माँ ने बेटे को नींद की गोली दी

माँ ने बेटे को नींद की गोली दी और प्रेमी का इंतजार किया। बेटा जागता रहा। उसने माँ को रस्सियों से बाँधा, गांड फाड़ी, मुट्ठी घुसाई और पूरी रात अपनी मर्जी से इस्तेमाल किया। अब वापसी का रास्ता नहीं।

नमस्कार दोस्तो!
उत्तर प्रदेश के एक सुनसान कस्बे में, जहाँ गलियाँ कच्ची थीं और रात के अंधेरे में सन्नाटा छा जाता था, एक पुराना मकान खड़ा था। दीवारें फटी हुईं, खिड़कियाँ टूटी हुईं। उस मकान में माँ-बेटा अकेले रहते थे। विक्रम 24 साल का था—लंबा, मजबूत कंधों वाला, कसा हुआ शरीर। उसकी माँ कविता 48 साल की थी। शरीर भारी-भरकम, लटकती हुई मोटी छातियाँ, चौड़ी कमर, गोल और मोटी गांड, और गहरी-चौड़ी चुत। पति सालों पहले मर चुका था। कविता अब अकेली थी और उसकी भूख दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी।

उस रात खाना खाने के बाद दोनों अपने-अपने चारपाई पर लेट गए। कविता ने विक्रम के लिए दूध का गिलास रखा था जिसमें उसने नींद की गोली मिला दी थी। वह सोच रही थी कि बेटा सो जाएगा तो उसका प्रेमी सुरेश आ जाएगा और पूरी रात उसकी चुत और गांड को चीर डालेगा। सुरेश 40 साल का मोटा-ताजा आदमी था, जिसका लंड 8 इंच का मोटा और नसों वाला था। कविता पिछले कई महीनों से उससे चुदवा रही थी।

लेकिन विक्रम उससे भी बड़ा खिलाड़ी निकला। पिछले तीन दिनों से उसने अपनी माँ को सुरेश के साथ चुदते देखा था। एक रात तो माँ की गांड में सुरेश ने इतनी जोर से घुसेड़ा था कि कविता की चीखें घर के बाहर तक गूंज गई थीं। विक्रम ने दूध का गिलास उठाया, बाहर टहलने का बहाना किया और सारा दूध झाड़ियों में फेंक दिया। वापस आकर वह सोने का नाटक करने लगा।
कविता ने आवाज दी—“विक्रम… बेटा?”

कोई जवाब नहीं मिला। वह समझ गई कि गोली का असर हो गया है। तुरंत उसने सुरेश को फोन लगाया।
“सुरेश… कब तक आ रहे हो? मेरी चुत और गांड दोनों मचल रही हैं तुम्हारे मोटे लंड पर। आज पूरी रात चोदना… गांड भी फाड़ना है।”
सुरेश ने जवाब दिया—“कविता, आज नहीं आ पाऊँगा। बाहर फँसा हूँ। सॉरी।”
कविता का गुस्सा फूट पड़ा—“पहले बता देता! मैंने बेटे को नींद की गोली दे दी है। मेरी चुत खुजली मार रही है। अब क्या करूँ?”

सुरेश हँसा—“तो नंगी हो जा। फोन पर ही चुदवा ले। उँगली कर, चुत मसल… सोच कि मेरा लंड है।”
कविता ने फोन स्पीकर पर रखा और एक-एक करके कपड़े उतारने लगी। साड़ी, ब्लाउज, पेटीकोट, ब्रा, पैंटी—सब चारपाई के पास फेंक दिए। चाँदनी रात में उसका नंगा शरीर चमक रहा था। भारी छातियाँ लटक रही थीं, निप्पल काले और मोटे। गांड गोल और मोटी, चुत के बाल घने और गीले।

वह विक्रम की चारपाई के पास बैठ गई, दोनों पैर फैलाए और अपनी चुत खोल दी। विक्रम की आँखें बंद थीं लेकिन वह सब देख रहा था। माँ की चुत का छेद साफ दिख रहा था—गुलाबी, गीला, थोड़ा खुला हुआ।
“अब उँगली डाल…” सुरेश ने आदेश दिया।
कविता ने एक उँगली अंदर घुसाई, फिर दो, फिर तीन। जोर-जोर से अंदर-बाहर करने लगी। सिसकियाँ निकल रही थीं—“आह… आह… सुरेश… और अंदर… फाड़ दे…”

विक्रम चुपचाप लेटा रहा। उसका लंड कच्छे में कड़क हो चुका था—10 इंच लंबा, मोटा, नसों से भरा। उसने धीरे से माँ की पैंटी उठाई और सूँघने लगा। चुत की गंध से उसका दिमाग घूम गया। लंड को बाहर निकालकर वह धीरे-धीरे हिलाने लगा।
सुरेश ने कहा—“अब सोच कि मेरा लंड तेरी चुत में है। जोर से चोद खुद को।”

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कविता चार उँगलियाँ एक साथ डालकर अपनी भोसड़ी को फाड़ रही थी। पानी निकल रहा था, चारपाई गीली हो रही थी। तभी सुरेश ने मजाक में कहा—“अगर लंड चूसना है तो अपने बेटे का चूस ले। वह तो सोया पड़ा है। पता भी नहीं चलेगा।”
कविता का गुस्सा फूट पड़ा। उसने फोन काट दिया। सुरेश दोबारा कॉल करने लगा लेकिन उसने फोन बंद कर दिया। नंगी ही बिस्तर पर लेट गई। छातियाँ ऊपर-नीचे हो रही थीं।

पाँच मिनट बाद वह उठी और विक्रम की चारपाई पर आ बैठी। उसके हाथ चादर के अंदर घुस गए। जाँघों को सहलाने लगी। विक्रम का लंड डर से थोड़ा सिकुड़ गया था लेकिन माँ के हाथ लगते ही फिर से फौल गया।
कविता बुदबुदाई—“सुरेश ने सही कहा… बेटे को पता नहीं चलेगा… मेरा काम हो जाएगा…”

उसने चादर हटाई। विक्रम सिर्फ कच्छे में था। कविता कच्छे के ऊपर से लंड दबाने लगी। फिर कच्छा नीचे खींच दिया। 10 इंच का मोटा काला लंड बाहर निकल आया।
“बाप रे… कितना मोटा है… सुरेश से भी ज्यादा मोटा… पापा से भी…”

वह झुकी और लंड को मुँह में ले लिया। जीभ से लपेटकर चूसने लगी। गहरी, पेशेवर तरीके से। लंड गले तक पहुँच रहा था। वह गट-गट आवाजें निकाल रही थी। फिर टट्टे चाटने लगी, गांड के छेद के आसपास जीभ घुमाने लगी। विक्रम का शरीर काँप रहा था लेकिन वह सोने का नाटक जारी रखे हुए था।

कविता ऊपर आई। अपनी गीली चुत को लंड के सिरे पर सेट किया। एक झटके में पूरा लंड अंदर घुस गया।
“आह्ह्ह्ह… फट गई…!”
वह उछल-उछलकर चुदने लगी। चुत चीख रही थी। पानी छलक रहा था। आठ-दस मिनट बाद वह झड़ गई। शरीर ढीला पड़ गया। लेकिन विक्रम का लंड अभी भी पत्थर की तरह अंदर था।

तभी विक्रम ने आँखें खोलीं। दोनों हाथ माँ की भारी छातियों पर रख दिए और जोर से मसलने लगा। निप्पल को नोचने लगा।
कविता चौंक गई—“विक्रम… तू… तू जाग रहा है?!”
विक्रम ने उसकी गर्दन पकड़कर खींचा और होंठों पर अपने होंठ रख दिए। जबरदस्ती जीभ घुसा दी। माँ विरोध कर रही थी लेकिन विक्रम ने और जोर से चूसा।
“तू कब से जग रहा है?” कविता रोने लगी।
“तीन रातों से सब देख रहा हूँ। तुझे सुरेश कैसे चोदता है, कैसे तेरी गांड फाड़ता है… सब।”

कविता का चेहरा सफेद पड़ गया। वह रोने लगी—“प्लीज बेटा… किसी को मत बताना… मैं मर जाऊँगी शर्म से…”
विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा—“नहीं बताऊँगा। लेकिन अब से तू सिर्फ मेरी रांड है। रोज चुदेगी। दिन में पाँच बार। चुत, मुँह, गांड—सब।”
कविता डर गई लेकिन उसकी चुत अभी भी लंड को कसकर पकड़े हुए थी। विक्रम ने उसे सीधा लिटा दिया। दोनों पैर उसके कंधों पर रख दिए और पूरा लंड एक झटके में अंदर पेल दिया।
“आह्ह्ह्ह… धीरे… फट जाएगी…!”
“फाड़ने के लिए ही तो चोद रहा हूँ।”

विक्रम ने तेज झटके शुरू कर दिए। चुत की दीवारें चीख रही थीं। हर झटके पर कविता की छातियाँ उछल रही थीं। विक्रम ने दोनों निप्पल नोच लिए।
“कितने लंड ले चुकी है तू अब तक?”
कविता रोते हुए बोली—“तेरा छठा… पापा, सुरेश, एक मजदूर, एक ड्राइवर, एक चौकीदार…”
“और गांड?”
“गांड किसी को नहीं दी…”
विक्रम हँसा—“आज से मेरी है। पूरी।”

उसने लंड निकाला और कविता को उलटा कर दिया। घुटनों के बल बैठाया। गांड ऊपर। दोनों हाथों से गांड के गोल मांस को फैलाया। छेद साफ दिख रहा था—छोटा, गुलाबी, कभी न खोला हुआ।
“देख… कितनी सील बंदी है तेरी गांड।”
उसने थूक लगाया और लंड का सिरा छेद पर रखा। एक जोरदार धक्का।
कविता चीखी—“नहीं… बेटा… मत कर… फट जाएगी… दर्द…!”

विक्रम ने दोनों कूल्हे पकड़कर और जोर से धक्का मारा। आधा लंड अंदर घुस गया। कविता की आँखों से आँसू बहने लगे। वह चीख रही थी लेकिन विक्रम रुकने वाला नहीं था।
“साली रांड… इतने लंड चुत में लिए और गांड बचाकर रखी थी? अब ले… पूरा ले…”
दूसरा धक्का। पूरा 10 इंच अंदर समा गया। कविता का शरीर काँप रहा था। दर्द से वह पागल हो रही थी। विक्रम ने धीरे-धीरे झटके शुरू किए। गांड का छेद खून से गीला हो रहा था लेकिन वह नहीं रुका।

“अब से रोज गांड भी चुदेगी। समझी?”
कविता सिर हिलाती रही। दर्द और मजे का मिश्रण उसे पागल बना रहा था। विक्रम ने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसकी चुत में चार उँगली घुसा दी। अब वह दोनों छेद एक साथ चोद रहा था—लंड गांड में, उँगलियाँ चुत में।
“देख… कैसे फैल रही है तेरी गांड। अब दो लंड एक साथ भी ले लेगी।”
कविता बड़बड़ा रही थी—“बेटा… और जोर से… फाड़ दे… मैं तेरी रांड हूँ…”

विक्रम ने स्पीड बढ़ा दी। गांड की दीवारें फट रही थीं। हर झटके पर कविता की चीखें निकल रही थीं। अचानक विक्रम ने लंड निकाल लिया और चुत में घुसा दिया। फिर वापस गांड में। बारी-बारी से दोनों छेद चोदने लगा।
“आज रात दोनों में माल भरूँगा।”

वह फिर गांड में घुसा और जोर-जोर से पेलने लगा। कविता का शरीर थरथरा रहा था। वह झड़ गई—चुत से पानी की धार निकल रही थी। लेकिन विक्रम नहीं रुका। पंद्रह मिनट और चोदने के बाद उसने सारा गर्म माल माँ की गांड के अंदर उंडेल दिया।
“ले… पूरी गांड भर दी।”

लंड निकालते ही सफेद गाढ़ा वीर्य गांड के छेद से बाहर निकलने लगा। कविता थककर गिर पड़ी। विक्रम उसके ऊपर लेट गया। छातियाँ मसलते हुए बोला—“अब से तू दिन में माँ है, रात में मेरी रखैल। रोज पाँच बार चुदेगी। चुत, गांड, मुँह—सब। और अगर किसी और से चुदवाई तो दोनों टाँगें तोड़ दूँगा।”
कविता ने आँखें बंद करके कहा—“जैसा तू कहे बेटा… अब सिर्फ तेरी हूँ…”

विक्रम मुस्कुराया। उसने फिर से लंड खड़ा किया और माँ की खुली हुई गांड में दोबारा घुसा दिया।
“अभी तो रात बाकी है। दूसरी राउंड शुरू।”
और पूरी रात उसने अपनी माँ की चुत और गांड को बारी-बारी से फाड़ा। कभी मुँह में ठूसा, कभी छातियों के बीच, कभी दोनों छेद एक साथ उँगलियों और लंड से। कविता की चीखें, सिसकियाँ और गिड़गिड़ाहटें रात भर गूंजती रहीं।

सुबह होने तक कविता की चुत और गांड दोनों सूज चुकी थीं, खून और वीर्य से सनी हुईं। विक्रम ने उसे चूमते हुए कहा—“अगली बार और ज्यादा दर्द दूँगा। रस्सियों से बाँधूँगा। चाबुक से पीटूँगा। तेरी गांड को इतना चौड़ा कर दूँगा कि मुट्ठी अंदर चली जाए।”
कविता ने सिर्फ सिर हिलाया। उसकी आँखों में डर था, लेकिन चुत में गर्मी भी।

सुबह की पहली किरणें खिड़की से अंदर घुस रही थीं लेकिन कमरे में अभी भी अंधेरा और गंदगी का माहौल था। कविता चारपाई पर नंगी पड़ी थी। उसकी चुत और गांड दोनों सूजी हुई, लाल, खून और वीर्य से सनी। विक्रम उसके बगल में लेटा था, उसका 10 इंच का मोटा लंड अभी भी आधा खड़ा था। उसने माँ की गांड के छेद को उँगली से छुआ—अंदर अभी भी उसका गर्म माल भरा हुआ था जो धीरे-धीरे बाहर रिस रहा था।
विक्रम उठ बैठा। उसने कविता के बाल पकड़कर सिर उठाया।

“उठ रांड। अभी तो सिर्फ शुरुआत हुई है।”
कविता की आँखें सूजी हुई थीं। वह धीरे से बोली—“बेटा… दर्द हो रहा है… गांड फटी हुई है…”
विक्रम हँसा। उसने थप्पड़ जड़ दिया उसके गाल पर। जोर का।
“दर्द सहना सीख। आज से तू मेरी गुलाम है। बोल—‘मैं विक्रम की रांड हूँ’।”

कविता ने आँसू पोंछते हुए कहा—“मैं… मैं विक्रम की रांड हूँ…”
“जोर से!”
“मैं विक्रम की रांड हूँ! मेरी चुत और गांड सिर्फ तेरी हैं!”
विक्रम ने उसे चारपाई से खींचकर फर्श पर गिरा दिया। कमरे के कोने में रस्सी पड़ी थी जो कभी कपड़े सुखाने के काम आती थी। उसने कविता के दोनों हाथ पीछे बांध दिए। फिर दोनों टाँगें फैलाकर उसके घुटनों को भी रस्सी से कस दिया। अब वह नंगी, बेबस, फर्श पर घुटनों के बल बैठी थी। गांड ऊपर उठी हुई, चुत पूरी तरह खुली।

विक्रम ने अपना लंड उसके मुँह के सामने लाया।
“चूस। और गहरे। गले तक।”
कविता ने मुँह खोला। विक्रम ने बाल पकड़कर पूरा लंड एक झटके में गले में ठूस दिया। कविता की आँखों से आँसू निकलने लगे। वह घुट रही थी लेकिन विक्रम नहीं रुका। वह उसके सिर को आगे-पीछे करने लगा जैसे कोई मशीन हो।
“साली रांड… कल रात गांड फाड़ी, आज मुँह फाड़ूँगा।”

पंद्रह मिनट तक उसने माँ के गले में लंड ठूँसा। लार मुँह से निकलकर छाती पर बह रही थी। फिर उसने लंड निकाला और कविता के चेहरे पर थप्पड़ मारे—एक, दो, तीन, चार। गाल लाल हो गए।
“अब गांड। आज और गहरा।”
उसने कविता को और आगे झुकाया। गांड का छेद अभी भी सूजा हुआ और खून से भरा था। विक्रम ने थूक लगाया और बिना किसी तैयारी के पूरा लंड एक ही धक्के में अंदर घुसा दिया।

कविता चीखी—“आह्ह्ह्ह… बेटा… फट गई… दर्द…!”
विक्रम ने दोनों कूल्हे पकड़ लिए और पागलों की तरह पेलने लगा। हर झटका इतना जोरदार था कि कविता का शरीर आगे सरक रहा था। रस्सियाँ उसके हाथों और घुटनों में धंस रही थीं।

“चिल्ला… और चिल्ला… किसी को सुनाई नहीं देगा। यह कस्बा सुनसान है।”
वह बीस मिनट तक लगातार गांड चोदता रहा। बीच-बीच में लंड निकालकर चुत में घुसा देता, फिर वापस गांड में। कभी दोनों उँगलियाँ चुत में डालकर एक साथ दोनों छेद फाड़ता। कविता की चीखें अब सिसकियों में बदल चुकी थीं। उसका शरीर पसीने से तर था।

अचानक विक्रम रुका। उसने रस्सियाँ खोलीं लेकिन सिर्फ इसलिए कि वह माँ को खड़ा कर सके। उसने कविता को दीवार के सामने खड़ा किया। दोनों हाथ ऊपर उठाकर दीवार पर टिका दिए। फिर पीछे से आकर गांड में दोबारा घुस गया। एक हाथ से उसकी गर्दन दबाई, दूसरे हाथ से छातियाँ नोचने लगा।
“अब बता… कितने लंड और लिए थे तूने? सच बता नहीं तो और जोर से चोदूँगा।”

कविता रोते हुए बोली—“पापा… सुरेश… मजदूर… ड्राइवर… चौकीदार… और एक बार गाँव के पंडित ने भी…”
विक्रम का गुस्सा फूट पड़ा। उसने गर्दन और जोर से दबाई।
“साली रांड! छह नहीं, सात? आज मैं तेरी गिनती पूरी करूँगा।”

उसने लंड निकाला। कमरे में पड़ी पुरानी बेल्ट उठाई।
“अब पीटूँगा। गिनती में।”
पहला चाबुक गांड पर पड़ा। कविता चीखी। दूसरा, तीसरा… पंद्रह तक। गांड पर लाल निशान उभर आए। फिर उसने बेल्ट चुत पर मारी। कविता के पैर काँपने लगे।
“अब ले… दोनों छेद एक साथ।”

विक्रम ने अपनी चार उँगलियाँ गांड में घुसाईं और लंड चुत में। फिर उँगलियाँ निकालकर लंड गांड में और पाँच उँगलियाँ चुत में। वह दोनों छेद को एक साथ फाड़ रहा था। कविता का शरीर थरथरा रहा था। वह झड़ गई—पानी की धार फर्श पर गिरने लगी। लेकिन विक्रम नहीं रुका।
“झड़… और झड़… मैं नहीं रुकने वाला।”

वह उसे फर्श पर लिटा दिया। दोनों टाँगें उसके कंधों पर रखीं और पूरा शरीर उसके ऊपर डाल दिया। लंड गांड में अंदर तक। वह कुत्ते की तरह पेलने लगा। हर झटके पर कविता की छातियाँ उसके चेहरे पर बार-बार लग रही थीं। विक्रम ने एक निप्पल मुँह में ले लिया और जोर से काट लिया। खून निकला। कविता चीखी लेकिन विक्रम ने और जोर से काटा।
“आज से तेरे निप्पल भी मेरे हैं। काटूँगा, नोचूँगा, जैसे चाहूँ।”

पैंतालीस मिनट तक वह लगातार चोदता रहा। बीच में लंड निकालकर कविता के मुँह में ठूस देता ताकि वह अपनी ही चुत और गांड का स्वाद चखे। फिर वापस गांड में।
अंत में विक्रम ने दोनों छेद में बारी-बारी से माल भरा। पहले गांड में—इतना कि बाहर निकलने लगा। फिर चुत में। फिर मुँह में। कविता का चेहरा, छाती, गांड—सब वीर्य से सना हुआ था।

विक्रम ने उसे वैसे ही फर्श पर छोड़ दिया। खुद उठकर पानी पिया। फिर वापस आकर बोला—“अब उठ। नहा। और तैयार रह। दोपहर में दोबारा चोदूँगा। आज पूरे दिन पाँच बार नहीं… सात बार।”
कविता ने कमजोर आवाज में पूछा—“बेटा… रस्सी… बेल्ट… हर बार?”

विक्रम मुस्कुराया। उसने माँ के बाल सहलाते हुए कहा—“हर बार। और अगली बार चाबुक के साथ मोमबत्ती भी जलाऊँगा। तेरी गांड के छेद में मोम गिराऊँगा। चुत में अदरक डालूँगा। तू चीखेगी… और मैं और जोर से चोदूँगा।”
कविता की आँखों में डर था लेकिन उसकी चुत में फिर से गर्मी उठ रही थी। वह जानती थी—अब वापस जाने का कोई रास्ता नहीं। वह अपने बेटे की पूरी गुलाम बन चुकी थी।

दोपहर में विक्रम वापस आया। इस बार उसके हाथ में मोटी रस्सी, बेल्ट, एक मोमबत्ती और अदरक की फांक थी। कविता पहले से नंगी चारपाई पर बैठी इंतजार कर रही थी।
“आज की सजा शुरू…”

उसने कविता को फिर से रस्सियों से बाँध दिया—हाथ पीछे, टाँगें फैली हुईं। बेल्ट से गांड और चुत पर बीस-बीस वार किए। फिर मोमबत्ती जलाकर गर्म मोम गांड के छेद पर और चुत के होंठों पर गिराई। कविता चीख रही थी, शरीर ऐंठ रहा था। फिर अदरक की फांक चुत में ठूस दी। जलन से कविता पागल हो गई।

“अब ले… दोनों छेद फाड़ूँगा।”
विक्रम ने लंड गांड में घुसाया और चार उँगलियाँ चुत में। फिर मुट्ठी चुत में डाल दी। कविता चीख रही थी लेकिन विक्रम ने दूसरी मुट्ठी गांड में भी डाल दी। दोनों हाथ अंदर। घुमाते हुए।
“देख… अब तू पूरी तरह खुल गई है। अब कुछ भी अंदर जा सकता है।”

उसने मुट्ठियाँ निकालकर अपना लंड दोनों छेद में बारी-बारी से ठूँसा। आखिर में सारा माल एक साथ दोनों में भर दिया। फिर मुँह में भी।
रात तक कविता की चुत और गांड दोनों इतने खुले और सूजे हुए थे कि विक्रम की मुट्ठी आसानी से अंदर चली जा रही थी। उसने मुट्ठी चुत में डालकर घुमाई। कविता चीख रही थी लेकिन विक्रम ने दूसरी मुट्ठी गांड में भी डाल दी। दोनों हाथ अंदर।
“देख… अब तू पूरी तरह खुल गई है। अब कुछ भी अंदर जा सकता है।”

उसने मुट्ठियाँ निकालकर अपना लंड दोनों छेद में बारी-बारी से ठूँसा। आखिर में सारा माल एक साथ दोनों में भर दिया।
कविता थककर बेहोश पड़ी थी। विक्रम उसके बगल में लेट गया। उसने माँ की खुली हुई गांड को सहलाते हुए धीरे से कहा—“कल और नया खेल होगा। आज रात आराम कर ले… कल मैं तुझे कुत्ते की तरह पालतू बनाऊँगा। गर्दन में पट्टा बाँधूँगा। घर के अंदर घुमाऊँगा। और जो कहूँगा वही करेगी। चाबुक, मोम, अदरक, मुट्ठी—सब रोज चलेगा।”

कविता की आँखें बंद थीं लेकिन होंठ हिल रहे थे—“जैसा तू कहे… मालिक…”
विक्रम मुस्कुराया। उसकी उँगली माँ की खुली गांड में फिर से घुस गई।
उस रात से कविता की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई। अब वह सिर्फ माँ नहीं रही थी—वह अपने बेटे की पूरी रांड, गुलाम और खेलने की चीज बन चुकी थी। जिसे वह जब चाहे, जैसे चाहे, जितनी बार चाहे—चोद सकता था, पीट सकता था, फाड़ सकता था। और हर रात अंधेरा गहरा होता था, चीखें गूंजती थीं, और विक्रम की भूख और बढ़ती जाती थी।

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