मेघगढ़ की रानी वैशाली को कालासिंह दुर्ग में कैद कर लिया गया। सुल्तान अज़ीज़ खान ने उसे नंगा बाँधा, चाबुक से पीटा, कई मर्दों से एक साथ भरवाया और हर रात नया अपमान दिया। शरीर जलता रहा, आँखों से आँसू बहे, पर कोई छुटकारा नहीं मिला।
राजमहल की ऊँची दीवारों के पीछे छिपा एक संसार था जहाँ सत्ता और वासना एक-दूसरे में घुलमिल गए थे। मध्य एशिया के विशाल रेगिस्तान में बसा ‘कालासिंह दुर्ग’ कभी हिंदू राजाओं का गढ़ था, पर अब वह तुर्क शासक सुल्तान अज़ीज़ खान के कब्जे में था। सुल्तान की उम्र बत्तीस साल थी, शरीर लोहे जैसा मजबूत, कंधे चौड़े, छाती पर घनी काली दाढ़ी और आँखों में बर्फीली क्रूरता। उसकी हरम में सौ से ज्यादा औरतें थीं, पर आज उसकी नज़र एक नई कैदी पर टिकी थी।
महारानी वैशाली की उम्र अट्ठाईस साल थी। वह ‘मेघगढ़’ की रानी थी, जहाँ के राजा वीरेंद्र सिंह ने पिछले महीने तुर्क सेना से हार खाई थी। वैशाली का शरीर पत्थर की मूर्ति जैसा था—ऊँचाई पाँच फुट आठ इंच, कमर इक्कीस इंच, कूल्हे छत्तीस इंच, और स्तन छत्तीस इंच के गोल-मटोल, जिन्हें किसी भी कपड़े में छिपाना असंभव था। उसकी त्वचा दूध जैसी सफेद, बाल कमर तक घने काले, और आँखें गहरी भूरी जो अब भी गुस्से से चमक रही थीं।
रात भर की क्रूर लीला के बाद वैशाली अपने नए कमरे में नंगी पड़ी थी। बिस्तर पर रेशमी चादरें बिछी थीं, पर उसके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। उसकी जाँघों के बीच सूखा हुआ गाढ़ा सफेद तरल चिपका हुआ था—सुल्तान का। उसकी चूत अभी भी फूल रही थी, होंठ सूजे हुए, और कमर पर लाल निशान थे जहाँ सुल्तान ने अपनी मजबूत उंगलियों से दबा-दबा कर पकड़ा था। कमरे की खिड़की से सुबह की धूप आ रही थी, पर वैशाली गहरी नींद में थी। नींद में भी उसके होंठ हल्के-हल्के काँप रहे थे, जैसे अभी भी दर्द और सुख दोनों याद आ रहे हों।
दरवाजा धीरे से खुला। अंदर आई एक दासी—नाम था ज़रीना। उम्र पच्चीस साल, शरीर पतला पर स्तन बड़े, कमर पतली, और आँखों में शरारत। ज़रीना हरम की सबसे पुरानी दासी थी। उसने वैशाली को इस हाल में देखा तो मुस्कुराई। वह जानती थी कि सुल्तान जब किसी नई रानी को अपने बिस्तर पर लाता है तो सुबह ऐसा ही दृश्य होता है।
“उठो रानी जी,” ज़रीना ने धीमी आवाज़ में कहा। “सुल्तान ने हुक्म दिया है। आज दरबार में आपकी पेशी है।”
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वैशाली की आँखें धीरे-धीरे खुलीं। पहले तो उसे समझ नहीं आया कि वह कहाँ है। फिर याद आई—मेघगढ़ का पतन, राजा वीरेंद्र सिंह का भागना, और खुद का बंदी बनना। तुर्क सैनिकों ने उसे महल से घसीट कर बाहर निकाला था। उसके कपड़े फाड़ दिए गए थे, शरीर पर थूक और हाथ लगाए गए थे, और अंत में उसे सुल्तान के तंबू में पेश किया गया था।
रात भर सुल्तान ने उसे अपने बिस्तर पर बिठाया था। पहले तो वैशाली ने विरोध किया, पर सुल्तान ने उसकी दोनों कलाईयाँ लोहे की जंजीर से बाँध दीं। फिर उसने वैशाली को पेट के बल लिटाया, उसकी कमर ऊपर उठाई, और अपनी मोटी, लंबी, गहरी रंगत वाली लंड को उसकी चूत में एक झटके में घुसेड़ दिया। वैशाली चिल्लाई, पर सुल्तान ने उसका मुँह कपड़े से बंद कर दिया।
फिर उसने बिना रुकें एक घंटे तक उसे ठोका। हर धक्के पर वैशाली की छाती बिस्तर से टकराती, स्तन फैलते-सिकुड़ते, और उसकी चूत से खून और रस दोनों निकलते। सुल्तान ने बीच में उसकी गांड भी ली। पहले उंगलियाँ घुसाईं, फिर अपनी लंड। वैशाली की आँखों से आँसू बह रहे थे, पर शरीर ने धोखा दिया—उसकी चूत गीली हो गई थी, और जब सुल्तान ने अंदर ही झाड़ दिया तो वह काँप उठी।
अब सुबह वैशाली ने ज़रीना को देखा तो शर्म से चादर खींचने लगी। पर ज़रीना हँसी।
“यहाँ शर्म की कोई जगह नहीं, रानी जी। आप अब सुल्तान की सम्पत्ति हैं। उठो, नहाने चलो।”
वैशाली चुपचाप उठी। चादर लपेटे वह ज़रीना के पीछे-पीछे गुसलखाने में गई। गुसलखाना संगमरमर का था, बीच में बड़ा हौज़, गर्म पानी, और तरह-तरह के तेल। ज़रीना ने वैशाली की चादर उतार दी। वैशाली नंगी खड़ी थी। ज़रीना ने उसके शरीर को देखा—कूल्हे गोल, जाँघें मोटी, चूत के बाल घने और काले, स्तन भारी और निपल्स अभी भी सख्त।
“माशाअल्लाह,” ज़रीना बोली। “सुल्तान ने सही चुना है।”
फिर तीन और दासियाँ आईं—मेहेर, सबा और नूरी। चारों ने मिलकर वैशाली को नहलाया। गर्म पानी से उसके शरीर को धोया, तेल से मालिश की। मेहेर ने वैशाली की चूत को साफ करते हुए उँगली अंदर डाल दी। वैशाली चौंकी।
“क्या कर रही हो?”
मेहेर हँसी। “सिर्फ साफ कर रही हूँ, रानी जी। कल रात सुल्तान का काफी कुछ अंदर रह गया था।”
फिर सबा ने वैशाली के स्तनों पर तेल लगाया, निपल्स को घुमा-घुमा कर दबाया। नूरी ने उसकी गांड की दरार में तेल डाला और उँगली घुमाई। वैशाली का शरीर काँप रहा था। वह विरोध करना चाहती थी, पर चारों दासियाँ मजबूत थीं। उन्होंने उसे पकड़ रखा था।
नहाने के बाद उन्होंने वैशाली को तैयार किया। सुल्तान की पसंद के कपड़े—एक पतला रेशमी कुर्ता जो स्तनों को आधा ही ढकता था, नीचे सलवार जो कूल्हों पर चिपक जाती थी, और एक पारदर्शी ओढ़नी। बाल खुले रखे गए, माथे पर ज्वेलरी, और गले में मोटी सोने की चेन।
जब वैशाली ने शीशे में खुद को देखा तो चौंक गई। वह अब वैशाली नहीं, बल्कि एक वेश्या जैसी लग रही थी—शरीर उभरा हुआ, आँखों में काजल, होंठ लाल।
“तैयार हो?” ज़रीना ने पूछा।
वैशाली ने सिर हिलाया। चारों दासियाँ उसे दरबार की ओर ले चलीं।
दरबार विशाल था। संगमरमर के खंभे, सोने की छत, और बीच में सुल्तान का सिंहासन। सुल्तान अज़ीज़ खान बैठा था। उसके दोनों तरफ सिपाही, और नीचे दरबारी। वैशाली को सिंहासन के सामने लाकर खड़ा कर दिया गया।
सुल्तान ने मुस्कुराते हुए कहा, “वैशाली, मेघगढ़ की रानी। कल रात तुमने अच्छा प्रदर्शन किया। आज मैं तुम्हें अपना खास तोहफा दूँगा।”
वैशाली ने सिर उठाया। “मैं रानी हूँ। मुझे इस तरह अपमानित मत करो।”
सुल्तान हँसा। “यहाँ तुम रानी नहीं, मेरी लौंडी हो।”
फिर उसने इशारा किया। दो सिपाही आए और वैशाली के कपड़े फाड़ दिए। कुर्ता फट गया, स्तन बाहर निकल आए। सलवार भी खींच ली गई। वैशाली पूरी नंगी दरबार के बीचोंबीच खड़ी थी। सारे दरबारी हँस रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे।
सुल्तान ने आदेश दिया, “उसे घुटनों के बल बिठाओ।”
सिपाहियों ने वैशाली को घुटनों पर बैठाया। सुल्तान अपने सिंहासन से उतरा। उसने अपनी पजामा खोली। उसकी लंड बाहर निकली—मोटी, लंबी, नसों वाली, और पहले से ही सख्त। उसने वैशाली के बाल पकड़े और अपना लंड उसके मुँह में ठूंस दिया।
“चूसो,” उसने आदेश दिया।
वैशाली ने विरोध किया, पर सुल्तान ने उसके बाल और कसकर पकड़े और लंड को गले तक घुसेड़ दिया। वैशाली की आँखों से आँसू बहने लगे, साँस रुक गई, पर सुल्तान बिना रुके धक्के मारता रहा। दरबार में सब देख रहे थे। कुछ दरबारी अपनी पजामा खोलकर खुद हस्तमैथुन करने लगे।
दस मिनट बाद सुल्तान ने वैशाली को पेट के बल लिटाया। उसने उसकी कमर ऊपर उठाई, दोनों हाथों से कूल्हे पकड़े, और अपनी लंड को उसकी चूत में एक झटके में घुसेड़ दिया। वैशाली चिल्लाई। सुल्तान ने बिना रुकें ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर वैशाली का शरीर आगे-पीछे होता, स्तन बिछौने से टकराते, और उसकी चूत से रस की आवाज़ आती।
सुल्तान ने बीच में उसकी गांड भी ली। पहले थूक लगाकर, फिर पूरी लंड। वैशाली की चीखें दरबार में गूँज रही थीं। सुल्तान ने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “अब तुम मेरी हो। हर रात यही होगा। कभी अकेले, कभी दरबार में, कभी सिपाहियों के सामने।”
फिर उसने वैशाली को घुमाया, उसकी दोनों टाँगें अपने कंधों पर रखीं, और और तेज़ी से ठोकने लगा। वैशाली का शरीर काँप रहा था। उसकी चूत फूल चुकी थी, निपल्स सख्त, और आँखें बंद। सुल्तान ने आखिर में अंदर ही झाड़ दिया—गाढ़ा, गर्म, और बहुत सारा।
जब वह निकला तो वैशाली की चूत से सफेद तरल बह रहा था। सुल्तान ने सिपाहियों से कहा, “उसे हरम ले जाओ। आज रात फिर बुलाऊँगा। और हाँ, ज़रीना, उसे सिखाओ कि सही तरीके से गांड कैसे उठानी है।”
वैशाली को उठाया गया। उसके पैर काँप रहे थे। दासियाँ उसे हरम ले गईं। रास्ते में ज़रीना ने उसके कान में कहा, “रानी जी, अब तो शुरुआत हुई है। कल रात से भी ज्यादा क्रूर होगा। सुल्तान को दर्द पसंद है। वह तुम्हें बाँधेगा, चाबुक मारेगा, और कई बार एक साथ कई मर्दों से तुम्हें लेवाएगा।”
वैशाली ने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में आँसू थे, पर शरीर अभी भी गुनगुना रहा था। हरम के कमरे में पहुँचकर दासियों ने उसे फिर नहलाया, तेल लगाया, और बिस्तर पर लिटा दिया। वैशाली आँखें बंद किए पड़ी रही। बाहर से दरबार की हँसी अभी भी सुनाई दे रही थी।
शाम को फिर दरवाजा खुला। सुल्तान खुद आया। उसके साथ दो और सिपाही थे। वैशाली को फिर नंगा किया गया। सुल्तान ने उसे जंजीरों से बाँधा—हाथ ऊपर, टाँगें फैली हुई। फिर उसने चाबुक निकाला। पहली मार वैशाली की जाँघ पर पड़ी। दूसरी स्तनों पर। तीसरी चूत पर। वैशाली चिल्लाई, पर सुल्तान हँसता रहा।
फिर उसने सिपाहियों को इशारा किया। दोनों ने अपनी पजामा उतारी। एक ने वैशाली के मुँह में लंड ठूंस दी, दूसरे ने उसकी चूत में। सुल्तान खुद उसकी गांड में घुस गया। तीनों एक साथ धक्के मार रहे थे। वैशाली का शरीर हिल रहा था, आवाज़ें बंद हो रही थीं, पर शरीर ने फिर धोखा दिया—उसकी चूत और गांड दोनों गीली हो गई थीं।
रात भर यही चलता रहा। कभी सुल्तान अकेले, कभी सिपाहियों के साथ, कभी दासियों से वैशाली को चाटवाते हुए। सुबह होने तक वैशाली का शरीर नीले निशानों से भरा था, चूत और गांड दोनों फूल चुके थे, और मुँह में सफेद तरल भरा था।
जब सुल्तान गया तो ज़रीना आई। उसने वैशाली के बाल सहलाते हुए कहा, “अब तुम पूरी तरह हमारी हो, रानी जी। यहाँ से भागने का कोई रास्ता नहीं। हर दिन नया खेल होगा। कभी जंगल में, कभी दरबार में, कभी सिपाहियों की बैरक में।”
वैशाली ने आँखें खोलीं। उसकी आवाज़ कर्कश थी। “मैं… मैं मर जाऊँगी।”
ज़रीना हँसी। “मरने नहीं देंगे। सुल्तान को तुम्हारा शरीर बहुत पसंद है। तुम जिंदा रहोगी, और हर रात यही होगा।”
वैशाली ने सिर घुमाया। खिड़की से बाहर रेगिस्तान दिख रहा था। दूर कहीं मेघगढ़ था, जहाँ उसका पति भाग चुका था। पर अब वह वापस नहीं जा सकती थी। वह अब सुल्तान अज़ीज़ खान की लौंडी थी—नंगी, बाँधी हुई, और हर रात इस्तेमाल होने वाली।
हरम में रात गहरी होती जा रही थी। बाहर सिपाहियों की पहरेदारी थी। वैशाली बिस्तर पर पड़ी रही। शरीर में दर्द की लहरें दौड़ रही थीं—चूत सूजी हुई, गांड जल रही थी, स्तनों पर चाबुक के लाल निशान और जाँघों पर उंगलियों के गहरे निशान। आँखों से आँसू रुक-रुक कर बह रहे थे, पर शरीर अभी भी काँप रहा था। सुल्तान का गाढ़ा वीर्य अभी भी उसकी चूत और गांड से धीरे-धीरे रिस रहा था, जाँघों पर सफेद धारियाँ बनाता हुआ।
रात और गहरी हो चुकी थी जब दरवाजा फिर खुला। ज़रीना अकेली नहीं आई थी। उसके साथ मेहेर, सबा, नूरी और दो नए सिपाही थे—एक का नाम रशीद, दूसरा कासिम। दोनों सिपाही युवा थे, शरीर कसा हुआ, आँखों में भूख। ज़रीना के हाथ में लोहे की जंजीरें, काले चमड़े का चाबुक और एक मोटी लोहे की रॉड थी।
“उठो लौंडी,” ज़रीना ने ठंडी आवाज़ में कहा। “सुल्तान का नया हुक्म आया है। आज रात तुम्हें पूरी तरह तोड़ना है।”
वैशाली ने विरोध में सिर हिलाया, पर चारों दासियों ने उसे बिस्तर से खींच कर खड़ा कर दिया। उसके हाथ पीछे बाँध दिए गए—कलाईयाँ एक-दूसरे से जकड़ दी गईं, फिर ऊपर खींच कर छत की कड़ी से लटका दिया गया। पैर फैलाए गए और टखनों में भी जंजीरें कस दी गईं। वैशाली अब पूरी तरह नंगी, बाँहें ऊपर उठी हुई, पैर चौड़े, चूत और गांड खुली हुई खड़ी थी। स्तन आगे की ओर तने हुए, निपल्स सख्त।
रशीद ने आगे बढ़कर उसके मुँह में अपना मोटा लंड ठूंस दिया। वैशाली की आँखें फटी की फटी रह गईं। लंड गले तक चला गया, साँस रुक गई। रशीद ने बाल पकड़कर सिर स्थिर किया और जोर-जोर से धक्के मारने लगा। गले में घरघराहट हो रही थी, आँसू बह रहे थे, पर रशीद नहीं रुका।
उधर कासिम ने पीछे से वैशाली की गांड पर थूका। फिर दो उंगलियाँ घुसाईं, फैलाया, और अपनी लंड एक झटके में अंदर धकेल दी। वैशाली की चीख रशीद के लंड में दब गई। कासिम ने कमर पकड़कर जोर से ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर वैशाली का शरीर आगे-पीछे हिलता, स्तन उछलते, और चूत से पहले का वीर्य टपकता।
ज़रीना ने चाबुक उठाया। पहली मार वैशाली की पीठ पर पड़ी—लाल धार बन गई। दूसरी जाँघों पर। तीसरी सीधे चूत के होंठों पर। वैशाली का शरीर झटका खा गया। ज़रीना हँसते हुए बार-बार मारती रही—स्तनों पर, निपल्स पर, पेट पर, कमर पर। हर मार के साथ वैशाली की चीखें गूँजतीं, पर रशीद और कासिम नहीं रुकते।
मेहेर ने वैशाली की चूत में तीन उंगलियाँ घुसा दीं और अंदर घुमाते हुए बोली, “देखो कैसे गीली हो रही है। शरीर तो धोखा दे रहा है, रानी जी।” फिर उसने झुककर वैशाली की चूत चाटी—जीभ से क्लिट को जोर से दबाया, चूसा, दाँतों से हल्का काटा। सबा ने स्तनों को मुँह में लिया, निपल्स को दाँतों से काटते हुए चूसा। नूरी ने वैशाली के मुँह से रशीद का लंड थोड़ी देर के लिए निकाला और खुद वैशाली के मुँह में थूक कर फिर लंड वापस ठूंस दिया।
रशीद ने आखिर में वैशाली के गले में ही झाड़ दिया। गाढ़ा वीर्य मुँह में भर गया, कुछ बाहर निकला, कुछ निगलने पर मजबूर किया गया। कासिम ने गांड में गहराई तक जाकर अंदर ही छोड़ दिया। जब दोनों निकले तो वैशाली की गांड और चूत दोनों से सफेद तरल बह रहा था।
पर खेल खत्म नहीं हुआ था। ज़रीना ने लोहे की रॉड ली। रॉड ठंडी और मोटी थी। उसने वैशाली की चूत में रॉड घुसा दी—धीरे-धीरे, फिर जोर से। वैशाली की आँखें फटी रह गईं। रॉड अंदर-बाहर होने लगी। फिर ज़रीना ने वही रॉड गांड में डाल दी। दोनों छेद एक-एक करके फैलाए जा रहे थे। बीच-बीच में चाबुक की मारें पड़ती रहीं।
तभी दरवाजा फिर खुला। सुल्तान अज़ीज़ खान खुद आ गया। उसके पीछे तीन और सिपाही। सुल्तान ने वैशाली को इस हाल में देखा—लटकी हुई, शरीर पर लाल धारियाँ, मुँह और चूत-गांड से वीर्य टपकता हुआ—तो मुस्कुराया।
“अच्छा काम किया,” उसने ज़रीना से कहा। फिर वैशाली के पास आकर उसके बाल पकड़े। “आज तुम्हें सिखाऊँगा कि असली गुलाम कैसे बनते हैं।”
सुल्तान ने अपनी पजामा उतारी। उसकी लंड पहले से सख्त थी—मोटी, लंबी, नसों वाली। उसने वैशाली की टाँगें और फैलाईं, और अपनी लंड उसकी चूत में एक ही झटके में पूरी घुसेड़ दी। वैशाली की चीख छत तक पहुँची। सुल्तान ने कमर पकड़कर बर्बरता से ठोकना शुरू किया। हर धक्के पर वैशाली का शरीर झूलता, जंजीरें खनकतीं। सुल्तान ने बीच में उसकी गांड भी ली—बिना किसी तेल के, सिर्फ पहले के वीर्य के सहारे। गांड फटने जैसी दर्द हो रही थी, पर सुल्तान नहीं रुका।
फिर उसने तीनों नए सिपाहियों को इशारा किया। एक ने वैशाली के मुँह में लंड डाली, दूसरे ने चूत में, तीसरे ने गांड में। तीनों एक साथ धक्के मार रहे थे। वैशाली का शरीर तीनों तरफ से भरा हुआ था। मुँह, चूत, गांड—सब भरे हुए। सिपाही बारी-बारी से झाड़ते गए—कभी मुँह में, कभी चेहरे पर, कभी स्तनों पर, कभी अंदर। सुल्तान खुद बार-बार अपनी लंड निकालकर वैशाली के चेहरे पर मारता, फिर वापस अंदर ठूंस देता।
ज़रीना ने चाबुक से वैशाली की पीठ और कूल्हों पर मारना जारी रखा। हर मार के साथ वैशाली का शरीर सिकुड़ता, पर सिपाही और जोर से ठोकते। मेहेर और सबा ने वैशाली के निपल्स को धातु के क्लैंप से दबा दिया—दर्द इतना कि आँखों के आगे अँधेरा छा गया। नूरी ने वैशाली की चूत के क्लिट पर छोटी सुई जैसी चीज़ से हल्का चुभाया, बस इतना कि दर्द और सुख दोनों मिल जाएँ।
घंटों यही चलता रहा। वैशाली कई बार बेहोश होने के करीब पहुँची, पर ठंडे पानी के छींटों से होश में लाया जाता। सुल्तान ने आखिर में उसे जंजीरों से उतारा। वैशाली गिर पड़ी। सुल्तान ने उसे पेट के बल बिस्तर पर घसीटा, कमर ऊपर उठाई, और फिर से गांड में घुस गया। इस बार उसने वैशाली के बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और कान में कहा, “कल से तुम्हें सिपाहियों की बैरक में भी भेजूँगा। पचास मर्द एक-एक करके तुम्हें लेंगे। फिर दरबार में कुत्तों के सामने। फिर जंगल में पेड़ से बाँधकर।”
वैशाली की आवाज़ अब सिर्फ घरघराहट बन चुकी थी। सुल्तान ने अंदर झाड़ दिया, फिर निकला। सिपाहियों ने बारी-बारी से उसके मुँह में, चूत में, गांड में और चेहरे पर वीर्य की बौछार कर दी। जब सब खत्म हुए तो वैशाली का चेहरा, बाल, स्तन, पेट, जाँघें—सब सफेद तरल से लथपथ थे। शरीर पर चाबुक के निशान, उंगलियों के निशान, दाँतों के निशान।
ज़रीना ने उसे फिर से बाँध दिया—इस बार बिस्तर के चारों कोनों से। हाथ-पैर फैले हुए, चूत और गांड खुली। सुल्तान ने जाते-जाते कहा, “सुबह तक ऐसे ही रहो। कोई साफ नहीं करेगा। तुम्हारा शरीर मेरा है—गंदा, इस्तेमाल किया हुआ, तोड़ा हुआ।”
कमरे में अँधेरा गहराता गया। वैशाली जंजीरों में जकड़ी पड़ी रही। शरीर जल रहा था, हर साँस में दर्द, हर हलचल में जलन। पर अंदर कहीं कोई अजीब गर्मी भी थी—वह क्रूर, जबरदस्ती का सुख जो बार-बार उसके शरीर को हिला रहा था। आँखों से आँसू बहते रहे, पर होंठ काँपते रहे।
बाहर सिपाहियों की पहरेदारी की आवाज़ें आ रही थीं। दूर कहीं सियारों की हुँकार। कालासिंह दुर्ग की दीवारें अब भी उतनी ही ऊँची थीं। और वैशाली अब पूरी तरह टूट चुकी थी—शरीर से, मन से, आत्मा से। कल फिर नई यातनाएँ होंगी। नई जंजीरें, नए चाबुक, नए मर्द। और वह सिर्फ सहेगी—क्योंकि अब उसके पास सहने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।
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