हर रात माँ को जकड़कर

बेटा हर रात माँ को रस्सियों से जकड़कर गला दबाता, निप्पल कुचलता और उसकी दोनों जगहों को बेरहमी से चीरता है। माँ दर्द से तड़पती हुई खुद और ज्यादा तोड़ने की भीख माँगती रहती है।

नया नाम, उम्र, शहर और पूरी कहानी अलग है।
मेरा नाम अमन है। मैं राजस्थान के जोधपुर शहर का रहने वाला हूँ। मेरी उम्र 28 साल है। मेरी माँ का नाम सुनीता है, उम्र 52 साल। वो गोरी, भारी भरकम शरीर वाली औरत है। उसके बूब्स बहुत बड़े और भारी हैं, निप्पल काले और मोटे। कमर पतली लेकिन कूल्हे चौड़े और गांड गोल-गोल उभरी हुई। होंठ मोटे और गुलाबी। मैंने बचपन से ही उनकी देह को छिपे-छिपे देखा था, लेकिन आज जो हुआ वो सब कुछ पार कर गया।

ये बात पिछले साल की है। मेरे पापा दो महीने के लिए बाहर गए हुए थे। घर में सिर्फ हम दोनों थे। एक रात सुनीता माँ नहाकर निकली। सफेद पतला नाइटी पहना था, अंदर कुछ नहीं। गीले बाल कंधों पर बिखरे थे। नाइटी गीली होने से उनके बड़े-बड़े बूब्स साफ दिख रहे थे। निप्पल टाइट होकर बाहर को धकेले जा रहे थे। मैं बैठे-बैठे लंड को दबा रहा था। माँ ने मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई।
“अमन… आज रात तुम मेरे कमरे में सोओगे।”

रात को जब मैं उनके कमरे में गया तो वो बिस्तर पर लेटी हुई थीं। नाइटी ऊपर तक उठा रखी थी। जांघें खुली हुईं। गुलाबी चूत के बाल साफ मुंडे हुए थे। चूत की फांक थोड़ी खुली थी और अंदर से चमक रही थी। मैंने कपड़े उतारे। मेरा 9 इंच का मोटा लंड सीधा खड़ा था। माँ ने आँखें गड़ा दीं।
“इतना बड़ा… आ जा मेरे पास।”

मैं उनके ऊपर चढ़ गया। उन्होंने मेरे लंड को दोनों हाथों से पकड़ा और अपने मुँह में ठूंस लिया। गले तक ले गईं। मैंने उनके बाल पकड़कर जोर से धक्के मारने शुरू कर दिए। माँ की आँखों से आँसू निकलने लगे लेकिन वो रुकने का नाम नहीं ले रहीं थीं। गला खराब हो रहा था फिर भी वो लंड को और अंदर खींच रहीं थीं। थूक मुँह से बाहर निकल रहा था। मैंने जोर से एक धक्का मारा और पूरा लंड उनके गले में धँस गया। माँ ने गला दबाया लेकिन मैंने बाल और कसकर पकड़ लिए।

“अब निकाल… अब मैं तेरी चूत लूँगा।”
मैंने उन्हें पेट के बल लिटाया। गांड ऊपर की तरफ उठा दी। दोनों गोल कूल्हों को जोर से फैलाया। गुलाबी गांड का छेद सिकुड़ रहा था। मैंने थूक लगाया और एक झटके में आधा लंड अंदर घुसा दिया। माँ चीख पड़ी।
“आह्ह… दर्द हो रहा है बेटा… धीरे…”

मैंने जवाब में और जोर से धक्का मारा। पूरा 9 इंच उनकी गांड में धँस गया। माँ चादर को मुट्ठियों में जकड़कर चीख रही थीं। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कमर पर जोर-जोर से थप्पड़ मारने लगा। हर थप्पड़ के साथ गांड लाल होती जा रही थी। मैंने दोनों हाथों से उनके कूल्हे दबाए और बेतहाशा धक्के मारने शुरू कर दिए। हर धक्के पर माँ की चीखें कमरे में गूँज रही थीं।
“रुक… रुक अमन… बहुत दर्द हो रहा है…”

मैं रुका नहीं। बल्कि और तेज हो गया। लंड उनकी गांड से बाहर निकलता और फिर पूरी ताकत से अंदर धँस जाता। माँ रो रही थीं लेकिन उनकी चूत से पानी टपक रहा था। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उनकी चूत में दो उंगलियाँ ठूंस दीं। अंदर गीला और गरम था। उंगलियों को घुमाते हुए गांड में धक्के जारी रखे।

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थोड़ी देर बाद मैंने लंड निकाला। गांड का छेद खुला और लाल हो चुका था। मैंने उन्हें करवट पर लिटाया। एक पैर ऊपर उठाया और लंड सीधा उनकी चूत में पेल दिया। चूत इतनी टाइट थी कि लंड मुश्किल से अंदर जा रहा था। माँ ने मेरे कंधे पर नाखून गाड़ दिए।
“ज़ोर से… और ज़ोर से पेल… माँ की चूत फाड़ दे…”

मैंने कमर झटके से हिलाई। हर धक्के पर उनके बड़े बूब्स उछल रहे थे। मैंने मुँह झुकाकर एक निप्पल मुँह में लिया और जोर से काट लिया। माँ चिल्लाईं लेकिन मैंने और जोर से चूसा। दोनों निप्पल को दाँतों से दबाते हुए चूत में लंड पीसता रहा। माँ के नाखून मेरी पीठ पर लकीरें बना रहे थे।

मैंने उन्हें फिर से उल्टा किया। घुटनों के बल बैठाया। सिर नीचे और गांड ऊपर। इस बार मैंने लंड उनकी चूत में डाला और एक हाथ से उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींच लिया। दूसरे हाथ से उनकी गांड पर लगातार थप्पड़ मारने लगा। हर थप्पड़ की आवाज तेज थी। माँ की गांड जल रही थी लेकिन वो पीछे धक्का दे रही थीं।
“और मार… और जोर से चोद… मैं तेरी रांड हूँ…”

मैंने लंड निकाला और सीधा गांड में फिर से घुसा दिया। इस बार बिना रुकें। पूरा जोर लगाकर धक्के मार रहा था। माँ का शरीर आगे-पीछे हो रहा था। उनके मुँह से सिर्फ कराहें और गालियाँ निकल रही थीं। मैंने दोनों हाथों से उनके कूल्हे इतने जोर से दबाए कि उंगलियों के निशान पड़ गए।

आधे घंटे तक लगातार गांड चोदने के बाद मैंने लंड निकाला। माँ बिस्तर पर ढेर हो चुकी थीं। साँस फूल रही थी। गांड और चूत दोनों खुली और लाल थीं। मैंने उन्हें फिर से सीधा किया। पैर फैलाए और लंड उनकी चूत में डालकर जोर-जोर से पेलने लगा। इस बार मैंने उनके गले पर हाथ रखा और हल्का दबाया। माँ की आँखें फटी हुईं थीं लेकिन वो मेरे हाथ को नहीं हटा रहीं थीं। बल्कि और कसकर गले दबाने का इशारा कर रहीं थीं।

“दबा… और दबा… माँ को गला घोंट कर चोद…”
मैंने गला और कस दिया। माँ का चेहरा लाल होने लगा। मैंने लंड को उनकी चूत में पूरी ताकत से पेलना जारी रखा। हर धक्के पर उनके बूब्स उछल रहे थे। मैंने मुँह झुकाकर दोनों निप्पल को बारी-बारी से काटा। माँ की आवाज रुक-रुक कर निकल रही थी।
जब मुझे लगा कि वो लगभग बेहोश होने वाली हैं तो मैंने गला छोड़ दिया। माँ ने जोर से साँस ली और फिर मेरे कान में फुसफुसाईं—
“अब मेरे मुँह में डाल… और पूरा पानी गले में उतार दे।”

मैंने लंड उनकी चूत से निकाला। माँ ने मुँह खोल दिया। मैंने पूरा लंड गले तक ठूंस दिया और जोर से धक्के मारने लगा। माँ की आँखों से आँसू बह रहे थे। थूक और लार मुँह से बाहर निकल रही थी। मैंने बाल पकड़कर सिर स्थिर रखा और आखिरी जोरदार धक्कों के साथ पूरा गाढ़ा पानी उनके गले में उंडेल दिया। माँ ने निगल लिया। कुछ बाहर निकलकर उनके ठुड्डी पर लग गया।

मैं थक कर उनके बगल में लेट गया। लेकिन माँ ने मुझे आराम नहीं करने दिया। उन्होंने मेरे लंड को फिर से मुँह में लिया और चूसने लगीं। फिर खुद मेरे ऊपर चढ़ गईं। लंड को अपनी चूत में बैठाया और जोर-जोर से कमर हिलाने लगीं। उनके बड़े बूब्स मेरे चेहरे पर लटके हुए थे। मैंने दोनों को मुँह में भर लिया और जोर से दबाया।

माँ खुद ही अपनी गांड पर थप्पड़ मार रही थीं और चिल्ला रही थीं—
“और अंदर… और गहरा… माँ की चूत फाड़ दे बेटा…”
मैंने उनकी कमर पकड़कर नीचे से जोरदार धक्के मारने शुरू कर दिए। बिस्तर चरमरा रहा था। माँ की चीखें घर में गूँज रही थीं। मैंने एक हाथ से उनके गले को फिर दबाया और दूसरे हाथ से उनकी गांड में दो उंगलियाँ ठूंस दीं। चूत और गांड दोनों एक साथ भरी हुई थीं। माँ का शरीर काँप रहा था।

जब मैंने दूसरा पानी उनकी चूत में छोड़ा तो माँ भी अपने पानी से पूरी चादर गीली कर चुकी थीं। वो मेरे ऊपर गिर पड़ीं। साँसें फूल रही थीं। शरीर पसीने से तरबतर था।
सुबह तक हम रुकने वाले नहीं थे। मैंने उन्हें फिर से पेट के बल लिटाया। इस बार रस्सी से उनके हाथ बाँध दिए। पैर भी फैला कर बाँध दिए। माँ बिल्कुल बेबस लेटी हुई थीं। मैंने पहले उनकी चूत में लंड डाला और जोर से पेलने लगा। फिर निकाला और गांड में ठूंस दिया। बारी-बारी से दोनों छेदों को बेरहमी से चोदता रहा। हर थप्पड़ के साथ माँ चीखतीं लेकिन रुकने को नहीं कहती थीं।

मैंने उनके बूब्स को इतने जोर से मसला कि निप्पल पर दाँत के निशान पड़ गए। गले पर बार-बार हाथ रखा। बाल खींचे। गांड पर इतने थप्पड़ मारे कि लाल हो गई। माँ रो रही थीं, कराह रही थीं, गालियाँ दे रही थीं लेकिन हर बार पीछे धक्का दे रही थीं।
आखिरकार जब मैंने तीसरी बार उनका मुँह और चूत दोनों भर दिए तो माँ पूरी तरह थक कर बिस्तर पर पड़ी रह गईं। शरीर पर मेरे नाखून और थप्पड़ों के निशान थे। चूत और गांड दोनों सूज गए थे। लेकिन उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी।

उन्होंने धीरे से कहा—
“अब हर रात ये ही होगा अमन… तू मेरी गांड और चूत दोनों फाड़ता रहेगा… और मैं तेरी रांड बनी रहूँगी।”
उस रात के बाद घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। सुनीता माँ अब दिन में भी सामान्य नहीं रह पाती थीं। हर बार जब मैं घर में होता, उनकी निगाहें मेरे लंड पर टिक जातीं। रात होते ही वो खुद कमरे में आतीं, हाथ में मोटी रस्सी और काला कपड़ा लेकर।
तीसरी रात।

माँ ने दरवाजा बंद किया और खुद को मेरे सामने पूरी तरह नंगा कर दिया। बड़े-बड़े बूब्स भारी होकर लटक रहे थे। निप्पल पहले से ही टाइट और काले। चूत के बाल साफ मुंडे हुए, फांक थोड़ी खुली और चमकदार। गांड गोल और मांसल। उन्होंने रस्सी मेरे हाथ में थमा दी।
“आज मुझे पूरी तरह बाँध… हाथ-पैर दोनों… और जितना चाहे उतना सता।”

मैंने उन्हें बिस्तर के चारों कोनों पर बाँध दिया। हाथ ऊपर की तरफ खिंचे हुए, पैर फैले हुए। बिल्कुल बेबस। मैंने काला कपड़ा उनकी आँखों पर बाँध दिया। अब वो कुछ देख नहीं सकती थीं। सिर्फ महसूस कर सकती थीं।
मैंने पहले उनके बूब्स पर जोरदार थप्पड़ मारे। बायाँ, फिर दायाँ। निप्पल इतने लाल हो गए कि खून के छींटे जैसे लग रहे थे। माँ चीख उठीं लेकिन मुँह बंद रखने की कोशिश कर रही थीं। मैंने उनके मुँह में अपना अँगुठा ठूंस दिया।

“चिल्ला… जितना चाहे चिल्ला… कोई सुनने वाला नहीं है।”
फिर मैंने उनका गला पकड़ा और हल्का दबाया। दूसरे हाथ से उनकी चूत में तीन उंगलियाँ एक साथ पेल दीं। अंदर गीला था लेकिन मैंने बिना रुकें उंगलियों को जोर-जोर से अंदर-बाहर किया। नाखून उनकी भीतरी दीवारों को खरोंच रहे थे। माँ का शरीर ऐंठ रहा था। रस्सियाँ उनके手腕ों में धँस रही थीं।

मैंने उंगलियाँ निकालीं और सीधा अपना 9 इंच का मोटा लंड उनकी चूत में एक झटके में घुसा दिया। पूरा अंदर तक। माँ की चीख कपड़े में दब गई। मैंने कमर को बेरहमी से हिलाना शुरू किया। हर धक्का इतना जोरदार था कि बिस्तर की टाँगें चरमरा रही थीं। उनके बूब्स इधर-उधर उछल रहे थे। मैंने एक निप्पल को मुँह में लिया और दाँतों से काट लिया। खून की बूंद निकली। माँ दर्द से काँप उठीं।
“आह्ह… काट… और काट… माँ के निप्पल फाड़ दे…”

मैंने दोनों निप्पल को बारी-बारी से दाँतों से कुचला। चूत में लंड पीसता रहा। जब उनकी चूत पूरी तरह ढीली पड़ने लगी तो मैंने लंड निकाला और बिना किसी चेतावनी के सीधा गांड में पेल दिया। आधा अंदर गया। माँ जोर से चिल्लाईं।
“नहीं… इतना मोटा… फट जाएगी…”

मैं रुका नहीं। पूरा लंड उनकी गांड में धकेल दिया। फिर बेतहाशा धक्के शुरू कर दिए। एक हाथ से उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा, दूसरे हाथ से गला दबाया। हर धक्के पर माँ की आवाज रुक-रुक कर निकल रही थी। गांड का छेद फैल चुका था, लाल और सूजा हुआ। मैंने थप्पड़ पर थप्पड़ जमाए। दोनों गोल कूल्हे जल रहे थे।

मैंने लंड निकाला। गांड से गाढ़ा सफेद पानी और थूक मिलाजुला पदार्थ बाहर निकल रहा था। मैंने माँ का मुँह खोला और लंड उनके गले तक ठूंस दिया। आँखों पर कपड़ा बँधा होने के कारण वो और बेचैन थीं। मैंने बाल पकड़कर सिर स्थिर रखा और गले में जोर-जोर से धक्के मारे। माँ के गले से अजीब सी आवाजें आ रही थीं। थूक मुँह से बह रहा था, नाक से साँस फूल रही थी।

जब मैंने पहला पानी उनके गले में उंडेला तो माँ ने निगल लिया। कुछ बाहर निकलकर उनके सीने पर गिर गया। मैंने कपड़ा उनकी आँखों से हटाया। उनकी आँखें लाल थीं, आँसू बह रहे थे, लेकिन उनमें वासना की आग जल रही थी।
“और… अभी और चाहिए…”

मैंने रस्सियाँ थोड़ी ढीली कीं लेकिन हाथ बाँधे रखे। उन्हें घुटनों के बल बैठाया। सिर नीचे, गांड ऊपर। इस बार मैंने उनकी चूत और गांड दोनों में बारी-बारी से लंड पेलना शुरू किया। दस धक्के चूत में, दस गांड में। हर बार ज्यादा जोर से। माँ की चीखें अब खुली थीं।
“फाड़ दे… दोनों फाड़ दे… माँ को अपनी रांड बना दे…”

मैंने एक मोटी मोमबत्ती निकाली जो माँ ने खुद रखी थी। उसे उनकी गांड में ठूंस दिया और लंड उनकी चूत में डालकर फिर से धक्के मारने लगा। दो चीजें एक साथ अंदर। माँ का शरीर काँप रहा था। मैंने उनके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और गले पर हाथ रखा। साँस रुकने लगी तो छोड़ दिया, फिर फिर दबाया। ये खेल बार-बार दोहराया।

जब दूसरा पानी उनकी चूत में छोड़ा तो माँ भी अपने पानी से बिस्तर गीला कर चुकी थीं। लेकिन मैं रुका नहीं। लंड अभी भी सख्त था। मैंने उन्हें सीधा लिटाया। पैर उनके कंधों पर रख दिए। इस पोजीशन में लंड और गहरा जाता था। मैंने पूरी ताकत से पेलना शुरू किया। हर धक्के पर माँ की आवाज टूट रही थी।
“दर्द… बहुत दर्द… लेकिन मत रुक… और जोर से…”

मैंने उनके गले पर दोनों हाथ रख दिए और जोर से दबाया। चेहरा लाल हो गया, आँखें फटी हुईं। मैंने लंड को उनकी चूत में पीसते हुए गला और कस दिया। माँ का शरीर ऐंठ रहा था। जब लगा कि वो बेहोश होने वाली हैं तो छोड़ दिया। माँ ने जोर से साँस ली और फिर मेरे कान में फुसफुसाईं—
“फिर से दबा… और देर तक…”

मैंने वही किया। गला दबाकर चोदता रहा। उनके नाखून मेरी पीठ पर लकीरें बना रहे थे। खून की पतली लकीरें बह रही थीं। मुझे और जोश आ गया। मैंने उनके बूब्स को इतने जोर से मसला कि उंगलियों के निशान गहरे पड़ गए। निप्पल से फिर खून निकला। मैंने उसे चाट लिया।
रात के तीन बज चुके थे। माँ की चूत और गांड दोनों पूरी तरह सूज गए थे, लाल और खुले हुए। मैंने उन्हें फिर से बाँध दिया। इस बार उल्टा—पेट के बल। गांड ऊपर। मैंने उनकी गांड पर लगातार थप्पड़ मारे जब तक कि दोनों गोलियाँ जल न गईं। फिर लंड अंदर पेल दिया और बिना रुके बीस मिनट तक धक्के मारता रहा। माँ अब सिर्फ कराह रही थीं। आवाज बैठ चुकी थी।

आखिरकार जब मैंने तीसरा पानी उनकी गांड में छोड़ा तो माँ बिलकुल ढेर हो गईं। शरीर पर नीले-लाल निशान थे। रस्सियों के निशान wrists और टखनों पर गहरे थे। चूत और गांड दोनों से पानी और मेरे वीर्य का मिश्रण बह रहा था।
मैंने रस्सियाँ खोलीं। माँ मुड़कर मेरे सीने से चिपक गईं। उनकी साँसें अभी भी तेज थीं। उन्होंने मेरे लंड को हाथ में लिया जो अभी भी आधा सख्त था।

“कल रात और ज्यादा… आज जो किया वो कम था। कल मुझे और सताना… गला ज्यादा देर तक दबाना… निप्पल और काटना… गांड में कुछ मोटा डालना…”
मैंने उनके बाल सहलाए। “जैसी मर्जी माँ। तू मेरी रांड है। जितना चाहेगी उतना तोड़ूँगा।”

सुबह जब माँ उठीं तो चल नहीं पा रही थीं। चूत और गांड में दर्द हो रहा था। लेकिन उनकी आँखों में मुस्कान थी। उन्होंने नाश्ते में मेरे सामने बैठकर अपनी साड़ी का पल्लू हटाया और बूब्स दिखाए। निप्पल पर दाँत के निशान साफ थे।
“देख… तेरे निशान… आज दिन भर इन्हीं को छूती रहूँगी।”

रात को फिर वही सिलसिला। इस बार माँ ने खुद ज्यादा तैयारी की थी। मोटी बेल्ट, क्लिप्स, और एक बड़ा सा काला खिलौना। उन्होंने खुद को बाँधने से पहले कहा—
“आज मेरी चूत में ये खिलौना डालकर गांड चोदना… और गला इतना दबाना कि होश ही न रहे…”

मैंने वैसा ही किया। खिलौना उनकी चूत में पूरा अंदर तक ठूंस दिया। फिर लंड गांड में पेलकर बेतहाशा धक्के मारे। एक हाथ गले पर, दूसरा बालों में। माँ की आवाज बंद हो गई थी। सिर्फ गले से घरघराहट आ रही थी। मैंने तब तक नहीं छोड़ा जब तक उनका शरीर ढीला नहीं पड़ गया। फिर छोड़ दिया। माँ ने जोर से साँस ली और मुस्कुराईं।

“और… अभी और…”
रात भर ये खेल चलता रहा। मैंने उनके शरीर के हर हिस्से को कुचला, काटा, पीटा, भरा। चूत, गांड, मुँह—तीनों को बारी-बारी से इस्तेमाल किया। जब सुबह हुई तो माँ बिस्तर पर पड़ी हुई थीं। शरीर पर अनगिनत निशान। लेकिन वो खुश थीं।
उन्होंने कमजोर आवाज में कहा—

“अब ये रोज होगा अमन… तू मुझे तोड़ता रह… और मैं तुझे अपनी पूरी देह देती रहूँगी… चाहे मर ही क्यों न जाऊँ।”
और फिर से रात आई। रस्सियाँ बँधीं। गला दबा। निप्पल कटे। चूत और गांड फाड़ी गईं। माँ की चीखें और कराहें घर की दीवारों में समा गईं।
ये सिलसिला कभी थमा नहीं। हर रात और क्रूर, और गहरा, और बेकाबू। सुनीता माँ अब सिर्फ मेरी माँ नहीं थीं। वो मेरी पूरी तरह टूटी हुई, बाँधी हुई, पीटी हुई रांड थीं—और वो खुद ये चाहती थीं।

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