। वे चीखीं लेकिन मना नहीं किया। फिर चूत और गांड दोनों में बारी-बारी। सुबह तक उनके शरीर पर निशान थे—दांत के, नाखून के, रस्सी के। वे आईने के सामने खड़ी होकर मुस्कुराईं। “ये निशान मुझे याद दिलाते हैं कि मैं कितनी बड़ी रंडी हूँ।”


अब सालों बीत गए। पापा अभी भी अक्सर बाहर रहते हैं। और मैं और रानी… हर मौके का फायदा उठाते हैं। कभी क्लब से लौटकर नशे में, कभी दिन के उजाले में, कभी रसोई में खाना बनाते हुए। रानी की चूत हमेशा तैयार रहती है। मेरा लंड हमेशा भूखा।


उस दर्जी की दुकान वाली रात को मैं आज भी याद करता हूँ। जब पहली बार माँ के मुंह में अपना लंड देखा, जब पहली बार उनकी चूत में घुसा, जब पहली बार उन्हें किसी और के नीचे कराहते देखा। वह रात हमारी जिंदगी का वो मोड़ थी जहां सब कुछ बदल गया। और अब वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं।


रात और गहरी हो चली थी। घर में सिर्फ पंखे की आवाज और रानी की भारी सांसें गूंज रही थीं। मैं अभी भी उनके ऊपर लेटा था। मेरा लंड उनकी चूत से निकला नहीं था। अंदर ही अंदर धड़क रहा था। रानी की आंखें बंद थीं लेकिन होंठ खुले। मुंह के कोनों से थूक और वीर्य मिला हुआ द्रव टपक रहा था।
मैंने उनके गाल पर थप्पड़ मारा। जोर से। “आंखें खोल।”


रानी ने आंखें खोलीं। उनमें आंसू और वासना दोनों थे। “मालिक… और करो।”
मैंने लंड निकाला। चूत से सफेद गाढ़ा द्रव निकलकर जांघों पर बहने लगा। मैंने उन्हें उल्टा कर दिया। पेट के बल। दोनों हाथ उनकी पीठ पर मोड़कर एक हाथ से पकड़े। दूसरे हाथ से उनकी गांड के दोनों भागों को फैलाया। गुदा का छेद अभी भी सूजा हुआ और लाल था। सुरेंद्र के लंड का निशान साफ दिख रहा था।


मैंने थूक लगाकर अपना लंड वहां घुसेड़ दिया। एक झटके में आधा। रानी चीख पड़ीं। “आह्ह्ह… फट रहा है… धीरे…”
मैंने बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “धीरे नहीं। आज पूरा रास्ता साफ करूंगा।”
और मैंने पूरा लंड अंदर धकेल दिया। रानी की चीख दब गई। शरीर तन गया। मैंने दोनों हाथ उनकी कमर पर रखे और बर्बरता से धक्के लगाने लगे। हर धक्के के साथ उनकी गांड की मांसपेशियां कांपतीं। चूत से पहले वाला वीर्य निकल-निकलकर फर्श पर गिर रहा था


मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनकी चूत में तीन उंगलियां घुसा दीं। साथ-साथ दोनों छेदों को भर दिया। रानी पागलों की तरह कराहने लगीं। “विकास… मुझे मार डाल… लेकिन रुक मत…”
मैंने उंगलियां निकालकर उनके मुंह में ठूंस दीं। “चाट। अपनी गांड और चूत का स्वाद।”
रानी ने जीभ निकालकर चाटा। आंखों में पानी भर आया लेकिन चूसती रहीं।
तभी फोन की घंटी बजी। सुरेंद्र का नंबर। मैंने स्पीकर ऑन कर दिया। “बोल।”


सुरेंद्र की मोटी आवाज आई, “रंडी तैयार है? मैं आ रहा हूँ। आज दोनों को एक साथ लेना है।”
रानी ने मुंह से उंगलियां निकालकर कहा, “आ जाओ… दोनों छेद खुले पड़े हैं।”
बीस मिनट बाद सुरेंद्र दरवाजे पर था। काली शर्ट, पैंट में उभार साफ। जैसे ही अंदर आया, उसने रानी को देखकर हंसा। “क्या हाल है भाभी जी? बेटे ने अच्छी तरह इस्तेमाल किया लगता है।”


उसने अपनी पैंट खोली। लंड पहले से भी ज्यादा मोटा और कड़ा लग रहा था। उसने रानी के बाल पकड़कर खींचे और मुंह में ठूंस दिया। गला तक। रानी की आंखें फटी की फटी रह गईं। सुरेंद्र ने सिर पकड़कर जोर-जोर से आगे-पीछे किया। गला भरने की आवाज आने लगी। थूक मुंह से निकलकर छाती पर गिरने लगा।


मैं पीछे से उनकी गांड में फिर से घुस गया। अब दोनों लंड एक साथ—एक मुंह में, एक गांड में। रानी का शरीर दो तरफ से धकेल रहा था। सुरेंद्र ने कहा, “आज डबल पेनिट्रेशन करेंगे। चूत और गांड दोनों।”
उसने रानी को उठाया। मैं बिस्तर पर लेट गया। रानी को मेरे ऊपर बैठाया। मेरा लंड उनकी चूत में चला गया। फिर सुरेंद्र ने पीछे से गांड में अपना लंड धकेला। दोनों लंड अंदर। रानी की चीख ऐसी निकली जैसे जान निकल रही हो। “नहीं… बहुत भरा हुआ है… निकल जाएगा…”
सुरेंद्र ने उनके कंधे दबाए। “निकलने नहीं देंगे। आज दोनों छेद फाड़कर रख देंगे।”


फिर दोनों ने एक साथ धक्के लगाने शुरू किए। एक अंदर जाता तो दूसरा बाहर। फिर दोनों एक साथ। रानी का शरीर बीच में पिसे जा रहा था। स्तन ऊपर-नीचे हो रहे थे। निपल्स इतने कड़े हो गए थे कि काटे जा सकते थे। मैंने मुंह में एक निपल लिया और दांत गड़ा दिए। खून की एक बूंद निकली। रानी और जोर से चीखीं लेकिन शरीर और खुल गया।


सुरेंद्र ने उनके गले पर दोनों हाथ रख दिए और दबाया। सांस रुकने लगी। चेहरा लाल हो गया। आंखें उलटने लगीं। ठीक उसी समय दोनों ने जोरदार धक्के मारे और अंदर ही अंदर झड़ गए। गर्म वीर्य दोनों छेदों में भर गया। रानी का शरीर कांपता रहा। जब सुरेंद्र ने गला छोड़ा तो वे भारी सांस लेकर बोलीं, “और… अभी और चाहिए…”


सुरेंद्र हंसा। “साली असली रांड निकली।”
उसने रानी को फर्श पर घुटनों के बल बैठाया। दोनों लंड उनके सामने। “अब दोनों साफ कर।”
रानी ने बारी-बारी दोनों लंड चूसे। पहले मेरा, फिर सुरेंद्र का। वीर्य, थूक और उनकी अपनी चूत-गांड का रस मिलाकर चाटती रहीं। मुंह चमक रहा था।


फिर सुरेंद्र ने एक रस्सी निकाली जो उसने साथ लाई थी। रानी के दोनों हाथ पीठ के पीछे बांध दिए। आंखों पर काला कपड़ा बांध दिया। मुंह में उनका ही पैंटी ठूंस दी। फिर उन्हें कुर्सी पर बैठाया। टांगें फैलाकर कुर्सी के पायों से बांध दीं। चूत और गांड पूरी तरह खुली।
उसने मोमबत्ती जलाई। पहली बूंद उनके बाएं स्तन पर गिरी। रानी तड़प उठीं। दूसरी बूंद निपल पर। तीसरी चूत के ऊपर। मोम जमती गई।

लाल निशान पड़ते गए। मैंने उनकी चूत में चार उंगलियां घुसा दीं और फैलाया। सुरेंद्र ने मोम वहां भी टपकाई। रानी की चीख पैंटी के अंदर दब गई।
फिर सुरेंद्र ने एक पतली बेल्ट निकाली। चूत पर एक जोरदार वार। लाल निशान। दूसरा वार। तीसरा। रानी का शरीर कुर्सी पर उछल रहा था लेकिन बंधी होने की वजह से हिल नहीं सकती थीं। मैंने उनके मुंह से पैंटी निकाली। “बोल क्या चाहिए?”


“और मारो… और चोदो… मुझे कुत्ते की तरह इस्तेमाल करो…”
सुरेंद्र ने बेल्ट उनकी गांड पर मारी। फिर चूत पर। फिर स्तनों पर। निशान गहराते गए। इसके बाद उसने अपना लंड फिर से गांड में ठूंस दिया। मैंने चूत में। अब दोनों छेद फिर से भरे हुए थे। इस बार और तेज। कुर्सी चरमरा रही थी। रानी की चीखें घर में गूंज रही थीं।
एक घंटे तक यही चलता रहा। कभी लंड निकालकर उनके चेहरे पर थप्पड़, कभी स्तनों को मरोड़ना, कभी निपल्स को दांतों से खींचना। रानी कई बार झड़ चुकी थीं। शरीर पसीने और वीर्य से चमक रहा था। आंखों का कपड़ा आंसुओं से गीला हो चुका था।


आखिर में सुरेंद्र ने रस्सी खोली। रानी फर्श पर गिर पड़ीं। हम दोनों ने उन्हें बीच में लिया। एक ने मुंह में लंड दिया, दूसरे ने चूत में। फिर स्थान बदले। रात भर।
सुबह जब पहली रोशनी आई तो रानी अभी भी फर्श पर ही थीं। शरीर पर नीले-लाल निशान, जांघों पर सूखा वीर्य, बाल बिखरे हुए। मैंने पानी लाकर उनके चेहरे पर छिड़का। उन्होंने आंखें खोलीं और मुस्कुराईं। “विकास… सुरेंद्र… दोनों ने आज सही मायनों में मालिकाना हक जताया।”
सुरेंद्र कपड़े पहनते हुए बोला, “अगली बार और सामान लाऊंगा। हाथ analog कफ़, गैग, वैक्यूम पंप… सब। तेरी चूत और गांड को नई-नई सजा दूंगा।”


रानी ने धीरे से कहा, “लाओ… जितना क्रूर हो सके लाना।”
सुरेंद्र चला गया। घर फिर से सिर्फ हम दोनों का रह गया। मैंने रानी को उठाया और बाथरूम ले गया। शॉवर के नीचे खड़ा किया। पानी उनके घायल शरीर पर गिर रहा था। मैंने साबुन लगाया और धीरे-धीरे मालिश की। लेकिन मालिश करते-करते मेरा लंड फिर खड़ा हो गया। रानी ने पीछे मुड़कर देखा। “अभी भी बाकी है?”


मैंने उन्हें दीवार से सटाया। एक पैर ऊपर उठाया और खड़े-खड़े चूत में घुसेड़ दिया। पानी के नीचे। फिसलन भरे शरीर पर। रानी की पीठ दीवार से रगड़ खा रही थी। मैंने उनके गले पर हाथ रखा और दबाते हुए चोदा। “आज से हर सुबह यही होगा। चाहे शरीर में निशान हों या दर्द। समझी?”


रानी ने आंखें बंद करके कहा, “समझ गई मालिक… हर सुबह… हर रात… जब चाहो।”
मैंने जोर का आखिरी धक्का मारा और अंदर ही झड़ गया। रानी भी कांप उठीं।
उसके बाद के दिन और भी गंदे होते गए। कभी मैं रानी को रसोई में खाना बनाते हुए पीछे से पकड़ लेता। साड़ी ऊपर करके चूत में लंड डाल देता। वे चूल्हे के सामने कराहती रहतीं। कभी बालकनी में, जहां नीचे लोग चल रहे होते। मैं उन्हें रेलिंग से झुका देता और पीछे से चोदता। उनके मुंह पर हाथ रख देता ताकि चीख न निकल सके।


एक दिन सुरेंद्र ने सच में नया सामान लाया। चमड़े के हाथ-पैर के कफ़। लोहे की चेन। एक बड़ा काला डildo जो मेरे लंड से भी मोटा था। और एक वैक्यूम पंप।
उस दिन हमने रानी को पूरी तरह बांध दिया। बिस्तर के चारों कोनों से। आंखें ढक दीं। मुंह में गैग लगा दिया। फिर वैक्यूम पंप उनके स्तनों पर लगाया। स्तन फूलते गए, निपल्स लंबे और काले पड़ गए। रानी तड़प रही थीं लेकिन आवाज नहीं निकल रही थी। फिर पंप चूत पर लगाया। चूत के होंठ बाहर की तरफ खिंच गए। सूज गए।


सुरेंद्र ने उस मोटे डildo को उनकी गांड में धकेला। पूरा। फिर मेरा लंड चूत में। दोनों छेद एक साथ भरे। डildo और लंड की双重 गति। रानी का शरीर बेकाबू हो रहा था। हमने घंटों तक यही किया। कभी डildo निकालकर उनके मुंह में ठूंस दिया ताकि वे अपनी गांड का स्वाद लें। कभी चेन से उनके निपल्स बांधकर खींचे।


रात के अंत में जब रस्सियां खोली गईं तो रानी हिल भी नहीं पा रही थीं। शरीर एक जीवित घाव की तरह दिख रहा था। लेकिन आंखों में वही भूख थी। “कल और… और ज्यादा…”
मैंने उनके बाल सहलाते हुए कहा, “कल से भी ज्यादा। क्योंकि तू सिर्फ माँ नहीं। तू हमारी निजी रंडी है। और रंडी का काम है टूटना और फिर से तैयार होना।”


रानी ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने सूजे हुए स्तन पर रखा। “तो तोड़ते रहो… जिंदगी भर।”
और उस रात के बाद से हमारा घर एक निजी यातना गृह बन गया। जहां हर कोने में रानी की चीखें, कराहें और भीगी हुई चूत की खुशबू रहती। पापा जब आते तो सब छिप जाता। लेकिन जैसे ही उनका साया हटता, रानी फिर से फर्श पर होतीं। घुटनों के बल। मुंह खुला। और दोनों छेद तैयार।


क्योंकि अब वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा था। सिर्फ और गहरा अंधेरा। और ज्यादा क्रूर खेल। और एक माँ जो अपने बेटे और एक दर्जी के हाथों हर रोज नई तरह से टूटती थी… और मजा लेती थी।

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