गर्भवती भाभी और विधवा बहन

गर्भवती भाभी और विधवा बहन को राहुल ने दर्द, आँसू व गहरी लालसा में डुबो दिया। घर के हर कोने में चलता काला खेल जो पाठक को अंत तक बाँधे रखे widow porn stories ।

मेरा नाम राहुल शर्मा है। उम्र 22 साल। मैं जयपुर के एक मध्यमवर्गीय इलाके में रहता हूँ। कद 5′ 10″, शरीर कसकर बना हुआ, सीना चौड़ा और कमर पतली। मेरा लंड 8 इंच का है, मोटा और नसों से भरा। मैं चार भाई-बहनों में सबसे छोटा हूँ। घर वाले प्यार से मुझे “छोटा” कहते हैं।
मेरी भाभी का नाम कविता शर्मा है। उम्र 26 साल। मेरे बड़े भाई विक्रम की बीवी। उसके स्तन 36D के हैं, कमर 26 इंच और कूल्हे 38 इंच। गोरी चमड़ी, गहरे काले बाल और आँखें जो सीधे लंड को खड़ा कर दें। विक्रम दुबई में प्राइवेट कंपनी में मैनेजर है, उम्र 30 साल। वह कभी-कभी बेचैन रहता है और अपनी पत्नी को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाता।

घर में तीन बहनें हैं। दो शादीशुदा और बाहर रहती हैं। तीसरी बहन अंजलि विधवा है। उम्र 25 साल। पति की मौत के बाद घर लौट आई है और अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन पूरी कर रही है। मां-बाप चारों धाम यात्रा पर गए हुए हैं। घर में सिर्फ मैं, कविता और अंजलि हैं। अंजलि अक्सर कॉलेज या लाइब्रेरी में रहती है।

कविता की शादी को चार साल हो गए हैं लेकिन वह मां नहीं बन पाई। विक्रम ने साफ कह दिया था—“जब तक तू प्रेग्नेंट नहीं होती, राहुल तेरे शरीर का पूरा इस्तेमाल कर सकता है। बाहर वालों से घर वाला बेहतर है।” विक्रम पांच दिन पहले दुबई लौट गया था और मैदान साफ छोड़ गया था।

एक सुबह अंजलि कॉलेज चली गई। घर खाली था। मैंने पीछे से जाकर कविता की कमर पकड़ी और उसकी गर्दन पर जोर से काट लिया। वह चौंकी लेकिन पीछे हटी नहीं।
“छोटा… आज बहुत भूखा लग रहा है?”
“भूखा नहीं, प्यासा हूँ। और आज सिर्फ चूसने से काम नहीं चलेगा।”

उसने मुड़कर मेरी आँखों में देखा। “ठीक है। लेकिन शर्त है—इन इक्कीस दिनों में मुझे गर्भवती करना है। जितना चाहे जितना क्रूर हो, जितना बर्बर हो… कर। लेकिन अंदर ही छोड़ना।”
मैंने उसका मुंह पकड़कर जोर से चूमा। जीभ अंदर घुसाई, होंठ काटे। वह कराह उठी। मैंने उसके बालों को मुट्ठी में भरकर खींचा और गले पर दबाव डाला।
“आज से तू सिर्फ मेरी रंडी है। समझी?”

“हाँ… मालिक।”
हम दोनों बाथरूम गए। मैंने उसे दीवार से सटाया। उसके साड़ी के पल्लू को फाड़ दिया। ब्लाउज के बटन एक-एक करके फाड़े। ब्रा खोलते ही 36D के भारी स्तन बाहर निकल आए। मैंने एक स्तन मुंह में लिया और जोर से चूसा, दांत गड़ाए। वह चिल्लाई। दूसरे स्तन को हाथ से मसलने लगा—इतनी ताकत से कि उंगलियों के निशान पड़ गए।
“आह… राहुल… दर्द हो रहा है…”
“दर्द ही मजा है।”

मैंने उसके पेटीकोट का नाड़ा खींचकर फाड़ दिया। वह नंगी हो गई। मैंने उसके बाल पकड़कर घुटनों पर बैठा दिया।
“मुंह खोल।”
उसने मुंह खोला। मैंने अपना 8 इंच का लंड उसके गले तक घुसा दिया। वह घुटने टेके खांसी और आंसू बहाने लगी लेकिन मैंने सिर पकड़ रखा था। आगे-पीछे धक्के मारता रहा। गला सिकुड़ रहा था, लार टपक रही थी। मैंने उसके बालों को और कसकर पकड़ा और आखिरी धक्के में पूरा लंड गले में ठूंस दिया। वह सिसक रही थी।

फिर मैंने उसे उठाया और बेडरूम में ले गया। बिस्तर पर पटक दिया। उसके पैर फैलाए और चूत पर थूक गिराया। दो उंगलियां अंदर घुसाईं और जोर-जोर से हिलाने लगा। तीसरी उंगली भी जोड़ दी। वह कराह रही थी, कमर उठा-उठाकर मेरी उंगलियों को और अंदर लेने की कोशिश कर रही थी।
“और अंदर… और जोर से…”

मैंने चार उंगलियां अंदर कर दीं और मुट्ठी बनाने लगा। उसकी चूत फैल रही थी। मैंने अपना मुंह उसके भग पर लगा दिया और जीभ अंदर-बाहर करने लगा। साथ ही मुट्ठी घुमाता रहा। वह चीख उठी।
“आह… छोटा… मैं आने वाली हूँ…”
“आने से पहले पूछ।”
वह रोते हुए बोली—“मालिक… मुझे आने दो… प्लीज…”

मैंने मुट्ठी और जोर से घुमाई। वह कांपते हुए झड़ गई। उसके शरीर से पानी की धार निकल रही थी। मैंने वह पानी चाट लिया।
फिर मैंने उसके पैर उसके कंधों तक मोड़ दिए और अपना लंड उसकी गीली चूत पर रखा। एक ही धक्के में पूरा 8 इंच अंदर घुसा दिया। वह जोर से चीखी। मैंने उसके मुंह पर हाथ रख दिया।
“चुप। घर में आवाज नहीं।”

मैंने बर्बरता से धक्के मारने शुरू कर दिए। पूरा शरीर उसके ऊपर गिर रहा था। स्तनों को मसल रहा था, गर्दन काट रहा था, कूल्हों को इतनी ताकत से पकड़ा था कि निशान पड़ रहे थे। वह मेरे नीचे कराह रही थी, नाखून मेरे पीठ में गड़ा रही थी।
मैंने उसे पलटा। कुत्ते की तरह बैठाया। बाल पकड़कर खींचा और पीछे से फिर घुसा दिया। एक हाथ से उसके गले को दबाया। सांस फूल रही थी उसका। मैं और तेज होता गया।

“आज तेरी चूत फाड़ दूंगा।”
“फाड़ दो… मालिक… फाड़ दो…”
मैंने पूरा माल उसकी गहराई में उड़ेल दिया। वह कांपते हुए फिर झड़ गई। हम दोनों पसीने से भीगे बिस्तर पर गिरे रहे।
लेकिन इक्कीस दिन थे। और अंजलि का खतरा भी।
शाम को अंजलि आई। कविता ने मुझसे आँख मिलाई। मैं समझ गया।

रात को कविता ने अंजलि को अपने कमरे में बुलाया। मैं छिपकर सुन रहा था। कविता ने अंजलि को दो ब्लू फिल्मों की सीडी दिखाई। अंजलि पहले झिझकी लेकिन धीरे-धीरे उसकी सांसें तेज होने लगीं। कविता ने उसका हाथ पकड़कर अपनी जांघ पर रखा।
“देख… राहुल कितना बड़ा है। और कितना क्रूर। तू भी चाहे तो…”
अंजलि का शरीर कांप रहा था। कविता ने उसका चेहरा अपने स्तनों के बीच दबाया। मैं कमरे में घुस गया। दरवाजा बंद कर दिया।
अंजलि चौंकी। “राहुल… ये क्या…”

मैंने उसके बाल पकड़कर खींचा। “आज से तू भी मेरी है। बहन होने का नाटक बंद कर।”
कविता ने अंजलि के कपड़े फाड़ने शुरू कर दिए। मैंने अंजलि को बिस्तर पर पटक दिया। उसकी चूत अभी भी सूखी थी। मैंने थूक लगाया और दो उंगलियां जबरदस्ती अंदर घुसा दीं। वह चिल्लाई।
“दर्द हो रहा है… छोड़ो…”
“दर्द ही तेरा नया प्यार है।”

मैंने अपना लंड उसके मुंह में ठूंस दिया जबकि कविता उसकी चूत चाट रही थी। अंजलि की आँखों से आंसू बह रहे थे लेकिन उसका मुंह लंड चूस रहा था। मैंने उसके गले तक धकेल दिया। वह उल्टी करने वाली थी लेकिन मैंने सिर पकड़ रखा था।
फिर मैंने अंजलि को कुत्ते की पोजीशन में किया। कविता उसके स्तन मसल रही थी। मैंने अंजलि की चूत में एक झटके में पूरा लंड घुसा दिया। वह जोर से चिल्लाई। कविता ने उसका मुंह बंद कर दिया।

मैंने बर्बरता से धक्के मारे। अंजलि की चूत फटने वाली थी। खून की हल्की सी धार भी निकली लेकिन मैं रुका नहीं। कविता उसके कान में फुसफुसा रही थी—“सह ले… ये तेरा नया जीवन है।”
मैंने अंजलि के अंदर झड़ने के बाद कविता को भी उसी लंड से फिर चोदा जो अंजलि की चूत के खून और पानी से सना था। दोनों को एक-दूसरे पर लिटाकर बारी-बारी से घुसाता रहा। बाल खींचे, गले दबाए, स्तन काटे, चूत फैलाई।

रातभर यही सिलसिला चला। सुबह अंजलि की आँखें सूजी हुई थीं, शरीर पर नीले निशान थे, चूत सूजी हुई थी। लेकिन जब मैंने फिर उसका मुंह खोला तो उसने बिना विरोध के लंड ले लिया।
अगले बीस दिन यही रहा। हर सुबह अंजलि कॉलेज जाने से पहले दोनों को नंगा करके चोदता। कभी रस्सी से बांधकर, कभी आँखें बांधकर, कभी चेहरे पर थप्पड़ मारकर। कविता खुद अंजलि को तैयार करती—उसकी चूत फैलाती, लंड को अपनी बहन की चूत में घुसाती देखती और मजा लेती।

एक दिन मैंने दोनों को एक-दूसरे से चुदाई करवाई। कविता अंजलि की चूत चाट रही थी जबकि मैं कविता को पीछे से चोद रहा था। अंजलि रो रही थी लेकिन उसकी चूत गीली थी।
इक्कीसवें दिन कविता का टेस्ट पॉजिटिव आया। वह गर्भवती थी।

उस रात मैंने दोनों को आखिरी बार एक साथ लिया। सबसे क्रूर तरीके से। दोनों के हाथ-पैर बांधे। बारी-बारी से मुंह, चूत और गांड में घुसाया। अंजलि की गांड पहली बार फाड़ी। वह चीख रही थी लेकिन कविता उसका मुंह चूम रही थी।
जब मैंने आखिरी बार दोनों के अंदर अपना माल उड़ेला तो कमरा सिर्फ कराहों और मांस की आवाजों से भरा था।
अब घर में तीन शरीर हैं जो मेरे हैं। कविता मेरा बच्चा पालेगी। अंजलि मेरी दूसरी रंडी। और विक्रम दुबई में सोचता होगा कि उसकी बीवी अकेली है।

जारी…
कविता का टेस्ट पॉजिटिव आने के बाद घर का माहौल और भी काला पड़ गया। विक्रम को फोन पर बस इतनी खबर दी गई कि “हो गई।” उसने खुशी जताई और कहा—“अब राहुल को रोक देना।” लेकिन कविता ने फोन काटते ही मेरे पैर छू लिए।
“मालिक… बच्चा आपके ही लंड का है। अब और भी बुरा व्यवहार कीजिए। मुझे और अंजलि को पूरी तरह तोड़ दीजिए।”

अंजलि कोने में बैठी अपने सूजे हुए शरीर को सहला रही थी। उसकी गांड अभी भी हल्के खून से सनी थी। मैंने उसे इशारे से बुलाया। वह रेंगते हुए आई।
“आज से नियम बदल गए हैं,” मैंने कहा। “कविता गर्भवती है, इसलिए उसकी चूत थोड़ी संभालकर। लेकिन अंजलि… तू अब पूरी तरह प्रयोगशाला है।”

मैंने दोनों को नंगा करवाया। कविता के पेट पर हल्के से हाथ फेरते हुए अंजलि के बालों को मुट्ठी में भर लिया। कमरे में रस्सियाँ, बेल्ट और एक मोटी मोमबत्ती पहले से रखी थी। मैंने अंजलि के हाथ पीछे बांध दिए। घुटनों के बल बैठाया। उसके मुंह में कपड़ा ठूंस दिया ताकि चीखें दब जाएँ।
फिर कविता को आदेश दिया—“उसकी गांड फैला।”

कविता ने बहन की गांड के गोल माँस को दोनों हाथों से खींचकर फैला दिया। मैंने मोमबत्ती जलाई और पिघला हुआ मोम सीधे अंजलि की गांड के छेद पर टपकाया। वह झटके से काँपी, शरीर ऐंठ गया, लेकिन बांधी हुई थी। मोम ठंडा होते ही सख्त हो गया। मैंने और मोम टपकाया—पीठ पर, स्तनों पर, जांघों के अंदर। हर बूँद पर उसका शरीर काँपता।
“अब चाट,” मैंने कविता से कहा।

कविता घुटनों के बल बैठी और अंजलि की गांड पर जमी मोम को जीभ से साफ करने लगी। अंजलि की आँखों से आँसू बह रहे थे। मैंने पीछे से कविता की गर्भवती चूत में दो उंगलियाँ घुसा दीं और धीरे-धीरे हिलाने लगा।
“तेरी बहन की गांड अब मेरी पसंदीदा जगह है। आज इसे पूरा खोलूँगा।”

मैंने अपना लंड अंजलि के मुंह के कपड़े हटाकर उसके गले तक धकेल दिया। वह घुट रही थी। लार टपक रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर और जोर से धक्के मारे जब तक उसकी आँखें लाल नहीं हो गईं। फिर लंड निकाला और सीधे उसकी गांड पर रखा।
कविता ने थूक लगा दिया। मैंने एक ही झटके में आधा लंड अंदर घुसा दिया। अंजलि की चीख कपड़े में दब गई। मैं रुका नहीं। पूरा 8 इंच धीरे-धीरे लेकिन निर्दयता से धकेलता गया। उसकी गांड फट रही थी, खून की धार फिर निकली। मैंने कविता का हाथ पकड़कर अंजलि की चूत पर रख दिया।

“उसे सहला। मजा आने तक।”
कविता की उंगलियाँ अंजलि की चूत में घूम रही थीं जबकि मैं उसकी गांड में बर्बर धक्के मार रहा था। हर धक्के पर अंजलि का शरीर आगे झुक जाता। मैंने उसके बाल खींचकर सिर पीछे किया और गले पर दबाव डाला। सांस फूल रही थी उसकी। चेहरा लाल हो गया था।
मैंने अंजलि की गांड में ही झड़ने का फैसला किया। पूरा माल गहराई में उड़ेल दिया। निकालते समय खून और वीर्य मिला हुआ निकल रहा था। कविता ने तुरंत जीभ लगा दी और सब चाटने लगी।

“अब बारी तेरी,” मैंने कविता से कहा।
मैंने कविता को अंजलि के ऊपर लिटा दिया—चेहरा उसकी खून से सनी गांड पर। फिर कविता की चूत में धीरे से लंड घुसाया। गर्भवती होने के कारण आज sensivity बढ़ गई थी। वह कराह उठी। मैंने उसके बाल पकड़कर अंजलि की गांड में और जोर से दबाया।
“चाट। अपनी बहन का खून और मेरा माल दोनों।”

कविता ने आज्ञा मान ली। जीभ घुमा-घुमाकर चाट रही थी जबकि मैं उसकी चूत में गहरे लेकिन नियंत्रित धक्के मार रहा था। एक हाथ से अंजलि के स्तनों को मसल रहा था—इतनी ताकत से कि उंगलियों के निशान नीले पड़ गए।
रात के तीन बज चुके थे। मैंने दोनों को बिस्तर के पायों से बांध दिया। अंजलि के पैर फैलाए और उसकी चूत में एक मोटा लकड़ी का डंडा घुसा दिया। कविता की चूत में अपनी उंगलियाँ। फिर दोनों के मुंह में बारी-बारी से लंड डालकर चूसवाया। जब थक जाता तो उनके चेहरों पर थप्पड़ मारता, गालों को लाल कर देता।

सुबह अंजलि को कॉलेज नहीं जाने दिया। मैंने कहा—“आज तू घर पर ही पढ़ेगी। पाठ नया है।”
मैंने उसे रसोई में ले जाकर सिंक के किनारे झुका दिया। हाथ पीछे बांधे। फिर पीछे से फिर गांड में घुसा दिया। इस बार बिना थूक के। वह सिसक रही थी। कविता नाश्ता बनाते हुए देख रही थी और कभी-कभी आकर अंजलि के स्तन मसल देती।

दोपहर में मैंने दोनों को बालकनी के पास खड़ा किया। पर्दे थोड़े खुले थे। पड़ोसी देख सकते थे अगर ध्यान देते। मैंने अंजलि को घुटनों के बल बैठाया और लंड उसके मुंह में ठूंस दिया। कविता पीछे से उसकी गांड फैलाए खड़ी थी। मैं धक्के मार रहा था और कविता को आदेश दे रहा था कि वह अंजलि की चूत में उंगलियाँ घुमाए।

“अगर कोई देख ले तो बता देना कि तू अपनी छोटी बहन को सिखा रही है,” मैंने हँसते हुए कहा।
शाम को और क्रूर हुआ। मैंने अंजलि के निप्पल्स पर क्लिप लगा दी। छोटी-छोटी धातु की क्लिप जो दर्द देती थीं। फिर रस्सी से उसके स्तनों को बांधकर ऊपर खींचा। वह रो रही थी लेकिन उसकी चूत गीली थी। मैंने उंगली डालकर जाँचा।
“शरीर तो झूठ नहीं बोलता। तू मजा ले रही है।”

मैंने कविता को अंजलि के चेहरे पर बैठने का आदेश दिया। कविता की चूत अंजलि के मुंह पर थी। अंजलि को चाटना पड़ रहा था जबकि मैं उसकी गांड में फिर से घुस गया। इस बार और तेज। हर धक्के पर क्लिप हिलतीं और दर्द बढ़ता। अंजलि की जीभ कविता की चूत में घूम रही थी क्योंकि और कोई रास्ता नहीं था।

मैंने अंजलि की गांड में झड़ने के बाद लंड निकाला और सीधा कविता के मुंह में डाल दिया। “चाट। बहन की गांड का स्वाद।”
कविता ने आज्ञाकारी ढंग से सब साफ कर लिया।
रात को मैंने दोनों को एक साथ बांधा—एक-दूसरे के सामने, पैर फैले हुए। बीच में बैठकर बारी-बारी से दोनों की चूत और गांड में उंगलियाँ, फिर लंड घुमाता रहा। कभी अंजलि की चूत में, कभी कविता की। कभी दोनों की गांड में एक साथ दो उंगलियाँ। जब वे कराहतीं तो उनके मुंह में उंगलियाँ ठूंस देता ताकि आवाज न निकले।

एक बार अंजलि ने बहुत जोर से सिसकी। मैंने उसका गला दबाया और लंड उसकी चूत में पूरा धकेल दिया।
“बोल। तू क्या है?”
आँसू भरी आँखों से उसने कहा—“आपकी… रंडी… मालिक।”
“और कविता?”
“मेरी… दीदी भी… आपकी रंडी।”

मैंने दोनों के चेहरों पर थूक दिया। उन्होंने चाट लिया।
अगले कई दिन यही सिलसिला चला। कविता का पेट हल्के से उभरने लगा था। मैं उसकी चूत में सावधानी से लेकिन उसकी गांड और मुंह में पूरी बर्बरता से लेता। अंजलि की गांड अब इतनी फैल चुकी थी कि मेरा लंड आसानी से अंदर चला जाता। फिर भी मैं उसे और फैलाने के लिए मोटी वस्तुएँ इस्तेमाल करता—कभी खीरा, कभी गाजर, कभी अपनी मुट्ठी तक।

एक रात मैंने अंजलि की मुट्ठी उसकी अपनी गांड में घुसवा दी। कविता ने मदद की। अंजलि चीख रही थी लेकिन शरीर काँप रहा था मजे से। मैंने उसका मुंह चूमते हुए कहा—“अब तू पूरी तरह टूट चुकी है। और यही मुझे चाहिए।”
घर का हर कोना अब हमारे खेल का मैदान बन चुका था। सोफे पर, रसोई की मेज पर, बाथरूम की फर्श पर, यहाँ तक कि माँ-बाप के बिस्तर पर भी। मैंने अंजलि को माँ-बाप के कमरे में ले जाकर उसी बिस्तर पर बांधा जहाँ वे सोते थे। फिर पूरी रात उसकी गांड और चूत दोनों का इस्तेमाल किया जबकि कविता एक तरफ बैठी अपने स्तनों से दूध जैसी हरकतें करती देखती रही।

विक्रम कभी-कभी वीडियो कॉल करता। कविता हँसकर बात करती और मैं पीछे से उसकी गांड में लंड डाले बैठा रहता। एक बार कॉल के दौरान ही मैंने अंजलि को भी कमरे में बुलाया और उसके मुंह में लंड डाल दिया। कविता ने कैमरे को थोड़ा सा घुमाया नहीं। विक्रम को कुछ पता नहीं चला।

अब घर में सिर्फ तीन शरीर बचे थे—एक गर्भवती भाभी, एक टूटी हुई विधवा बहन, और मैं। रात के अंधेरे में जब दोनों मेरे नीचे कराहते, रोते, भीख माँगते और फिर खुद ही और दर्द माँगते, तो मुझे पता चलता कि यह साम्राज्य अब और गहरा होने वाला है।
क्योंकि अगले हफ्ते माँ-बाप लौटने वाले थे। और तब तक दोनों को इतना आदी बना देना था कि वे खुद ही चुप रहें… या फिर और किसी को भी इस जाल में खींच लें।

मैंने अंजलि के कान में फुसफुसाया—“अगला शिकार कौन होगा? सोच।”
उसकी आँखों में डर था… और भूख भी।

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