सरसों के खेतों में नेहा की चीखें – sex ki kahani

दिवाली की रात, नहर किनारे पीपल की छाँव में नेहा की गोरी देह काँपी। टाइट चूत फटी, खून बहा, पाँच झड़के, तीन राउंड चुदाई… अब वो कंडोम माँग रही है, वासना की जंग जारी है! जंगली, गंदी, देसी लस्ट sex ki kahani ।

मेरा नाम विक्रम है, उम्र 28 साल। मैं दिल्ली में एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर डेवलपर हूँ, लेकिन हर साल दिवाली की छुट्टियों में मैं अपने पैतृक गाँव हरियाणा के रोहतक के पास वाले छोटे से गाँव कस्बा-भराना लौट आता हूँ। वहाँ का माहौल अलग ही है – खेतों की हरी-भरी महक, शाम को ठंडी हवा और वो पुरानी यादें जो बचपन से चिपकी हुई हैं।


इस बार जब मैं गाँव पहुँचा, तो सबसे पहले नज़र पड़ी मेरी पड़ोसन नेहा पर। नेहा अब 24 साल की हो चुकी थी। कॉलेज खत्म करके वो अब घर पर ही थी, कभी-कभी शहर जाकर कुछ छोटे-मोटे काम करती। नेहा का रंग गोरा था, लंबाई करीब 5 फुट 5 इंच, फिगर ऐसा कि कोई भी दो बार देखे – 36-26-38। वो अक्सर टाइट कुर्ती और लेगिंग्स पहनती, जिससे उसके कर्व्स और भी उभर आते। बचपन में हम साथ खेलते थे, लेकिन अब वो लड़की नहीं रही थी – अब वो औरत थी, जिसकी आँखों में एक अलग ही आग जलती थी।


दिवाली के दूसरे दिन शाम को मैं खेतों की सैर करने निकला। नेहा भी वहीं थी, अपने पिता के साथ सरसों के खेत में कुछ काम निपटा रही थी। जैसे ही उसने मुझे देखा, मुस्कुराई और हाथ हिलाया। “विक्रम भैया! आ गए दिल्ली से? कितने दिन रुकोगे इस बार?” उसने पूछा, आवाज़ में वो पुरानी शरारत थी।


“दस-बारह दिन तो हूँ,” मैंने कहा और उसके पास खड़ा हो गया। उसके पिता ने कहा, “बेटा, तुम दोनों बात करो, मैं घर जा रहा हूँ।” और चले गए। अब हम दोनों अकेले थे खेतों के बीच में। सूरज ढल रहा था, आसमान नारंगी हो गया था। नेहा ने कहा, “चलो ना, थोड़ा आगे चलते हैं। वहाँ नहर के किनारे बहुत अच्छी जगह है, कोई नहीं आता।”


हम चल पड़े। नहर के किनारे एक पुराना पीपल का पेड़ था, उसके नीचे घास बिछी हुई। हम बैठ गए। बातें शुरू हुईं – दिल्ली की लाइफ, उसके कॉलेज के दिन, फिर धीरे-धीरे बातें पर्सनल होने लगीं। “भैया, तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड है क्या?” उसने शरमाते हुए पूछा। मैं हँसा, “अभी तक नहीं मिली जो दिल से लग जाए। तू बता, कोई लड़का पसंद आया?”


वो चुप हो गई, फिर बोली, “कई तो आते हैं, लेकिन कोई ऐसा नहीं जो… मतलब… सब कुछ समझ सके।” उसकी आँखें मेरी तरफ उठीं। उस पल में कुछ हुआ। मैंने उसका हाथ पकड़ा। वो काँप गई, लेकिन हाथ नहीं छोड़ा। “नेहा…” मैंने धीरे से कहा। वो मेरे करीब आ गई। हमारी साँसें मिलने लगीं।


मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। वो पहले तो सिहर गई, फिर जवाब देने लगी। किस गहरा होता गया। मेरे हाथ उसकी कमर पर गए, फिर ऊपर। उसकी साँसें तेज़ हो गईं। “विक्रम… यहाँ… कोई देख लेगा…” उसने फुसफुसाया। लेकिन उसकी आँखें बंद थीं, और शरीर मेरे साथ चिपका हुआ था।


मैंने उसे पीपल के पेड़ के पीछे ले जाकर खड़ा किया। वहाँ झाड़ियाँ थीं, कोई आसानी से नहीं देख सकता था। मैंने उसकी कुर्ती ऊपर की। उसकी ब्रा में उसके बड़े-बड़े स्तन उभरे हुए थे। मैंने ब्रा ऊपर सरकाई और एक निप्पल मुंह में ले लिया। नेहा ने “आह्ह…” की आवाज़ निकाली और मेरे बालों में उंगलियाँ फेरने लगी। “विक्रम… कितना अच्छा लग रहा है… आह्ह…”


मैंने दूसरा हाथ उसकी लेगिंग्स के अंदर डाला। पैंटी पहले से गीली थी। मैंने उंगली से उसकी चूत को सहलाना शुरू किया। वो उछल पड़ी। “आह्ह… माँ… बस… इतना मत करो… दिल धड़क रहा है इतना तेज़…” वो कराह रही थी। लेकिन मैं रुकने वाला नहीं था। मैंने एक उंगली अंदर डाली। कितनी गरम और टाइट थी उसकी चूत! मैंने अंदर-बाहर करना शुरू किया। वो काँप रही थी। “विक्रम… आह्ह… बस करो… मैं… मैं…” और वो झड़ गई। उसका पूरा शरीर काँप उठा। आँखें बंद, मुंह से सिसकारियाँ निकल रही थीं।


जब वो शांत हुई, तो मुस्कुराई। “बहुत हो गया… अब घर चलें?” उसने कहा। मैंने कहा, “तेरा तो हो गया, मेरा क्या?” वो हँसी, “यहाँ? ऐसे?” मैंने कहा, “क्यों नहीं?” वो चुप हो गई। उसकी आँखों में इच्छा साफ दिख रही थी, लेकिन बोल नहीं पा रही थी।


मैंने अपना जींस खोला और लुंड बाहर निकाला। ७ इंच का, मोटा, सख्त। मैंने उसे उसके पेट पर रगड़ा। वो सिहर उठी। आँखें खुलीं, फिर बंद। मैंने उसके पैर थोड़े फैलाए और घुटनों के बल बैठ गया। उसकी चूत मेरे मुंह के सामने थी। मैंने जीभ से क्लिट को छुआ। नेहा मछली की तरह तड़पी। “आह्ह… विक्रम… बस… मार डालोगे… आह्ह…” वो मेरे बाल जोर से पकड़ रही थी। मैंने चूसना नहीं छोड़ा। जीभ अंदर-बाहर, क्लिट को चाटते हुए। वो चीख रही थी, “विक्रम… अब मत रुकना… डाल दो ना… अपना वो… मेरे अंदर…”


मैंने कहा, “क्या?” वो चुप। मैंने कहा, “जो करना है, तू खुद कर।” तो उसने मेरे लुंड को हाथ में पकड़ा। थूक लगाया, अच्छे से गीला किया। फिर खुद उसकी चूत पर रखकर बोली, “अंदर डालो ना… प्लीज…”


मैंने धीरे से धक्का दिया। बहुत टाइट थी। वो “आह्ह…” करके सिहर गई। “कुछ हुआ?” मैंने पूछा। “नहीं…” उसने कहा। मैंने लुंड बाहर निकाला, फिर जोर से धक्का मारा। आधा अंदर चला गया। नेहा चीखी, “आह्ह… माँ… मार गई… विक्रम… क्या कर दिया…” उसकी चूत से थोड़ा खून निकला। वो वर्जिन थी।

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मैंने कहा, “सब्र कर, अभी आधा ही गया है।” वो रोने लगी, “बस… इतने में ही पूरा कर लो…” लेकिन थोड़ी देर बाद वो खुद अपने नितंब उछालने लगी। दर्द कम हो रहा था। मैंने धीरे-धीरे धक्के देने शुरू किए। वो साथ देने लगी। “थोड़ा और अंदर… डालो ना…” उसने कहा। मैंने कहा, “नहीं, तू चीखती है।” वो बोली, “अब नहीं चीखूँगी।”


मैंने जोर लगाया। पूरा अंदर चला गया। वो “आह्ह… माँ… विक्रम… इतना जोर से नहीं… मार दिया तूने…” कर रही थी। मैंने उसे किस किया। होंठ चूसते हुए धक्के देने लगा। अब वो भी साथ दे रही थी। “आह्ह… वाह… कितना अच्छा लग रहा है… पूरा ले लिया… आह्ह… रोज़ देना… मज़ा आ गया…”


मैंने स्पीड बढ़ाई। उसकी चूत से पच… पच… की आवाज़ आने लगी। वो दूसरी बार झड़ने वाली थी। मैंने तेज़ धक्के मारे। वो झड़ गई, मुझे कसकर पकड़ लिया। नाखून मेरी पीठ में गड़ गए। उसका सारा रस निकल गया। मैं रुका नहीं। बड़े-बड़े स्ट्रोक मारने लगा। २० मिनट तक चुदाई चलती रही। फिर मैंने कहा, “मैं झड़ने वाला हूँ… कहाँ झड़ूँ?”


“अंदर मत… कुछ हो गया तो…” उसने कहा। मैंने बाहर निकालकर उसके पेट, स्तनों पर सारा माल छोड़ दिया। वो भी फिर से झड़ने वाली थी, लेकिन मैंने लुंड निकाल लिया। वो बोली, “क्यों? अब कुछ नहीं करोगे?”


मैंने कहा, “अब तो तुझे ही जगाना पड़ेगा।” वो इतनी गरम थी कि बिना कुछ कहे मेरे लुंड को हाथ में लेकर सहलाने लगी। फिर मुंह में ले लिया। चूसने लगी, जीभ घुमाती हुई। मेरा लुंड फिर से खड़ा हो गया। वो बोली, “लो, जगा दिया… अब जल्दी कुछ करो।”


मैंने उसे डॉगी स्टाइल में किया। पीछे से पकड़कर पूरी ताकत से धक्के मारे। वो चीख रही थी, “आह्ह… और जोर से… फाड़ दो मेरी… आह्ह…” उस दिन खेत में हमने तीन बार चुदाई की। पहली बार मिशनरी, दूसरी डॉगी, तीसरी वो ऊपर थी, कूद रही थी मेरे ऊपर।
तीसरी बार के बाद वो थक गई। “अब नहीं… उठ भी नहीं पा रही…” उसने कहा। मैंने पूछा, “कितनी बार झड़ी?” वो मुस्कुराई, “पाँच बार।” मैं समझ गया – पाँच बार झड़ने के बाद हालत क्या होती है।


हम अंधेरा होने से पहले उठे। वो चल नहीं पा रही थी। मैंने उसे गोद में उठाया और घर तक ले आया। रास्ते में वो मेरे सीने से लगी रही, खुश।
रात को जब सब सो गए, वो चुपके से मेरे कमरे में आ गई। “विक्रम… कल अगर कहीं जाना हो तो कंडोम ले आना। अगली बार तुम्हारा माल बाहर नहीं निकलेगा…” उसने कान में फुसफुसाया। मैंने उसे गले लगाया। वो संतुष्ट थी, बहुत ज़्यादा।


अगले कई दिन हमने मौके देख-देखकर मिलना जारी रखा। कभी खेतों में, कभी नहर किनारे, कभी घर की छत पर। वो मेरी हो चुकी थी, और मैं उसका। वो शाम जो खेतों में शुरू हुई थी, वो हमारी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत राज़ बन गई। और आज भी जब मैं दिल्ली में अकेला होता हूँ, तो वो यादें ताज़ा हो जाती हैं – नेहा की सिसकारियाँ, उसकी गरम चूत, और वो पल जब वो बोली थी, “रोज़ देना… मज़ा आ गया…”

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