ट्यूशन वाली मैडम को घर में

एक छात्र ने ट्यूशन वाली मैडम को घर में घसीटा, बाल नोचे, गला दबाया और उसके शरीर को दर्द से चीखते हुए टुकड़े-टुकड़े कर दिया। हर रात नई यातना, नया घाव।

यह कहानी बिल्कुल सच्ची है।मेरा नाम अर्जुन है। उम्र 22 साल। मैं दिल्ली के एक कॉलेज में बी.कॉम फाइनल ईयर का स्टूडेंट हूँ। घर नोएडा सेक्टर-62 में है। ट्यूशन के लिए मैं गाजियाबाद के एक छोटे से फ्लैट में जाता था, जहाँ एक प्राइवेट टीचर रहे थे—राकेश सर। उनकी उम्र करीब 38 साल थी। उनकी पत्नी का नाम था शिखा। उम्र 31। गोरी, लंबे बाल, पतली कमर, और स्तन जो साड़ी के नीचे से भी अपनी मौजूदगी जताते थे।

पहले मेरी नजर क्लास की एक लड़की पर थी। नाम था अंजलि। 20 साल की, गोरी-चिट्टी, टाइट जीन्स और छोटे टॉप में आती थी। जब भी वो बेंच पर बैठती, मेरा 8 इंच लंबा लंड तुरंत खड़ा हो जाता। लेकिन वो सब कुछ बदल गया जिस दिन मैंने पहली बार शिखा को देखा।
उस दिन सुबह 7:45 बजे मैं फ्लैट के गेट पर खड़ा था। दरवाजा खोला तो एक औरत सामने खड़ी थी। दूधिया रंग, होंठ गुलाबी, आँखें गहरी काली। उसने हल्की मुस्कान दी। मेरे लंड ने उसी पल पतलून फाड़ने की कोशिश की। मैंने सिर झुका लिया और अंदर चला गया।

क्लास में 9 लड़कियाँ और मैं अकेला लड़का। राकेश सर आते और पढ़ाते। लेकिन मेरी नजर बार-बार किचन या बेडरूम की तरफ जाती। शिखा कभी चाय लेकर आती, कभी पानी। हर बार उसकी साड़ी की पल्लू थोड़ी सी सरक जाती और मेरी नजर उसके गले से नीचे चली जाती।
कुछ दिनों बाद मैंने जानबूझकर जल्दी पहुँचना शुरू कर दिया। शिखा दरवाजा खोलती और मुस्कुराती। “अर्जुन… आज जल्दी आ गए?” उसकी आवाज में एक नरम-सी नमी होती। मैं सिर्फ सिर हिलाता। अंदर जाते हुए उसका शरीर मेरे शरीर से हल्का सा रगड़ खाता।

एक शाम राकेश सर ने कहा, “कल मैं बाहर जा रहा हूँ। तुम लोग नोट्स रिवाइज कर लेना। शिखा देख लेगी।”
अगले दिन मैं अकेला पहुँचा। बाकी स्टूडेंट्स नहीं आए। शिखा ने दरवाजा खोला। आज उसने हल्की गुलाबी साड़ी पहनी थी। ब्लाउज टाइट था। निप्पल्स साफ उभर रहे थे।
“अंदर आओ,” उसने कहा। आवाज में पहले से ज्यादा गंभीरता थी।

मैं कमरे में बैठा। शिखा किचन से चाय लेकर आई। कप रखते हुए उसकी उंगलियाँ मेरे हाथ से छू गईं। फिर उसने मेरी आँखों में देखा।
“तुम्हारा लंड आज भी खड़ा है ना?”
मैं सन्न रह गया।
उसने खुद ही मेरे घुटनों के बीच हाथ बढ़ाया और पतलून के ऊपर से 8 इंच लंबे तने हुए लंड को दबाया। “इतना बड़ा… और इतना सख्त। रोज मुझे देखकर खड़ा होता है ना?”
मैंने कुछ नहीं कहा। सिर्फ साँस तेज हो गई।

शिखा ने साड़ी की पल्लू गिरा दी। ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले। स्तन बाहर निकल आए—मोटे, सफेद, और गुलाबी निप्पल्स। उसने मेरे हाथ पकड़कर अपने स्तनों पर रख दिए। “जोर से दबा। दर्द होना चाहिए।”
मैंने दबाया। उसने आँखें बंद कर लीं और धीरे से कराह उठी। फिर उसने मेरे बाल पकड़कर अपने स्तनों की तरफ खींच लिया। “चूस। दोनों को। दाँत से काट भी।”

मैंने मुँह लगाया। निप्पल मुँह में लिया और जोर से चूसा। उसने मेरे सिर को और जोर से दबाया। “और जोर से… काट!” मैंने दाँत गड़ा दिए। उसकी चीख निकली, लेकिन उसने मुझे रोका नहीं। बल्कि और जोर से मेरे मुँह को दबाया।
फिर उसने मेरे बाल छोड़कर खुद घुटनों के बल बैठ गई। मेरी पतलून और अंडरवियर एक झटके में नीचे खींच ली। 8 इंच का लंड उसके चेहरे के सामने तना हुआ खड़ा था। शिखा ने जीभ निकाली और लंड की नोक पर धीरे से चाटा। फिर पूरा मुँह खोलकर आधा लंड अंदर ले लिया। गले तक। उसकी आँखों में आँसू आ गए लेकिन उसने रोका नहीं। उल्टे मेरे हाथ पकड़कर अपने बालों में फँसा दिए। “धक्का मार। गले तक ठूस।”

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मैंने दोनों हाथ उसके बालों में फँसाए और जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। लंड उसके गले में अटक-अटक कर जा रहा था। लार बह रही थी। शिखा की आँखें लाल हो गईं, साँसें रुक रुक कर आ रही थीं, लेकिन वो रुकने का इशारा नहीं कर रही थी। बल्कि मेरे कूल्हों को और जोर से अपनी तरफ खींच रही थी।

जब मैंने बाहर निकाला तो उसकी लार लंड पर चमक रही थी। उसने साड़ी पूरी उतार दी। अब वो नंगी थी। चूत के बाल साफ मुंडे हुए थे। होंठ गुलाबी और थोड़े सूजे हुए। उसने खुद ही अपनी टाँगें फैला दीं।
“मेज पर लिटा दो मुझे। और जोर से चोदो। दर्द होना चाहिए।”

मैंने उसे मेज पर लिटाया। टाँगें उसके कंधों पर चढ़ा दीं। लंड की नोक चूत पर रखी। एक ही जोरदार धक्के में पूरा 8 इंच अंदर धँस गया। शिखा की चीख कमरे में गूँज उठी। “आह्ह… माँ…!”
मैंने रुका नहीं। जोर-जोर से धक्के लगाने शुरू कर दिए। मेज हिल रही थी। शिखा के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए। खून निकल आया लेकिन उसने कहा, “और जोर से! मारो! चूत फाड़ दो!”

मैंने उसके गले पर हाथ रखा और हल्का सा दबाया। उसकी आँखें बड़ी हो गईं। मैंने और जोर से दबाया। साँस रुकने लगी तो भी वो सिर हिलाकर इशारा कर रही थी—जारी रखो। मैंने गला दबाए हुए ही चुदाई जारी रखी। उसके चेहरे का रंग बदलने लगा। जब साँस लगभग बंद होने वाली थी तब मैंने हाथ हटाया। उसने जोर से खाँसी और फिर हँस पड़ी। “फिर से… गला दबाकर चोदो।”

मैंने फिर गला दबाया। इस बार ज्यादा देर तक। उसके शरीर में ऐंठन होने लगी। चूत में पानी की बाढ़ आ गई। मैंने गला छोड़ा तो वो जोर से काँपते हुए झड़ गई। पूरा शरीर पसीने से तर।
मैंने उसे पलट दिया। पेट के बल लिटाया। हाथ पीछे करके उसकी साड़ी की पल्लू से बाँध दिए। टight। फिर उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा। लंड फिर से चूत में ठूस दिया। इस बार धक्के और भी क्रूर थे। हर धक्के के साथ उसकी छाती मेज से टकरा रही थी। स्तन दब रहे थे।
“गाँड में डालो,” उसने कर्कश आवाज में कहा।

मैंने लंड बाहर निकाला। थूक लगाकर गाँड के छेद पर रखा। दो जोरदार धक्कों में 8 इंच गाँड के अंदर धँस गया। शिखा की चीख इतनी तेज थी कि दीवारें काँप गईं। मैंने उसके बाल और जोर से खींचे। सिर लगभग पीछे की तरफ मुड़ गया।
“मारो… तोड़ो… गाँड फाड़ दो!”

मैंने बिना दया के धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ उसकी गाँड के छेद से खून की हल्की लकीरें निकलने लगीं। लेकिन शिखा चीख-चीख कर और माँग रही थी। मैंने एक हाथ आगे बढ़ाकर उसके गले पर फिर से दबाया। दूसरे हाथ से उसके स्तनों को मरोड़ने लगा। निप्पल्स को उंगलियों के बीच दबाकर घुमाया।

जब मेरा लंड फटने वाला था तो मैंने उसे फिर पलट दिया। मुँह के अंदर लंड ठूस दिया और पूरा वीर्य उसके गले में उड़ेल दिया। शिखा ने सब निगल लिया। लार और वीर्य उसके ठुड्डी से टपक रहे थे।
लेकिन मैं अभी थमा नहीं था। लंड फिर से सख्त हो गया। मैंने उसे फर्श पर घुटनों के बल बिठाया। हाथ पीछे बाँधे हुए। फिर उसके मुँह में लंड डालकर जोर-जोर से मुँह चोदने लगा। जब थक गई तो मैंने उसे उठाया और दीवार से सटा दिया। एक टाँग ऊपर उठाकर फिर से चूत में लंड घुसेड़ दिया। इस बार धक्के इतने तेज थे कि दीवार पर उसकी पीठ की खरोंचें पड़ गईं।

मैंने उसके दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक हाथ से पकड़े और दूसरे हाथ से उसके गले को दबाए रखा। चुदाई जारी रखी। शिखा की आँखों से आँसू बह रहे थे, लेकिन मुँह से सिर्फ कराहें निकल रही थीं—“और… और मारो…।”
अंत में मैंने उसे फर्श पर गिरा दिया। पेट के बल। गाँड ऊपर उठाई और फिर से गाँड में लंड ठूस दिया। इस बार मैंने उसके बाल इतने जोर से खींचे कि कई बाल टूट गए। जब वीर्य फूटा तो मैंने पूरा गाँड के अंदर ही उड़ेल दिया। फिर लंड बाहर निकालकर उसके मुँह में ठूस दिया ताकि वो अपनी ही गाँड का वीर्य चाटे।

शिखा थक कर फर्श पर लेटी हुई थी। शरीर पर खरोंचें, दाँत के निशान, बाल बिखरे हुए, आँखें सूजी हुई। उसने मुझसे कहा, “कल फिर आना। अगली बार रस्सी और चाबुक भी लाना।”
मैंने कपड़े पहने। बाहर निकला। गली में खड़े होकर साँस ली। शरीर में दर्द था, लेकिन मन में एक अजीब-सी भूख और संतुष्टि दोनों थीं।
उस दिन के बाद मैं रोज जाता रहा। कभी राकेश सर घर होते, कभी नहीं। जब होते तो शिखा चुपचाप मुझे नजरें दिखाती। जब अकेले होते तो कमरा सिसकारियों, थप्पड़ों और चीखों से गूँज उठता।

एक दिन उसने मुझे बेडरूम में बुलाया। वहाँ चारपाई के कोनों पर रस्सियाँ बँधी हुई थीं। उसने खुद को नंगा किया और चारों तरफ रस्सियों से बँधने को कहा। मैंने उसके हाथ-पैर बाँध दिए। फिर उसके मुँह में कपड़ा ठूँस दिया। चाबुक उठाया जो उसने खुद ही अलमारी से निकाला था।
पहली चोट उसकी जाँघ पर पड़ी। लाल निशान उभर आया। दूसरी चोट स्तनों पर। तीसरी चूत के पास। शिखा की आँखें आँसू से भरी थीं लेकिन सिर हिलाकर कह रही थी—जारी रखो। मैंने चाबुक से उसके शरीर के हर हिस्से को लाल कर दिया। फिर लंड निकालकर उसके मुँह का कपड़ा हटाया और गले तक ठूस दिया।

उसके बाद मैंने उसे बँधा हुआ छोड़कर चूत और गाँड दोनों में बारी-बारी से लंड घुसेड़ा। हर धक्के के साथ चाबुक की एक चोट। खून की हल्की धारें बह रही थीं। शिखा की आवाज अब सिर्फ कर्कश कराहें बन चुकी थी।
जब मैं थक गया तो मैंने रस्सियाँ खोलीं। शिखा मेरे पैरों पर गिर पड़ी। मेरे लंड को चूमने लगी। “मालिक… अगली बार और जोर से… मुझे तोड़ दो।”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर उठाया। “तू मेरी रांड है। जब चाहूँगा तब आऊँगा। और जो चाहूँगा करूँगा।”

उसने सिर हिलाया। आँखों में सिर्फ समर्पण था।
उस रात मैं घर लौटा तो शरीर में दर्द था, लेकिन मन में एक नई आग जल रही थी। शिखा अब सिर्फ टीचर की पत्नी नहीं थी। वो मेरी बँधी हुई, पीटी हुई, तोड़ी हुई रांड बन चुकी थी। और मैं उसका मालिक।
शिखा अब सिर्फ राकेश सर की पत्नी नहीं रह गई थी। वो मेरी निजी रांड बन चुकी थी। मैं जब चाहता, फ्लैट के गेट पर खड़ा हो जाता। कभी सुबह 6 बजे, कभी रात के 11 बजे। वो दरवाजा खोलती और बिना एक शब्द कहे अंदर ले जाती। कपड़े उतारने की जरूरत नहीं पड़ती थी। मैं खुद उसके बाल पकड़कर घसीटता हुआ बेडरूम ले जाता।

एक रात मैंने फैसला किया कि आज सीमा पार करनी है। मैंने साथ में मोटी रस्सी, काला टेप, एक लोहे की चेन और एक छोटी चाबुक लाई थी। शिखा ने दरवाजा खोला। उसने सिर्फ एक पतली नाइटी पहनी थी। निप्पल्स साफ उभर रहे थे।
मैंने बिना बात किए उसके बाल पकड़े और अंदर घसीट लिया। दरवाजा लात मारकर बंद किया। फिर उसके मुँह पर जोरदार थप्पड़ जड़ा। गाल लाल हो गया। उसने कुछ नहीं कहा, सिर्फ घुटनों के बल बैठ गई।

“कपड़े उतार,” मैंने हुक्म दिया।
उसने नाइटी ऊपर से उतारी। नंगी हो गई। मैंने रस्सी निकाली। उसके दोनों हाथ पीठ के पीछे बाँध दिए। इतने कसकर कि कलाईयाँ तुरंत लाल हो गईं। फिर उसके टखनों को भी बाँधा और रस्सी को उसके गले से जोड़ दिया। अगर वो ज्यादा हिलती तो गला खुद ही दब जाता।
मैंने उसे फर्श पर पेट के बल गिराया। चाबुक उठाई। पहली चोट उसकी जाँघ की अंदरूनी हिस्से पर पड़ी। लाल रेखा फूट पड़ी। दूसरी चोट सीधे चूत के ऊपर। शिखा की चीख दब गई क्योंकि मैंने उसका मुँह टेप से बंद कर दिया था। तीसरी, चौथी, पाँचवीं… मैंने उसकी पीठ, गाँड, जाँघें, स्तन सब लाल कर दिए। खून की पतली धारें बहने लगीं।

जब उसकी पीठ पूरी तरह लाल हो गई तो मैंने टेप हटाया। लार और आँसू उसके चेहरे पर बह रहे थे।
“अब बोल,” मैंने कहा।
“मालिक… और मारो… मुझे तोड़ दो…”

मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे खींचा और 8 इंच का लंड उसके मुँह में ठूस दिया। गले तक। उसने उल्टी की कोशिश की लेकिन मैंने सिर दबाए रखा। लार नाक और आँखों से निकल रही थी। मैंने दस-बारह जोरदार धक्के लगाए फिर बाहर निकाला।
फिर मैंने उसे चारपाई पर घसीटा। हाथ-पैर फैलाकर चारों कोनों पर बाँध दिए। चेन उसके गले में डालकर चारपाई के सिरहाने से कस दी। अब वो बिल्कुल हिल नहीं सकती थी।

मैंने उसके स्तनों को दोनों हाथों से पकड़ा और जोर से मरोड़ा। निप्पल्स को उंगलियों के बीच दबाकर घुमाया। फिर मुँह लगाकर दाँत गड़ा दिए। खून की बूँदें निकलीं। शिखा चीख रही थी लेकिन आवाज दबी हुई थी क्योंकि चेन गला दबा रही थी।
मैंने लंड चूत पर रखा। एक ही धक्के में पूरा अंदर धँस गया। इतनी जोर से कि चारपाई चरमरा गई। मैंने बिना रुकें धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ उसका शरीर झटका खाता। चेन गले को और कसती। उसका चेहरा लाल हो रहा था।

मैंने एक हाथ से उसके गले की चेन और कस दी। दूसरे हाथ से चाबुक से उसके जाँघों पर मारता रहा। खून और पानी मिलाकर चूत से बह रहा था।
जब वो झड़ने वाली हुई तो मैंने लंड बाहर निकाल लिया। उसने आँखों से विनती की। मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “आज नहीं। आज सिर्फ दर्द।”
मैंने उसे अनबाइंड किया। फिर रस्सी से उसके हाथों को पीठ के पीछे बाँधा और उसे घुटनों के बल बिठाया। उसके मुँह में लंड ठूस दिया और जोर-जोर से मुँह चोदने लगा। जब लार बहुत ज्यादा हो गई तो मैंने उसके बाल पकड़कर खींचा और लंड गाँड में ठूस दिया।

कोई थूक नहीं, कोई तैयारी नहीं। सिर्फ एक जोरदार धक्का। शिखा की चीख इतनी तेज थी कि पड़ोसी सुन सकते थे। लेकिन मैंने परवाह नहीं की। मैंने उसके बाल दोनों हाथों से पकड़े और जानवरों की तरह धक्के लगाने शुरू कर दिए। हर धक्के के साथ उसकी गाँड के छेद से खून निकल रहा था।

मैंने बीस मिनट तक बिना रुके गाँड मारी। फिर वीर्य उसके अंदर उड़ेल दिया। लंड बाहर निकाला तो खून और वीर्य मिलाकर बह रहा था। मैंने उसे पलट दिया और वही खून-मिला लंड उसके मुँह में ठूस दिया।
“चाट। साफ कर।”
उसने आँखों में आँसू लिए हुए चाटा।

उस रात मैंने उसे फर्श पर ही छोड़ दिया। रस्सियों में बँधा हुआ, शरीर खून और वीर्य से सना हुआ। सुबह जब राकेश सर आने वाले थे, तब जाकर मैंने रस्सियाँ खोलीं। शिखा मुश्किल से उठ पाई। उसने मेरे पैर छुए और कहा, “मालिक… कल और जोर से आना।”
अगले तीन हफ्ते मैंने उसे और क्रूर बनाया।

एक दिन मैंने उसके दोनों निप्पल्स में छोटी-छोटी क्लिप्स लगा दीं। चेन से जोड़ दीं। फिर उसे नंगा करके बालकनी में खड़ा कर दिया। रात के 1 बजे। ठंडी हवा में उसके शरीर पर सिहरन दौड़ रही थी। क्लिप्स इतने टight थे कि निप्पल्स नीले पड़ गए थे। मैंने अंदर से खिड़की बंद कर दी और बीस मिनट तक उसे वैसे ही छोड़ दिया। जब वापस लाया तो उसके पैर काँप रहे थे।
मैंने उसे बिस्तर पर लिटाया। क्लिप्स हटाए तो खून निकल आया। मैंने उन घावों पर मुँह लगाकर चूसा। फिर लंड चूत में डालकर इतनी जोर से चुदाई की कि बिस्तर की लकड़ी टूटने की आवाज आने लगी।

एक और दिन मैंने उसके हाथ-पैर बाँधकर उसे उल्टा लटका दिया। कमरे की छत के पंखे से रस्सी बाँधकर। सिर नीचे, पैर ऊपर। खून सिर में जमा होने लगा। मैंने उसके मुँह में लंड ठूस दिया और गले तक धकेलते हुए कहा, “अगर गिरा तो गर्दन टूट जाएगी।”
उसने डर के मारे और जोर से चूसा। मैंने उसकी चूत और गाँड दोनों में बारी-बारी से उंगलियाँ घुसेड़ीं। चार उंगलियाँ एक साथ। फिर पूरा मुट्ठी भरने की कोशिश की। शिखा की चीखें दबी हुई थीं क्योंकि मुँह में लंड था।

जब मैंने उसे उतारा तो वो बेहोश होने के करीब थी। मैंने उसके चेहरे पर थप्पड़ जड़कर होश में लाया और फिर से चोदने लगा।
हर मुलाकात के साथ मेरी क्रूरता बढ़ती गई।
एक रात मैंने उसके पूरे शरीर पर मोमबत्ती का पिघला हुआ मोम टपकाया। स्तनों पर, पेट पर, चूत के ऊपर, गाँड पर। हर बूँद के साथ उसकी चीख निकलती। फिर मैंने उन जले हुए निशानों पर लंड रगड़ा और चोदा।
कभी-कभी मैं उसे राकेश सर के आने से ठीक पहले छोड़ देता। शरीर पर निशान, खून के धब्बे, बाल बिखरे हुए। वो जल्दी से कपड़े पहनती और मुस्कान ओढ़ लेती। लेकिन उसकी आँखों में जो समर्पण था, वो छुप नहीं सकता था।

मैंने उसे सिखा दिया था कि वो मेरी संपत्ति है।
एक दिन मैंने उससे कहा, “आज तुम्हें खुद को और तोड़ना होगा।”
उसने सिर झुका लिया। मैंने उसके हाथ में चाबुक थमा दी।
“अपने स्तनों पर मार। जोर से।”

शिखा ने आँखें बंद कीं और चाबुक अपने ही स्तनों पर जड़ाई। एक, दो, तीन… दस बार। स्तन लाल हो गए, खून की धारें बहने लगीं। फिर मैंने कहा, “अब चूत पर।”
उसने टाँगें फैलाईं और चाबुक अपनी चूत पर मारी। चीख निकल गई लेकिन उसने रोका नहीं। जब उसकी चूत सूज गई और खून आने लगा तब मैंने चाबुक छीन लिया और खुद उसके मुँह में लंड ठूस दिया।

मैंने उसे फर्श पर घसीटा। पेट के बल लिटाया। हाथ-पैर बाँधे। फिर उसके गाँड के छेद में न सिर्फ लंड बल्कि चाबुक का हैंडल भी ठूस दिया। दोनों साथ-साथ। शिखा की आवाज अब सिर्फ जानवरों जैसी कराह बन चुकी थी।
मैंने एक हाथ से उसके बाल पकड़े, दूसरे हाथ से गला दबाया और जानवरों की तरह धक्के लगाते रहे। कमरा खून, पसीने और वीर्य की गंध से भर गया।

जब आखिरकार मेरा वीर्य फूटा तो मैंने पूरा उसके गाँड के अंदर उड़ेल दिया। फिर लंड निकालकर उसके चेहरे पर रगड़ा।
“चाट। अपनी गाँड का स्वाद ले।”
शिखा ने आँखों में आँसू और मुँह में मुस्कान के साथ चाटा।
उस रात जब मैं निकला तो उसने मेरे पैर छुए और फुसफुसाई, “मालिक… मैं अब पूरी तरह तुम्हारी रांड हूँ। जब चाहो तोड़ देना… मार डालना… लेकिन छोड़ना मत।”

मैंने उसके बाल सहलाए।
“तू मेरी है। और मैं तुझे तब तक तोड़ता रहूँगा जब तक तुझमें साँस है।”
बाहर निकलते हुए रात की ठंडी हवा ने मेरे पसीने को सुखाया। लेकिन अंदर जो आग जल रही थी, वो और भड़क गई थी।
शिखा अब सिर्फ एक औरत नहीं थी। वो मेरी क्रूरता की जीवित निशानी बन चुकी थी। और मैं… उसका निर्दयी मालिक।

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