पति खोने के बाद अकेली पड़ी मामी को भतीजे ने अपने फ्लैट में बुलाया। रस्सियों से बांधकर, चेन कसकर और बेतहाशा धकेलकर उसने उसकी हर सांस पर कब्जा कर लिया। दर्द में भी वह और मांगती रही full mother sex stories ।
मेरा नाम मीरा है। उम्र 45 साल। पति राजेश का निधन हुए लगभग 18 महीने हो चुके थे। हम लोग मुंबई के अंधेरी वेस्ट में एक पुराने संयुक्त परिवार वाले फ्लैट में रहते थे। परिवार में मैं, मेरी शादीशुदा बेटी प्रिया, देवर सुरेश, देवरानी सुनीता और उनका बेटा रोहन। रोहन की उम्र 25 साल थी। वह पुणे में आईटी कंपनी में काम करता था और पिछले साल पिता की मृत्यु के समय ही घर आया था।
पति के जाने के बाद मेरे शरीर में एक अजीब सी प्यास जाग गई थी। राजेश के साथ मेरा शारीरिक रिश्ता हमेशा तीव्र और भूखा रहता था। रात भर चुदाई, कभी बेड पर, कभी दीवार से सटाकर, कभी बाथरूम में पानी की धार के नीचे। उनकी मोटी लंड मेरी चूत को चीरती थी, मेरी चूचियों को काटती थी, मेरे गले में घुसती थी। उनकी मौत के बाद वह भूख और भी विकराल हो गई। मैं रात को अकेली लेटी रहती और अपनी उंगलियों से अपनी गीली चूत को रगड़ती, लेकिन संतुष्टि नहीं मिलती थी।
रोहन हमेशा से तेज और महत्वाकांसी था। 22 साल की उम्र में ही अच्छी नौकरी लग गई थी। पिता की मृत्यु के बाद वह एक हफ्ते रुका, फिर वापस पुणे चला गया। लेकिन उस एक हफ्ते में कुछ ऐसा हुआ जो दोनों के जीवन को हमेशा के लिए बदलने वाला था।
एक रात, जब घर शांत था, रोहन मेरे कमरे में आया। मैं सिल्क की नाइटी में थी, दुपट्टा नहीं लगाया था। मेरी भरी हुई चूचियां कपड़े के नीचे साफ उभर रही थीं। उसने दरवाजे पर खड़े होकर मुझे देखा। उसकी निगाहें मेरी छाती पर ठहर गईं।
“मामी, कल जा रहा हूं। कुछ चाहिए तो बता दीजिए।”
मैंने दुपट्टा ओढ़ लिया, लेकिन देर हो चुकी थी। उसने पहले ही मेरी देह का नाप ले लिया था। प्रिया भी आई, थोड़ी बात की और चली गई। अब कमरे में सिर्फ हम दोनों थे।
रोहन मेरे पास आकर बैठ गया। उसकी सांसें भारी थीं। “मामी, आप अकेली कैसे रहेंगी? पापा नहीं रहे…”
मैंने उसकी ओर देखा। उसकी आंखों में सहानुभूति के साथ कुछ और भी था—भूख। मैंने धीरे से कहा, “तुम हो ना, सुरेश है। सब हो जाएगा।”
उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया और मेरे कंधे पर रखा। उसकी हथेली गर्म थी। मैं सिहर उठी। उसके स्पर्श में ताकत थी, युवा मर्द की ताकत। मैंने उसका हाथ नहीं हटाया। कुछ पल चुप रहे। फिर वह उठा और चला गया। लेकिन उसकी उंगलियों की गर्मी मेरे शरीर पर रह गई।
अगले दिन वह चला गया। लेकिन फोन आने लगे। रात के 11 बजे, 12 बजे। पहले सामान्य बातें, फिर धीरे-धीरे उसकी आवाज में तनाव। “मामी, आप क्या पहनकर सोती हैं?” मैं हंस देती, लेकिन अंदर से मेरी चूत गीली होने लगती। एक रात उसने व्हाट्सएप पर अपनी जिम वाली फोटो भेजी—पसीने से चमकता बदन, कसी हुई मांसपेशियां, पेट की रेखाएं साफ। मैंने देर तक देखा। मेरी उंगलियां अपनी जांघों के बीच चली गईं।
एक साल बाद प्रिया की शादी तय हुई। रोहन एक महीना पहले आ गया। जब वह आया तो उसका शरीर और भी कठोर हो चुका था। चौड़ी छाती, मजबूत बांहें, कसी हुई कमर। उसने मेरे पैर छुए। उसके हाथों का स्पर्श मेरे पैरों से लेकर कमर तक बिजली की तरह दौड़ा। रात को खाने के बाद वह मेरे कमरे में आया। प्रिया भी थी। बातें हुईं। प्रिया जल्दी सोने चली गई।
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रोहन ने धीरे से कहा, “मामी, मैंने पुणे में एक अलग फ्लैट ले लिया है। कंपनी वाला। नीचे मकान मालिक रहते हैं। एक बेडरूम, बड़ा बेड।”
मेरे मन में तुरंत तस्वीर उभरी—उस फ्लैट में, उस बेड पर, उसकी मजबूत देह मेरे ऊपर। मैंने मुंह से कुछ नहीं कहा, लेकिन मेरी चूचियां सख्त हो गईं। नाइटी के नीचे निप्पल्स उभर आए।
सुबह मैं ढीला सूट पहनकर उसके कमरे में गई। वह बेड पर लेटा था, सिर्फ लोअर पहने। उसकी छाती नंगी थी। मैंने उसके पास जाकर कहा, “चलो, शादी के कार्ड छपवाने हैं।”
गाड़ी में बैठते ही मैंने अपनी जांघ उसकी जांघ से सटा दी। रास्ते में मैं और करीब सरक गई। मेरी चूची उसकी बांह से टकराई। दो साल बाद किसी मर्द की देह से मेरा स्पर्श। मैंने सांस रोक ली। फिर जानबूझकर और दबाव दिया। उसकी बांह सख्त थी।
मैंने कमर में हाथ डालकर अपनी दोनों चूचियां उसकी पीठ से सटा दीं। वह थोड़ा अकड़ गया, फिर ढीला पड़ गया। मैंने रगड़ा। धीरे-धीरे, लगातार। उसकी सांसें तेज हो गईं।
शॉपिंग के दौरान मैंने अपने लिए बहुत छोटे साइज की ब्रा और पैंटी लीं। जानबूझकर। बाद में काम आएंगी।
शादी से दो दिन पहले मैंने उसे अकेले बुलाया। “रोहन, मेरी इनर वियर का साइज गलत आ गया है। तुम जाकर बदलवा लाओ।”
वह शरमाया। “मामी… मैं… वहां क्या बोलूंगा?”
“बोल देना एक नंबर बड़ा चाहिए। या फोन पर मुझसे बात करा देना।”
उसकी जींस में उभार साफ दिख रहा था। मैंने मुस्कुराकर देखा। उसने निगाहें झुका लीं।
शादी के दिन वह बहुत आकर्षक लग रहा था। काला शेरवानी, कसी हुई देह। मैं चाहती थी कि सबके सामने उसकी छाती से अपनी चूचियां सटा लूं, लेकिन मेहमानों की भीड़ थी। बेटी की विदाई हुई। चार दिन बाद रोहन जाने वाला था।
डिनर पर मैंने सुरेश और सुनीता से कहा, “मैं रोहन के साथ पुणे चली जाती हूं। एक महीना। घूम आऊंगी। बिटिया की विदाई भी साथ में हो जाएगी। रोहन का खाना-पीना भी सही रहेगा।”
सुरेश मुस्कुराए, “बहुत अच्छा भाभी। रोहन, अपनी मामी को ले जा।”
रोहन की आंखों में चमक थी। उसने तुरंत कहा, “हां पापा।”
शाम को वोल्वो बस में सवार हुए। दो सीटर। मैं खिड़की की तरफ। रात गहराने लगी। बस की लाइटें बुझ गईं। लोग सोने लगे।
मैंने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया। फिर धीरे से अपनी एक चूची उसकी कोहनी से सटा दी। दबाव दिया। दूध दबने का मजा आने लगा। उसने कोहनी नहीं हटाई। मैंने और जोर से दबाया। मेरी चूत गीली हो रही थी।
“पानी की बोतल उतार दो ऊपर से,” मैंने कहा।
वह खड़ा हुआ। बस झटका लगी। वह संभलने के लिए ऊपर का रॉड पकड़ने लगा। मैं जानबूझकर उसकी तरफ गिर गई। एक हाथ उसकी जांघ पर, दूसरा जानबूझकर उसके लंड पर। जींस के अंदर उसका लंड पूरी तरह खड़ा था—मोटा, लंबा, गर्म। मैंने हथेली मुट्ठी में बदल ली। साढ़े आठ इंच का अजगर। मोटाई ऐसी कि मुट्ठी पूरी नहीं बंद हो पा रही थी। मैंने हल्का निचोड़ा। वह सिसक उठा।
रात भर मैं उसकी गोद में सरककर लेटी रही। चूचियां उसकी छाती से रगड़ती रहीं। मेरा हाथ बार-बार उसके लंड पर जाता, आकार लेता, निचोड़ता। वह सोने का नाटक करता रहा, लेकिन उसका लंड हर बार और सख्त होता गया।
सुबह पुणे पहुंचे। उसके नए फ्लैट में। छोटा लेकिन साफ। बड़ा बेड, दो कुर्सियां, एक टेबल। नीचे मकान मालिक। हमने नाश्ता किया। फिर मैंने बाथरूम में जाकर नहाया। बाहर निकलते समय सिर्फ तौलिया लपेटा।
रोहन बैठक में बैठा था। मैं उसके सामने खड़ी हो गई। तौलिया खोल दिया।
मेरा नंगा शरीर उसके सामने था। भरी हुई चूचियां, काले बड़े निप्पल्स, चिकनी चूत, मोटी जांघें। उसने सांस रोक ली।
“मामी…” उसकी आवाज फटी।
मैंने पास जाकर उसके बाल पकड़े और अपने निप्पल उसके मुंह में ठूंस दिया। “चूस। जोर से चूस। काट। जितना दर्द हो उतना।”
उसने पहले धीरे चूसा। फिर मैंने उसके बाल और जोर से खींचे। “जोर से। काट मेरे दूध को।”
उसने दांत गड़ा दिए। दर्द की लहर दौड़ी। मैं कराह उठी। “हां… ऐसे ही… और जोर से।”
मैंने उसका लोअर नीचे खींचा। उसका लंड बाहर निकला—साढ़े आठ इंच, मोटा, नसें फूली हुई, सिर चमकता हुआ। मैंने घुटनों के बल बैठकर उसे मुंह में ले लिया। गले तक। वह सिसक उठा। मैंने अपने बाल उसके हाथ में रख दिए। “धकेल। जोर से। मेरा गला फाड़ दे।”
उसने मेरे बाल पकड़े और धकेलना शुरू किया। लंड मेरे गले में धंसता गया। आंसू निकल आए। मैंने गला और खोला। वह और गहराई तक गया। मैंने उसके अंडकोष दबाए। वह और बेकाबू हो गया। थूक मेरी ठुड्डी पर टपक रहा था। मैंने उसे बाहर निकाला और कहा, “अब बेड पर।”
बेड पर मैं चारों हाथ-पैर फैलाकर लेट गई। उसने मेरे हाथ बिस्तर के हेडबोर्ड से बेल्ट से बांध दिए। फिर पैर भी। मैं पूरी तरह बेबस। उसने मेरी चूत को देखा—गीली, खुली, चमकती। दो उंगलियां अंदर घुसा दीं। जोर से। मैं चीख पड़ी। “और… और उंगलियां… फाड़ दे।”
तीन उंगलियां। फिर चार। दर्द और मजे का मिश्रण। फिर उसने अपना लंड मेरे मुंह पर रगड़ा। “चूस फिर से।” मैंने चूसा। फिर उसने अचानक मेरी चूत में धंसा दिया। एक झटके में पूरा।
मैं चीखी। मेरी चूत फटने जैसी लगी। उसने रुका नहीं। जोर-जोर से धकेलने लगा। हर धक्के पर मेरी चूचियां उछल रही थीं। उसने एक चूची मुंह में ले ली और काटने लगा। दांत गड़ाए। मैं दर्द से कराह रही थी, लेकिन चूत और भी भीग रही थी।
“और जोर से… मार… मार मेरी चूत को,” मैं चिल्ला रही थी।
उसने मेरी गर्दन दबाई। सांस रुकने लगी। फिर छोड़ा। फिर दबाया। उसी लय में चुदाई चल रही थी। मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा रहा था, लेकिन ऑर्गाज्म करीब था। उसने अचानक लंड बाहर निकाला और मेरे मुंह में ठूंस दिया। मैंने गला खोला। वह मेरे गले में झड़ गया। गर्म वीर्य मेरे पेट में उतरता गया। मैंने सब निगल लिया।
लेकिन वह रुका नहीं। कुछ ही देर में उसका लंड फिर खड़ा हो गया। उसने मुझे पलटा। घुटनों के बल। हाथ बंधे। उसने मेरी गांड पर थप्पड़ मारा। जोर का। लाल हो गई। फिर और। मैं कराह रही थी। फिर उसने अपनी उंगली मेरी गांड में घुसाई। सूखी। दर्द। मैं चिल्लाई। उसने थूक लगाया और दो उंगलियां अंदर कर दीं। फिर अपना लंड।
गांड की चुदाई शुरू हुई। धीरे-धीरे नहीं—जोर से। हर धक्के पर मेरी चूचियां बिस्तर से रगड़ खा रही थीं। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। “मामी की गांड कितनी टाइट है… फट जाएगी आज।”
मैं रो रही थी, लेकिन मजा आ रहा था। दर्द में भी। उसने एक हाथ आगे बढ़ाकर मेरी चूत रगड़ी। क्लिट पर जोर से। मैं कांप उठी। ऑर्गाज्म आया—तेज, लंबा, शरीर हिलता रहा। उसने मेरी गांड में ही झड़ दिया। गर्म वीर्य अंदर भर गया।
रात भर यही चलता रहा। कभी वह मुझे दीवार से सटाकर उठाकर चुदाता, कभी फर्श पर घुटनों के बल, कभी कुर्सी पर बिठाकर। उसने रसोई से बर्फ निकाली और मेरे निप्पल्स पर लगाई। फिर गर्म चाय के प्याले की धार। दर्द और ठंडक का खेल। उसने अपनी बेल्ट से मेरी जांघों पर निशान बनाए। लाल रेखाएं। मैं रोती, कराहती, भीख मांगती—और फिर और मांगती।
सुबह जब सूरज निकला, मैं उसके सीने पर लेटी थी। शरीर पर नीले-लाल निशान। चूत और गांड दोनों सूजी हुई, वीर्य से भरी। उसने मेरे बाल सहलाए। “मामी, अब हर महीने आना। या मैं आ जाऊंगा।”
मैंने उसकी लंड को फिर से छुआ। वह फिर से सख्त हो रही थी। “जब तक तू चाहे। मेरी चूत, मेरी गांड, मेरा गला—सब तेरा। जितना मारना हो मार। जितना काटना हो काट। मैं तेरी रखैल हूं।”
उसने मुस्कुराकर मुझे फिर से पलटा। हाथ फिर बांधे। लंड फिर से मेरी चूत के मुहाने पर। “आज पूरा दिन। कोई छुट्टी नहीं।”
और धक्का लगा। मैं चीखी। कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। वह महीना हमने उसी फ्लैट में बिताया। हर रात नई यातना, नया मजा। कभी उसने मुझे रस्सी से बांधकर घंटों छोड़ दिया, सिर्फ मुंह में कपड़ा ठूंसकर। कभी आईने के सामने खड़ा करके खुद को चुदते हुए देखने पर मजबूर किया।
कभी उसके दोस्त के आने की धमकी दी—हालांकि कभी बुलाया नहीं—सिर्फ डराने के लिए। मेरी चूत हमेशा खुली, गीली, तैयार रहती।
जब मैं मुंबई लौटी तो शरीर पर उसके छोड़े हुए निशान अभी भी जल रहे थे। जांघों पर बेल्ट की लाल धारियां, निप्पल्स पर दांतों के गड्ढे, गांड में अभी भी उसके वीर्य की गंध। रात भर मैं बेचैन रही। सुबह फोन बजा। रोहन की आवाज ठंडी और हुक्म वाली थी।
“मामी, इस हफ्ते आ जाओ। छुट्टी ले लो। फ्लैट तैयार है। और इस बार कुछ नया सामान लाया हूं।”
मैंने बिना देर किए हां कह दी। तीन दिन बाद फिर उसी पुणे वाले फ्लैट में खड़ी थी। दरवाजा खोला तो रोहन नंगा खड़ा था। हाथ में काले चमड़े की पट्टियां, एक मोटी रस्सी, और एक छोटी सी लोहे की चेन। उसकी लंड पहले से ही सख्त और नसों से फूली हुई थी।
“कपड़े उतारो। सब।”
मैंने उतार दिए। वह पास आया और मेरे बालों को मुट्ठी में जकड़कर घुटनों पर गिरा दिया। “मुंह खोल।” लंड मेरे गले में इतनी जोर से धंसा कि आंसू बह निकले। उसने दोनों हाथ मेरे सिर पर रख दिए और धक्के लगाने लगा—तेज, गहरा, बिना रुके। मेरी नाक में सांस नहीं आ रही थी। गला फटने जैसा दर्द। थूक और लार मेरे सीने पर बह रही थी। जब वह बाहर निकाला तो मैं खांस रही थी, लेकिन उसने तुरंत रस्सी से मेरे हाथ पीठ के पीछे बांध दिए। इतने कसकर कि कलाईयां सूजने लगीं।
फिर उसने मुझे बेड पर घुटनों के बल बैठाया। चेन से मेरे गले का कॉलर बांधा और दूसरे सिरे को हेडबोर्ड से लगा दिया। अब मैं न तो पीछे हट सकती थी न सीधी हो सकती थी। उसने मेरी गांड पर जोर का थप्पड़ मारा। फिर एक और। त्वचा जल उठी। तीसरे थप्पड़ के साथ उसने अपनी दो उंगलियां सूखी गांड में धंसा दीं। मैं चीखी। उसने और अंदर दबाया, मोड़ा, फैलाया।
“मामी की गांड अभी भी टाइट है। आज इसे फाड़कर रख दूंगा।”
उसने थूक लगाया और अपना पूरा लंड एक झटके में गांड में घुसा दिया। दर्द इतना तेज था कि मेरी आंखें काली पड़ गईं। वह रुका नहीं। जोर-जोर से धकेलने लगा। हर धक्के पर चेन मेरे गले को कसती। सांस रुकने लगती तो वह और तेज मारता। एक हाथ से मेरी चूत में तीन उंगलियां घुसा दीं और क्लिट को बेरहमी से मसलने लगा। दर्द और मजे का मिश्रण इतना तीव्र था कि मैं कांपने लगी। ऑर्गाज्म आया तो शरीर हिचकियां लेने लगा, लेकिन उसने चुदाई नहीं रोकी। गांड में ही झड़ गया। गर्म वीर्य अंदर भरता गया।
वह बाहर निकाला तो मैं ढेर हो गई। लेकिन उसने मुझे उठाया और आईने के सामने खड़ा कर दिया। हाथ अभी भी बंधे। उसने मेरे बाल पकड़कर सिर ऊपर उठाया। “देख, कितनी गंदी लग रही है तू। वीर्य गांड से निकल रहा है, चूत पानी टपका रही है।” फिर उसने चाबुक निकाला—पतला, चमड़े का। जांघों पर, चूचियों पर, पेट पर। हर वार के साथ मैं कराहती। निप्पल्स पर जब चाबुक लगा तो दर्द की बिजली दौड़ गई। उसने एक निप्पल को चिमटे से दबाया। इतना जोर कि आंसू बह निकले।
रात भर यही सिलसिला चला। कभी वह मुझे फर्श पर घसीटकर बाथरूम ले गया, ठंडे पानी की धार के नीचे खड़ा करके फिर से चुदाया। कभी रस्सी से लटकाया—पैर जमीन से कुछ ऊपर, चूत खुली। उसने मोमबत्ती जलाई और पिघला मोम मेरी छाती पर टपकाया। जलन इतनी तेज कि मैं चीख पड़ी। फिर उसी जलती त्वचा पर अपना लंड रगड़ा और मेरे मुंह में ठूंस दिया।
सुबह जब रस्सी खोली तो मेरे हाथ-पैर सुन्न थे। शरीर पर नीले-लाल निशान, जलन, सूजन। रोहन ने मेरे बाल सहलाते हुए कहा, “अगली बार और सामान लाऊंगा। लोहे के हत्थे, मुंह बंद करने वाला गैग, और एक बड़ा सा प्लग। मामी की हर छेद को भरकर रखूंगा।”
मैंने उसके लंड को फिर से छुआ। वह फिर खड़ा हो रहा था। मेरी आवाज फटी हुई थी, “जितना मारना हो मार… मैं तेरी कुतिया हूं। छोड़ना मत।”
उसने मुस्कुराया और मुझे फिर से बेड पर धकेल दिया। हाथ फिर बांधे। लंड फिर से मेरी सूजी चूत के मुहाने पर। “आज पूरा दिन। कोई दया नहीं।”
और धक्का लगा। मैं चीखी। कहानी यहीं नहीं रुकी। वह हफ्ता हमने उसी अंधेरे कमरे में बिताया। हर घंटे नई यातना, नया अपमान, नई चुदाई। मेरी चूत, गांड और गला—तीनों हमेशा उसके लंड या उंगलियों या चाबुक के लिए खुले रहते। और मैं हर बार और गहराई तक उसकी गुलाम बनती जा रही थी।