काले दानव की चूत-फाड़ चोदन – lusty stories

मार्कस का 11 इंच काला लंड प्रिया की गोरी भोसड़ी और गांड को रात भर बेरहमी से चीरता रहा। पति की जलन भरी नजरों में गालियां-चीखें उफान मारीं – दर्द की आग में मजा, अब अनियंत्रित लत की बर्बर जंग lusty stories ।

मेरा नाम प्रिया है। उम्र 26 साल। रंग गोरा, जैसे दूध में डूबी हुई कोई परी। साइज 34-28-36, ऐसे उभरे हुए स्तन जो किसी भी मर्द की नजरों को चुरा लें, पतली कमर जो लहराती हुई कमर की लचक दिखाए, और वो सेक्सी कूल्हे जो हर आंख को मदहोश कर दें। मैं बैंगलोर में रहती हूं, एक छोटे से आईटी फर्म में काम करती हूं।

लेकिन मेरी असली जिंदगी तो रातों में शुरू होती है, जब मैं अपने पति रोहन के साथ बिस्तर पर उतरती हूं। रोहन, 34 साल का, एक सीनियर सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट। वो लंबा, स्मार्ट, लेकिन सेक्स में वो वो जुनून रखता है जो मुझे हर बार नई दुनिया दिखा देता है। हमारी शादी को तीन साल हो चुके हैं, लेकिन हमारी सेक्स लाइफ? वो तो कोई पुरानी किताब की तरह नहीं, बल्कि एक ज्वालामुखी है जो हर बार फट पड़ता है।


हम दोनों हमेशा नई-नई तरकीबें आजमाते हैं। कभी रोल-प्ले, कभी टॉयज, कभी आउटडोर एडवेंचर। लेकिन हमारे मन में एक ऐसी फैंटेसी घूमती रहती थी, जो हमें रातों की नींद उड़ा देती। रोहन को ककोल्ड का शौक था – वो कल्पना करता कि कोई दूसरा मर्द, कोई ताकतवर, जंगली आदमी, मुझे चोद रहा हो, और वो किनारे पर बैठा सब देख रहा हो। उसकी आंखों में वो जलन, वो उत्तेजना, जो उसे और भी दीवाना बना दे। और मैं? मुझे भी वो गैर मर्द की कल्पना रुलाती। कोई ऐसा जो मेरी चूत को फाड़ दे, मेरी गांड को चीर दे, मुझे इतना तोड़ दे कि मैं खुद को पहचान न पाऊं। लेकिन ये सिर्फ सपना था, या था?


एक शाम, हम दोनों सोफे पर लेटे थे। रोहन का हाथ मेरी जांघों पर सरक रहा था, और मैं उसकी गर्दन पर किस ले रही थी। “प्रिया,” उसने धीरे से कहा, “क्या हम वो कर सकते हैं? असल में?” मैंने उसकी आंखों में झांका। वो जल रही थीं। “कौन सा?” मैंने मासूम बनकर पूछा, जानते हुए कि वो क्या कहेगा। “वो… कोई दूसरा। कोई अफ्रीकन। तू तो हमेशा कहती है न, काला लंड तेरी कमजोरी है।” मैं हंस पड़ी, लेकिन मेरी चूत में एक झुरझुरी दौड़ गई। “हां रोहन, लेकिन डर नहीं लगेगा? तुझे?” उसने मुझे कसकर पकड़ लिया। “डर? ये तो मेरा सपना है। तुझे चुदते देखना, वो जलन महसूस करना… उफ्फ!” हम दोनों राजी हो गए। लेकिन सावधानी से। कोई रिस्क नहीं।


अगले हफ्ते हमने प्लान बनाया। बैंगलोर छोड़कर हम केरल के वेम्बनाड झील के किनारे एक रिसॉर्ट में पहुंचे। वो जगह जन्नत थी – हरे-भरे पाम ट्रीज, चमकती झील, और रातें जो चुपके से गर्म हो जातीं। यहां की आजादी हमें सूट कर रही थी। रोहन ने तुरंत ऐप्स पर सर्च शुरू कर दिया। “अफ्रीकन, गोवा नहीं, केरल। मजबूत, भरोसेमंद।” आखिरकार, एक नाम मिला – मार्कस। 28 साल का, नाइजीरियन मूल का, लेकिन केरल में सालों से रहता। बॉडीबिल्डर, टूर गाइड का काम करता। और हां, वो ‘सर्विस’ भी देता था – पैसे के बदले। रोहन ने चैट की, डील फिक्स की। 10,000 रुपये, एक रात, हमारे रिसॉर्ट रूम में। मार्कस ने हिंदी में रिप्लाई किया – “सर, मेम को खुश रखूंगा। गारंटी।” मेरी सांसें तेज हो गईं। कल्पना में ही उसका काला लंड मेरी चूत में घुस रहा था।


शाम ढली। हमारा रूम झील के किनारे, बालकनी से लहरें दिख रही थीं। मैंने रेड सिल्क की साड़ी पहनी, जो मेरी कमर को लपेटे हुए मेरे कूल्हों को उभार रही थी। रोहन ने व्हिस्की की बॉटल खोली। “नर्वस हो?” उसने पूछा। मैंने मुस्कुराकर कहा, “नहीं। बस… उत्साहित। तू?” वो हंसा। “मेरा दिल धक-धक कर रहा है। लेकिन यही तो मजा है।” घड़ी ने 8 बजाए। बेल बजी।

रोहन ने दरवाजा खोला। वहां खड़ा था मार्कस। भगवान! वो कोई इंसान नहीं, कोई काला राक्षस था। 6 फुट 8 इंच लंबा, कंधे इतने चौड़े कि दरवाजा भर जाएं। चेहरा कटा हुआ, आंखें गहरी काली, और मुस्कान जो भेड़िए जैसी लगी। काली शर्ट, टाइट जींस, जो उसके जांघों की मांसपेशियों को चिपकाए हुए थी। उसे देखते ही मेरी चूत फड़फड़ाई। पानी छोड़ने लगी। “हैलो सर, मैम,” उसने गहरी आवाज में कहा। हिंदी अच्छी थी – केरल की नौकरी ने सिखा दी। “मार्कस। आज आपकी रात।”


हम तीनों अंदर आए। रोहन ने हैंडशेक किया, मैंने शर्माते हुए स्माइल दी। लेकिन मेरी आंखें उसकी कमर पर अटकीं। वो गांड… नहीं, वो लंड का उभार। डरावना। हमने डिनर ऑर्डर किया – सीफूड प्लेटर, केरल की मसालेदार मछली। व्हिस्की के गिलास भरे। बातें शुरू हुईं। मार्कस ने बताया, “मैं नाइजीरिया से हूं, लेकिन यहां प्यार हो गया। इंडिया की औरतें… फायर हैं।” उसकी नजर मुझ पर।

मैं लजाई, लेकिन अंदर से जल रही। रोहन ने हंसकर कहा, “आज प्रिया तेरी। जो मन करे, कर। लेकिन… इंटेंस।” मार्कस ने सिर हिलाया। “सर, चिंता मत। मैं जानता हूं क्या करना है।” नशा चढ़ने लगा। हंसी-मजाक, फिर साइलेंस। हवा में सेक्स की गंध फैल गई।


अचानक, मार्कस उठा। “डांस?” उसने मुझसे पूछा। मैंने रोहन की तरफ देखा। वो सिर हिलाया। संगीत चला दिया – कोई स्लो जज। मार्कस ने मुझे खींच लिया। उसके हाथ मेरी कमर पर। काले, मोटे उंगलियां। उसकी बॉडी की गर्मी, वो मस्क की खुशबू – अफ्रीकन मसल्स की। मैं पिघल रही थी। हम घूमे, उसके सीने से मेरा स्तन रगड़ रहा। “तू हॉट है, प्रिया,” उसने कान में फुसफुसाया। मेरी सांसें तेज। रोहन सोफे पर बैठा, गिलास थामे, आंखें चमक रही। फिर मार्कस ने झुका। लिप्स मेरे होंठों पर। किस? नहीं, वो चूस रहा था। जंगली। जीभ अंदर, मेरी जीभ को काटने जैसा। मैं सिसकी भर आई। चूत से रस बह रहा। उसके लंड का दबाव मेरी जांघ पर। भारी, कठोर। 10 इंच? ज्यादा? मैं पागल।


किस खत्म हुआ। हम बेडरूम में। लाइट्स डिम। मार्कस ने मेरी साड़ी खींची। “नंगा हो जा, रंडी,” उसने कहा। हिंदी में, गाली। मैं कांप गई। लेकिन उत्साहित। साड़ी गिरी। ब्लाउज खोला। मेरे 34 के स्तन बाहर। निप्पल्स सख्त। उसने दबाए। दर्द। “आह!” मैं चिल्लाई। “चुप, साली। आज तेरी चूत फटेगी।” रोहन ने अपना लंड निकाला, मुठ मारने लगा। मैंने मार्कस की शर्ट उतारी। छाती – काली, पसीने से चमकती। जींस खोली। चड्डी। भगवान! वो उभार। चड्डी उतारी।

लंड बाहर कूदा। काला, मोटा – 11 इंच लंबा, 7 इंच गोलाई। नसें फूलीं, सिर लाल। हाथ जितना। मैं घुटनों पर। “ये… ये क्या?” चिल्लाई। वो हंसा। “चूस, कुत्तिया।” मैंने पकड़ा। गर्म। भारी। मुंह में डाला। आधा भी न गया। गला चोक। लेकिन चूसी। जीभ घुमाई। वो सिसका। “फक, बेबी! गुड गर्ल।” लार टपक रही। रोहन देख रहा, तेज मुठ।


10 मिनट चूसा। मेरा मुंह दर्द। फिर मार्कस ने मुझे बेड पर पटका। “लेट, मिशनरी।” मैं लेटी। वो ऊपर चढ़ा। 100 किलो वजन। सीने पर दबाव। सांस बंद। लेकिन चाहत। उसने मेरी कांख सूंघी। “गंदी कुत्तिया, पसीना।” जीभ डाली। चाटा। घिन। लेकिन उत्तेजना। फिर नाभि, पेट। गांड पर पहुंचा। “उठा, घोड़ी बन।” मैं घोड़ी। गांड ऊपर। वो सूंघा। “मादरचोद, तेरी गांड की महक… मार डालेगी।” जीभ डाली। गुदा में। चाटा। मैं चिल्लाई। “आह मार्कस! हां!” चूत टपक रही। फिर चूत पर। जीभ अंदर। चूस। मैं झड़ी। पहली बार, बिना चुदे। “उफ्फ! आ गया!” माल छूटा। वो पी गया। “स्वीट, रंडी।”

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टॉयलेट लगा। “मार्कस, पेशाब…” वो गिलास लाया। “यहीं, साली।” मैं लजाई। लेकिन की। आधा गिलास। पीला। वो दारू मिलाई। गटक गया। “अब तेरी बारी।” मुझे लिटाया। लंड चूत पर रगड़ा। क्रीम लगाई। टोपा दबाया। झटका। “नहीं! दर्द!” चीखी। आंसू। वो हाथ मुंह पर। “चुप, भोसड़ी के।” धक्का। टोपा अंदर। चीर रही। फिर पूरा। 11 इंच। फाड़ दिया। खून? नहीं, लेकिन दर्द। वो रुका। धीरे झटके। 15 मिनट। दर्द कम। मजा। “फास्ट, मार्कस! चोद!” वो हंसा। रफ्तार। बेड हिल। “रंडी! तेरी मां की चूत! बहनचोद!” गालियां। “हां! चोद, कुत्ता! मेरे पति को दिखा, कैसे फाड़ रहा!” रोहन करीब। “प्रिया… हॉट लग रही।”


30 मिनट। मैं झड़ी दूसरी बार। वो छाती पर। मुठ। माल। गाढ़ा, सफेद। मुंह खोला। गिराया। पिया। लंड चाटा। साफ। आराम। लेकिन वो फिर खड़ा। “राउंड दो।” मैं डरी। लेकिन गीली। वो लेटा। मैं ऊपर। लंड पकड़ा। चूत में। बैठी। दर्द फिर। लेकिन उछली। रोहन आया। गांड चाटने लगा। “प्रिया, तेरी गांड… स्वीट।” मैं उछल रही। दो लंड – एक चूत में, एक जीभ गांड। फिर रोहन मुंह में। चूसा। तीनों। जन्नत।


फिर घोड़ी। मार्कस पीछे। चूत में धक्के। कुतिया जैसा। रोहन मुंह। गला चोदा। गला फूला। लार। “ग्लक ग्लक!” 20 मिनट। स्विच। मार्कस गांड। क्रीम। “नहीं!” चीख। लेकिन धक्का। फटा। दर्द। आंसू। रोहन चूत। दो लंड। एक साथ। चीर। “आह! मार डालो!” लेकिन मजा। रिदम। झटके। मैं चिल्लाई। गालियां। “चोदो, हरामी! फाड़ दो! मां चोद, बहन चोद!” वो हंसे। “तेरी गांड टाइट, रंडी! रोहन सर, तेरी बीवी सस्ती कुतिया!” रोहन: “हां, चोद इसे!”


रात भर। पोज बदल। डॉगी, काउगर्ल, स्टैंडिंग। झील की आवाजें। चीखें। मैं 5 बार झड़ी। वो दो। रोहन एक। सुबह। थकान। लेकिन दवा – वियाग्रा। जारी। नाश्ता। रोहन सोया। मैं और मार्कस बाथरूम। शावर। पानी। वो दीवार से सटाया। लंड चूत में। खड़ा चोदा। “पकड़, साली!” दीवार हिली। 30 मिनट। झड़ी फिर। गांड में। मुंह में।


दोपहर। चूत सूजी। गांड खुली। भोसड़ा बनी। लेकिन लत। नंबर लिया। “फिर आना, मार्कस।” वो मुस्कुराया। “तू मेरी हो गई, प्रिया।” वापसी बैंगलोर। लेकिन अब? महीने में दो बार। चुपके। होटल। मार्कस आता। रोहन को नहीं पता। लेकिन वो आग? बुझती नहीं। काला लंड। मेरी कमजोरी। गांड-चूत। उसकी लत। जिंदगी? अब ये ही। जंगली। बेरहम। लेकिन… जी भर के।

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